बाबा तालाब को दोबारा जीवित करने के दौरान बनाए गए चेक डैम पर खड़ी महिलाएं।
फोटो: परमार्थ समाज सेवी संस्थान
200 से अधिक महिलाओं ने पहाड़ काटकर 110 मीटर लंबी नहर बनाई।
नहर बनने से तालाब भरा और गांव के भूजल स्तर में सुधार हुआ।
अग्रोथा की पहल बताती है कि जल संरक्षण में स्थानीय समुदाय और महिलाओं की भागीदारी बेहद जरूरी है।
साल 2019 में बुंदेलखंड के अर्ध-शुष्क इलाके में बार-बार पड़ रहे सूखे ने छतरपुर जिले के अग्रोथा गांव की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। गांव में बचे हुए पानी के स्रोत भी सूखने की कगार पर पहुंच गए थे। हालात गंभीर हो चुके थे। नलों में पानी नहीं था। हैंडपंपों पर घंटों लंबी कतारें लगती थीं और पानी को लेकर आए दिन झगड़े होते थे। मवेशियों के लिए भी पानी जुटाना मुश्किल हो गया था।
जब सरकारी व्यवस्था और प्रशासन से पर्याप्त मदद नहीं मिली तो अग्रोथा और आसपास के गांवों की 200 से अधिक महिलाओं ने खुद इस समस्या से निपटने का फैसला किया।
यह कहानी मध्य भारत में जल संकट से निपटने के सामुदायिक प्रयासों पर बनी एक डॉक्यूमेंट्री से ली गई है। इसमें अग्रोथा की महिलाओं से बातचीत, पहाड़ काटकर बनाई गई नहर की मौजूदा स्थिति और देश के जल संकट पर विशेषज्ञों की राय शामिल है।
इन महिलाओं के पास कोई बड़ी मशीन नहीं थी। हाथ में सिर्फ कुदाल, फावड़े और लोहे के तसले थे। इन्हीं औजारों के सहारे उन्होंने 18 महीने तक काम किया। भीषण गर्मी हो, सर्दी हो या बारिश, काम चलता रहा।
उन्होंने पहाड़ को काटकर 110 मीटर लंबी और 11 मीटर गहरी नहर बनाई।
मकसद बिल्कुल साफ था। मच्छेरी नदी के ऊपरी हिस्से के जंगलों से बहकर आने वाले पानी को गांव के सूख चुके तालाब तक पहुंचाना था।
परमार्थ समाज सेवी संस्थान के सचिव संजय सिंह बताते हैं, “अग्रोथा गांव की महिलाओं ने बछेड़ी नदी की एक सहायक धारा पर काम किया। पहाड़ियों को काटकर उन्होंने उसका पानी गांव के उस तालाब तक पहुंचाया, जो सूख चुका था। उनकी यह सफलता ‘नीर, नारी, नदी’ की कहावत को सच करती है। इसका अर्थ है कि जब जल स्रोतों को बचाने में महिलाओं की ताकत और समझ को साथ लिया जाता है तो गांव मुश्किल हालात का बेहतर तरीके से सामना कर पाता है और जीवन फिर फलने-फूलने लगता है।”
ऊपर से ली गई तस्वीर में अग्रोथा तालाब को दोबारा जीवित करने का शुरुआती काम दिखाई देता है। नई बनाई गई नालियों के जरिए बारिश का पानी तालाब में पहुंचने लगा है। (तस्वीर: परमार्थ समाज सेवी संस्थान)
अग्रोथा की महिलाओं के लिए खुद खुदाई करना मजबूरी थी। गांव में पानी की मौजूदा व्यवस्था से जरूरत पूरी नहीं हो रही थी। इसका सीधा असर घर और खेती, दोनों पर पड़ रहा था।
इस काम का नेतृत्व करने वाली गांव की एक महिला बताती हैं, “नल पूरी तरह सूख चुके थे। बर्तनों में पानी नहीं था और तालाब में भी पानी नहीं था। पानी नहीं होता तो झगड़े होते हैं। हम बहुत परेशान थे। इसलिए हमने तय किया कि सब मिलकर पहाड़ काटेंगे और पानी अपने तालाब तक लाएंगे। इससे हमारे मवेशियों को पानी मिलेगा और लोग भी जी सकेंगे।”
