फोटो : विकी कॉमंस
सरकार ने लोकसभा में दी ग्रीन इंडिया मिशन के तहत हुए काम की जानकारी
क्या है सरकार का राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना?
पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी है प्रकृति को फिर से संवारना?
पर्यावरण की बात अकसर पेड़ों और जंगलों तक सिमट कर रह जाती है। पर, वास्तव में इसका दायरा इससे कहीं ज्यादा है। घासभूमियां, आर्द्रभूमियां, मैंग्रोव की झाडि़यां तक पर्यावरण को संतुलित बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र और जैव विविधता के लिए इन सभी को बचाना जरूरी है। इसलिए पर्यावरण पारिस्थितिक तंत्र की प्राकृतिक क्षमता बनाए रखने केवल पेड़ लगा देना पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए पूरे पारिस्थितिक तंत्र को फिर से कार्यशील बनाए रखना आवश्यक है। पारिस्थितिकी के संरक्षण की इस प्रक्रिया को इको-रिस्टोरेशन या पारिस्थितिक पुनर्स्थापन कहा जाता है, जिसके लिए सरकार की ओर से ग्रीन इंडिया मिशन Green India Mission) चलाया जा रहा है।
एक ताजा सरकारी के तहत सरकार ने लोकसभा में बताया है कि ग्रीन इंडिया मिशन के तहत 2015-16 से अब तक 17 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 1,84,467 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को इको-रिस्टोरेशन के दायरे में लाया गया है।
राष्ट्रीय हरित भारत मिशन (Green India Mission-GIM) राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (NAPCC) के तहत चलाए जा रहे आठ प्रमुख मिशनों में से एक है। इसका उद्देश्य केवल देश में पेड़ों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि घटते वन आवरण की रक्षा, खराब हो चुके वन और अन्य पारिस्थितिक तंत्रों का पुनर्स्थापन और उनकी गुणवत्ता में सुधार करना है। मिशन जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अनुकूलन और शमन, दोनों उपायों को साथ लेकर चलता है। इसके तहत जैव विविधता, जल, कार्बन भंडारण, मैंग्रोव, आर्द्रभूमि और अन्य पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं को मजबूत करने पर भी जोर दिया जाता है।
मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में 50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वन और वृक्ष आवरण बढ़ाना तथा अन्य 50 लाख हेक्टेयर वन और गैर-वन भूमि की गुणवत्ता में सुधार करना शामिल है। इसके अलावा इसका लक्ष्य कार्बन सिंक बढ़ाने, जल संबंधी पारिस्थितिक सेवाओं और जैव विविधता को मजबूत करने तथा करीब 30 लाख वन-आधारित परिवारों की आजीविका आय बढ़ाने का भी है।
ग्रीन इंडिया मिशन के तहत वनों की गुणवत्ता सुधारना, Ecosystem, शहरी और उप-शहरी क्षेत्रों में हरित आवरण बढ़ाना, एग्रो-फॉरेस्ट्री और सामाजिक वानिकी को बढ़ावा देना तथा आर्द्रभूमियों का पुनर्स्थापन जैसे काम शामिल हैं। मिशन की एक खास बात यह है कि इसके कार्यों में स्थानीय समुदायों की योजना बनाने, निर्णय लेने, क्रियान्वयन और निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका रखी गई है।
यानी ग्रीन इंडिया मिशन का लक्ष्य सिर्फ भारत को ज्यादा हरा बनाना नहीं, बल्कि उसके प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों को ज्यादा स्वस्थ, टिकाऊ और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीला बनाना है।
