कर्नाटक डिजिटल इकोनॉमी मिशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव गुप्ता
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल नीतियां बनाना या नई तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है। यह समझना भी जरूरी है कि जलवायु संबंधी खतरे कहां और कितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, किन समुदायों पर उनका सबसे अधिक असर पड़ रहा है और उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता है। इसके लिए विश्वसनीय डेटा और उसके आधार पर निर्णय लेने की क्षमता महत्वपूर्ण है।
बेंगलुरु में 12 से 16 अक्टूबर 2026 के बीच आयोजित बेंगलुरु क्लाइमेट डेटा वीक में इसी विषय पर चर्चा हुई। क्लाइमेट कलेक्टिव फाउंडेशन की ओर से आयोजित इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में जलवायु तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), शहरी जलवायु जोखिम, औद्योगिक उत्सर्जन, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन जैसे विषयों पर गहन चर्चा की गई।
कार्यक्रम में इस बात पर जोर दिया गय कि जलवायु संकट का प्रभावी समाधान विकसित करने के लिए तकनीक को स्थानीय जरूरतों, विश्वसनीय आंकड़ों और जमीनी स्तर पर निर्णय लेने वाली संस्थाओं से जोड़ना होगा। जल सुरक्षा और शहरी नियोजन जैसे क्षेत्रों में भी यह दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो सकता है।
इस मौके पर जलवायु तकनीक और डेटा के इस्तेमाल को लेकर कई प्रमुख विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। क्लाइमेट कलेक्टिव फाउंडेशन के संस्थापक प्रताप राजू ने जलवायु समाधानों को बड़े स्तर पर लागू करने के लिए बेहतर डेटा उपलब्धता और विभिन्न क्षेत्रों के बीच सहयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। कर्नाटक डिजिटल इकोनॉमी मिशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी संजीव गुप्ता ने जलवायु डेटा को अधिक सुलभ बनाने, बाढ़ और गर्मी से निपटने के लिए डिजिटल टूल विकसित करने तथा कृषि में AI के इस्तेमाल की संभावनाओं को रेखांकित किया।
वहीं गूगल में जियो सस्टेनेबिलिटी की ग्लोबल पार्टनरशिप्स लीड रोली अग्रवाल ने जलवायु संबंधी जटिल आंकड़ों को व्यावहारिक समाधानों में बदलने में AI की भूमिका पर प्रकाश डाला। वहीं, क्लाइमेट कलेक्टिव फाउंडेशन के सह-संस्थापक नलिन अग्रवाल ने औद्योगिक उत्सर्जन कम करने के लिए विश्वसनीय डेटा, ऊर्जा दक्षता और उद्योगों तथा तकनीक विकसित करने वालों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण बताया। कार्यक्रम में CSTEP ने शहरी गर्मी और सतत विकास से जुड़े डेटा टूल प्रस्तुत किए, जबकि WRI India ने बेंगलुरु में जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए डेटा आधारित निर्णयों को बढ़ावा देने हेतु Data Lab Connect पहल शुरू की।
बेंगलुरु क्लाइमेट डेटा वीक में महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई
जलवायु से जुड़ी प्रमुख बातें जिन पर चर्चा हुई
शहरों में बढ़ती गर्मी, अनियमित वर्षा, बाढ़ और जलापूर्ति से जुड़ी चुनौतियां एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं। इनके समाधान के लिए केवल राष्ट्रीय स्तर के औसत आंकड़े पर्याप्त नहीं होते। शहर के अलग-अलग हिस्सों में तापमान, हरित क्षेत्र, जल निकायों, निर्मित क्षेत्र और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को समझना भी जरूरी है।
कार्यक्रम में सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एंड पॉलिसी (CSTEP) ने शहरी गर्मी से निपटने के लिए BHRIGU–National + Heat Insights Explorer प्रस्तुत किया। इस टूल का उद्देश्य शहरी गर्मी से जुड़े जोखिमों को समझने और गर्मी के प्रति शहरों की अनुकूलन क्षमता मजबूत करने में सहायता करना है। इसी के साथ CSTEP ने अपने Namma SAFARI और DISHA प्लेटफॉर्म भी प्रदर्शित किए गए।
