बिहार के कोसी क्षेत्र में महिलाओं का कठिन जीवन 

 

फोटो - नीतू सिंह के सौजन्य से 

लोक संस्कृति

बिहार - गोबर से बने ‘गोरहा’ के बीच बीतता है कोसी क्षेत्र की महिलाओं का सावन

उत्तर बिहार में गोरहा - ईंधन के इस संसाधन को बनाने की प्रक्रिया सदियों पुरानी है। छोटी-छोटी बच्चियों और किशोरियों से लेकर नई-नवेली दुल्हन तक हर किसी को गोरहा में बटाना होता है हाथ।

Author : डॉ. रंजीत कुमार साहनी

बारिश के आगमन पर देश भर में सावन मास को धूम-धाम से मनाया जाता है। हरियाली का प्रतीक हरे रंग की साड़ी, लहंगा, आदि में हरियाली तीज, कजरी तीज, गुड़िया जैसे त्योहार मनाये जाते हैं, जिनमें महिलाएं सजती संवरती हैं, नाचती हैं, गाती हैं। लेकिन बिहार के कोसी क्षेत्र में रहने वाली महिलाओं का सावन गाय-भैंस के गोबर से बने गोरहा के बीच बीतता है। मॉनसून से दो महीने पहले कड़ी धूप में इसे बनाने की प्रक्रिया और बारिश आने पर इसे संभाल कर रखने की जद्दोजहद। ये सब इसलिए ताकि वो अपने परिवार को दो वक्त की रोटी पका कर दे सकें।   

उत्तर बिहार के कोसी क्षेत्र में मॉनसून आते ही नदी के जल स्तर के साथ-साथ लोगों में तनाव का स्तर बढ़ जाता है। रहने के लिए किसी टीले पर झोपड़ी होती है, चार-ठो बर्तन और छोटी-छोटी पन्नियों में नमक, मिर्च, आटा, चावल, सत्तू, आदि। गठरी में चार-पांच कपड़े और कुछ ज़रूरत का सामान। इनके पास खाना पकाने के लिए गैस नहीं होती, लकड़ी पानी में भीग चुकी होती है और सूखा पैरा दूर-दूर तक नहीं मिलता। ऐसे में मात्र एक ही सहारा होता है - “गोरहा”।

मॉनसून शुरू होने से तीन महीने तक कोसी तटबंधों के बीच ईंधन के रूप में केवल गोरहा का इस्तेमाल होता है। और इसे बनाने के लिए क्षेत्र की महिलाएं करीब 2 महीने पहले से अपना काम शुरू कर देती हैं।इस क्षेत्र में हमेशा से बाढ़ का खतरा रहा है, इसलिए ईंधन के इस स्रोत को बनाने की प्रक्रिया भी सदियों पुरानी है। जितनी पुरानी गोरहा बनाने की तकनीक है उतना ही पुराना यहां की महिलाओं का संघर्ष। 

मॉनसून शुरू होने से तीन महीने तक कोसी तटबंधों के बीच ईंधन के रूप में केवल गोरहा का इस्तेमाल होता है। और इसे बनाने के लिए क्षेत्र की महिलाएं करीब 2 महीने पहले से अपना काम शुरू कर देती हैं।इस क्षेत्र में हमेशा से बाढ़ का खतरा रहा है, इसलिए ईंधन के इस स्रोत को बनाने की प्रक्रिया भी सदियों पुरानी है। जितनी पुरानी गोरहा बनाने की तकनीक है उतना ही पुराना यहां की महिलाओं का संघर्ष। 

कोसी क्षेत्र की झोपड़ियों में ऐसी होती है रसोई  

औरतों की समझ-बूझ का प्रमाण है गोरहा 

साल-दर-साल बाढ़ की समस्या और जंगल तथा लकड़ी के अभाव के कारण, खाना पकाने में बहुत कठिनाई होती है। कोसी के पूर्वी एवं पश्चिमी नदी तटबंध के भीतर रहने वाले गाँवों में यह समस्या और भी ज़्यादा गंभीर है, क्योंकि साल के 4 से 6 महीने तक ये गाँव बाढ़ और जल जमाव का सामना करते हैं। ख़ासकर कोसी के दक्षिणी एवं निचले इलाक़ों में, जहाँ नदी की कम ढलान के कारण जल की निकासी नहीं हो पाती और लोग महीनों तक परेशान रहते है। कोसी के ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी और पक्की सड़कों के अभाव के कारण एलपीजी (LPG) गैस का चलन अभी भी बहुत कम है। ऐसे में, इन ग्रामीण क्षेत्रों में घर का चूल्हा जलना यहाँ की औरतों की समझ-बूझ और दूरदर्शिता से ही संभव हो पाता है।

