ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण बढ़ते तापमान से लद्दाख में ग्लेशियर पिघल रहे हैं इस कारण वहां के लोगों ने गर्मियों में पानी की उपलब्धता के लिए कृत्रिम तरीके से आइस स्तूप बनाना शुरू किया है। जिओ थर्मल पावर प्रोजेक्ट से यहां बढ़ते तापमान को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
फोटो : विकी कॉमंस
पहाड़ों पर बड़े-बड़े बांध बना कर बिजली बनाने वाले सैकड़ों पावर प्रोजेक्ट देश में मौजूद हैं, जो देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इसके अलावा कोयले से थर्मल पावर बनाने वाली इकाइयां बड़ी संख्या में मौजूद हैं। पर, बिजली बनाने के लिए बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रही इन दोनों ही तकनीकों के अपने कई तरह के पर्यावरणीय दुष्प्रभाव हैं। इसलिए पर्यावरणविद बिजली बनाने की ऐसी तकनीकों के इस्तेमाल पर ज़ोर देते हैं, जिनसे प्राकृतिक संतुलन को कम से कम बाधित करके विद्युत उत्पादन किया जा सके। ऊर्जा क्षेत्र की सरकारी कंपनी ONGC ने हिमालयी राज्य लद्दाख में एक ऐसी ही अनूठी शुरुआत की है।
ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) के एनर्जी सेंटर ने लद्दाख की पूगा घाटी में (Puga Valley) में देश के पहले जियोथर्मल एनर्जी प्रोजेक्ट की शुरुआत की है। इसके लिए ONGC एनर्जी सेंटर ने करीब 14,000 हजार फीट की ऊंचाई पर 1000 मीटर गहरे दो कुएं तैयार किए गए हैं। इन कुओं से प्राकृतिक रूप से निकलने वाले गर्म पानी से बिजली बनाकर लद्दाख को क्लीन एनर्जी हब बनाने में काफी मदद मिलेगी। इसे भारत के क्लीन एनर्जी मिशन (Clean Energy Mission) की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा है।
शुरुआती दौर में अभी यहां 1 मेगावॉट का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। आगे चलतकर इसकी क्षमता बढ़ाने की योजना है, ताकि कमर्शियल लेवल पर बिजली का उत्पादन किया जा सके। इससे लद्दाख के ऊर्जा संकट को दूर करने के साथ ही इसे एक कार्बन-न्यूट्रल और इको फ्रेंडली रीजन बनाने में मदद मलेगी। क्योंकि, कुदरती गर्म धारा से बिजली बनाने के लिए बांध बना कर पर्यावरण को प्रभावित करने या कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन को जलाने की आवश्यकता नहीं होगी, जिससे वायु प्रदूषण और ग्लोबल वॉर्मिंग पैदा करने वाली ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
लद्दाख की पूगा वैली में ही इस प्रोजेक्ट को शुरू करने की वजह बड़ी सीधी सी है। यह देश में जियोथर्मल एनर्जी का सबसे बड़ा और एक्टिव हॉट स्पॉट है। हिमालय के इस हिस्से में भारी मात्रा में गर्म पानी और भाप मौजूद होने के कारण धरती की गर्मी से उबलते पानी की कई प्राकृतिक जलधाराएं मौजूद हैं। प्रोजेक्ट से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक यहां पर महज़ 400 मीटर की गहराई पर ही 135 डिग्री सेल्सियस का अधिकतम तापमान रिकॉर्ड किया गया है, जोकि जियो थर्मल पावर प्लांट में बिजली बनाने के लिए काफी अच्छा माना जाता है। इसी कारण प्रोजेक्ट के लिए इस जगह को चुना गया है।
दुनिया में सबसे ज्यादा जियोथर्मल बिजली अमेरिका में बनती है। अमेरिका की जियोथर्मल बिजली उत्पादन क्षमता करीब 4 गीगावाट (GW) है। इसके बाद इंडोनेशिया, फिलीपींस, तुर्किये, न्यूजीलैंड, केन्या और इटली जैसे देश आते हैं। दुनिया में जियोथर्मल बिजली की कुल स्थापित क्षमता लगभग 17–18 गीगावाट है।International Energy Agency (IEA) की रिपोर्ट
