बिहार की गोगा बिलझील, इन्सेट में बामी मछली
झील की फोटो - नीतू सिंह के सौजन्य से
ज़मीनदारों द्वारा लगान वसूलने की सिदयों पुरानी परम्परा के बारे में आपने ज़रूर पढ़ा या सुना होगा, लेकिन हमारे देश में ही एक समय ऐसा भी था जब पानी पर भी लगान देना पड़ता था, लगान वसूलने वाले को पानीदार कहा जाता था। ये पानीदार तालाब, पोखरों, व नदी से मछ्ली पकड़ने वालों से कर वसूलते थे और इस तरह मछुआरों को मछली पकड़ने की फीस देनी पड़ती थी। जिस वजह से मछलियों का गुप्त शिकार किया जाता था। 3 दशक बीत गए, पानीदारी खत्म गई, लेकिन बामी मछली (lesser spiny fish) का गुप्त शिकार करने की परम्परा आज भी कायम है। परम्परा नहीं, दरअसल यह एक कौशल है, जो अब कुछ गिने चुने मछुआरों के पास ही है।
गुप्त शिकार वो शिकार है जिसमें मछुआरे नदी में जाल नहीं डालते, बल्कि मछली के बिल में घात लगाकर पकड़ते हैं। घात लगाने में जहां घंटों लग जाते हैं, वहीं पकड़ने का काम महज़ चंद संकेंड का होता है। आगे बढ़ने से पहले जानते हैं कि गुप्त शिकार की परम्परा कैसे शुरू हुई।
भारत में अंतर्स्थलीय मछली पालन हमेशा से सरकार और स्थानीय पानीदारों द्वारा अत्यधिक नियंत्रित रहा है। बिहार राज्य में मछली पकड़ना हमेशा से एक बहुत जटिल और संघर्षपूर्ण कार्य रहा है। पारम्परिक रूप से बिहार में मछुआरे नदियां, तालाब, पोखर एवं चर यानी आर्द्रभूमि (वेटलैंड), और पट्टा पर लिए गए जलाशयों में मछली पकड़ते आये हैं। ऐसे में मछली पकड़ने का काम मछुआरों के लिए कभी सुरक्षित नहीं रहा है जिसका एक बड़ा कारण पानीदारी व्यवस्था का दबदबा होना था।
अतीत में बिहार के जलाशयों पर जमींदार और पानीदार नदियों के विशेष हिस्सों पर एकाधिकार रखते थे। यह पानीदारों को कर देने की परम्परा खासतौर से गंगा नदी व कोसी-कमला नदी घाटी में थी। मुज़फ्फरपुर व आस-पास के इलाकों में तो मुगलकाल से ही यहां के छोटे-छोटे जलाशयों तक पर पानीदारों का कब्जा हुआ करता था। यह परम्परा आज़ादी के बाद भी जारी थी।
इस परम्परा के खिलाफ 'गंगा मुक्ति आंदोलन' हुआ जिसमें मछुआरों ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। वर्षों तक चले के संघर्ष के परिणामस्वरूप वर्ष 1991 में पानीदारी व्यवस्था को आधिकारिक रूप से समाप्त कर दिया गया और बिहार की नदियों को सभी के लिए मुक्त घोषित कर दिया गया।
बिहार की गोगाबिल झील
अधिकारिक रूप से यह व्यवस्था भले ही समाप्त हो गई है लेकिन, ज़मीनी हकीकत आज भी पूरी तरह बदली नहीं है। मछुआरों के मन में आज भी पानीदारों का खौफ बना हुआ है। उत्तर बिहार के कोसी-कमला क्षेत्र में पीएचडी (PhD) शोध के दौरान यह देखा गया कि पुरानी पीढ़ी के मछुआरों को आज भी पकड़े जाने और अपनी मछली छीन लिए जाने का भय सताता रहता है। दरअसल अब पानीदार भले ही नहीं हैं, लेकिन स्थानीय दबंगों द्वारा मछली छीनने की घटनाएं यहां आम हैं।
बामी मछली (लेसर स्पाइनी ईल) आमतौर पर नदी के कीचड़ भरे किनारों पर केकड़े के बिलों (Crab Burrows) और मिट्टी में शरण लेती है। वे पानी में पड़े किसी भी खोखले बेलनाकार ढांचे में भी छिप जाती हैं, जहाँ उनका लंबा शरीर समा सके। जाल डालकर इस मछली को पकड़ेंगे तो सबको पता चल जाएगा इसलिए इसका शिकार गुप्त रूप से किया जाता है - सीधे इसके बिल में घात लगाकर।
ईल का शिकार करने का तरीका स्थानीय निवासी व मछुवारा समुदाय से गंगाराम साहनी साझा किया और कहा, “मैं बहुत ही साधारण औजारों के साथ काम करता हूँ। एक सीधा धातु का हुक जिससे नायलॉन का मजबूत धागा जुड़ा होता है, जिसे हम 'गत्था’ कहते हैं; और दो लंगोट (एक पहनने के लिए और दूसरी मछली पकड़ने के बाद बदलने तथा मछली को छिपाने के लिए)।
बामी मछली (Lesser Spiny Eel Fish)
गर्मी के मौसम में बामी मछली नदी के किनारे जिन बिलों में रहती हैं, उनमें बाहर निकलने के कई रास्ते होते हैं:
पहला रास्ता: सीधे नदी में खुलता है।
दूसरा रास्ता: किनारे के समानांतर जाकर नदी में खुलता है।
तीसरा रास्ता: पानी के स्तर से ऊपर जमीन पर खुलता है (जो मुख्य रूप से हवा/ऑक्सीजन के लिए होता है)।
गंगाराम साहनी ने बताया कि इसके साथ ही, इन बिलों में अन्य जीव भी हो सकते हैं जैसे स्नेकहेड (गरई व सौरा) मछली, केकड़े और दो अलग-अलग प्रजातियों के सांप (चेकर्ड कीलबैक, ऑलिव कीलबैक)। गनीमत यह है कि ये सांप विषैले नहीं होते, फिर भी पानी के अंदर इन सांपों और केकड़ों से बचकर केवल ईल पर ध्यान केंद्रित करना काफी कठिन काम होता है।
“जब मैं नदी में मछली पकड़ने निकलता हूँ तो नदी के किनारों के पास गहरे पानी वाले कुंडों और घनी वनस्पतियों की तलाश करता हूँ, क्योंकि बामी मछली इन्हीं जगहों पर केकड़े के बिलों में पाई जाती हैं। लेकिन समस्या यह है कि शुष्क मौसम में गहरे पानी के कुंड और कीचड़ भरे किनारे अन्य मानवीय गतिविधियों - जैसे भैंसों को नहलाना, कपड़े धोना और स्नान करना, आिद के लिए भी इस्तेमाल होते हैं। ऐसी व्यस्त जगह पर ईल पकड़ना अपने आप में एक चुनौती है। ये मछलियाँ पानी में ज़रा सी हलचल के प्रति बहुत संवेदनशील होती हैं और तुरंत बिल से बाहर निकल जाती हैं,“ गंगाराम साहनी ने बताया।
इस तरह नदी के तट पर केकड़ों के बिलों में रहती है बामी मछली
उन्होंने आगे कहा, “मैं पानी में उतरता हूँ और स्नान करने का नाटक करता हूँ। जब मुझे यकीन हो जाता है कि कोई मुझे नहीं देख रहा है, तब मैं नदी के किनारे बिलों की तलाश शुरू करता हूँ। मैं अपने नंगे हाथों से बिलों को टटोलता हूँ और बिल के मुंह पर पानी के तापमान में बदलाव को महसूस करने की कोशिश करता हूँ। जब ईल परेशान होकर बिल के अंदर से बाहर की ओर भागती है, तो बिल के भीतर का ठंडा पानी बाहर आ जाता है। इससे मुझे पता चल जाता है कि अंदर मछली मौजूद है। इसके बाद मैं उन बिलों के पास लकड़ी की छड़ें गाड़कर निशान लगा देता हूँ और आगे बढ़ जाता हूँ। मैं बहुत तेजी से पानी में चलता हूँ ताकि बिलों में अधिक हलचल न हो।”
गंगाराम ने बताया, “ऐतिहासिक रूप से इन सभी जल स्रोतों पर ज़मींदारों और पानीदारों का कब्ज़ा रहा है। यदि आप मछली पकड़ते और उन्हें पता चल जाता, तो वे या तो सारी मछली छीन लेते थे या बिना अनुमति मछली पकड़ने के लिए जुर्माना लगाते थे। इसीलिए एक मछुआरे को कभी भी अपने विरोधियों को अपनी पकड़ी हुई मछली नहीं दिखानी चाहिए। साथ ही, बामी जैसी चालाक मछली का शिकार करते समय 'सरप्राइज एलिमेंट' बहुत ज़रूरी है। मछुआरे को सिर्फ यह नहीं जानना चाहिए कि कब और कहाँ मछली पकड़नी है, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह जानना है कि पकड़े जाने के बाद मछली को लोगों से कैसे छिपाना है।”