किरतपुर प्रखंड के अंतर्गत स्थित जमालपुर गाँव में पीएचडी (Ph.D.) शोध कार्य के दौरान एक मौखिक इतिहास साक्षात्कार के सिलसिले में मेरी मुलाकात गरिमा देवी से हुई। गरिमा देवी का मायका कोसी क्षेत्र के बाहर पश्चिम में जयन्तीपुर में था, जहां बाढ़ नहीं आती है। उन्होंने दोनों क्षेत्रों की जीवन शैली में अंतर बताता और उसी दौरान गोरहा की कहानी सुनाई।  

गोरहा बनाने की कहानी गरिमा देवी के जुबानी 

गोरहा की कहानी सुनाते हुए गिरमा देवी ने कहा - “क्या बताएं हम औरतों का तकलीफ, यंहा तो जरना-काठी (जलावन) भी नहीं मिलता। हम पश्चिम में जहां से आती हूँ। वहां मेरा मायका है, वहां सूखा हो या बरसात खाना पकाने के लिए जलावन बहुत आसानी से मिल जाता है। यंहा मेरे ससुराल जमालपुर में और कोसी के बाकी गाँवों में - हम औरतों को बरसात के दो महीना पहले से ही जलावन का जुगाड़ करना पड़ता है।  

कोसी क्षेत्र में ज्यादातर गांवों में जलावन की लकड़ी का सुविधा नहीं है और हमारे जैसे परिवार जिनके पास अपनी जमीन है खुद की खेतीऔर पशु धन, वो हर साल बरसात और बाढ़ आने से पहले आपस में मिल कर नदी किनारे खेतों में भैंस के गोबर से गोरहा बनाते हैं। गोरहा बनाने का काम बहुत मेहनत का है। इसमें गोबर इकठ्ठा करने के लिए बाल-बच्चों के साथ दिन भर भैंसों के पीछे-पीछे चलना पड़ता है। कभी-कभी ये भैंसे हमें खेतों में दौरा (दौड़ा) भी देते हैं। कई बार गाय-भैंस लात मार देती हैं। फिर भी हम औरतें कड़ी धूप में, बलुवाहा मिट्टी पर नंगे पांव चलकर गोबर इकट्ठा करते हैं।

गोबर के अलावा गोरहा बनाने के लिए बांस की डंडी, पटसन (जिसे स्थानीय भाषा में 'संठी' कहते हैं) की डंडी, सूखा घास और गेहूं का भूसा इकठ्ठा करते हैं। गोबर को सूखी घास और भूसे के साथ पानी मिलाकर गूंदकर एक से दो फ़ीट लंबी संठी पर एक बिलाँग (हाथ के अंगूठे से छोटी उंगली के बीच की दूरी) चौड़ी 'गोरहा' बनाते हैं।

नोट - यहां हिन्दी व्याकरण को अलग रखते हुए गरिमा देवी के शब्दों को स्थानीय शैली में ही लिखा गया है।   

सामूहिक गोरहा निर्माण – कोसी क्षेत्र

कोसी क्षेत्र की महिलाओं के जीवन संघर्ष का सूचक है गोरहा 

गरिमा देवी की बात से यह स्पष्ट हो गया है कि गोरहा बनाने की यह सामूहिक गतिविधि अनोखी और ख़ास तो है लेकिन साथ ही यह गतिविधि कोसी-कमला नदी क्षेत्र में औरतों की दयनीय स्थिति और संघर्ष का सूचक भी है। और तो और, यह प्रक्रिया समयबद्ध भी है क्यूंकि औरतों को गंगा नदी क्षेत्र से अपने मवेशियों को चराने आए भैंसवारों (चरवाहों) के प्रवास के समय के साथ-साथ चलना पड़ता है, वो भी मई-जून की तपती धूप में जब तापमान अक्सर 40 डिग्री के पार होता है। 