अभी इस गर्म पानी और भाप की आगे की टेक्निकल टेस्टिंग चल रही है। अभी यहां केवल 1 मेगावॉट का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इंजीनियर्स को उम्मीद है कि करीब 1000 मीटर की गहराई पर इससे भी ज्यादा तापमान मिलेगा। इससे और भी बड़े टर्बाइन्स को चलाया जा सकेगा, जिससे ज्यादा बिजली का उत्पादन हो सकेगा। पायलट प्रोजेक्ट के कामयाब होने पर इस पायलट प्रोजेक्ट को एक कमर्शियल पावर प्लांट में बदल दिया जाएगा, जिससे लद्दाख के एक बड़े हिस्से को बिजली मिल सकेगी।
लद्दाख की कठिन जलवायवीय परिस्थितियों के कारण यहां कोई भी बड़ी परियोजना शुरू कर पाना काफी मुश्किल होता है। जिओ थर्मल पावर प्रोजेक्ट लगाने में भी ONGC के इंजीनियर्स को कई प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
जिओ थर्मल ऊर्जा (Geothermal Energy) पृथ्वी के भीतर मौजूद प्राकृतिक गर्मी से प्राप्त होने वाली स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा है। धरती की गहराई में मौजूद गर्म चट्टानें आसपास के पानी को गर्म कर देती हैं। यही गर्म पानी या भाप बिजली उत्पादन का स्रोत बनती है। इस तकनीक की खासियत यह है कि इसमें कोयला, डीजल या गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए कार्बन उत्सर्जन भी बहुत कम होता है। इसकी पूरी प्रक्रिया इस प्रकार है:
पहला चरण : गर्म जल स्रोत की पहचान
वैज्ञानिक सर्वेक्षण के माध्यम से ऐसे स्थान खोजे जाते हैं, जहां जमीन के भीतर प्राकृतिक रूप से गर्म पानी या भाप पर्याप्त मात्रा में मौजूद हो।
दूसरा चरण : गहरे कुएं की ड्रिलिंग
चयनित स्थान पर कई हजार फीट गहरे कुएं खोदे जाते हैं। इन कुओं से गर्म पानी या भाप को पाइपों के माध्यम से सतह तक लाया जाता है।
तीसरा चरण : टरबाइन को घुमाना
उच्च तापमान और दबाव वाली भाप टरबाइन के ब्लेड से टकराती है। भाप का दबाव टरबाइन को तेज गति से घुमाता है।
चौथा चरण : बिजली का उत्पादन
टरबाइन से जुड़ा जनरेटर घूमने लगता है। यही जनरेटर यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलकर बिजली पैदा करता है।
पांचवां चरण : भाप को फिर पानी बनाना
टरबाइन से निकलने वाली भाप को कंडेंसर में ठंडा करके दोबारा पानी में बदल दिया जाता है।
छठा चरण : पानी को वापस जमीन में भेजना
ठंडे हुए पानी को इंजेक्शन वेल (Injection Well) के जरिए फिर से जमीन के भीतर भेज दिया जाता है। वहां यह दोबारा प्राकृतिक गर्मी से गर्म होता रहता है और भविष्य में फिर बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
इस बंद चक्र प्रणाली (Closed Loop System) के कारण पानी की बर्बादी बहुत कम होती है और बिजली उत्पादन लंबे समय तक लगातार जारी रखा जा सकता है। यही कारण है कि जिओ थर्मल ऊर्जा को 24 घंटे उपलब्ध रहने वाला, विश्वसनीय और पर्यावरण-अनुकूल ऊर्जा स्रोत माना जाता है।
लद्दाख के शुष्क व ठंडे रेगिस्तानी इलाके में जियो थर्मल तकनीक से बिजली का उत्पादन शुरू होने से यहां की ऊर्जा ज़रूरतों को पर्यावरण अनुकूल तरीके से पूरा करने में मदद मिलेगी।
भारत में जियोथर्मल ऊर्जा की अनुमानित क्षमता 10 गीगावाट से अधिक मानी जाती है, लेकिन अब तक व्यावसायिक स्तर पर एक भी जियोथर्मल बिजली संयंत्र संचालित नहीं हो पाया था। लद्दाख का यह प्रोजेक्ट इस दिशा में भारत का पहला बड़ा कदम माना जा रहा है।
‘जियोथर्मल’ का मतलब धरती के अंदर मौजूद प्राकृतिक गर्मी से होता है। जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट में धरती की गर्मी से उबलते पानी का इस्तेमाल करके टर्बाइन चलाकर बिजली बनाई जाती है। इस तरह यह तकनीक कम खर्च और पर्यावरण के अनुकूल होती है। इसके प्रमुख फायदे इस प्रकार हैं -
