नंदी हिल्स, बेंगलुरु | फ़ोटो - अजय मोहन 

 
पर्यावरण

विश्व पर्यटन दिवस : बढ़ते ट्रैफिक से लेकर घटते पानी तक

Author : सयाली पराते

  • देश के कई हिस्सों में ओवरटूरिज्म की वजह से पर्यावरण को नुकसान के साथ-साथ पानी पर भारी दबाव पड़ रहा है। 

  • वायनाड में जहाँ कई महत्वपूर्ण पेड़ों की प्रजातियां गायब हो गईं तो बेंगलुरु के नंदी हिल्स से निकलने वाली 6 नदियाँ ख़तरे में हैं। 

  • चित्तौड़गढ़ में बढ़ती भीड़ के कारण राजस्थान का बस्सी वन्यजीव अभयारण्य भारी जल संकट की ओर बढ़ रहा है।  

गर्मियों का मौसम शुरू होते ही पहाड़ों पर पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगती है। बीते दो-तीन वर्षों में कई वीकेंड ऐसे आये जब होटल से लेकर होमस्टे तक सब फुल हो गए और वाहनों की लंबी-लंबी कतारें सड़कों पर दिखीं, लोगों को ठहरने के लिए रूम नहीं मिले तो कारों में रातें बिताईं। शिमला, मसूरी के अलावा कई हिल स्टेशन हैं जहां कमोबेश ऐसे मंज़र देखने को मिले। सवाल यह है कि क्या ऐसी परिस्थितियां केवल ट्रैफिक पर दबाव डालती हैं? दरअसल यह दबाव पयर्टन स्थल के पानी पर भी होता है।  

27 सितंबर को हर साल विश्व पर्यटन दिवस मनाया जाएगा और फिर से सैर-सपाटे की बातें होंगी। इस चर्चा में पर्यावरण को होने वाले नुकसान की बात के साथ-साथ पानी की बात करना भी जरूरी है। क्योंकि बोतलबंद पानी से लेकर झरने व स्नोफॉल तक पानी का पर्यटन से सीधा ताल्लुक है। 

विश्व पर्यटन दिवस सिर्फ घूमने-फिरने और नई जगहों को देखने का उत्सव नहीं है, बल्कि यह सोचने का अवसर भी है कि पर्यटन किसी जगह की अर्थव्यवस्था, संस्कृति, प्रकृति और स्थानीय लोगों के जीवन को किस तरह प्रभावित करता है। विश्व पर्यटन दिवस की शुरुआत 1980 में हुई थी। 27 सितंबर की तारीख 1970 में तत्कालीन UNWTO के संविधान को अपनाए जाने की वर्षगांठ के कारण चुनी गई थी। 

आज पर्यटन दुनिया की महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधियों में शामिल है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दुनिया में हर 10 में से लगभग एक व्यक्ति की आजीविका पर्यटन से जुड़ी है। पर्यटन रोजगार पैदा करने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं, सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक क्षेत्रों के संरक्षण में भी भूमिका निभाता है। लेकिन इसके साथ पर्यावरण पर पड़ने वाला दबाव भी बढ़ रहा है। 

पानी और पर्यटन का रिश्ता 

कई पर्यटन स्थल अपनी पहचान ही पानी से बनाते हैं, जिसमें झीलें, नदियां, झरने, समुद्र तट और गर्म पानी के स्रोत इसके उदाहरण है। लेकिन पानी केवल पर्यटक आकर्षण नहीं है, पर्यटन उद्योग के संचालन के लिए भी यह बुनियादी संसाधन है। होटल, रेस्तरां और अन्य पर्यटन सेवाओं में पानी की जरूरत होती है। ऐसे क्षेत्रों में जहां पहले से जल संकट है, पर्यटकों की संख्या बढ़ने के साथ स्थानीय जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

हिमाचल प्रदेश का शिमला इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। 2018 में शिमला का जल संकट इतना गंभीर हो गया था कि प्रशासन और स्थानीय लोगों ने पर्यटकों से कुछ समय के लिए शहर न आने की अपील तक की थी। उस समय शहर की पानी की उपलब्धता मांग के मुकाबले काफी कम हो गई थी। जून 2018 में शिमला में 1 लाख से अधिक लोगों के पहुंचने के कारण पानी की डिमांड 45 एमएलडी तक पहुंच गई थी, जबिक उस दौरान शहर की क्षमता मात्र 18 से 22 एमएलडी थी। 

कैनेडियन रीसोर्स जर्नल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार मनाली के घरों में पहुंचने वाला पानी नेहरू कुंड और मनालसु नाला से सप्लाई होता है और गर्मी के मौसम में इन दोनों जल स्रोतों में पानी कम हो जाता है और उस वक्त पर्यटकों की संख्या में इज़ाफा होने से शहर में पानी का दबाव बढ़ जाता है। अध्ययन में पाया गया कि मनाली में मौजूद ब्यास नदी और बाकी के जलाशयों में पानी की गुणवत्ता गिरने का प्रमुख कारण पर्यटकों द्वारा फेंका गया कचरा होता है। इस कचरे में मुख्य रूप से पैकिंग मटीरियल, फूड रैपर, पेपर, प्लास्टिक बैग, पानी की बोतलें, आदि होते हैं। विडंबना यह है कि शहर का डंपिंग यार्ड भी ब्यास नदी से कुछ ही दूरी पर स्थित है। 

मनाली का हिडंबा माता मंडित | फोटो विकिकॉमंस 

वैसे पानी और पर्यटन का रिश्ता केवल पहाड़ों पर नहीं बल्कि किसी न किसी रूप में हर एक पयर्टन स्थल के साथ है। चाहे वो चेन्नई का मरीना बीच हो, या वायनाड का बनासुरा सागर बांध, वाराणसी हो या हम्पी, गुवाहाटी हो या जयपुर हर जगह पानी को दूषित नहीं करने की जिम्मेदारी पर्यटकों की ही होती है। वो बात अलग है कि इस जिम्मेदारी को समझने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है।     

यह जिम्मेदारी केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में साथ चलती है। UN Tourism के अनुसार, पानी पर्यटन के लिए एक महत्वपूर्ण संसाधन है और पानी की कमी पर्यटन गतिविधियों के साथ-साथ स्थानीय निवासियों के लिए भी समस्या पैदा कर सकती है। इसलिए पानी का संरक्षण, पुनर्चक्रण और अपशिष्ट जल का बेहतर प्रबंधन सतत पर्यटन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

भारत की National Strategy for Sustainable Tourism में भी पर्यटन क्षेत्र में पानी के कुशल इस्तेमाल, अपशिष्ट जल प्रबंधन, प्रदूषण नियंत्रण और तकनीकी दक्षता को जल सुरक्षा से जोड़ा गया है। 

जब पर्यटन प्रकृति पर दबाव डालता है

पर्यटन की बढ़ती गतिविधियों के साथ प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव भी बढ़ सकता है। होटल और रिसॉर्ट के लिए पानी चाहिए, पर्यटकों के लिए परिवहन चाहिए और पर्यटन गतिविधियों के साथ कचरा तथा सीवेज भी पैदा होता है।

UN Environment के अनुसार, पर्यटन क्षेत्र ऊर्जा, पानी और भूमि जैसे संसाधनों का इस्तेमाल करता है और इसके साथ ठोस कचरा, सीवेज, जैव विविधता के नुकसान और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसी पर्यावरणीय चुनौतियां भी जुड़ी है। यही वजह है कि अब पर्यटन विकास के साथ सतत पर्यटन (Sustainable Tourism) की अवधारणा पर जोर दिया जा रहा है।

तीन उदाहरण जहां पर्यटन से नष्ट हो रही इकोलॉजी

अत्याधिक पर्यटन के दुष्प्रभावों की सूची बहुत लंबी है, देश के लगभग सभी पर्यटन स्थल किसी न किसी रूप में पर्यटकों की आवाजाही और लापरवाही और गैरजिम्मेदाराना गतिविधियों की वजह से प्रभावित हो रही है। प्रस्तुत हैं तीन उदाहरण -  

जैव विविधता खोता केरलम का वायनाड 

पश्चिमी घाट के सबसे सुंदर हिल स्टेशन में से एक केरलम का वयनाड अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है। लेकिन ओवर टूरिज्म और पर्यटकों की सुविधाओं के लिए हो रहे कॉन्क्रीटीकरण के चलते यहां की जैव विविधता खतरे में है। अकिता इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी, जापान के डॉ. फिलिप वर्गीस और डॉ. योजी नाटोरी द्वारा 2024 में किए गए अध्ययन के अनुसार वायनाड का एग्रोईकोसिस्टम से चावल की 160 वरायटी गायब हो गईं। मसालों के लिए सबसे उपजाऊ भूमियों में से एक वायनाड से काली मिर्च की 12 वरायटी विलुपत हो गईं। और तो और 13 प्रकार के केले और अन्य सब्जियों की अन्य वरायटियां जो यहां की शान हुआ करती थीं, अब यहां नहीं पायी जाती हैं। 

वायनाड, केरलम | फोटो - अजय मोहन  

खतरे में चित्तौड़गढ़ का बस्सी वन्य जीव अभ्यारण्य 

राजस्थान विश्वविद्यालय की शोधकर्ता अपेक्षा नागोरी और सरिंग कालिया द्वारा 2024 में किए गए एक अध्ययन में साफ चेतावनी दी गई है कि अगर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के में स्थित बस्सी वन्य जीव अभ्यारण्य में पर्यटन गतिविधियों को नियंत्रित नहीं किया गया तो यहां के 42 गाँवों के लोगों की आजीविका आने वाले वर्षों में खत्म हो जाएगी। क्योंकि चित्तौड़गढ़ का किला और श्री सांवलिया जी मंदिर में आने वाले लोगों की संख्या बीते 10 वर्षों में तेजी से बढ़ी है। साथ-साथ वन्यजीव अभयारण्य आने वाले पर्यटकों की संख्या भी बढ़ी।

शोधपत्र के अनुसार शहर के लोगों द्वारा प्रति व्यिक्त 100 लीटर पानी प्रतिदिन इस्तेमाल किया जाता है, जबिक घरेलू पर्यटकों द्वारा प्रतिव्यक्ति पानी का खर्च 135 लीटर प्रतिदिन है, जबिक विदेशी पर्यटकों में प्रतिव्यक्ति पानी का खर्च 200 लीटर प्रतिदन है। चित्तौढ़गढ़ में देसी और विदेशी दोनों प्रकार के पर्यटकों की संख्या (2015 से 2021 के बीच करीब एक लाख सालाना, 2022 में 5 लाख, 2023 में 12 लाख और 2024 में 24 लाख पर्यटक आये) में तेज़ी से हो रहा इज़ाफा खतरे की घंटी बजा रहा है।  

चित्तौड़गढ़ का किला जहाँ लाइट एंड साउंड शो के लिए जुटती है भारी भीड़ 

खतरे में 6 नदियों का उद्गम स्थल कर्नाटक का नंदी हिल्स 

बेंगलुरु से करीब 80 किलोमीटर दूर स्थित नंदी हिल्स की पहाड़ियों से छह क्षेत्रीय नदियां निकलती हैं, जो कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के कई हिस्सों तक जाती हैं।  

  1. अरकावती नदी : यह नदी हेसरागट्टा और तिप्पागोंडाहल्ली जलाशयों के जरिए बेंगलुरु शहर के लिए पीने के पानी का प्रमुख स्रोत बनती है। 

  2. पालार नदी :  इसे “दूध की नदी”  भी कहा जाता है, यह आगे चलकर नदी बनने से पहले ज़मीन के नीचे बहती है। 

  3. उत्तरा पिनाकिनी (उत्तर पेन्नार/पेन्ना) : यह नदी कर्नाटक के उत्तर और पूर्वी हिस्से से होते हुए आंध्र प्रदेश तक जाती है।    

  4. दक्षिण पिनाकिनी (दक्षिण पेन्नार/पेन्ना) : इस नदी की शाखाएं दक्षिण की तरफ होते हुए तमिलनाडु तक जाती हैं।  

  5. चित्रावती नदी : पेन्नार रिवर सिस्टम की मुख्य ट्रिब्यूटरी है।  

  6. पापाग्नि नदी : इस क्षेत्र के शुष्क इलाकों से होकर बहने वाली एक और महत्वपूर्ण सहायक नदी।

नंदी हिल्स की पहाड़ियों पर रिसॉर्ट और होटलों की संख्या के साथ-साथ यहां आने वाले पर्यटकों की संख्या हर साल तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में यहां के प्राकृतिक संसाधनों को खतरा हो सकता है। आंकड़ों की बात करें तो कर्नाटक पर्यटन विभाग के अनुसार 2023 में यहां 19.48 पर्यटक आये, 2024 में 21.32 लाख और 2025 में 24 लाख (अंतरिम संख्या) पर्यटक आये। अनुमान के अनुसार 2028 तक यहां सालाना पर्यटकों की संख्या 32 लाख तक पहुंचने की संभावना है। ऐसे में यहां की ईकोलॉजी के साथ-साथ इन छह नदियों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।  

नंदी हिल्स की पहाड़ियों पर रोज़ाना जुटती है ऐसी भीड़ 

पर्यटन और स्थानीय लोगों का रिश्ता

पर्यटन किसी क्षेत्र में छोटे कारोबार और स्थानीय रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है। खासकर ग्रामीण इलाकों में पर्यटन को स्थानीय संस्कृति, कृषि, हस्तशिल्प, खान-पान और पारंपरिक ज्ञान से जोड़कर आजीविका के नए अवसर बनाए जा सकते है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, पर्यटन महिलाओं, युवाओं, ग्रामीण आबादी और अन्य समूहों के लिए रोजगार और आजीविका का महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। 

लेकिन पर्यटन से होने वाली आय का कितना हिस्सा वास्तव में स्थानीय समुदाय तक पहुंचता है। यदि किसी पर्यटन स्थल पर स्थानीय लोगों की भूमिका केवल कम वेतन वाले कामों तक सीमित रह जाए और बड़े व्यवसायों को अधिकांश आर्थिक लाभ मिले, तो पर्यटन का स्थानीय विकास में योगदान सीमित हो सकता है।

भारत में पर्यटन का बढ़ता दायरा

भारत के लिए पर्यटन केवल विदेशी पर्यटकों तक सीमित क्षेत्र नहीं है। देश में धार्मिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक, ग्रामीण और साहसिक पर्यटन के अलग-अलग रूप मौजूद है।

भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत में लगभग 2948.19 मिलियन घरेलू पर्यटक यात्राएं दर्ज की गईं, जो 2023 के 2508.82 मिलियन की तुलना में 17.51 प्रतिशत अधिक थीं। इसी वर्ष विदेशी पर्यटक यात्राएं लगभग 20.94 मिलियन रहीं। 

ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में घरेलू पर्यटन का पैमाना कितना बड़ा है। इसका मतलब यह भी है कि पर्यटन से जुड़े फैसलों का असर केवल प्रसिद्ध पर्यटन शहरों पर नहीं, बल्कि छोटे शहरों, गांवों, तीर्थस्थलों, जंगलों, पहाड़ी क्षेत्रों और स्थानीय बाजारों पर भी पड़ता है।

क्या हर पर्यटन स्थल को ज्यादा पर्यटक चाहिए?

पर्यटन को अक्सर पर्यटकों की संख्या से मापा जाता है। लेकिन किसी जगह की वहन क्षमता यानी carrying capacity भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

यदि किसी पहाड़ी शहर, झील, समुद्र तट या जंगल में सीमित समय में बहुत अधिक लोग पहुंचते हैं, तो सड़क, पानी, सीवेज, कचरा प्रबंधन और स्थानीय पारिस्थितिकी पर दबाव बढ़ सकता है।

इसलिए पर्यटन की सफलता का सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसी जगह पर कितने पर्यटक आए। यह भी देखना जरूरी है कि - 

  • स्थानीय लोगों की आय में कितना बदलाव आया?

  • क्या स्थानीय युवाओं को रोजगार मिला?

  • क्या स्थानीय संस्कृति और विरासत सुरक्षित रही?

  • पानी की उपलब्धता पर क्या असर पड़ा?

  • कितना कचरा पैदा हुआ और उसका प्रबंधन कैसे हुआ?

  • क्या प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हुआ?

  • क्या पर्यटन से होने वाला लाभ स्थानीय समुदाय तक पहुंचा?

स्थानीय संस्कृति पर्यटन की पहचान है

भारत में पर्यटन की सबसे बड़ी ताकत उसकी सांस्कृतिक विविधता है। किसी जगह का भोजन, लोकनृत्य, लोकगीत, त्योहार, पहनावा, वास्तुकला, हस्तशिल्प और पारंपरिक ज्ञान उस क्षेत्र की पहचान बनाते है।

लेकिन जब स्थानीय संस्कृति को केवल पर्यटकों के मनोरंजन के लिए प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके व्यावसायीकरण का खतरा भी रहता है। इसलिए पर्यटन योजनाओं में स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी है।

सतत पर्यटन की अवधारणा आर्थिक लाभ के साथ पर्यावरणीय संरक्षण और सामाजिक-सांस्कृतिक जरूरतों को भी ध्यान में रखने की बात करती है। संयुक्त राष्ट्र के सतत पर्यटन संबंधी दस्तावेजों में स्थानीय संस्कृति और उत्पादों से रोजगार पैदा करने को भी SDG 8.9 के तहत महत्व दिया गया है। 

2026 में पर्यटन की दिशा तय करेगी डिजिटल तकनीक

विश्व पर्यटन दिवस 2026 की थीम “Digital Agenda and Artificial Intelligence to Redesign Tourism” है। यानी इस साल पर्यटन की चर्चा में डिजिटल तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को केंद्र में रखा गया है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, AI पर्यटकों के गंतव्य चुनने, पर्यटन उद्योग के संचालन और यात्रा अनुभव को डिजाइन करने के तरीके को बदल सकता है।

लेकिन तकनीक के विस्तार के साथ एक सवाल भी महत्वपूर्ण है क्या डिजिटल पर्यटन का फायदा केवल बड़े पर्यटन व्यवसायों और लोकप्रिय स्थलों तक सीमित रहेगा या छोटे कारोबारियों, स्थानीय गाइडों, ग्रामीण पर्यटन स्थलों और कम प्रसिद्ध जगहों तक भी पहुंचेगा?

संयुक्त राष्ट्र ने 2026 के संदेश में इस बात पर जोर दिया है कि पर्यटन कर्मचारी, स्थानीय समुदाय और उभरते पर्यटन स्थल भविष्य की डिजिटल व्यवस्था को आकार देने में शामिल हों। डिजिटल कौशल और तकनीक तक पहुंच बढ़ाना भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। 

जिम्मेदार पर्यटक की भूमिका

सतत पर्यटन केवल सरकार या पर्यटन उद्योग की जिम्मेदारी नहीं है। पर्यटक भी इसके महत्वपूर्ण हिस्सेदार है। किसी पर्यटन स्थल पर प्लास्टिक का इस्तेमाल कम करना, कचरा खुले में न फेंकना, पानी की बर्बादी रोकना, स्थानीय उत्पाद खरीदना, वन्यजीवों से दूरी बनाए रखना और स्थानीय संस्कृति का सम्मान करना छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं।

पर्यटन का अनुभव तब अधिक सार्थक हो सकता है जब पर्यटक किसी जगह से केवल तस्वीरें लेकर न लौटे, बल्कि उस जगह के पर्यावरण और समुदाय के प्रति जिम्मेदारी की समझ भी लेकर लौटे।

विश्व पर्यटन दिवस 2026 हमें पर्यटन के बदलते स्वरूप पर विचार करने का अवसर देता है। एक तरफ AI और डिजिटल तकनीक पर्यटन को अधिक व्यक्तिगत और सुविधाजनक बना सकती है, वहीं दूसरी तरफ यह जरूरी है कि तकनीक के लाभ छोटे व्यवसायों और स्थानीय समुदायों तक भी पहुंचें।

दूसरी ओर, पर्यटन का भविष्य प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर तय नहीं किया जा सकता। पानी, जंगल, नदियां, पहाड़, समुद्र और जैव विविधता ही कई पर्यटन स्थलों की असली पूंजी हैं।

छात्रों के लिए नोट - अगर आप विश्व पर्यटन दिवस पर निबंध लिख रहे हैं तो इस लेख के इनपुट आपके लिए लाभकारी हो सकते हैं। 

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