ग्रीन इंडिया मिशन यानी GIM राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (National Action Plan on Climate Change) के तहत शुरू किए गए प्रमुख मिशनों में से एक है। इसका उद्देश्य केवल वन क्षेत्र बढ़ाना नहीं, बल्कि घटते वन आवरण की रक्षा, उसकी गुणवत्ता में सुधार और खराब हो चुके वन तथा गैर-वन क्षेत्रों के पारिस्थितिक तंत्र को पुनर्जीवित करना है, जिसे इको-रिस्टोरेशन कहा जाता है। इस मिशन के तहत इको-रिस्टोरेशन की गतिविधियां वित्त वर्ष 2015-16 से शुरू हुई थीं। लोकसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक मिशन के तहत 17 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में 1,84,467 हेक्टेयर क्षेत्र को इको-रिस्टोरेशन के तहत लाया गया है। वित्त वर्ष 2026-27 में अब तक सात राज्यों, छत्तीसगढ़, हरियाणा, केरल, मध्य प्रदेश, मणिपुर, सिक्किम और उत्तर प्रदेश, के लिए स्वीकृत गतिविधियों पर 57.08 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इन गतिविधियों का क्रियान्वयन स्थानीय संस्थाओं, संयुक्त वन प्रबंधन समितियों, ग्राम वन समितियों और अन्य सामुदायिक संगठनों की भागीदारी से किया जाता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। 1.84 लाख हेक्टेयर का आंकड़ा यह बताता है कि इतने क्षेत्र में इको-रिस्टोरेशन गतिविधियां की गई हैं या क्षेत्र को इसके दायरे में लाया गया है। इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि इतने बड़े क्षेत्र का पारिस्थितिक तंत्र पूरी तरह अपने मूल स्वरूप में लौट चुका है। किसी पारिस्थितिक तंत्र की वास्तविक बहाली एक लंबी प्रक्रिया है, जिसके परिणामों को वनस्पति की गुणवत्ता, जैव विविधता, मिट्टी, जल उपलब्धता, प्राकृतिक पुनर्जनन और अन्य पारिस्थितिक सेवाओं के आधार पर समय के साथ मापना पड़ता है।
| राज्य/केंद्र शासित प्रदेश | इको-रिस्टोरेशन क्षेत्र (हेक्टेयर) |
|---|---|
| आंध्र प्रदेश | 1433 |
| अरुणाचल प्रदेश | 5314 |
| छत्तीसगढ़ | 22601 |
| हरियाणा | 3755 |
| हिमाचल प्रदेश | 1299 |
| जम्मू-कश्मीर | 1778 |
| कर्नाटक | 2722 |
| केरल | 14290 |
| मध्य प्रदेश | 32831 |
| महाराष्ट्र | 5223 |
| मणिपुर | 17488 |
| मिजोरम | 19643 |
| ओडिशा | 20711 |
| पंजाब | 7168 |
| सिक्किम | 6567 |
| उत्तराखंड | 14836 |
| पश्चिम बंगाल | 2606 |
| उत्तर प्रदेश | 4202 |
| कुल | 184467 |
इको-रिस्टोरेशन का सामान्य अर्थ है ऐसे पारिस्थितिक तंत्र को फिर से स्वस्थ और कार्यशील बनाने में मदद करना, जो मानवीय गतिविधियों या प्राकृतिक दबावों के कारण क्षतिग्रस्त, नष्ट या कमजोर हो गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार इसका उद्देश्य पारिस्थितिक क्षरण को रोकना और उलटना, पारिस्थितिक सेवाओं में सुधार तथा जैव विविधता की वापसी है।
इसका मतलब हमेशा यह नहीं होता कि किसी जंगल या आर्द्रभूमि को बिल्कुल उसी अवस्था में वापस ले आया जाए, जैसी वह कई दशक पहले थी। कई बार प्राकृतिक परिस्थितियां बदल चुकी होती हैं और जलवायु परिवर्तन ने भी पारिस्थितिक तंत्र की परिस्थितियां बदल दी होती हैं। ऐसे में लक्ष्य उसके पारिस्थितिक कार्यों और लचीलेपन को बहाल करना होता है।
इसीलिए इको-रिस्टोरेशन के तरीके भी अलग-अलग हो सकते हैं। कहीं स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाए जाते हैं, कहीं प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा दिया जाता है, कहीं मिट्टी और नमी संरक्षण के उपाय किए जाते हैं, तो कहीं आक्रामक प्रजातियों को हटाने या चराई और दूसरे मानवीय दबावों को नियंत्रित करने की जरूरत होती है। आर्द्रभूमियों, मैंग्रोव, घासभूमियों, नदी किनारों और खनन से प्रभावित भूमि के लिए पुनर्स्थापन की रणनीतियां भी अलग हो सकती हैं। यानी इको-रिस्टोरेशन का केंद्र सिर्फ पेड़ नहीं, पूरा पारिस्थितिक तंत्र है।
पर्यावरण संरक्षण की चर्चा में अक्सर पौधरोपण और इको-रिस्टोरेशन को एक ही मान लिया जाता है। दोनों में संबंध जरूर है, लेकिन दोनों समान नहीं हैं।
अगर किसी सूखे और क्षतिग्रस्त वन क्षेत्र में केवल बड़ी संख्या में पौधे लगा दिए जाएं, लेकिन मिट्टी का क्षरण जारी रहे, पानी उपलब्ध न हो, स्थानीय जैव विविधता वापस न आए और पौधों की जीवित रहने की दर कम हो, तो इसे सफल पारिस्थितिक पुनर्स्थापन नहीं कहा जा सकता।