कड़ी धूप में अपने संघर्ष के बारे में गरिमा देवी बताती हैं ,“क्या बताएं हर साल मई और जून के महीने में हमारा क्या हाल होता है, पुरे दो महीने तक खाने का ठीक होता है पीने का, धूप में लूह लगने का खतरा सो अलग, क्यूंकि इसी समय दो महीने के लिए सैकड़ों चरवाहे अपनी भैंसों के साथ कोसी-कमला नदी घाटी में फैले घास के मैदानों और फ़सल कटने के बाद ख़ाली पड़े खेतों में चराई के लिए आते हैं। हम औरतें सूर्य उदय से पहले उठकर, नास्ता-पानी बनाकर बच्चों को साथ लेकर नदी किनारे गोबर इकठ्ठा करने चले जातें हैं। 

इस काम को करने में अगर घर बच्चे ख़ासकर लड़कियां साथ दे तो गोबर इकठ्ठा करना असंभव है। क्योंकि हमें बहुत सुबह उठकर जाना होता है, सिर्फ कुछ ही अपनी इच्छा से आते हैं, बाकि सभी अपनी इच्छा के विरुद्ध ही आतें हैं। बच्चों को इस तरह से परेशान करना अच्छा नहीं लगता पर हमारी मज़बूरी है, वरना समय पर गोबर जमा करना और फिर गोरहा बनाना वो भी बरसात से पहले बहुत कठिन काम है। साल दर साल भैंसों की संख्या भी घटती जा रही और कभी-कभी तो भैंसवार समय पर भी नहीं आते। तब घंटों धूप में इंतजार करना पड़ता है,” गरिमा ने बताया। 

महिलाओं के आपसी सामंजस्य का प्रतीक गोरहा 

कोसी-कमला नदी क्षेत्र में गोरहा बनाने की इस प्रक्रिया की एक और ख़ास बात यह है कि ये महिलाएँ नदी किनारे से गोबर इकट्ठा करके तुरंत घर नहीं ले जातीं, बल्कि वहीं किसी एक खेत में जमा करती हैं। फिर पाँच से दस परिवारों की महिलाओं का समूह एक साथ किसी एक खेत में गोबर जमा करती हैं और साथ मिलकर गोरहा बनाती हैं। यह इन औरतों के आपसी सामंजस्य को दर्शाता है।  

गोरहा बनाने का कार्य ज्यादातर भूमिहीन और हाशिये पर जी रहे समुदायों जैसे मुसहर और मल्लाह एवं अन्य अति पिछड़ी जातियों की महिलाएं करती हैं। तीसरी खास बात यह है कि खेत-मालिक को दो महीने तक खेत में गोबर सुखाने की जगह देने के बदले सभी महिलाओं की तरफ से गोरहा का दसवाँ हिस्सा (किराए के रूप में) देना होता है। 

कोसी क्षेत्र में साल भर के ईंधन का ब्योरा 

गोरहा के अलावा क्या-क्या चीजें ईंधन के रूप में इस्तेमाल होती हैं, उनके बारे में गरिमा देवी बताती हैं, हम सभी महिलाएँ खेतों में ही बाँस के ढाँचे के सहारे गोरहा को 'X' की आकृति में खड़ा करके सुखाती हैं। वर्ष के दो महीनों में हर परिवार से हम औरतें कम से कम 300 से 400 गोरहा बना लेती हैं, जो हमारे परिवार के लिए 3 से 5 गोरहा प्रतिदिन के हिसाब से 3 महीनों के लिए पर्याप्त होते हैं। साल के शेष 9 महीने हम मक्के के बलडी (maize cob), बांस, आम और जामुन के पत्ते एवं पैरा (कृषि अवशेष) आदि जलाकर खाना पकाते हैं। 

गोरहा बनाने, लाने, लेजाने में कोई मदद नहीं करते पुरुष  

गरिमा देवी ने बताया कि औरतें खेतों में सामूहिक रूप जो गोरहा बनाती हैं। फिर पूरी तरह से सूखने के बाद धीरे-धीरे सिर पर ढोकर घर को ले जाती हैं। इस कार्य में घर के पुरुष इनकी कोई मदद नहीं करते और फिर से घर के बच्चे खासकर लडकियां ही दिन में दो वक़्त का खाना पीने का पानी लेकर आते हैं और वापसी में गोरहा की गठड़ियों को सर पर ढोकर घर तक ले जाते हैं। 

