तिरुवनंतपुरम में बीते दिनों केरल के जल संसाधन मंत्री रोशी ऑगस्टीन ने केआईआईडीसी) द्वारा संचालित कंपनी हिली एक्वा द्वारा बायोडिग्रेडेबल बोतलों में पानी की बिक्री औपचारिक शुरुआत की। 

 

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पर्यावरण

बायो प्लास्टिक की बोतल में पानी की पैकिंग से प्रदूषण पर लगाम लगाने की अनूठी पहल

केरलम के बैक वाटर्स में पानी की प्‍लास्टिक बोतलों के कचरे को खत्‍म करने के लिए तीन कंपनियों ने पेश किया नया इको-फ्रेंडली विकल्‍प

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर का तेजी से बढ़ता बाजार दुनिया भर में प्लास्टिक प्रदूषण की एक बड़ी वजह बन चुका है। हर साल अरबों प्लास्टिक की बोतलें इस्तेमाल होने के बाद कूड़े के ढेर, नदियों, झीलों और समुद्रों में पहुंच जाती हैं। इनमें से बड़ी संख्या कभी रिसाइकिल नहीं हो पाती और धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक में बदलकर पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए खतरा बन जाती है। इसका एक इको-फ्रेंडली समाधान हाल ही में केरलम में देखने को मिला। यहां दो निजी कंपनियों और सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी ने बायो प्‍लास्टिक की बोतलों में पेयजल मुहैया करा कर पेश किया है। 

सरकारी कंपनी हिली एक्वा और दो स्टार्टअप कंपनियों ग्रीन बायो बकवा ने इस दिशा में कदम बढ़ाया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केरल सिंचाई अवसंरचना विकास निगम (केआईआईडीसी) द्वारा संचालित हिली एक्वा एक पायलट प्रोजेक्‍ट के तहत 300 मिलीलीटर की बायोडिग्रेडबल बोतलों में पानी उपलब्ध कराना शुरू किया है। बीते दिनों केरल के जल संसाधन मंत्री रोशी ऑगस्टीन ने तिरुवनंतपुरम में बायोडिग्रेडेबल बोतलों में पानी की बिक्री का आधिकारिक तौर पर शुभारंभ किया। इस मौके पर उन्‍होंने बताया कि वर्तमान में हिली एक्वा उत्पादों का निर्माण थोडुपुझा और अरुविक्करा के संयंत्रों में किया जा रहा है। आने वाले महीनों में कट्टप्पना और अलुवा में नई सुविधाओं को चालू करने की योजना है। इसके बाद पांचवां संयंत्र कोझिकोड जिले के पेरुवन्नामुझी में चकित्तापारा में शुरू करने की तैयारी है।

दूसरी ओर, ग्रीन बायो व बकवा आधे व एक लीटर की बोतलों में व्‍यावसायिक स्‍तर पर पानी बेच रही हैं। यह कंपनियां गन्ने और कॉर्न स्टार्च से बने पॉलीलैक्टिक एसिड (पीएलए) प्रीफॉर्म के उपयोग से निर्मित बायोप्लास्टिक की बोतलों में पैकेज्ड पानी उपलब्ध कराना शुरू किया है। दावा है कि ये बोतलें उपयोग के बाद लगभग 180 दिनों में जैविक रूप से अपघटित होकर मिट्टी में मिल जाती हैं।

बकवा की बात करें, तो इसकी शुरुआत अश्विन, एलेन और बेसल नाम के तीन दोस्तों ने की। इन्‍होंने केरल के बैकवाटर्स में तैरती प्लास्टिक की बोतलों को देखकर इस बात को समझ लिया कि केवल सफाई अभियान चलाने से समस्या खत्म नहीं होगी। उन्‍हें यह बात भी समझ में आ चुकी थी कि स्‍थायी समाधान के लिए समस्‍या की जड़ तक जाना होगा। यानी कभी न खत्‍म होने वाले प्‍लास्टिक का समाधान ढूंढ़ना होगा। तकरीबन ऐसी ही सोच  ग्रीन बायो नाम से ऐसा ही स्‍टार्टअप शुरू करने वाले प्रदीप कोक्कट और अली असगर की भी रही। कई महीनों की रिसर्च के बाद आखिरकार इन लोगों इसका एक कारगर रास्‍ता बायो प्‍लास्टिक के रूप में मिल गया। 