एक स्वस्थ पारिस्थितिक तंत्र में पेड़-पौधों के साथ मिट्टी, सूक्ष्मजीव, कीट, पक्षी, वन्यजीव, जल स्रोत और उनके बीच के प्राकृतिक संबंध भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए अच्छे इको-रिस्टोरेशन में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रजातियों का चयन, प्राकृतिक पुनर्जनन, मिट्टी और जल संरक्षण, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जैसे पहलुओं को साथ देखा जाता है।
ग्रीन इंडिया मिशन की संरचना भी इसी व्यापक सोच को दर्शाती है। इसके तहत वन आवरण की गुणवत्ता सुधारने, पारिस्थितिक तंत्र बहाल करने, शहरी और उप-शहरी क्षेत्रों में वृक्ष आवरण बढ़ाने, एग्रो-फॉरेस्ट्री और सामाजिक वानिकी को बढ़ावा देने तथा आर्द्रभूमियों के पुनर्स्थापन जैसे अलग-अलग क्षेत्रों पर काम किया जाता है।
सबसे ज्यादा इको-रिस्टोरेशन मध्य प्रदेश (32,831 हेक्टेयर) में हुआ है। दूसरा नंबर छत्तीसगढ़ (22,601 हेक्टेयर), तीसरा ओडिशा (20,711 हेक्टेयर) इसके बाद मिजोरम (19,643 हेक्टेयर) और मणिपुर (17,488 हेक्टेयर) का स्थान है।
किसी पारिस्थितिक तंत्र के कमजोर होने का असर केवल पेड़-पौधों और वन्य जीवों पर नहीं पड़ता। बल्कि, इसका व्यापक असर पानी, मिट्टी, खेती, स्थानीय जलवायु और मानव आजीविका तक पर पड़ता है।
स्वस्थ जंगल वर्षा के पानी को जमीन में पहुंचाने, मिट्टी को बांधने और नदियों तथा जलस्रोतों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करते हैं। घासभूमियां मिट्टी और जैव विविधता के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आर्द्रभूमियां बाढ़ के पानी को रोकने और जल चक्र को सहारा देने में मदद करती हैं। मैंग्रोव तटीय इलाकों को तूफानों और समुद्री लहरों से सुरक्षा देते हैं।
इसलिए किसी क्षतिग्रस्त पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने का मतलब एक साथ कई पर्यावरणीय सेवाओं को मजबूत करना है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार स्वस्थ और अधिक जैव विविधता वाले पारिस्थितिक तंत्र अधिक उपजाऊ मिट्टी, बेहतर खाद्य और मत्स्य उत्पादन तथा अधिक कार्बन भंडारण जैसी सेवाएं देते हैं।
भारत जैसे देश में इको-रिस्टोरेशन का एक महत्वपूर्ण पहलू पानी है। जंगल और अन्य प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्र जलग्रहण क्षेत्रों को मजबूत करते हैं। वनस्पति आवरण मिट्टी के कटाव को कम करता है और बारिश के पानी को तेजी से बह जाने के बजाय जमीन में जाने का अवसर देता है।
इसी तरह आर्द्रभूमियों और नदी तटों का संरक्षण स्थानीय जल चक्र को बनाए रखने में मदद करता है। इसलिए पारिस्थितिक पुनर्स्थापन को केवल वन विभाग या जैव विविधता से जुड़ा विषय मानना सीमित दृष्टिकोण होगा। इसका सीधा संबंध भूजल, नदियों, बाढ़, सूखे और कृषि से भी है। जलवायु परिवर्तन के दौर में यह भूमिका और महत्वपूर्ण हो जाती है। UNEP के अनुसार प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों का संरक्षण और पुनर्स्थापन जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने में महत्वपूर्ण प्रकृति-आधारित समाधान है। उदाहरण के लिए मैंग्रोव तटीय बाढ़ से सुरक्षा देते हैं और पुनर्वनीकरण सूखे तथा मरुस्थलीकरण के प्रभावों को कम करने में मदद कर सकता है।
वृक्षारोपण करने से न केवल दूषित पर्यावरण में सुधार होता है, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र को संरक्षण मिलता है।
आज दुनिया एक साथ तीन बड़े पर्यावरणीय संकटों का सामना कर रही है, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का नुकसान और प्रदूषण। भूमि क्षरण इन तीनों संकटों को और गंभीर बनाता है। ऐसे में केवल मौजूदा प्राकृतिक क्षेत्रों को बचाना पर्याप्त नहीं है। जो क्षेत्र पहले ही खराब हो चुके हैं, उन्हें भी फिर से उपयोगी और लचीला बनाना जरूरी है।
इसी वजह से संयुक्त राष्ट्र ने 2021 से 2030 को इकोसिस्टम रिस्टोरेशन का दशक घोषित किया है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में पारिस्थितिक तंत्रों के क्षरण को रोकना, उसे उलटना और जैव विविधता तथा पारिस्थितिक अखंडता को बहाल करना है।