अपने बच्चों को गोरहा से दूर रखने की आस  

दो महीने का गोरहा बनाने का जटिल कार्य और उसके बाद 3 से 4 महीने बाढ़ का प्रकोप - इन वजहों से कोसी क्षेत्र के बच्चों की पढ़ाई हर साल हाशिए पर चली जाती है। पढ़ाई नहीं कर पाने की वजह से इन बच्चों के पास आगे चलकर मजदूरी के अलावा कोई चारा नहीं बचता, क्योंकि इनके पास न ताक खुद की जमीन है और न खेती। वहीं लड़कियों की शादी कर दी जाती है और वो कम उम्र में ही माँ बन जाती हैं। यही कारण है कि यहां की तमाम औरतें अपने बच्चों को गोरहा से दूर रखना चाहती हैं। 

गरिमा देवी कहती हैं, मैंने तो पढाई नहीं की क्योंकि मेरे पिताजी के पास संसाधन नहीं थे और शायद इसी वजह से उन्होंने मुझे कोसी के इस दलदल में फ़ेंक दिया पर मैं अपनी बेटी को पढ़ाना चाहती हूँ ताकि जो दुःख और दर्द हमें भुगतना पड़ता है वो उसे ना झेलना पड़े। कुछ भी हो, मैं उसकी शादी बाढ़-ग्रस्त इलाके में नहीं करना चाहती हूँ।”  

नम आंखों के साथ गरिमा देवी आगे कहती हैं, “मेरी बेटी शादी के बाद भूखे रहेगी पर सूखे में रहेगी, जो गलती मेरे माता-पिता ने किया वो मैं नहीं दुहराने वाली। मैं अपनी बेटी को कोसी के दलदल से बाहर जरुर भेजूंगी।”  

नई-नवेली दुल्हनों को भी बनाना होता है गोरहा  

मई और जून के महीने में कोसी क्षेत्र के गाँवों में बहुत तेज़ धूप होती है और साथ में गोबर इकठ्ठा करने का तनाव। धूप से बचने के लिए ये औरतें घास की एक छायादार छत (छापरी) भी बना लेती हैं, जहाँ बैठकर वे भोजन करती हैं और बीच-बीच में कोसी-कमला के लोकगीत भी गाती हैं, जो इनके तनाव को कम करता है। 

गोरहा बनाने की प्रक्रिया मई-जून की गर्मी में पूरी की जाती है और बाढ़ में ईंधन का संकट नहीं हो इसके लिए यह बनाना बहुत जरूरी होता है- इतना जरूरी कि अगर इस दौरान किसी की शादी हुई है, तो घर की नई-नवेली दुल्हनों को भी यह काम करना पड़ता है। उनके पास न कहने का कोई विकल्प नहीं होता है। 

गरिमा बताती हैं कि मिथिला में नई दुल्हन कम से कम दो सालों तक घर से बाहर कदम नहीं रखती है, जबकि कोसी क्षेत्र में ऐसा नहीं है। यहां नई हो या पुरानी, बूढ़े हों या बच्चे सभी को बाहर जाकर धूप में काम करना पड़ता है। 

इस तरह रखा जाता है सामान 

5 फीट की ऊँचाई पर संभाल कर रखे जाते हैं गोरहा 

जब कोसी के तटबंधों के बीच बाढ़ अपना कहर बरपाती है, तब तमाम गाँव डूब जाते हैं, जिस कारण लोगों को टीलों पर शरण लेनी पड़ती है। छोटी-छोटी झोपड़ी बनाकर रहना पड़ता है और उसमें भी गोरहा रखने के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है। गरिमा ने कहा, गोरहा को घर लाने के बाद हम गोरहा के छड़ों को घर के अंदर ज़मीन से ऊपर लगभग 5  फ़ीट की ऊँचाई पर बाँस के बने टाँड/छज्जों पर संभालकर रखते हैं, ताकि बाढ़ का पानी घर में घुसने के बावजूद गोरहा गीला न हो और खाना पकाने के काम आ सके। हम गोरहा की मोटाई को हमारी मिट्टी के चूल्हों के मुहाने से कम रखती हैं। 

