महेंद्र हिल्स में स्थित, 'हिल टॉप कॉलोनी' पठार की प्राकृतिक ढलान पर फैली हुई है। यह हैदराबाद के उत्तर-पश्चिमी इलाकों से अलग है, जहाँ ज़मीन को समतल कर दिया गया है।
चित्र: प्रोजेक्ट जलम
हिल टॉप कॉलोनी में जलभराव, रिसती पाइपलाइनें और खतरनाक ढलान लोगों के लिए बड़ी समस्या थीं।
‘प्रोजेक्ट जलम’ ने सीढ़ीदार रास्ते और बेहतर जल निकासी से पानी के बहाव को नियंत्रित किया।
1.75 लाख रुपये की इस पहल ने छोटे स्थानीय समाधानों की प्रभावशीलता साबित की।
परियोजना ने सुरक्षित रास्तों के साथ सामुदायिक मेलजोल के लिए भी जगह बनाई।
यह पहल दिखाती है कि जलवायु अनुकूलन स्थानीय भागीदारी और छोटे हस्तक्षेपों से भी संभव है।
हैदराबाद के उत्तर-पूर्वी हिस्से में, महेंद्र हिल्स पर बसी हिल टॉप कॉलोनी एक पथरीले पठार पर फैली हुई है। कभी यही चट्टानी भू-दृश्य शहर की पहचान हुआ करता था। यह उस समय की बात है, जब बड़े एक्सप्रेसवे, कांच की ऊंची इमारतें और आईटी कॉरिडोर हैदराबाद की तस्वीर का हिस्सा नहीं हुआ करते थे। तब यहां की बस्तियां ढलानों और चट्टानी उभारों के साथ तालमेल बिठाते हुए विकसित हुई थीं। वे जमीन के प्राकृतिक स्वरूप को मिटाकर नहीं, बल्कि उसे अपनाकर आगे बढ़ी थीं।
समय के साथ शहर का विस्तार हुआ और विकास का ध्यान नए इलाकों और आधुनिक बुनियादी ढांचे की ओर केंद्रित हो गया। ऐसे में हिल टॉप कॉलोनी जैसे मोहल्ले शहर के विकास की मुख्य धारा से पीछे छूटते गए। आज ये इलाके असमान शहरी विकास का बोझ झेल रहे हैं, जिसे अक्सर तरक्की की चमक-दमक के बीच नजरअंदाज कर दिया जाता है।
कॉलोनी के युवा निवासी अंकुति शिवा के लिए सबसे बड़ी चुनौती शहर में अवसर तलाशना नहीं थी, बल्कि घर लौटना था। उनका परिवार लगभग तीस साल पहले हिल टॉप कॉलोनी में आकर बसा था।
कॉलोनी के युवा निवासी अंकुति शिवा के लिए सबसे बड़ी चुनौती शहर में अवसर तलाशना नहीं थी, बल्कि घर लौटना था। लगभग तीन दशक पहले उनका परिवार हिल टॉप कॉलोनी में आकर बसा था। भारत के शहरों में बिना किसी योजना और परियोजना के ख़ुद से बस गईं बस्तियों में रहने वाले अनगिनत परिवारों की तरह, उनके परिवार ने भी धीरे-धीरे कमरे-दर-कमरे अपना घर खड़ा किया था।
अंकुति से उम्मीद की जाती थी कि वे अपने माता-पिता से आगे बढ़ेंगे, ज़्यादा कमाएंगे, तरक़्क़ी करेंगे और अपने लिए एक अधिक सुरक्षित भविष्य बनाएंगे। लेकिन दिन के ख़त्म होने के बाद अक्सर वापस घर लौटना ही उनके लिए सबसे मुश्किल साबित होता था।
हिल टॉप कॉलोनी में घर तक पहुंचने का आखिरी रास्ता एक खड़ी और टूटी-फूटी ढलान था, जहाँ खुले पाइप, ढीले पत्थर और बरसाती पानी रोज़मर्रा की आवाजाही को जोखिम भरा बना देते थे।
हर साल मानसून आते ही, उनके घर तक जाने वाला संकरा रास्ता पानी में डूब जाता था। घर तक जाने वाली खड़ी ढलान वाली सड़क की हालत पहले से ही ख़स्ता थी और बारिश के बाद तो धीरे-धीरे कटती जा रही थी। उसी ढलान के किनारे पानी की खुली पाइपलाइनों का जाल बिछा था। जिनसे अक्सर रिसाव होता रहता था। रास्ते पर बिखरे पत्थर और टूटा हुआ कंक्रीट पैरों के नीचे आ जाते थे।
तेज बारिश के दौरान बरसाती पानी, गंदे पानी और सीवर के बहाव के साथ मिलकर ढलान से नीचे की ओर तेज़ी से बहने लगता था। यह पानी कई घरों में घुस जाता था, उनकी नींव को कमजोर करता और लोगों के लिए अपने घर से निकलना और वापस घर लौटना ख़तरनाक हो गया था।
अंकुति के लिए शहर में काम और अवसरों तक पहुंचने का रास्ता जितना आसान था, घर लौटना उतना ही मुश्किल। कई बार घर पहुंचने के लिए उन्हें फिसलन भरे रास्तों, गंदे पानी और टूटी-फूटी सड़क के बीच से होकर गुजरना पड़ता था।
अंकुति और हैदराबाद की ऐसी अनेक बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए यह कोई कभी-कभार होने वाली परेशानी नहीं, बल्कि रोजमर्रा की हकीकत है। यहां आवाजाही केवल एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने का मामला नहीं है। यह पानी, कचरे और खड़ी ढलानों से लगातार जूझते रहने की कहानी है।
ऐसे हालात बताते हैं कि जब शहरों का विकास एक जैसा नहीं होता और मौसम की मार लगातार बढ़ती जाती है, तो बुनियादी सुविधियां कितनी जल्दी जवाब देने लगती हैं।
हैदराबाद के घने इलाकों में, सड़क एक ही समय में घर, बाज़ार और वर्कशॉप बन जाती है।
हिल टॉप कॉलोनी कोई अपवाद नहीं है। अंकुति के घर के बाहर का टूटा-फूटा रास्ता दरअसल भारत के कई शहरों की एक बड़ी समस्या की झलक है। यहां पानी सिर्फ एक संसाधन नहीं, बल्कि लोगों की आवाजाही, स्वास्थ्य, रोज़गार और जरूरी सेवाओं तक पहुंच को भी प्रभावित करता है।
इस बस्ती के लोगों को पानी से जुड़ी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। पहाड़ी ढलान पर घर एक-दूसरे से सटे हुए बने हैं, जिससे बुनियादी सुविधाओं में सुधार के लिए बहुत कम जगह बचती है। मानसून के दिनों में बारिश का पानी ढलान से तेजी से नीचे बहता है। कई बार इसमें सीवर और घरों से निकलने वाला गंदा पानी भी मिल जाता है। फिर यही पानी उन्हीं संकरी कच्ची गलियों से गुजरता है, जिनका इस्तेमाल लोग आने-जाने के लिए करते हैं और जो जल निकासी का रास्ता भी हैं। नतीजतन, जलभराव यहां आम बात है। समय के साथ घरों की नींव कमजोर पड़ने लगती है और लोगों के लिए रोजमर्रा की आवाजाही भी मुश्किल हो जाती है।
पानी की आपूर्ति की स्थिति भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। नगर निगम की एक पाइपलाइन पहाड़ी ढलान से होकर गुजरती है। इसी पाइपलाइन से बस्ती में दो दिन में केवल एक बार लगभग बीस मिनट के लिए पानी की आपूर्ति होती है। ढलान पर खुली पड़ी यह पाइपलाइन पानी छोड़े जाने के दौरान अक्सर जगह-जगह से रिसने लगती है।
इसके अलावा, पूरी बस्ती में घरों तक पानी पहुंचाने वाली छोटी-छोटी पाइपलाइनों का जाल बिछा हुआ है। ये जाल लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। लेकिन इनके टूटने-फूटने की घटनाएं भी आम हैं। इससे पानी का और अधिक रिसाव होता है और पहले से ही मुश्किल रास्तों पर चलना जोखिम को और बढ़ा देता है। नतीजतन, पानी की अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए कई परिवार निजी टैंकरों पर निर्भर रहने लगे हैं।
हैदराबाद के इलाके रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दिखाई देने वाली सूझ-बूझ और बुनियादी ढांचे की कमज़ोरी, दोनों को ही उजागर करते हैं।
हिल टॉप कॉलोनी की यह कहानी सिर्फ हैदराबाद तक सीमित नहीं है। भारत की अनेक ऐसी स्वनिर्मित बस्तियों में भी अलग-अलग रूपों में ऐसी ही परिस्थितियां देखने को मिलती हैं। ये वे बस्तियां हैं जिन्हें लोगों ने समय के साथ अपनी जरूरतों के अनुसार खुद विकसित किया है।
मुंबई की चॉलों, दिल्ली की पुनर्वास कॉलोनियों, बेंगलुरु की अनौपचारिक बस्तियों और देश के कई अन्य मोहल्लों में समुदाय समय के साथ धीरे-धीरे विकसित हुए हैं, लेकिन बुनियादी सुविधाएं उनकी बढ़ती जरूरतों के साथ कदम नहीं मिला पाई हैं।
इन इलाकों में घर अक्सर कमरे-दर-कमरे बनते और फैलते हैं। कई परिवार अपने घरों से ही छोटे कारोबार चलाते हैं, जिनकी गतिविधियां आसपास की गलियों और सार्वजनिक स्थानों तक फैल जाती हैं। ऐसे में, जहां सरकारी व्यवस्थाओं की पहुंच सीमित रह जाती है, वहां स्थानीय समुदाय और मोहल्ले स्तर की पहलें कई जरूरी जरूरतों का सहारा बनती हैं।
स्कूल ऑफ एनवायरनमेंट एंड आर्किटेक्चर (SEA) की सह-संस्थापक और वास्तुकार रूपाली गुप्ते तथा प्रसाद शेट्टी ऐसे मोहल्लों की एक खास क्षमता की ओर इशारा करती हैं। उनका कहना है कि सीमित सरकारी सहयोग और कमजोर औपचारिक व्यवस्थाओं के बावजूद ये बस्तियां काम करती रहती हैं। उन्होंने इसे "ट्रांजैक्शनल कैपेसिटी" का नाम दिया है।
असल में यह क्षमता उन छोटे-छोटे बदलावों और उपायों में दिखाई देती है, जिन्हें निवासी अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के अनुसार विकसित करते हैं। कहीं लोग घरों के सामने की जगह को बढ़ाकर छाया का इंतजाम कर लेते हैं, तो कोई काम करने के लिए नई जगह बना लेता है। वहीं, कुछ लोग साधारण ढांचों को कई अलग-अलग जरूरतों के मुताबिक इस्तेमाल में ले आते हैं। इसी तरह के अनौपचारिक उपायों से इन बस्तियों के लोगों का जीवन गतिमान बना रहता है।
फिर भी, समुदाय अपने दम पर हर समस्या का समाधान नहीं कर सकते। सीवर का पानी कई बार घरों और गलियों में भर जाता है। बारिश का तेज बहाव रास्तों और घरों की नींव को नुकसान पहुंचाता है। घरों में लगातार सीलन बनी रहती है। इन समस्याओं से रोज-रोज निपटना लोगों के लिए मुश्किल और थकाने वाला हो जाता है।
ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि इन समस्याओं के लिए नई तकनीकी या बुनियादी समाधान कैसे खोजे जाएं। असली चुनौती यह है कि उन स्थानीय जानकारियों, अनुभवों और रोजमर्रा के उपायों को कैसे मजबूत किया जाए? ताकि उनकी मदद से लंबे समय से पानी से जुड़े जोखिमों से इन बस्तियों में रहने वाले लोग निपट सकें।
बच्चे हिल टॉप कॉलोनी की खड़ी और मलबे से भरी गलियों से गुज़रते हुए, खुले पानी के पाइपों के बगल में साइकिल को ऊपर की ओर धकेल रहे हैं, एक ऐसी जगह जहाँ ग्रेविटी, इंफ्रास्ट्रक्चर और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का मिलन होता है।
संघर्षों के बीच से ही समाधान का रास्ता निकालना
हिल टॉप कॉलोनी जैसी बस्तियों में रहने वाले लोग पानी से जुड़ी चुनौतियों का सामना करने के लिए लगातार नए-नए तरीके अपनाते रहते हैं। देखने में ये उपाय छोटे लग सकते हैं। लेकिन इनके पीछे पानी के बहाव और उसके असर को लेकर गहरी समझ होती है। लोग जानते हैं कि पानी घरों, गलियों और पूरे मोहल्ले में किस तरह फैलता है और समस्याएं कैसे पैदा करता है।
इसी रोजमर्रा के अनुभव और स्थानीय समझ को पहचानने से "रेट्रो लैब" की शुरुआत हुई। सितंबर 2025 में हैदराबाद अर्बन लैब ने विप्रो फाउंडेशन के सहयोग से इस प्रयोगात्मक शिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया। इसका मकसद यह समझना था कि समुदायों के पास मौजूद स्थानीय ज्ञान और अनुभव पानी से जुड़े जोखिमों का सामना करने में उनकी कैसे मदद करते हैं। साथ ही, यह भी जानना था कि इन्हीं अनुभवों के सहारे वे अपने रोजमर्रा के जीवन को किस तरह व्यवस्थित रखते हैं।
हैदराबाद अर्बन लैब की निदेशक भाष्वती सेनगुप्ता के अनुसार, इस पहल का उद्देश्य कोई बड़े या तैयार समाधान खोजना नहीं था। बल्कि यह समझना था कि लोग रोजमर्रा की समस्याओं का सामना कैसे करते हैं। साथ ही यह भी जानने का प्रयास करना था कि इससे निपटने के लिए वे अपने स्तर पर कौन से उपाय विकसित करते और अपनाते हैं।
भाष्वती सेनगुप्ता कहती हैं, “ समाधान मांगते समय हम अक्सर समस्याओं को बहुत तयशुदा और सीमित ढंग से देखने लगते हैं। कई बार हमारी सोच के पहले से तय ढांचे में शहरों के युवाओं की कल्पना क्षमता और उनके अनुभवों के लिए जगह ही नहीं बन पाती है। हम समस्याओं को परिभाषित करते समय उसका पैमाना और दायरा बढ़ा देते हैं। नतीजतन, हमें लोगों की रोजमर्रा की समझ और व्यावहारिक सूझ-बूझ नजर ही नहीं आती।"
सीढ़ियों के बीच लगी छोटी प्लेटें बारिश के पानी के बहाव को धीमा करती हैं और उसे धीरे-धीरे ड्रेनेज चैनल और फिर स्टोरेज टैंक तक पहुँचाती हैं।
इस कार्यक्रम में शामिल लोगों ने बाढ़ और जलभराव की समस्याओं को तकनीकी शब्दों में नहीं, बल्कि अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर समझाया। हैदराबाद के पुराने शहर में शिक्षा, आपदा राहत और सामुदायिक कल्याण के क्षेत्र में काम करने वाले संगठन सफा बैत-उल-माल के स्वयंसेवक अली और बिलाल ने भी अपने इलाकों के अनुभव साझा किए।
अली कर्मनघाट इलाके में रहते हैं, जहां भारी बारिश के दौरान निचले हिस्सों की सड़कों पर जलभराव की समस्या अक्सर बनी रहती है। वहीं बिलाल मूसी नदी के किनारे बसी हैदराबाद की पुरानी बस्तियों में से एक चादरघाट के निवासी हैं। दोनों ने बताया कि बाढ़ और जलभराव को समझने के लिए आंकड़ों से ज्यादा महत्वपूर्ण उन लोगों के अनुभव हैं, जो हर साल इन परिस्थितियों का सामना करते हैं।
उनका सुझाव बेहद सीधा था: घरों के प्रवेश द्वार की नींव (प्लिंथ) को थोड़ा ऊंचा कर दिया जाए। उनका मानना था कि ऊंचाई में मामूली बढ़ोतरी से भी बाढ़ के पानी को घर के भीतर घुसने कुछ अधिक समय लगेगा। इससे घरों में पानी के घुसने से पहले ही लोगों को जरूरी तैयारी करने का मौका मिल जाता है। ऐसा करने का विचार सितंबर के आखिर में हुई भारी बारिश के बाद सूझा, जब हैदराबाद के कई इलाकों में जलभराव हो गया था।
मूसी नदी का जलस्तर बढ़ने की आशंकाओं ने भी लोगों की चिंताओं को फिर से बढ़ा दिया था। इसी दौरान लोगों ने महसूस किया कि घरों में छोटे-छोटे बदलाव भी बाढ़ के पानी से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकते हैं।
चर्चा में शामिल युवा महिलाओं ने एक दूसरी महत्वपूर्ण समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया। बाढ़ और सीवर के पानी के घरों में घुस आने के दौरान स्कूल के प्रमाणपत्र, राशन कार्ड, अस्पताल से जुड़े दस्तावेज और पहचान पत्र जैसे जरूरी कागजात अक्सर ख़राब हो जाते हैं।
चूंकि इन दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी कई घरों में महिलाओं पर होती है, इसलिए उन्होंने एक सरल उपाय सुझाया। उनका कहना था कि दीवारों पर सामान्य जलभराव के स्तर से ऊपर रैक या शेल्फ लगाए जाएं, ताकि महत्वपूर्ण कागजात को उन पर सुरक्षित रखा जा सके।
यह सुझाव भी इस बात का उदाहरण था कि समुदायों के पास मौजूद रोजमर्रा के अनुभव किस तरह छोटे लेकिन व्यावहारिक समाधान सामने लाते हैं। इन समाधानों से आपदा के समय नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।
कुछ प्रतिभागियों ने घरों में लगातार बनी रहने वाली सीलन की समस्या पर भी बात की। घनी आबादी वाले इलाकों में घर एक-दूसरे के इतने करीब बने होते हैं कि पर्याप्त धूप नहीं पहुंच पाती। नतीजतन, बारिश खत्म होने के कई दिनों बाद भी कपड़े, बिस्तर और अन्य घरेलू सामान पूरी तरह सूख नहीं पाते। इस समस्या के लिए उनके पास एक सरल समाधान था।
उन्होंने बताया कि हवा के आवागमन (वेंटीलेशन) के लिए बरामदों में जालीदार घेरे या संरचनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे कपड़े जल्दी सूख सकेंगे। साथ ही, वे धूल से भी बचे रहेंगे और घर की निजता भी बनी रहेगी। इन सभी सुझावों से एक ही बात समझ में आती है कि रोजमर्रा की समस्याओं के समाधान हमेशा बड़े निवेश या जटिल तकनीकों के माध्यम से नहीं आते। कई बार स्थानीय परिस्थितियों को समझने वाले छोटे और व्यावहारिक उपाय ही लोगों के जीवन को आसान बनाते हैं।
GHMC द्वारा बगल वाली लेन में बदलाव (पहले और बाद की स्थिति)।
इन चर्चाओं ने एक बड़े सवाल की ओर ध्यान खींचा। क्या शहर पानी को हर कीमत पर बाहर निकालने की कोशिश करने के बजाय उसके साथ तालमेल बिठाकर जीना सीख सकते हैं? दरअसल, कई बस्तियों में लोग पहले से ही अपने स्तर पर ऐसे उपाय अपनाते हैं। ताकि पानी के बहाव को धीमा किया जा सके, उसे कुछ समय के लिए रोका जा सके या उसकी दिशा बदली जा सके।
घरों और गलियों में किए गए ये छोटे-छोटे बदलाव दिखाते हैं कि समुदाय पानी के साथ काम करने के व्यावहारिक तरीके विकसित कर चुके हैं। रोजमर्रा के ये उपाय उस सोच से मेल खाते हैं, जिसे आज दुनिया भर में "स्पंज सिटी" की अवधारणा के रूप में पहचान मिल रही है। यह विचार शहरों को ऐसी जगहों के रूप में देखने की बात करता है, जो बारिश के पानी को केवल बाहर निकालने के बजाय उसे सोख सकें, रोक सकें और जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग भी कर सकें।
कबीर अरोड़ा जलवायु नीति पर काम करने वाले एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं। वे मानते हैं कि समुदायों की इस व्यावहारिक समझ से शहरों के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सीख मिलती है। वे कहते हैं, "मेरे लिए स्पंज सिटी का मतलब किसी खाली जमीन पर शुरू होने वाली विशाल परियोजना नहीं है। हमारे शहर धीरे-धीरे विकसित होते हैं और कई बार अनौपचारिक तरीकों से भी विस्तार पाते हैं। उनका रूप-स्वरूप लगातार बदलता रहता है। इसलिए हमें स्पंज सिटी की अवधारणा को अलग-अलग परिस्थितियों और जगहों के अनुसार ढालना होगा।
पानी को सोखने की क्षमता का संबंध केवल इस बात से नहीं है कि बारिश का पानी जमीन में जाकर भूजल को रिचार्ज करे। इसका मतलब यह भी है कि समुचित संरचना और व्यवस्था न होने के कारण अन्यथा बर्बाद हो जाने वाले पानी को सम्भालकर रखा जाए। जरूरत पड़ने पर उसे उपयोग में लाया जा सके या उसका बेहतर प्रबंधन किया जा सके।
यह सोच पानी की बर्बादी कम करने और सीमित संसाधनों से अधिक लाभ हासिल करने की बात करती है। इतना ही नहीं यह हर शहर और मोहल्ले की अपनी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुरूप होने वाले समाधानों के विकास पर भी जोर देती है।"
हैदराबाद अर्बन लैब के संस्थापक अनंत मारिंगंती का मानना है कि हमें सोचने के अपने तरीक़े में ही बदलाव लाने की ज़रूरत है। वे कहते हैं, “ अपने बनाए हुए समाधानों को थोपने के बजाए हमें समुदायों की समझ, सूझ-बूझ और अनुभवों का सम्मान करना चाहिए। ज़रूरत है कि स्थानीय ज़रूरतों को ध्यान में रखकर छोटे-छोटे प्रयास किए जाएँ।