UNEP के अनुसार 2030 तक 35 करोड़ हेक्टेयर क्षतिग्रस्त स्थलीय और जलीय पारिस्थितिक तंत्र को बहाल करने से करीब 9 अरब डॉलर की पारिस्थितिक सेवाएं हासिल की जा सकती हैं और 13 से 26 गीगाटन ग्रीनहाउस गैसों को वायुमंडल से हटाने में मदद मिल सकती है। इन बातों से पता चलता है कि इको-रिस्टोरेशन अब केवल पर्यावरण संरक्षण का कार्यक्रम नहीं रह गया है। यह जलवायु अनुकूलन, जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जैव विविधता और ग्रामीण आजीविका की रणनीति भी बन चुका है।
ग्रीन इंडिया मिशन का मूल उद्देश्य भारत में वन और वृक्ष आवरण को बढ़ाने के साथ-साथ मौजूदा वन और गैर-वन भूमि की गुणवत्ता में सुधार करना है। मिशन के मूल लक्ष्यों में 50 लाख हेक्टेयर तक वन और वृक्ष आवरण बढ़ाना तथा अन्य 50 लाख हेक्टेयर वन और गैर-वन भूमि की गुणवत्ता सुधारना शामिल है। साथ ही कार्बन भंडारण, जल संबंधी सेवाओं और जैव विविधता जैसी पारिस्थितिक सेवाओं को मजबूत करने तथा करीब 30 लाख परिवारों की वन आधारित आजीविका आय बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।
इसका मतलब है कि मिशन की सफलता केवल इस आधार पर नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने पौधे लगाए गए या कितने हेक्टेयर क्षेत्र में गतिविधियां हुईं। असली सवाल यह है कि इन प्रयासों से पारिस्थितिक तंत्र की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ, स्थानीय जैव विविधता कितनी लौटी, मिट्टी और पानी की स्थिति में क्या बदलाव आया और स्थानीय समुदायों को कितना लाभ मिला।
ग्रीन इंडिया मिशन के तहत 1.84 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को इको-रिस्टोरेशन के दायरे में लाना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन इसी समय मिशन के प्रदर्शन को लेकर हाल में सामने आई एक दूसरी सरकारी रिपोर्ट भी ध्यान देने योग्य है। अगस्त 2026 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG ने ग्रीन इंडिया मिशन की प्रगति पर गंभीर सवाल उठाए और 2015-16 से 2024-25 के दौरान वन आवरण बढ़ाने के लक्ष्यों की तुलना में उपलब्धि में करीब 98 प्रतिशत की कमी की ओर ध्यान दिलाया।
इसलिए इको-रिस्टोरेशन की चर्चा में क्षेत्रफल और परिणाम के बीच अंतर को समझना जरूरी है। कितनी जमीन पर काम हुआ, यह पहला सवाल है। लेकिन उससे आगे यह देखना भी जरूरी है कि उस जमीन पर पारिस्थितिक तंत्र कितना सुधरा, कितने पौधे जीवित रहे, स्थानीय प्रजातियां कितनी लौटीं, जल और मिट्टी की स्थिति में क्या सुधार हुआ और यह सुधार कितने वर्षों तक कायम रहा।
भारत में भूमि क्षरण, जंगलों पर बढ़ता दबाव, शहरीकरण, बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, वनाग्नि, जल संकट और बदलती जलवायु आने वाले वर्षों में प्राकृतिक पारिस्थितिक तंत्रों के सामने बड़ी चुनौतियां रहने वाली हैं। ऐसे में इको-रिस्टोरेशन का महत्व लगातार बढ़ेगा।
इसके लिए स्थानीय प्रजातियों और स्थानीय पारिस्थितिकी को प्राथमिकता देना, प्राकृतिक पुनर्जनन को बढ़ावा देना, पानी और मिट्टी के संरक्षण को रिस्टोरेशन का हिस्सा बनाना और स्थानीय समुदायों को केवल मजदूर नहीं बल्कि योजना और निगरानी में भागीदार बनाना जरूरी होगा। साथ ही रिस्टोरेशन के बाद कई वर्षों तक वैज्ञानिक निगरानी भी जरूरी है।
ग्रीन इंडिया मिशन के तहत 1.84 लाख हेक्टेयर का आंकड़ा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों का एक महत्वपूर्ण संकेत है। लेकिन असली सफलता तब मानी जाएगी जब बहाल किए गए क्षेत्र केवल सरकारी रिकॉर्ड में रिस्टोर किए गए हेक्टेयर न रहें, बल्कि वहां जंगल, मिट्टी, पानी, वन्यजीव और स्थानीय समुदायों के बीच का पारिस्थितिक संतुलन भी वास्तव में मजबूत हो। क्योंकि प्रकृति को बहाल करने का मतलब केवल जमीन को हरा करना नहीं, बल्कि उस जमीन को फिर से जीवंत बनाना है।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें