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पर्यावरण

दिल्ली के AQI में सुधार, लेकिन हवा वास्तव में साफ हुई या नहीं ताज़ा अध्ययन में जानें 

Author : सयाली पराते

दिल्ली में वायु प्रदूषण लंबे समय से एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती बना हुआ है। विशेष रूप से सितंबर और अक्टूबर के महीनों में पंजाब एवं हरियाणा में फसल अवशेष जलाने, मौसम में बदलाव और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण वायु गुणवत्ता पर व्यापक चर्चा होती है। 

सामान्यतः यह माना जाता है कि पराली जलाने की घटनाओं में कमी आने से दिल्ली की हवा साफ होती है, जबकि कम वर्षा और कमजोर वायुमंडलीय मिश्रण प्रदूषण को बढ़ा सकते हैं। लेकिन क्या वास्तव में वायु गुणवत्ता में होने वाले बदलावों को केवल एक कारण से समझा जा सकता है?

दिल्ली में स्थित पर्यावरण संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स द्वारा 28 अक्टूबर 2026 को जारी ताज़ा अध्ययन, “El Nino, Crop-Residue Burning in Punjab and Haryana, and Delhi’s Air Quality- A Multi-Year Assessment (2024-2026)” इसी का विश्लेषण करता है।

इसमें 2024, 2025 और 2026 के दौरान दिल्ली के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI), पंजाब एवं हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं तथा वर्षा, तापमान और हवा की गति जैसे मौसमी कारकों की तुलना की गई है। रिपोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह है कि 2026 में दिल्ली का औसत AQI बेहतर हुआ, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि शहर की सामान्य दैनिक वायु गुणवत्ता में व्यापक सुधार हुआ है।

15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच दिल्ली का AQI 

रिपोर्ट के अनुसार,15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 2025 की तुलना में केवल 4% की कमी आई, जबकि इसी अवधि में दिल्ली का औसत AQI 15.8% गिरकर 169.3 से 142.6 पर आ गया। 

इसके साथ ही, पराली की आग और दिल्ली के AQI के बीच सांख्यिकीय संबंध पिछले वर्ष के 0.62 से घटकर इस वर्ष केवल 0.17 रह गया, जो तीन वर्षों में सबसे कमजोर है। इससे स्पष्ट होता है कि इस वर्ष दिल्ली की वायु गुणवत्ता में आए बदलाव को केवल पराली जलाने में कमी के आधार पर नहीं समझा जा सकता। 

औसत AQI में गिरावट के बावजूद सामान्य दिनों की हवा की गुणवत्ता वास्तव में खराब हुई। AQI की मध्यिका 135 से बढ़कर 154 हो गई, यानी 14.1% की वृद्धि हुई। हां यह जरूर है कि दिल्ली में अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों की संख्या कम हुई है। AQI इस वर्ष केवल तीन दिन 200 के पार गया, जबकि पिछले वर्ष ऐसे 10 दिन थे।

इसी तरह, इस वर्ष AQI 300 के पार नहीं पहुंचा जबकि पिछले वर्ष यह 353 तक गया था। मौसम के आंकड़े भी इस गिरावट को समझने में सवाल खड़े करते हैं। प्रदूषण को जमीन के पास रोककर रखने वाली वायुमंडलीय सीमा-परत की उंचाई 4.3% कम रही और वर्षा में पिछले वर्ष की तुलना में 78.2% की गिरावट दर्ज की गई, जबकि कम वर्षा और निचली सीमा-परत आम तौर पर प्रदूषण के जमाव को बढ़ावा दे सकती हैं। 

यह स्थिति ऐसे समय में सामने आई है, जब NOAA के अनुसार El Nino के जनवरी से मार्च 2027 तक मजबूत बने रहने की संभावना 83% से अधिक बताई गई है। कुल मिलाकर, आंकड़े संकेत देते हैं कि दिल्ली के औसत AQI में सुधार को सामान्य दिनों की हवा में वास्तविक सुधार नहीं समझना चाहिए। इसके पीछे के कारणों को समझने के लिए पराली के साथ-साथ मौसम और प्रदूषण के अन्य स्रोतों की भूमिका का भी आकलन आवश्यक है।

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाएं

रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली के वायु प्रदूषण की चर्चा में पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष जलाने की घटनाओं को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। 15 सितंबर से 15 अक्टूबर तक दोनों राज्यों में दर्ज आग की घटनाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

वर्ष 2024 में दोनों राज्यों में कुल 1,672 आग की घटनाएं दर्ज की गईं। वर्ष 2025 में यह संख्या घटकर 201 रह गई, अर्थात् लगभग 88 प्रतिशत की कमी आई। वर्ष 2026 में कुल घटनाओं की संख्या 193 रही, जो 2025 की तुलना में लगभग 4 प्रतिशत कम थी। इस तरह, 2026 में आग की घटनाएं 2024 की तुलना में लगभग 88.5 प्रतिशत कम थीं।

हालांकि, इन आंकड़ों के साथ दिल्ली की वायु गुणवत्ता में होने वाले बदलावों की तुलना करने पर एक दिलचस्प स्थिति सामने आती है। 2024 से 2025 के बीच पराली जलाने की घटनाओं में भारी कमी आई, लेकिन दिल्ली का औसत AQI केवल 3.9 प्रतिशत घटा। इसके विपरीत, 2025 से 2026 के बीच आग की घटनाओं में केवल 4 प्रतिशत की कमी के बावजूद औसत AQI 15.8 प्रतिशत कम हो गया।

यह अंतर बताता है कि दिल्ली के प्रदूषण को केवल पराली जलाने की घटनाओं के आधार पर नहीं समझा जा सकता। हवा की दिशा, प्रदूषकों के परिवहन, स्थानीय यातायात, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियों से उठने वाली धूल और अन्य स्रोत भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

वर्षा में कमी और वायु प्रदूषण का संबंध

रिपोर्ट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वर्षा और वायु गुणवत्ता के बीच संबंध पर केंद्रित है। वर्षा वायुमंडल में मौजूद कुछ धूल और प्रदूषक कणों को नीचे लाने में सहायता करती है। इस प्रक्रिया को आर्द्र निक्षेपण (Wet Deposition) कहा जाता है। इसलिए कम वर्षा होने पर हवा से प्रदूषक कणों को हटाने की यह प्राकृतिक प्रक्रिया सीमित हो सकती है।

रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, पंजाब में 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच कुल वर्षा 2024 में 17.5 मिलीमीटर, 2025 में 42.5 मिलीमीटर और 2026 में 36.0 मिलीमीटर रही। हरियाणा में इसी अवधि के दौरान वर्षा क्रमशः 36.1, 48.8 और 33.6 मिलीमीटर दर्ज की गई। इन आंकड़ों से पता चलता है कि 2025 की तुलना में 2026 में दोनों राज्यों में वर्षा कम हुई।

दिल्ली के लिए रिपोर्ट में प्रस्तुत मौसम मॉडल के अनुसार, 15 सितंबर से 23 अक्टूबर के बीच संचित वर्षा 2025 में 46.70 मिलीमीटर थी, जो 2026 में घटकर 10.19 मिलीमीटर रह गई। यह लगभग 78.2 प्रतिशत की कमी है। इसके बावजूद दिल्ली का औसत AQI बेहतर हुआ।

यह स्थिति दर्शाती है कि कम वर्षा के बावजूद वायु गुणवत्ता में सुधार हो सकता है। हवा की गति में मामूली वृद्धि और क्षेत्रीय वायुमंडलीय मिश्रण प्रदूषकों के फैलाव में योगदान दे सकते हैं। फिर भी, रिपोर्ट यह स्थापित नहीं करती कि AQI में आई कमी का कितना हिस्सा प्रत्येक कारक के कारण था।

El Nino और बदलती मौसमी परिस्थितियां

El Niño एक जलवायु घटना है, जो भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों में समुद्र की सतह के सामान्य से अधिक गर्म होने से संबंधित है। यह वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित कर सकती है और विभिन्न क्षेत्रों में वर्षा, तापमान तथा मौसम के स्वरूप में बदलाव ला सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस वर्ष 2026 में El Nino मजबूत हो रहा था। इसी अवधि में दिल्ली में वर्षा कम हुई और वायुमंडल की औसत सीमा-परत की ऊंचाई (Planetary Boundary Layer Height) 2025 के 846 मीटर से घटकर 2026 में लगभग 810 मीटर रह गई। कम ऊंचाई वाली सीमा-परत कुछ परिस्थितियों में प्रदूषकों के फैलाव को सीमित कर सकती है।

दूसरी ओर, दिल्ली में औसत हवा की गति 2.40 मीटर प्रति सेकंड से बढ़कर 2.45 मीटर प्रति सेकंड हुई। हवा की गति में यह मामूली वृद्धि प्रदूषकों को फैलाने में मदद कर सकती है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव हवा की दिशा और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

इन परिणामों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि El Nino ने सीधे दिल्ली के AQI में सुधार या गिरावट पैदा की। रिपोर्ट स्पष्ट करती है कि जलवायु परिस्थितियों, पराली जलाने और दिल्ली की वायु गुणवत्ता के बीच संबंध अलग-अलग वर्षों में बदल सकता है।

प्रदूषण नियंत्रण के लिए व्यापक दृष्टिकोण

रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि दिल्ली की वायु गुणवत्ता में सुधार के लिए केवल पराली जलाने की घटनाओं पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। कृषि अवशेषों के बेहतर प्रबंधन के साथ-साथ यातायात, औद्योगिक उत्सर्जन, सड़क एवं निर्माण की धूल और कचरा जलाने जैसी गतिविधियों को भी संबोधित करना आवश्यक है।

इसके अलावा, वर्षा, मिट्टी की नमी, फसल कटाई के समय, हवा की दिशा और वायुमंडलीय मिश्रण के आंकड़ों का नियमित अध्ययन किया जाना चाहिए। कई वर्षों के आंकड़ों के आधार पर ही यह बेहतर ढंग से समझा जा सकता है कि वायु प्रदूषण में होने वाले बदलावों के पीछे किन कारकों की कितनी भूमिका है।

इस सम्बन्ध में डॉ. साग्निक डे, प्रमुख, सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक साइंसेज, IIT दिल्ली, कहते हैं, El Nino को वायु प्रदूषण का सीधा संकेतक नहीं मान सकते। इसका असर स्थानीय बारिश, तापमान, हवाओं और वायुमंडलीय स्थितियों पर निर्भर करता है। मौसम के प्रभाव और मानवीय गतिविधियों से होने वाले प्रदूषण को अलग-अलग समझना जरूरी है।

इस अध्ययन की एक सीमा यह भी है कि कुछ मौसमी आंकड़े NOAA के Global Forecast System (GFS) मॉडल पर आधारित हैं। यह रिपोर्ट दिल्ली की वायु गुणवत्ता को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। 2026 में औसत AQI और अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों की संख्या में कमी आई, लेकिन माध्यिका AQI में वृद्धि से पता चलता है कि सामान्य दिन की हवा पहले से अधिक प्रदूषित रही।

पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी, दिल्ली में वर्षा का कम होना, हवा की गति में मामूली वृद्धि और El Nino जैसी जलवायु परिस्थितियां इस पूरे परिदृश्य के अलग-अलग हिस्से हैं। इनमें से किसी एक को प्रदूषण में बदलाव का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।

वास्तविक सुधार तभी संभव है, जब वायु प्रदूषण को एक व्यापक पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखा जाए और कृषि, परिवहन, उद्योग, शहरी नियोजन तथा मौसम संबंधी कारकों पर एक साथ काम किया जाए। दिल्ली की हवा को स्वच्छ बनाने के लिए केवल गंभीर प्रदूषण वाले दिनों की संख्या घटाना पर्याप्त नहीं है, सामान्य दिनों में सांस लेने योग्य स्वच्छ हवा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

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