स्थानीय लोगों की परेशानियों को बिना जाने और समझे हल निकालने के प्रयास अक्सर अधूरे और प्रभावहीन ही रह जाते हैं। हिल टॉप कॉलोनी में यह सोच जल्द ही एक छोटे लेकिन प्रभावी हस्तक्षेप के रूप में सामने आई। यह पहल केवल पानी के प्रबंधन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने लोगों के रोजमर्रा के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव लाने का रास्ता खोला।
प्रोजेक्ट जलम के इंटीग्रेटेड डिज़ाइन का मॉकअप
प्रोजेक्ट जलम: पानी, रास्ता और समुदाय की साझी पहल
रेट्रो लैब की चर्चाओं से एक बात बार-बार उभरकर सामने आई। पानी को केवल एक समस्या के रूप में नहीं, बल्कि शहर और समुदाय के जीवन का हिस्सा मानकर समझना जरूरी है। तभी लोगों की वास्तविक जरूरतों से जुड़े हुए समाधान विकसित किए जा सकते हैं। हिल टॉप कॉलोनी में इन सीखों को जल्द ही जमीन पर उतारने का अवसर मिला। "प्रोजेक्ट जलम" के माध्यम से इन विचारों को एक व्यावहारिक रूप दिया गया, जहां पानी से जुड़ी समस्याओं को समझते हुए ऐसे समाधान विकसित किए गए, जो स्थानीय परिस्थितियों और समुदाय की जरूरतों के अनुरूप थे।
इस पहल की शुरुआत साल 2021 में हुई थी जब हैदराबाद अर्बन लैब ने विप्रो फाउंडेशन की मदद से वाटर प्लस एंड माइनस चैलेंज शुरू किया। इस कार्यक्रम में वास्तुकला और डिजाइन के छात्रों को शामिल किया गया। उनसे कहा गया कि वे उन बस्तियों के लिए छोटे और व्यावहारिक समाधान सुझाएं, जहां पानी और कचरे से जुड़ी समस्याएं लंबे समय से बनी हुई थीं।
हिल टॉप कॉलोनी जल्द ही इस पहल का केंद्र बन गई। यहां की भौगोलिक स्थिति अपने आप में कई चुनौतियां पैदा करती थी। बस्ती के एक तरफ बुद्ध विहार की दीवार थी, जबकि दूसरी तरफ खड़ी ढलान। नतीजतन, लोगों का आना-जाना मुश्किल हो जाता था। बरसात में पानी के बहाव, जल निकासी और रास्तों की खराब हालत जैसी समस्याएं और बढ़ जाती थीं।
इन्हीं चुनौतियों के बीच ऑरोरा डिजाइन इंस्टीट्यूट के छह छात्रों, पुन्ना नितीश, मनीष आनंद, येडला सुरेंद्र, भाटी दिव्यांश, अलंकृथा खोशेकाय और सृजा डिड्डी की टीम "जलम" ने इस इलाके का अध्ययन शुरू किया। टीम को जल्द ही महसूस हो गया कि यहां पानी, आवागमन और सुरक्षा की समस्याओं को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। ये सभी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई थीं।
इसी समझ के आधार पर उन्होंने एक ऐसा प्रस्ताव तैयार किया। इसमें किसी एक समस्या का हल निकालने के बजाय पूरे परिदृश्य को साथ लेकर चलना था। उनका प्रयास यह था कि पानी के बहाव, लोगों की आवाजाही और बस्ती की सुरक्षा को एक ही व्यवस्था का हिस्सा माना और समझा जाए और उसी के अनुरूप समाधान विकसित किया जाए।
टीम ने सबसे पहले उस ढलान पर ध्यान दिया, जहां बारिश के दिनों में पानी अक्सर जमा हो जाता था और लोगों का आना-जाना मुश्किल हो जाता था। अध्ययन के दौरान उन्हें महसूस हुआ कि यहां जल निकासी, टूटे रास्ते और पाइपलाइन से होने वाले रिसाव की समस्याएं अलग-अलग नहीं बल्कि एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में उन्होंने एक ऐसे समाधान के बारे में सूचना किया जो एक साथ कई समस्याओं को कम कर सके।
इसी प्रयास में सीढ़ियों वाले रास्ते का विचार सामने आया। प्रस्तावित डिजाइन में ढलान पर मजबूत सीढ़ियां बनाई गईं, जिनके बीच एक यू-आकार की नाली बनाई गई थी। इस नाली का काम बारिश के पानी और पाइपलाइन से रिसने वाले पानी को इकट्ठा करके नीचे की ओर ले जाना था। यह पानी आगे चलकर बस्ती में बने सामुदायिक भंडारण टैंकों तक पहुंच सकता था।
डिजाइन में सीढ़ियों के बीच विशेष प्लेटें भी लगाई गईं, जिससे पानी का बहाव धीमा हो जाता था। इससे मिट्टी और रास्तों के कटाव पर रोक लगती थी। पानी धीरे-धीरे नाली में पहुंचता था, जिससे तेज बहाव की स्थिति नहीं बनती थी। भारी बारिश के दौरान अतिरिक्त पानी को भी सुरक्षित रूप से नीचे की ओर मोड़ा जा सकता था, जिससे बस्ती में जलभराव और अनियंत्रित बहाव का खतरा कम हो जाता था।
इस हस्तक्षेप ने पानी को केवल एक समस्या के रूप में देखने का नजरिया बदल दिया। जो पानी पहले गंदगी और मिट्टी के साथ ढलान से नीचे बह जाता था, उसे अब रोका, धीमा किया और एक उपयोगी संसाधन के रूप में संभाला जाने लगा।
परियोजना की एक खास बात यह थी कि इसमें स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध सामग्री का उपयोग किया गया। सीढ़ियों के लिए तंदूर पत्थर, राइजर के लिए ईंटें और जल भंडारण टैंक के लिए प्रीकास्ट कंक्रीट का इस्तेमाल किया गया। पी. एन. प्रवीण के मार्गदर्शन में टीम ने स्थानीय परिस्थितियों और समुदाय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए काम किया। डिजाइन इस तरह तैयार किया गया कि वह इलाके की प्राकृतिक ढलान और भू-आकृति के अनुरूप रहे, न कि उसे बदलने की कोशिश करे।