गरिमा बताती हैं कि यंहा सभी के घरों में लगभग चार से पाँच 'एक-बर्तन वाले' चल-चूल्हे होते हैं, जिन्हें हम बाढ़ के दौरान आसानी से उठाकर कहीं भी लेकर जा सकते हैं। साल 2017 में कोसी पश्चिमी तटबंध टूटने के कारण यहां के लोगों को अपने घरों से विस्थापित होना पड़ा था। गरिमा ने कहा, "साल 2016 में ही मेरी शादी हुई थी और चूंकि मैं सूखे इलाके से हूँ तो मैंने अपनी जिंदगी में अचानक आने वाली बाढ़ नहीं देखी थी। उस वर्ष पुरे 3 महीने तक मैंने अपने सास-ससुर और पति के साथ कमला नदी के पूरी तटबंध पर बिताया था। उस वक़्त यही गोरहा, जिसे मेरी सास ने खाद वाले प्लास्टिक के बड़े बोड़ा में संभाल कर अपने साथ लेकर आई थी, से काम चलाया था।” 

"क्या बताएं, महीनों तक राहत शिविरों में रहना वो भी शादी के पहले साल में, बहुत दुखद अनुभव था, ऊपर से मुझे तैरना भी नहीं आता था। उसी दिन जब परिवार के साथ घर का सामान लेकर मैं पहली बार नाव में बैठी थी। तभी मैंने एक गाय और उसके बछड़े को अपने नजरों के सामने बाढ़ के पानी में डूबते हुए देखा था, मेरा दिल पसीज गया था। उस वक़्त तो सच में मुझे लग रहा था अब मैं नहीं बचूंगी। मेरी सास बाढ़ ग्रस्त क्षेत्र से हैं और मेरे पति और ससुर दोनों कुशल नाविक हैं तो उन्होंने सब संभाल लिया। पर ये तो बस शुरुआत थी, बांध पर अपने घरों से दूर खुले में खाना पकाना, शौच को जाना और तेज बारिश में एवं अँधेरे में सांप कीड़ों के बीच गीली जमीन पर रात बिताना बहुत कठिन था। वहां तटबंध पर न तो पीने का पानी मिलता था न कोई और व्यवस्था थी, खुले में जानवरों के बीच, हमें जानवरों की तरह रहना पड़ता था। लगातार 15 दिनों तक। ऐसे में गोबर से बनी वो गोरहा ही था जिसकी वजह से हम दो वक़्त का भोजन पका सकते थे।” 

कोसी क्षेत्र की महिलाओं का संघर्ष  

कोसी क्षेत्र की महिलाओं का ईंधन से जुड़ा अनुकूलन अत्यंत सराहनीय  

कोसी-कमला नदी क्षेत्र की औरतें बरसात एवं बाढ़ आने से कम से कम 60 दिन पहले ही घरों में चावल, आटा, नमक, मसाले और अन्य आवश्यक सामग्रियों के साथ-साथ गोबर से बने गोरहा का भी पूरा इंतज़ााम कर लेती हैं। साल-दर-साल आने वाली बाढ़ की विभीषिका को देखते हुए महिलाओं का यह स्थानीय ज्ञान और जलावन से जुड़ा अनुकूलन (adaptation) अत्यंत सराहनीय है। 

इन छोटी-छोटी तैयारियों के अभाव में हर साल तीन से चार महीने तक बाढ़ के बीच जीवन बिताना अत्यंत कठिन हो जाता है। बहुत से परिवार पर्याप्त जलावन के आभाव में भुखमरी का भी शिकार होते हैं और कच्चा खाना और असुरक्षित जल पीकर बीमार पड़ जाते हैं। बाढ़ के कारण हर साल बांध टूट जाते हैं और गरीबी इतनी की सबसे ज्यादा पलायन बिहार में कोसी क्षेत्र से ही होता है।

बिहार में और ख़ासकर कोसी क्षेत्र के गाँव में जिनके पास एलपीजी खरीदने और घरों तक ले जाने की सुविधा है, वो तो फिर भी जैसे तैसे बाढ़ का समय काट लेते हैं पर अभी भी कोसी तटबंध के अन्दर दरभंगा और सहरसा जिला में सैकड़ों गाँव हैं जहां गरिमा देवी की जैसी हजारों महिलाएं हैं जो अभी भी गोरहा के सहारे अपना जीवन यापन कर रही हैं। 

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