यह मेहनत आसान नहीं थी। महिलाओं को न तो किसी संस्था से आर्थिक मदद मिली, न मशीनें और न ही काम के बदले मजदूरी।
गांव की एक अन्य महिला बताती हैं, “ढलान से नीचे उतरने पर तालाब आता है। हम अपनी कुदाल और फावड़े लेकर जाते थे। घर से अपने लोहे के तसले भी ले जाते थे। तसले सिर पर रखकर तेज धूप में काम करते थे। कई बार भूखे-प्यासे भी काम किया।”
इतनी मेहनत के साथ घर की जिम्मेदारियां संभालना भी जरूरी था। इसके लिए महिलाओं ने आपस में काम बांट लिया। घरों और परिवारों के बीच बारी-बारी से काम करने की व्यवस्था बनाई गई।
एक महिला बताती हैं, “जिस घर में चार महिलाएं थीं, उनमें से दो पहाड़ पर काम करने जाती थीं और दो घर संभालती थीं। हम आपस में कहते थे कि आज तुम घर संभालो, हम पहाड़ पर जा रहे हैं। इस तरह सभी ने एक-दूसरे का साथ दिया।”
आज उनके इस श्रमदान ने इलाके में पानी की स्थिति बदल दी है। गांव के हैंडपंपों और खुले कुओं में भूजल का स्तर सुधरा है। अब सामान्य बारिश में भी तालाब में पानी जमा होता है। इसका कुछ हिस्सा जमीन में रिसता है, जिससे भूजल का स्तर सुधरता है।
अग्रोथा का संकट अकेले एक गांव की कहानी नहीं है। यह देश में पानी को लेकर मौजूद बड़ी चुनौतियों की एक झलक भी दिखाता है।
दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, लेकिन मीठे पानी के उपलब्ध संसाधनों में भारत की हिस्सेदारी करीब 4 प्रतिशत ही है।
नीति आयोग के आकलन भी देश में जल संकट की गंभीरता की ओर बार-बार ध्यान दिलाते रहे हैं। पानी की गुणवत्ता और लोगों तक इसकी पहुंच के मामले में भारत की स्थिति दुनिया के निचले पायदान वाले देशों में रही है। बड़े शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक पानी की कमी एक गंभीर समस्या बनी हुई है।
भारत अपनी पानी की जरूरतों के लिए काफी हद तक भूजल पर निर्भर है। लेकिन भूजल का दोहन भी तेजी से बढ़ा है।
ग्रामीण इलाकों में इस्तेमाल होने वाले करीब 85 प्रतिशत पानी और खेती की सिंचाई के लगभग 85 प्रतिशत हिस्से की निर्भरता सीधे भूजल पर है। शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। शहरी क्षेत्रों में कुल पानी की जरूरत का करीब 50 प्रतिशत हिस्सा भूजल से पूरा होता है।
इसी भारी निर्भरता के कारण भारत दुनिया में सबसे अधिक भूजल निकालने वाला देश बन गया है। भारत हर साल अपने जलभृतों से बड़ी मात्रा में भूजल निकालता है। जलभृत जमीन के भीतर की वे परतें हैं, जिनमें पानी जमा रहता है। भारत जितना भूजल निकालता है, वह अमेरिका और चीन द्वारा मिलकर निकाले जाने वाले भूजल से भी अधिक है।
इतनी बड़ी मात्रा में भूजल निकालने का असर पर्यावरण पर भी पड़ रहा है। भूजल दोहन का स्तर करीब 62 प्रतिशत है। भूजल के आकलन के लिए बांटे गए देश के लगभग एक चौथाई ब्लॉक अति-दोहित, गंभीर या अर्ध-गंभीर श्रेणी में आते हैं। इनमें बड़ी संख्या पश्चिमी भारत के इलाकों की है। यह स्थिति बताती है कि भूजल तेजी से कम हो रहा है।