हम जिस दौर में हैं उसमें बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं अक्सर बड़ी, महंगी और लोगों की रोजमर्रा की जरूरतों से दूर होती हैं। ऐसे में प्रोजेक्ट जलम ने दिखाया कि मोहल्ला स्तर पर किए गए छोटे लेकिन सटीक हस्तक्षेप का प्रभाव भी महत्वपूर्ण और गहरा हो सकता है।
पी. एन. प्रवीण कहते हैं, "जब कोई समाधान मोहल्ले के स्तर पर काम करता है, तो लोग उसे देखते हैं। यहां तक कि नगर निगम भी उस पर ध्यान देता है।" उनकी यह बात सही साबित हुई। बाद में ग्रेटर हैदराबाद म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (GHMC) ने पास की एक गली में इस परियोजना के सीढ़ीनुमा जल निकासी तंत्र के कुछ तत्वों को अपनाया। इस तरह प्रोजेक्ट जलम से मिली सीखें अपने मूल स्थल से आगे बढ़कर दूसरे इलाकों तक भी पहुंचीं।
पहाड़ी ढलान पर खुले पाइपों और तंग गलियों का जाल, हिल टॉप कॉलोनी के निवासियों के सामने पानी से जुड़ी रोज़मर्रा की चुनौतियों को दर्शाता था।
एक सीढ़ीनुमा जल निकासी तंत्र से आगे की कहानी
प्रोजेक्ट जलम का असर केवल जल निकासी में सुधार और सुरक्षित आवाजाही तक सीमित नहीं था। इस सीढ़ीदार रास्ते को सिर्फ एक बुनियादी ढांचे के रूप में नहीं देखा गया था। इसे समुदाय के साझा उपयोग की जगह के रूप में भी विकसित किया गया था।
रास्ते के किनारे ग्रेनाइट के आठ आरुगु (बैठने के चबूतरे) बनाए गए, जहां लोग बैठ कर सुस्ता सकें और एक दूसरे से बातचीत कर सकें। निर्माण कार्य शुरू होने से पहले यहां जमा कचरे और मलबे को ट्रैक्टर की ट्रॉलियों में भरकर हटाया गया और इस जगह की सफ़ाई की गई। बाद में ढलान के किनारे लगाए जाने वाले पौधों का चुनाव भी स्थानीय निवासियों ने ही किया।
धीरे-धीरे यह जगह एक जोखिम भरे रास्ते से बदलकर मोहल्ले के सामाजिक जीवन का हिस्सा बन गई। पहले लोगों की बैठकी और आपसी मेल-मिलाप मुख्य रूप से बस्ती के समतल हिस्सों तक सीमित रहता था। लेकिन बेहतर रास्ता, नियंत्रित जल बहाव और बैठने की जगहें बनने के बाद यह ढलान भी लोगों के इस्तेमाल की एक सक्रिय सार्वजनिक जगह में बदल गई।
इस बदलाव का सबसे सीधा असर महिलाओं के जीवन पर पड़ा। पानी के डिब्बे ढोने और रोज़ खतरनाक रास्तों से गुजरने की जिम्मेदारी अक्सर उन्हीं पर होती थी। बेहतर रास्तों और व्यवस्थित जल निकासी ने न केवल उनकी शारीरिक मेहनत कम की, बल्कि रोज के ख़तरे से भी बचाया।
ढलान के बीचोंबीच रहने वाली लक्ष्मी को वह समय आज भी याद है, जब इस परियोजना की शुरुआत नहीं हुई थी। वे बताती हैं, "बारिश होने पर हम घर से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करते थे। मिट्टी खिसकती रहती थी और गिरने का डर बना रहता था।" आज स्थिति काफी बदल चुकी है।
बच्चों को सीढ़ियों पर दौड़ते हुए देखकर वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, "अब ये ऊपर-नीचे भागते रहते हैं। पहले हमें इन्हें बार-बार घर के अंदर रहने के लिए कहना पड़ता था।" रास्ते के किनारे बने आरुगु अब मोहल्ले के लोगों के लिए बैठकी की जगह हो गई है, जहां शाम के समय लोग जमा होते हैं, बातचीत करते हैं और बच्चों पर नजर भी रखते हैं।
पानी भरने का काम भी पहले की तुलना में आसान और सुरक्षित हो गया है। वहीं के एक निवासी याद करते हुए कहते हैं, "जैसे ही पानी आता था, हमें जल्दी-जल्दी बर्तन भरने पड़ते थे। जमीन गीली होती थी और हाथों में भारी डिब्बे होते थे। जरा-सी चूक में हम और पानी का बर्तन दोनों के गिरने का डर होता था।"
अब रास्ते सुरक्षित हैं और जल निकासी की व्यवस्था भी बेहतर हो गई है। इससे पानी भरने के दौरान होने वाला तनाव भी कम हुआ है। पाइपलाइन से रिसने वाला पानी भी अब लोगों के पैरों के नीचे जमा होने के बजाय व्यवस्थित रूप से निकासी तंत्र में चला जाता है।
एक दूसरे स्थानीय निवासी का कहना है कि उनके लिए इस परियोजना का लाभ केवल पानी और सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है। वे हंसते हुए कहती हैं, “हमें पानी मिला, हाँ, हमें सुरक्षा भी मिली? हाँ। लेकिन साथ ही बैठने के लिए एक जगह भी मिली।” गर्मी के दिनों में दोपहर और शाम के समय यह जगह लोगों से भरी होती हैं। इस जगह ने हमें दो पल चैन से बैठने और आपसी मेलज़ोल बढ़ाने का अवसर भी दिया है।