ईल को पकड़ने की प्रक्रिया एक चरणबद्ध तकनीक है, जिसके बारे में सोनी गंगाराम ने बताया, “एक बार जब सभी सक्रिय बिलों को लकड़ियों से चिह्नित कर लिया जाता है, तो अगला कदम उनके भागने के रास्तों को बंद करना होता है। लौटते समय, मैं जलकुंभी की पत्तियों और हरा शैवाल से चिह्नित बिलों के मुख्य द्वारों को सावधानीपूर्वक सील कर देता हूँ। सालों के अनुभव से मुझे पता है कि ईल एक बार बिल छोड़ने के बाद 5 से 7 मिनट के भीतर वापस अपने बिल में लौट आती है। बिलों को अच्छी तरह बंद करने के बाद, मछली पकड़ने का समय आता है। इस बार फिर, पानी में उतरने से पहले मैं यह सुनिश्चित करता हूँ कि कोई मुझे न देख रहा हो, क्योंकि अगर लोगों को पता चल गया कि मैं मछली पकड़ रहा हूँ, तो वे हिस्सेदारी मांगने लगेंगे। इसलिए मैं धैर्यपूर्वक इंतजार करता हूँ।”
”फिर मैं अपने 'गत्था' के साथ पानी में उतरता हूँ। मैं चिह्नित बिलों के पास जाता हूँ, अपने पैरों से बगल के एक निकास द्वार को ढकता हूँ, और अपने एक हाथ (जिस पर सूती कपड़ा या जाल लिपटा होता है) को वनस्पति के सील को चीरते हुए मुख्य द्वार में डालता हूँ और मछली को उसके शरीर से कसकर पकड़ लेता हूँ।”
”स्पाइनी ईल बहुत ही फिसलन भरी होती है, इसलिए उसे सूती कपड़े या जाल की मदद से पकड़ना बेहद ज़रूरी है। फिर मैं धागे से जुड़े धातु के हुक को मछली के गल्फड़ों (Gills) के रास्ते घुसाकर उसके मुंह से बाहर निकाल लेता हूँ और मछली को अपनी कमर में बंधी लंगोट में लपेट लेता हूँ, ताकि वह फड़फड़ाकर पानी में हलचल न करे। इस विधि का उपयोग करके, मैं सभी चिह्नित बिलों पर जाता हूँ और मछलियों को गत्था में पिरोकर अपनी कमर में लपेटता जाता हूँ।”
गत्था में बामी मछली
“कभी-कभी एक ही बिल में दो ईल मिल जाती हैं, यह एक सुखद दोहरा आश्चर्य होता है, लेकिन इसे संभालना मुश्किल होता है। ऐसे बिलों में, मैं अपने दोनों हाथ अंदर डालकर मछलियों को कोने में घेर लेता हूँ। फिर एक-एक करके उन्हें बाहर निकालता हूँ। एक को पकड़ता हूँ और दूसरे के भागने का रास्ता हाथ से रोक देता हूँ। कई बार मुझे एक मछली को ज़मीन पर फेंकना पड़ता है और जल्दी से दूसरी को पकड़कर दोनों को गत्था में पिरोना पड़ता है,” गंगाराम ने कहा।
घर वापसी के बारे में उन्होंने बताया, “आखिरकार, मैं कमर में लंगोट में छिपे गत्था में टंगी मछलियों के साथ तैरकर 'घाट' की ओर वापस आता हूँ और लोगों के जाने का इंतजार करता हूँ। यदि मुझे बिना किसी के देखे नदी से बाहर निकलने का मौका नहीं मिलता, तो मैं मछलियों से भरे गत्था को पानी के अंदर ही किसी पेड़ की जड़ से बांध देता हूँ और खाली हाथ बाहर आ जाता हूँ, जैसे मैं सिर्फ स्नान कर रहा था। जब सब चले जाते हैं, तो मैं अंततः मछली बाहर निकालता हूँ, उसे गीली लंगोट में लपेटता हूँ और घर लौट आता हूँ।”
मछुआरों का यह गुप्त और चालाकी भरा व्यवहार आज भी जारी है। वे उच्च जातियों और पूर्व पानीदारों से अपना शिकार छिपाते हैं। मछुआरों का तर्क है कि यह सावधानी ज़रूरी है क्योंकि तथाकथित पानीदार और ज़मींदार आज भी उनसे मछली छीन सकते हैं।
यह कहानी दर्शाती है कि कैसे ऐतिहासिक रूप से मछुआरे कभी भी नदियों और आर्द्रभूमि के वास्तविक प्रबंधक नहीं बन पाए। उत्तर बिहार में 'गुप्त शिकार' केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि पानीदारी प्रथा के उत्पीड़न के खिलाफ मछुआरों के अस्तित्व और उनके ऐतिहासिक संघर्ष का एक जीवंत प्रतीक है।
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