जियोथर्मल तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह 24 घंटे और साल के 365 दिन काम करती है। यानी इससे बिना रुके लगातार बिजली का उत्पादन किया जा सकता है।
लद्दाख में जैसे ठंडे इलाकों में सर्दियों में तापमान माइनस 20 से 30 डिग्री तक चला जाने पर हाइड्रो और थर्मल पावर प्लांट से बिजली उत्पादन मुश्किल हो जाता है। पर, जियोथर्मल प्रोजेक्ट में ऐसी दिक्कत नहीं होती, क्योंकि इसमें धरती से स्वत: गर्म होकर निकलते पानी का उपयोग किया जाता है।
जियो थर्मल एनर्जी सौर या पवन ऊर्जा की तरह यह मौसम के मिजाज यानी हवा या धूप पर निर्भर नहीं होती। इसलिए इसमें किसी भी तरह के मौसम में समान मात्रा में बिजली का उत्पादन किया जा सकता है।
जियोथर्मल बिजली उत्पादन में कोयला, डीजल या प्राकृतिक गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों को नहीं जलाया जाता। इसलिए इससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होता है और जलवायु परिवर्तन से निपटने में मदद मिलती है।
सौर ऊर्जा संयंत्रों या बड़े पवन ऊर्जा पार्कों की तुलना में जियोथर्मल पावर प्लांट अपेक्षाकृत कम भूमि घेरते हैं। इससे पर्वतीय और सीमित भूमि वाले क्षेत्रों में भी इन्हें स्थापित करना आसान होता है।
एक बार संयंत्र स्थापित होने के बाद इसमें ईंधन खरीदने या लगातार उसकी आपूर्ति करने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे लंबे समय में बिजली उत्पादन की लागत अपेक्षाकृत कम रहती है।
जियोथर्मल ऊर्जा स्थानीय प्राकृतिक संसाधन पर आधारित होती है। इससे डीजल, कोयला या गैस जैसे बाहरी ईंधनों की आवश्यकता कम होती है और ऊर्जा आत्मनिर्भरता बढ़ती है।
जहां राष्ट्रीय ग्रिड पहुंचाना कठिन या महंगा होता है, वहां जियोथर्मल संयंत्र स्थानीय स्तर पर स्थायी बिजली उपलब्ध करा सकते हैं। लद्दाख जैसे सीमावर्ती और दुर्गम क्षेत्रों के लिए यह एक बड़ा लाभ है।
बिजली उत्पादन के बाद बची हुई ऊष्मा का उपयोग भवनों को गर्म रखने, ग्रीनहाउस खेती, मत्स्य पालन, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य औद्योगिक कार्यों में भी किया जा सकता है। इससे ऊर्जा का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होता है।
समुद्र तल से करीब 14 हजार फीट से ज्यादा ऊंचाई पर स्थित पुगा वैली में इस प्रोजेक्ट को शुरू करने में कई तरह की चुनौतियां पेश आईं। लद्दाख जैसी दुर्गम ऊंचाई और कठोर चट्टानों वाली जगह पर कोई भी बड़ा निर्माण करना कफी मुश्किल था।। भारी-भरकम ड्रिलिंग मशीनों और अन्य विशाल उपकरणों को खतरनाक व संकरे पहाड़ी रास्तों से यहां तक पहुंचाना अपने आप में एक टेढ़ा काम था। चट्टानों की कठोरता के कारण इंजीनियर्स को यहां जमीन के अंदर ड्रिलिंग करने मे काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा यहां ऑक्सीजन की कमी और खराब मौसम भी एक बड़ी चुनौती साबित हुआ। इस सबसे जूझते हुए 22 मई 2026 को पहले कुएं की ड्रिलिंग 1000 मीटर तक पूरी कर ली गई। इसके दो सप्ताह बाद 3 जून को दूसरे कुएं का काम शुरू हुआ। रिकॉर्ड एक महीने से भी कम समय में 8 जुलाई को दूसरा कुआं भी पूरा हो गया। इस तरह इस प्रोजेक्ट के चालू होने से भारत सरकार के लद्दाख को कार्बन न्यूट्रल बनाने के विजन की ओर एक बड़ा कदम बढ़ाने में कामयाबी मिली। भविष्य में इसकी क्षमता विस्तार से बिजली के लिए महंगे और प्रदूषणकारी जीवाश्म ईंधन पर लद्दाख की निर्भरता खत्म हो जाएगी। इससे यहां का पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और तेजी से पिघलते ग्लेशियर्स के संरक्षण में भी मदद मिलेगी।
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