इस परियोजना ने केवल रास्तों और जल निकासी की व्यवस्था नहीं बदली, बल्कि लोगों की नजर में पूरे मोहल्ले की छवि भी बदल दी। एक निवासी बताते हैं, "पहले लोग यहां आने से कतराते थे। रिश्तेदार भी इस चढ़ाई और रास्ते की मुश्किलों की शिकायत करते थे।" अंकुति शिवा के लिए इस बदलाव का एक निजी पहलू भी था। वे हंसते हुए कहते हैं, "मेरे घर तक पहुंचने का रास्ता इतना मुश्किल और जोखिम भरा लगता था कि कोई अपनी बेटी का रिश्ता यहां करने के लिए तैयार नहीं होता था।"
आज हालात अलग हैं। बेहतर रास्तों, व्यवस्थित जल निकासी और सुरक्षित माहौल ने न केवल बस्ती के भीतर लोगों की आवाजाही आसान बनाई है, बल्कि बाहर के लोगों की नजर में भी इस मोहल्ले की पहचान बदली है।
प्रोजेक्ट जलम यह दिखाता है कि पानी का बेहतर प्रबंधन केवल बाढ़ और जलभराव के जोखिम को कम करने तक सीमित नहीं है। यह सुरक्षित मोहल्ले बनाने, समुदाय के भीतर सामाजिक रिश्तों को मजबूत करने और लोगों के रोजमर्रा के जीवन में सम्मान और आत्मविश्वास लौटाने का भी माध्यम बन सकता है।
स्पंज सिटी के साथ-साथ सामाजिक जीवन को सक्रिय करना
शहर हिल टॉप कॉलोनी से क्या सीख सकते हैं?
प्रोजेक्ट जलम ने न तो बाढ़ की समस्या पूरी तरह खत्म कर दी और न ही पानी की कमी का स्थायी समाधान दिया। यह भी नहीं कि इससे शहरों में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे में निवेश की जरूरत समाप्त हो गई। लेकिन इस परियोजना ने यह जरूर दिखाया कि स्थानीय परिस्थितियों को समझकर किए गए छोटे और व्यावहारिक हस्तक्षेप भी पानी से जुड़े जोखिमों को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
परियोजना की सफलता का कारण यह था कि इसके समाधान स्थानीय परिस्थितियों को समझकर तैयार किए गए। रिसती पाइपलाइनें, बारिश का बहता पानी, फिसलन भरे रास्ते और मानसून में लोगों की रोजमर्रा की परेशानियां, इन सभी मुद्दों को साथ लेकर काम किया गया।
पी. एन. प्रवीण कहते हैं, "ढलान वाले इलाके में पानी गलती की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। यदि आप जमीन की ढलान और पानी के बहाव को सही ढंग से नहीं समझते, तो उसका असर तुरंत दिखाई देता है।"
यह डिजाइन एक ही बार में तैयार नहीं हो गया था। इसे लगातार देखकर-समझकर, अलग-अलग तरीकों को आजमाकर और उनसे सीख लेते हुए विकसित किया गया। कुछ विचार काम नहीं आए और उन्हें छोड़ दिया गया, जबकि कुछ को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बदला गया। अंततः जो समाधान सामने आया, वह कोई सार्वभौमिक मॉडल नहीं था, बल्कि हिल टॉप कॉलोनी की भौगोलिक स्थिति, पानी के बहाव और वहां के लोगों के अनुभवों से आकार लेने वाला समाधान था।
दरअसल, जिन परिस्थितियों ने प्रोजेक्ट जलम को जन्म दिया, वे केवल हिल टॉप कॉलोनी तक सीमित नहीं हैं। हैदराबाद समेत देश के कई शहरों में बस्तियां आज भी ढलानों, निचले इलाकों और पर्यावरणीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में फैल रही हैं। यहां के लोगों को जलभराव, कटाव, रिसते बुनियादी ढांचे और पानी की कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
ऐसे इलाकों में नालियां, रास्ते, घरों की नींव और पाइपलाइनें केवल ढांचागत सुविधाएं नहीं होतीं। यही वे साधन हैं, जिनके सहारे समुदाय पानी का प्रबंधन करते हैं और जोखिमों को कम करने की कोशिश करते हैं।
प्रोजेक्ट जलम यह भी दिखाता है कि जलवायु अनुकूलन केवल बड़ी परियोजनाओं के भरोसे नहीं हो सकता। शहरों को मजबूत जल निकासी तंत्र, बेहतर जलापूर्ति नेटवर्क और व्यापक शहरी योजना की जरूरत बनी रहेगी। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसे मोहल्ला स्तर के हस्तक्षेप भी जरूरी हैं, जो समुदायों के अनुभव और स्थानीय समझ को मजबूत बनाते हैं।
इस परियोजना की लागत लगभग 1.75 लाख रुपये थे। इसे हैदराबाद अर्बन लैब के "वॉटर प्लस एंड माइनस चैलेंज" के तहत, विप्रो फाउंडेशन के सहयोग से शुरू किया गया था। प्रोजेक्ट जलम ने दिखाया कि स्थानीय जरूरतों को समझकर किए गए छोटे-छोटे बदलाव भी लोगों के जीवन में बड़ा फर्क ला सकते हैं।