जलवायु में बदलाव के साथ बारिश का ढंग भी बदल रहा है। अब कई जगह कम समय में बहुत तेज बारिश होती है और उसके बाद लंबे समय तक सूखा रहता है।
बुंदेलखंड जैसे अर्ध-शुष्क इलाकों में सालाना औसत बारिश अक्सर 1,000 मिलीमीटर से कम रहती है। ऐसे इलाकों में बारिश का पानी रोकना और उसे जमीन में रिसने देना बहुत जरूरी हो जाता है। यही व्यवस्थाएं पानी के स्रोतों को पूरी तरह खत्म होने से बचाने में मदद कर सकती हैं।
अग्रोथा में हुआ काम केवल गांव तक पानी पहुंचाने तक सीमित नहीं है। यह अनुभव पानी और प्राकृतिक संसाधनों पर काम करने वालों के लिए भी कई जरूरी सबक देता है।
नए बोरवेल से पहले जलग्रहण क्षेत्र को समझना जरूरी: गांवों में पानी की कमी होने पर प्रशासन अक्सर नया और गहरा बोरवेल खुदवाने को पहला उपाय मानता है। लेकिन जहां जमीन के नीचे कठोर चट्टानें हों या भूजल पहले ही बहुत अधिक निकाला जा चुका हो, वहां भूजल को फिर से भरने की व्यवस्था किए बिना नए बोरवेल भी कुछ ही मौसम में बेकार हो सकते हैं।
अग्रोथा का अनुभव बताता है कि पानी की समस्या को पूरे जलग्रहण क्षेत्र को ध्यान में रखकर समझना जरूरी है। बारिश में बहने वाले पानी के पुराने रास्तों को तालाबों से दोबारा जोड़ने पर पूरे इलाके का भूजल स्तर सुधर सकता है। इससे कम गहराई वाले कुएं भी बने रहते हैं और महंगे, गहरे बोरवेलों पर निर्भरता कम होती है।
महिलाओं की भूमिका और जल संसाधनों की देखभाल: सूखे और दूसरी मुश्किलों से जूझ रहे खेती वाले इलाकों में पुरुष अक्सर मजदूरी के लिए कुछ महीनों के लिए शहरों की ओर चले जाते हैं। ऐसे में घर और खेती से जुड़ी कई जिम्मेदारियां महिलाओं के हिस्से आती हैं।
घर के लिए रोज पानी जुटाने की जिम्मेदारी भी आमतौर पर महिलाओं पर होती है। इसलिए उन्हें अपने आसपास के जल स्रोतों और पानी की कमी की अच्छी समझ होती है। उन्हें पता होता है कि कौन-सा स्रोत कब सूखता है और किस जगह पानी की समस्या ज्यादा है।
पानी से जुड़े फैसलों में महिलाओं को शामिल करने से उनकी भूमिका भी बदलती है। वे सिर्फ पानी की कमी झेलने वाली नहीं रहतीं, बल्कि जल स्रोतों को बचाने और उनकी देखभाल में भी भागीदार बनती हैं।
शहर और गांव में पानी की खपत का अंतर: यह कहानी गांवों में पानी की कमी और शहरों में पानी की खपत के फर्क की ओर भी ध्यान दिलाती है।
बड़े शहरों में प्रति व्यक्ति रोजाना पानी की खपत काफी अधिक होती है। पानी की आपूर्ति के दौरान होने वाली बर्बादी और उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला पानी इसे और बढ़ाता है। दूसरी ओर, खेती पर निर्भर गांवों में पानी की उपलब्धता साल-दर-साल बदलती रहती है।