इन पहलों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आयी कि जलवायु संबंधी आंकड़ों को मानचित्रों, विश्लेषण और निर्णय-सहायक टूल के रूप में उपलब्ध कराने से योजनाकारों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप समाधान तैयार करने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी शहर में गर्मी का खतरा कुछ इलाकों में अधिक है, तो स्थानीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर उन क्षेत्रों में छायादार स्थान, हरित क्षेत्र और जल उपलब्धता बढ़ाने की प्राथमिकताएं तय की जा सकती हैं। हालांकि, ऐसे निर्णयों के लिए तापमान के साथ आबादी, सामाजिक संवेदनशीलता और उपलब्ध बुनियादी सुविधाओं के आंकड़ों को भी जोड़ना होगा।
जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव, बाढ़, सूखे और जल उपलब्धता से जुड़ी अनिश्चितताएं बढ़ रही हैं। ऐसे में जल संसाधनों के प्रबंधन के लिए समय पर और स्थानीय स्तर पर प्रासंगिक जानकारी की आवश्यकता होती है। WRI India ने Data Lab Connect प्रस्तुत किया जिससे डेटा का इस्तेमाल करके शहरी गर्मी, बुनियादी ढांचे की कमियों और जल से जुड़े बदलते पैटर्न जैसी चुनौतियों पर काम करने में मदद मिलती है।
पानी से जुड़े डाटा पर आधारित टूल्स के माध्यम से निम्न चीजें समझने पर जोर दिया गय -
जल उपलब्धता का आकलन: अलग-अलग क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता और मांग के रुझानों को समझना।
शहरी बाढ़ की तैयारी: वर्षा, जल निकासी और स्थानीय भू-भाग से संबंधित आंकड़ों को जोड़कर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान करना।
जलापूर्ति की योजना: बुनियादी ढांचे में मौजूद कमियों को समझना और निवेश की प्राथमिकताएं तय करना।
जलवायु अनुकूलन: बदलती वर्षा और तापमान की परिस्थितियों के अनुरूप जल प्रबंधन की योजनाएं बनाना।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जलवायु संबंधी बड़ी मात्रा में उपलब्ध आंकड़ों का विश्लेषण करने और उनके आधार पर पूर्वानुमान तैयार करने में उपयोगी हो सकता है। कार्यक्रम के AI for Climate Tech Summit में मौसम और बाढ़ के पूर्वानुमान, ऊर्जा के बेहतर इस्तेमाल, माल परिवहन के विद्युतीकरण और संसाधन दक्षता जैसे अनुप्रयोगों पर चर्चा हुई।
जलवायु अनुकूलन से संबंधित एक अन्य सत्र में शहरी नियोजन, बुनियादी ढांचे, कृषि और बीमा के लिए जलवायु संबंधी जानकारी के उपयोग पर विचार किया गया। जल प्रबंधन के संदर्भ में AI की उपयोगिता को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है-
मौसम और वर्षा से संबंधित आंकड़ों के विश्लेषण से बाढ़ के संभावित जोखिम को समझने और चेतावनी प्रणालियों को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।
दूसरा, ऐतिहासिक वर्षा, जल निकासी और भू-भाग से संबंधित आंकड़ों को जोड़कर उन क्षेत्रों की पहचान करने में मदद मिल सकती है जहां भारी बारिश के दौरान पानी जमा होने की आशंका अधिक है।
जलवायु संबंधी पूर्वानुमानों को स्थानीय प्रशासन और संबंधित संस्थाओं की कार्यप्रणाली से जोड़कर तैयारी और प्रतिक्रिया की योजनाएं बेहतर बनाई जा सकती हैं।
कार्यक्रम में भी इस बात पर जोर दिया गया कि प्रयोग के स्तर पर विकसित समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए विश्वसनीय डेटा, मानकीकृत तरीकों और विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय की आवश्यकता है। इसका अर्थ है कि पूर्वानुमान तैयार करने के साथ-साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि संबंधित विभागों और समुदायों तक जानकारी समय पर पहुंचे और वे उसके आधार पर कार्रवाई कर सकें।
जलवायु संकट से निपटने के लिए AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन इस तकनीक के अपने पर्यावरणीय प्रभाव भी हैं। कार्यक्रम में AI के लिए आवश्यक डिजिटल बुनियादी ढांचे की ऊर्जा और पानी की जरूरतों पर भी चर्चा हुई।
AI प्रणालियों को चलाने वाले डेटा सेंटरों में कंप्यूटिंग उपकरणों के संचालन और शीतलन के लिए संसाधनों की आवश्यकता हो सकती है। इसलिए जलवायु संबंधी समाधान विकसित करते समय तकनीक के संभावित लाभों के साथ उसके संसाधन इस्तेमाल का आकलन करना भी जरूरी है।
यह सवाल खास तौर पर उन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण है जहां पानी की उपलब्धता पहले से दबाव में है। यदि AI आधारित समाधान विकसित करने और चलाने में बड़ी मात्रा में पानी या ऊर्जा खर्च होती है, तो उसके लाभों और पर्यावरणीय लागत के बीच संतुलन समझना आवश्यक होगा।
कार्यक्रम की चर्चाओं से यह निष्कर्ष निकलता है कि किसी तकनीक का मूल्यांकन केवल उसकी कार्यक्षमता के आधार पर नहीं होना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि वह उत्सर्जन घटाने, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने और वास्तविक जलवायु जोखिमों को कम करने में कितना योगदान देती है।
औद्योगिक क्षेत्र में उत्सर्जन कम करना जलवायु परिवर्तन से निपटने की एक बड़ी चुनौती है। सीमेंट और इस्पात जैसे उद्योगों में उत्सर्जन घटाने के लिए उत्पादन प्रक्रियाओं और ऊर्जा इस्तेमाल में बदलाव की आवश्यकता होती है। कार्यक्रम में आयोजित Industry Net Zero Innovation Summit में चर्चा हुई कि AI उद्योगों की परिचालन दक्षता बढ़ाने, ऊर्जा इस्तेमाल में सुधार करने और उत्सर्जन प्रबंधन को बेहतर बनाने में किस तरह मदद कर सकता है। हालांकि, किसी तकनीक का इस्तेमाल तभी प्रभावी होगा जब उसके परिणाम वास्तविक परिस्थितियों में साबित हों। इसके लिए विश्वसनीय परिचालन डेटा, स्पष्ट व्यावसायिक लाभ और तकनीक विकसित करने वालों तथा उसे अपनाने वाले उद्योगों के बीच सहयोग जरूरी है।
यह सिद्धांत जल क्षेत्र पर भी लागू होता है। जल शोधन, पंपिंग, वितरण और अपशिष्ट जल उपचार जैसी प्रक्रियाओं में संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल के लिए डेटा आधारित प्रणालियां उपयोगी हो सकती हैं। लेकिन ऐसे समाधानों की सफलता का आकलन वास्तविक जल बचत, ऊर्जा खपत और परिचालन लागत में बदलाव जैसे मापने योग्य परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।
बेंगलुरु क्लाइमेट डेटा वीक की चर्चाओं में एक और महत्वपूर्ण मुद्दा सामने आया। वो था कि जलवायु समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए केवल तकनीक विकसित करना पर्याप्त नहीं है। शोधकर्ताओं, स्टार्टअप, सरकार, उद्योग, निवेशकों और समुदायों के बीच सहयोग जरूरी है। विश्वसनीय डेटा तक पहुंच, वित्तीय संसाधन, संस्थागत समर्थन और प्रशिक्षित लोगों की उपलब्धता भी यह तय करती है कि कोई समाधान कितनी प्रभावी तरह से लागू हो पाएगा।
कार्यक्रम में महिला नेतृत्व वाले 26 जलवायु-तकनीक स्टार्टअप को समर्थन देने वाले She Wins Climate South Asia Accelerator की उपलब्धियों को भी सामने रखा गया। इसके अलावा, क्लाइमेट जॉब्स फेयर में 200 से अधिक रोजगार के इच्छुक लोगों को जलवायु तकनीक से जुड़े स्टार्टअप के साथ संवाद करने का अवसर मिला। ये पहलें बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तकनीकी क्षमता के साथ वित्त, उद्यमिता और कुशल मानव संसाधन को भी मजबूत करना होगा।
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