अक्सर समस्या सिर्फ पैसों की कमी नहीं होती। कई बार छोटी-छोटी मरम्मत और जरूरी सुधार नजरअंदाज हो जाते हैं। जबकि यही बदलाव लोगों का रोजमर्रा का जीवन ज्यादा सुरक्षित और आसान बना सकते हैं। हिल टॉप कॉलोनी का अनुभव बताता है कि ऐसे छोटे कदम भी समुदाय की सुरक्षा, पानी के बेहतर प्रबंधन और जीवन की गुणवत्ता में बड़ा फर्क ला सकते हैं
पानी के रास्ते पर चलते हुए
पानी हमेशा अपना रास्ता खोज लेता है। वह ढलानों का पीछा करता है, दरारों में उतरता है और शहरों की उन कमजोरियों को सामने ले आता है, जो अक्सर नजर नहीं आतीं। कई बार वह यह भी दिखा देता है कि शहरी विकास का लाभ किन इलाकों तक पहुंचा है और कौन-से समुदाय अब भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हिल टॉप कॉलोनी में भी कभी पानी टूटी-फूटी ढलानों से तेज़ी से नीचे बहता था। रास्ते कट जाते थे, गंदा पानी गलियों में फैल जाता था और अंकुति शिवा के लिए घर लौटना रोज़ का जोखिम बन जाता था।
आज भी अंकुति उसी रास्ते से घर लौटते हैं। ऊपर का शहर बदल चुका है। उनके पैरों के नीचे की ढलान भी बदल चुकी है। लेकिन सबसे बड़ा बदलाव शायद यह है कि अब यह रास्ता पानी से लड़ने की कोशिश नहीं करता। यह उसके साथ तालमेल बिठाकर काम करता है।
यही शायद हिल टॉप कॉलोनी और प्रोजेक्ट जलम की सबसे बड़ी सीख है कि पानी को पूरी तरह नियंत्रित करने की कोशिश हमेशा समाधान नहीं होती। कई बार बेहतर रास्ता यह होता है कि हम पानी के स्वाभाविक बहाव को समझें और अपने शहरों को उसी के अनुरूप ढालें।
आज यही ढलान एक अलग कहानी कहती है। यह सीढ़ीदार रास्ता न तो बारिश को रोक सकता है और न ही हैदराबाद की सभी जल समस्याओं का समाधान है। लेकिन यह जरूर दिखाता है कि जब शहर पानी के वास्तविक बहाव को समझते हैं और उन लोगों के अनुभवों को महत्व देते हैं, जो वर्षों से उसके साथ जी रहे हैं, तब सार्थक बदलाव संभव हो जाते हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम की चरम घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में भारतीय शहरों को बेहतर जल निकासी, मजबूत जलापूर्ति व्यवस्था और बाढ़ प्रबंधन के लिए बड़े निवेश की जरूरत होगी। लेकिन सिर्फ बुनियादी ढांचे पर खर्च बढ़ा देना ही काफी नहीं होगा। उतना ही जरूरी यह भी है कि शहर उन समुदायों के अनुभवों और समझ को महत्व दें, जो इन चुनौतियों का सामना हर दिन करते हैं।
क्योंकि ये समुदाय पानी से जुड़ी चुनौतियों को किसी रिपोर्ट, मॉडल या अनुमान के जरिए नहीं समझते हैं। वे इसके लिए अपने अनुभवों का प्रयोग करते हैं। उनके अनुभव और स्थानीय समझ ही ऐसे समाधानों की नींव बन सकते हैं, जो बदलती जलवायु के दौर में शहरों को अधिक सुरक्षित और लचीला बनाने में मदद करें।
हिल टॉप कॉलोनी हमें याद दिलाती है कि बड़े बदलाव अक्सर मोहल्ले के स्तर से शुरू होते हैं। उनकी शुरुआत स्थानीय लोगों की बात सुनने से होती है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि पानी कहां जमा होता है, कौन-से रास्ते हर बारिश में टूट जाते हैं और किन छोटे बदलावों से सबसे बड़ा फर्क पड़ सकता है।
अंकुति के लिए अब घर लौटना पहले जैसा मुश्किल नहीं रहा। बारिश के बाद फिसलन भरे रास्तों और गंदे पानी से होकर गुजरने की चिंता, जो कभी उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थी, काफी हद तक खत्म हो चुकी है। जो रास्ता कभी लोगों की परेशानियों और प्रशासनिक उपेक्षा की याद दिलाता था, वही आज इस बात का उदाहरण बन गया है कि छोटे लेकिन सोच-समझकर किए गए बदलाव किस तरह लोगों की जिंदगी आसान बना सकते हैं।
शायद यही इस कहानी की सबसे बड़ी सीख है। जलवायु अनुकूलन का मतलब हमेशा बड़ी परियोजनाएं या विशाल योजनाएं नहीं होता। कई बार एक छोटा-सा बदलाव भी बड़ा असर डाल सकता है। जैसे किसी समुदाय की पहल, किसी रास्ते की मरम्मत या ऐसी सीढ़ियां, जो पानी को सही दिशा दें और लोगों का घर लौटना सुरक्षित बना दें।
अस्वीकरण :
इस लेख को तैयार करने में सहयोग और जानकारी उपलब्ध कराने के लिए हैदराबाद अर्बन लैब तथा प्रोजेक्ट जलम की टीम का हार्दिक आभार। उनके अनुभवों, दस्तावेजों और बातचीत ने इस कहानी को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
यह कहानी इंडिया वाटर पोर्टल की रीजनल स्टोरी फेलोशिप 2025 के अंतर्गत तैयार की गई है।
इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ कुमारी रोहिणी ने किया है।
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