खेती और इलाके की खाद्य सुरक्षा, दोनों गांवों में पानी की नियमित उपलब्धता पर निर्भर हैं। शहरों की पानी और भोजन की जरूरतें भी काफी हद तक गांवों पर निर्भर हैं। इसलिए ग्रामीण इलाकों में पानी की उपलब्धता शहरों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
घर से निकले पानी का दोबारा इस्तेमाल और पोषण वाटिका: नहर बनने के बाद परमार्थ समाज सेवी संस्थान जैसे सामुदायिक संगठनों ने घरों से निकलने वाले इस्तेमाल किए हुए पानी को गांव में ही दोबारा काम में लाने में भी मदद की। इसके तीन प्रमुख फायदे सामने आए।
खाना बनाने और बर्तन धोने के बाद निकलने वाले पानी को गलियों में बहने से रोका गया।
इस पानी को घर के पीछे बनी पोषण वाटिकाओं में पहुंचाया गया। इससे स्थानीय स्तर पर ताजी सब्जियां और दूसरी उपज मिलने लगी और बाजार तक बार-बार जाने की जरूरत भी कम हुई।
घर से निकले इस पानी को दोबारा इस्तेमाल करने से मिट्टी में नमी बनी रहती है साथ ही सतह पर गंदा पानी जमा होने की समस्या भी कम होती है।
बुंदेलखंड का यह अनुभव एक महत्वपूर्ण बात सामने रखता है। सरकारी या तकनीकी स्तर पर बनाई गई जल योजनाएं तभी ज्यादा असरदार होती हैं, जब उनमें स्थानीय लोगों और उनके अनुभव को भी जगह मिले।
जब स्थानीय लोग जानते हैं कि उनके इलाके में पानी कहां से आता है और किसरास्ते बहता है तो स्थानीय स्तर पर बनाई गई व्यवस्थाओं की देखभाल भी लंबे समय तक संभव हो पाती है।
जल संसाधन विश्लेषक के. जी. व्यास के अनुसार देश के भविष्य के लिए स्थानीय स्तर पर भोजन और पानी की व्यवस्था को बचाना सबसे जरूरी है।
वे कहते हैं, “किसी देश का असली बुनियादी ढांचा उसके भोजन और कृषि उत्पादन पर टिका होता है। अगर अनाज ही नहीं होगा तो हम खाएंगे क्या? इमारतें या पुल तो खाए नहीं जा सकते। इनके बिना रहा जा सकता है, लेकिन भोजन और पानी के बिना नहीं।”
अब ‘जल जन जोड़ो’ अभियान के जरिए इस पहल को दूसरे इलाकों तक भी पहुंचाया जा रहा है। इसके माध्यम से छतरपुर और आसपास के जिलों की दूसरी ग्राम पंचायतों तक भी स्थानीय स्तर पर वर्षा जल संचयन के तरीके पहुंचाए जा रहे हैं।
जलवायु संबंधी अनुमान बताते हैं कि भूमध्य रेखा के आसपास के क्षेत्रों में आने वाले समय में तापमान बढ़ सकता है और मौसम पहले से अधिक अनिश्चित हो सकता है।
अग्रोथा का अनुभव बताता है कि बारिश के पानी को सहेजकर गांव अपनी पानी की जरूरत बेहतर ढंग से पूरी कर सकते हैं। इसके लिए जलग्रहण क्षेत्रों की देखभाल और पानी से जुड़े फैसलों में महिलाओं की भागीदारी जरूरी है। इससे जलवायु बदलाव के असर से निपटने में भी मदद मिल सकती है।
के. जी. व्यास कहते हैं, “21वीं सदी भारत के जल संकट की सदी है... अगर हमें भारत का भविष्य सुरक्षित करना है तो यह सुनिश्चित करना होगा कि देश पानी से समृद्ध रहे। अगर भारत जल संकट में फंसा रहा तो विश्व महाशक्ति बनने की बात भूल जाइए, हमारे सामने अपने अस्तित्व को बचाने का ही संघर्ष खड़ा हो जाएगा।”
इस लेख का हिन्दी अनुवाद डॉ. कुमारी रोहिणी ने किया है।
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