अपने-अपने स्‍तर पर लंबे आरएंडडी और प्रयोगों के बाद इन तीनों कंपनियों ने ऐसी बायोडिग्रेडेबल बोतल विकसित की, जो उपयोग के दौरान तो टिकाऊ व मजबूत रहती हैं, लेकिन फेंके जाने के बाद प्राकृतिक परिस्थितियों में कुछ महीनों के भीतर टूटकर मिट्टी का हिस्सा बन जाती हैं। इन्‍होंने पानी की पैकेजिंग के लिए ऐसी ही बायोडिग्रेडबल बोतले तैयार कीं, जो फेंके जाने पर कुछ ही महीनों में नष्‍ट (अपघटित) होकर मिट्टी में मिल जाएं। यह बोतलें प्‍लास्टिक या किसी भी सिंथेटिक मैटेरियल के बजाय गन्‍ने के रेशों और कॉर्न स्‍टार्च से बनाए गए पॉलीलैक्टाइड (पीएलए) से बनी होती हैं, जिसे आमतौर पर बायो प्‍लास्टिक के नाम से जाना जाता है। यह बायो डिग्रेडेबल मै‍टेरियल होने के कारण बोतलें पूरी तरह से प्राकृतिक और काफी कम समय में नष्‍ट हो जाने वाली होती हैं। एक खास प्रक्रिया से बनी होने के कारण यह काफी समय तक पानी को होल्‍ड करने की क्षमता भी रखती हैं। 

क्‍यों पानी में गलता नहीं कॉर्न स्टार्च, क्‍या है इसका विज्ञान?

पहली नज़र में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि बोतल कॉर्न स्टार्च जैसे पानी में घुलनशील पदार्थ से बनी है, तो पानी भरने पर बोतल गल क्यों नहीं जाती? इस सवाल का जवाब है एक विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया, जो स्‍टार्च को गलने से बचाती है।

असल में यह बोतल कच्चे स्टार्च से नहीं बनती। कॉर्न स्टार्च को विशेष रासायनिक और तापीय प्रक्रिया से संसाधित (Processing) करके  उसे संशोधित स्टार्च (Modified Starch) में बदल दिया जाता है। इस प्रक्रिया में स्टार्च के अणुओं की संरचना बदल जाती है और वे पानी में घुलने के बजाय एक मजबूत पॉलीमर नेटवर्क का हिस्सा बन जाते हैं। इसके बाद इसे गन्ने से प्राप्त बायोपॉलिमर, प्राकृतिक रेजिन और अन्य जैव-आधारित पदार्थों के साथ मिलाकर एक नया कंपोजिट मैटेरियल तैयार किया जाता है। आगे का काम आसान है क्‍योंकि बोतलों का निर्माण सामान्य प्लास्टिक उद्योग में इस्तेमाल होने वाली इंजेक्शन मोल्डिंग और ब्लो मोल्डिंग तकनीक से किया जाता है। इस तरह बनाई गई बोतलें देखने और इस्तेमाल करने में प्लास्टिक जैसी ही लगती हैं, लेकिन प्‍लास्टिक के विपरीत यह आसानी से विघटित हो जाती हैं और अपने पीछे केवल पानी, कार्बन डाईऑक्‍साइड (CO2) और जैव द्रव्यमान (Biomass) छोड़ती हैं।

इस बोतल की सबसे दिलचस्प विशेषता यही है कि यह अपने उपयोग के दौरान पूरी तरह स्थिर रहती है। इसमें कई महीनों तक पानी सुरक्षित रखा जा सकता है। सामान्य तापमान पर इसमें न तो रिसाव होता है और न ही इसकी मजबूती पर कोई असर पड़ता है। लेकिन, जब यह उपयोग के बाद मिट्टी, नमी, ऑक्सीजन और प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आती है तो इसकी जैविक संरचना धीरे-धीरे टूटने लगती है। यही प्रक्रिया इसे सामान्य प्लास्टिक से अलग बनाती है। जहां पारंपरिक पीईटी बोतल को पूरी तरह खत्म होने में सैकड़ों वर्ष लग सकते हैं, वहीं बायोडिग्रेडेबल बोतल कुछ महीनों में प्राकृतिक चक्र का हिस्सा बन जाती है। इस तरह यह इको फ्रेंडली बोतलें प्रदूषण फैलाने के बजाय मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाने का काम करती हैं।

केवल बोतल नहीं, पूरी पैकेजिंग है इको फ्रेंडली

इन बोतलों को बनाने वाली कंपनी प्‍लास्टिक प्रदूषण का कामचलाऊ समाधान तलाशने के बजाय समस्‍या को जड़ से खत्‍म करना चाहती थी। इसलिए स्टार्टअप ने केवल बोतल बदलने तक खुद को सीमित नहीं रखा। अकसर देखने में आता है कि किसी उत्पाद की मुख्य पैकेजिंग तो पर्यावरण अनुकूल होती है, लेकिन उसका ढक्कन, लेबल या चिपकाने वाला गोंद फिर भी प्लास्टिक आधारित होता है। इस स्टार्टअप ने इस कमी को भी दूर करने की कोशिश की है। बोतल के साथ उसका कैप और लेबल भी बायोडिग्रेडेबल सामग्री से तैयार किए गए हैं। यानी पूरी पैकेजिंग का उद्देश्य एक ही है उपयोग के बाद पर्यावरण पर न्यूनतम बोझ छोड़ना, ताकि पूरी पैकेजिंग पर्यावरण पर न्यूनतम प्रभाव छोड़े। इसलिए इस पहल में संपूर्ण पैकेजिंग में बायोडिग्रेडेबल सामग्री का ही इस्‍तेमाल किया गया है।

गन्‍ने के रेशों और कॉर्न स्‍टार्च से बनाए गए पॉलीलैक्टाइड (पीएलए) से बनी बायो प्‍लास्टिक बोतलें, जो पूरी तरह से बायो डिग्रेडेबल होती हैं। 

नया बिजनेस मॉडल : महंगी लागत विज्ञापन से हुई कवर 

नई तकनीक से प्‍लास्टिक बोतलों का इको फ्रेंडली समाधान करने वाले इस प्रयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हुई इन बायोडिग्रेडबल बोतलों की भारी-भरकम आर्थिक लागत थी। शुरुआती दौर में एक बोतल की कॉस्‍ट करीब 30 रुपये तक बैठ रही है। जबकि, पानी की पैकेजिंग में आमतौर पर इस्‍तेमाल होने वाली पेट बोतलों की कीमत पांच रुपये के आसपास बैठती है। यानी इससे छह गुनी कम। ज़ाहिर है कि इतनी महंगी बोतल का इस्‍तेमाल करके साथ बाजार में टिके रहना आसान नहीं है। ऐसे में इन युवा उद्यमियों ने विदेशों में प्रचलित स्‍पॉनसरशिप का अनूठा बिजनेस मॉडल अपना कर इसका समाधान निकाला। उन्होंने बोतल को केवल पानी बेचने का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे विज्ञापन का माध्‍यम बना दिया। कंपनियों और आयोजनों के प्रचार वाले लेबल पानी की इन बोतलों पर लगाए जाने लगे। इस तरह इन विज्ञापनों से मिलने वाली आय ने बोतलों की अधिक उत्पादन लागत के एक हिस्‍से को कवर कर लिया। इस तरह यह इको फ्रेंडली पानी की बोतलें अपेक्षाकृत कम कीमत पर ग्राहकों तक पहुंचने लगीं। इस तरह व्यावसायिक नवाचार वाले इस अनूठे बिजनेस मॉडल ने पर्यावरण संरक्षण की राह को कुछ हद तक आसान कर दिया।

बड़े पैमाने पर उत्पादन से और घट सकती है कीमत

कारोबार का नियम है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत कम हो जाती है। इसलि उम्‍मीद की जा रही है कि जैसे-जैसे इस पहल को सफलता मिलेगी और उत्‍पादन बड़े पैमाने पर होने लगेगा, वैसे-वैसे लागत घटती जाएगी। बड़ी मात्रा में कच्चे माल की खरीद से लागत कम होगी और निर्माण प्रक्रिया अधिक दक्ष बनेगी। 

तब इन बोतलों की कीमत भी तेजी से घट सकती है। हाल के वर्षों में इसका उदाहरण सौर ऊर्जा, एलईडी बल्ब और इलेक्ट्रिक वाहनों में पहले ही देखा जा चुका है। जो तकनीक कभी महंगी मानी जाती थी, वही आज आसानी से आम लोगों की पहुंच में है। इन बायोडिग्रेडबल बोतलों के साथ भी ऐसा हो सकता है।  यदि बड़े पैमाने पर मांग पैदा करने में सफलता मिलती है, तो बायोप्लास्टिक बोतलों के साथ भी यही बदलाव संभव है।

पैकेज्ड वाटर उद्योग में आ सकता है बड़ा बदलाव

दुनिया में हर मिनट लाखों प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं। इनमें से बड़ी संख्या कभी रिसाइकिल नहीं हो पाती। यही बोतलें नदियों, समुद्रों और लैंडफिल में पहुंचकर धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक का रूप ले लेती हैं।

यदि पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर उद्योग का एक बड़ा हिस्सा भी बायोडिग्रेडेबल बोतलों की ओर बढ़ता है तो एकल-उपयोग प्लास्टिक की खपत में उल्लेखनीय कमी आ सकती है। इससे कचरा प्रबंधन पर दबाव घटेगा, समुद्री प्रदूषण कम होगा और माइक्रोप्लास्टिक बनने की प्रक्रिया भी काफी हद तक नियंत्रित की जा सकेगी।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि किसी भी बायोडिग्रेडेबल उत्पाद को खुले वातावरण में फेंकना उचित नहीं है। बेहतर परिणाम तभी मिलेंगे जब उसके संग्रहण और जैविक अपघटन की उचित व्यवस्था भी विकसित की जाए।

नीतिगत स्तर पर क्या करने की जरूरत है

यदि सरकारें वास्तव में एकल-उपयोग यानी सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग पर लगाम लगाकर प्रदूषण को कम करना चाहती हैं, तो केवल प्रतिबंध लगाने से काम नहीं चलेगा। उन्हें इसके लिए पर्यावरण अनुकूल विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे। इसके लिए बायोप्लास्टिक उत्पाद बनाने वाली इकाइयों को कर छूट, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) में आर्थिक सहायता और उत्पादन आधारित वित्‍तीय प्रोत्साहन दिया जा सकता है। सरकारी कार्यक्रमों, रेलवे, हवाई अड्डों, पर्यटन स्थलों और सरकारी आयोजनों में पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग को प्राथमिकता दी जाए तो ऐसे उत्पादों के लिए बड़ा बाजार तैयार हो सकता है।

साथ ही भारत में बायोडिग्रेडेबल और कम्पोस्टेबल उत्पादों के लिए सख्त गुणवत्ता मानक लागू करना भी जरूरी है, ताकि बाजार में केवल वास्तविक पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद ही पहुंचें।

बदलाव में लोगों की भागीदारी जरूरी

लोगों को यह बात समझनी होगी कि प्रदूषण घटाने और पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या उद्योग की नहीं है। बल्कि उपभोक्ता के तौर पर लोग स्‍वयं भी इसमें बराबर के भागीदार हैं। यदि हम केवल सबसे सस्ता उत्पाद खरीदने की मानसिकता से बाहर निकलें और पर्यावरण के अनुकूल विकल्पों को अपनाएं, तो उद्योग भी उसी दिशा में आगे बढ़ेगा।

संभव है कि शुरुआत में ऐसी बोतल के लिए कुछ रुपये अधिक खर्च करने पड़ें। लेकिन यह अतिरिक्त कीमत दरअसल स्वच्छ नदियों, कम प्लास्टिक कचरे और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर पर्यावरण में किया गया निवेश होगी।

केरल के तीन युवाओं का यह प्रयोग केवल एक नई बोतल बनाने की कहानी नहीं है। यह उस सोच का उदाहरण है जो कहती है कि प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या का समाधान केवल कचरा उठाने में नहीं, बल्कि कचरा बनने से पहले ही उसका विकल्प तैयार करने में है। यदि ऐसे प्रयोगों को समाज, उद्योग और सरकार का साथ मिला, तो भविष्य में पैकेज्ड पानी की हर बोतल केवल प्यास ही नहीं बुझाएगी, बल्कि धरती का बोझ भी हल्का करेगी।

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