कानपुर के महराजपुर इलाके में हेक्सावेलेंट क्रोमियम युक्त कचरा फेंके जाने से भूजल में हानिकारक क्रोमियम घुलता जा रहा है।
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भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड, यूरेनियम जैसे हानिकारक पदार्थों और भारी धातुओं के घुलने की खबरें देश के विभिन्न इलाकों से सामने आती रहती हैं। ऐसा ही एक मामला कानपुर के महराजपुर इलाके के ग्राउंड वाटर में क्रोमियम घुलने की बात सामने आई है।
हालिया मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यहां कई जगह हरे रंग के हेक्सावेलेंट क्रोमियम युक्त जहरीले कचरे के कारण ज़मीन के नीचे मौजू़द पानी में भी धीमा ज़हर घुलता जा रहा है। क्षेत्र में अब तक कुल 07 जगहों पर खतरनाक क्रोमियम कचरा मिलने की पुष्टि हो चुकी है। इससे स्थानीय ग्रामीणों में चिंता और आक्रोश है।
पुरवामीर गांव में मिले कचरे की जांच करने पर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को तय मानक से 757 गुना अधिक क्रोमियम देखने को मिला। एक अन्य रिपोर्ट में तालाब के पानी में 37.86 mg/L और लैंडफिल के ठोस कचरे में 36.29 mg/L क्रोमियम दर्ज होने की बात कही गई है। इसलिए नीचे मैंने इसे "757 गुना अधिक" के रूप में ही रखा है, लेकिन क्रोमियम की किस रासायनिक अवस्था की मात्रा कितनी थी, इसे बिना मूल प्रयोगशाला रिपोर्ट के निश्चित नहीं किया है। इस कारण मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने इस मामले का संज्ञान लिया है। हालांकि इसके बावजूद प्रशासनिक स्तर पर इसे लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि करीब 3 साल पहले हाईवे किनारे बने नए होटलों के संचालकों ने जमीन के भराव के लिए 100 रुपये प्रति ट्रॉली के हिसाब से इस मलबे को मंगवाया था। उस समय लोग इसके खतरनाक दुष्प्रभावों से अनजान थे। ग्रामीणों का कहना है कि इसके बाद से ही फैक्ट्री संचालक चोरी-छिपे रात के अंधेरे में हाईवे किनारे जहरीला कचरा फेंक रहे हैं, जिससे पूरे इलाके की जमीन और भूगर्भ जल में क्रोमियम का जहर घुल रहा है। हाईवे किनारे जहां-जहां यह कचरा डाला गया, वहां के हरे-भरे पेड़-पौधे सूखकर ठूंठ बन चुके हैं।
पुरवामीर में क्रोमियम युक्त ज़हरीला कचरा मिलने की घटना के उजागर होने के बाद ग्रामीणों की सूचना पर हुई जांच में 4 अन्य नई जगहों पर भी क्रोमियम कचरा पड़ा मिला है। इनमें महुआ गांव मोड़, महोली मोड़ स्थित सिंह ढाबा, पुरवामीर का श्री वैष्णव रिजॉर्ट, साइन सिटी गेट और गैस एजेंसी कार्यालय का क्षेत्र शामिल है। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक करीब 22 दिन पहले तड़के 4 बजे दो डंपर होटल के पास जहरीला मलबा डालकर भाग गए थे। मलबे से आ रही तेज दुर्गंध और रसायन के रिसकर पास के खेतों में जाने से फसलों को भारी नुकसान हो रहा है।
मामले के तूल पकड़ने के बाद यह बात प्रदूषण नियंत्रण विभाग से लेकर एनजीटी, विधानसभा अध्यक्ष और लखनऊ के आला अधिकारियों तक पहुंची। जिसके बाद इसकी जांच के लिए शासन स्तर पर 5 सदस्यीय जांच कमेटी गठित की गई । हालांकि अब तक रिपोर्ट न आने से ग्रामीणों में आक्रोश है। उन्होंने यूपी पीसीबी पर लीपापोती का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट को सार्वजनिक करने की मांग की है। साथ ही ज़हरीले क्रोमियम के कचरे को सुरक्षित तरीके से हटाने की भी मांग की है।
हेक्सावेलेंट क्रोमियम लेदर टैनिंग, पिगमेंट निर्माण, इलेक्ट्रोप्लेटिंग और स्टेनलेस स्टील वेल्डिंग जैसी औद्योगिक प्रक्रियाओं से पैदा होता है। सांस या पानी के जरिये शरीर में पहुंचने पर यह कैंसर (विशेषकर फेफड़ों व लिवर के कैंसर) का खतरा बढ़ा सकता है और गंभीर अंगों को नुकसान पहुंचा सकता है। क्रोमियम के हवा या पानी के जरिये शरीर में पहुंचने पर इससे फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। नाक, गले और फेफड़ों में जलन व अल्सर तथा त्वचा पर रैश और एलर्जी भी हो सकती है।
| क्रोमियम का रूप | सामान्य स्थिति | प्रमुख खतरा |
|---|---|---|
| Cr(III) / त्रिसंयोजी क्रोमियम | पर्यावरण में पाया जाने वाला प्रमुख रूप; कुछ जैविक प्रक्रियाओं में आवश्यक | Cr(VI) की तुलना में कम विषैला माना जाता है; अत्यधिक संपर्क फिर भी हानिकारक हो सकता है |
| Cr(VI) / हेक्सावेलेंट क्रोमियम | प्राकृतिक और औद्योगिक दोनों स्रोतों से मिल सकता है; औद्योगिक प्रदूषण में विशेष चिंता | अधिक विषैला; लंबे समय तक संपर्क कैंसर समेत गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों से जुड़ा है |
| Cr(0) / धात्विक क्रोमियम | धात्विक अवस्था; मुख्यतः औद्योगिक उपयोगों से संबंधित | Cr(III) और Cr(VI) की तुलना में पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिम का आकलन अलग होता है; जोखिम संपर्क के रूप पर निर्भर करता है |
क्रोमियम अपने आप में एक ही तरह का प्रदूषक नहीं है। इसके अलग-अलग रासायनिक रूपों में हेक्सावेलेंट क्रोमियम यानी Cr(VI) सबसे अधिक चिंता का विषय माना जाता है। यह पानी और मिट्टी के जरिए पर्यावरण में फैल सकता है और लंबे समय तक इसके संपर्क में रहना मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। खास बात यह है कि क्रोमियम युक्त औद्योगिक कचरा यदि खुले में पड़ा रहे तो बारिश का पानी उसमें मौजूद रसायनों को घोलकर मिट्टी की परतों के भीतर ले जा सकता है। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे भूजल को भी प्रभावित कर सकती है। क्रोमियम प्रदूषण की सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसका बड़ा हिस्सा आंखों से दिखाई नहीं देता। जमीन पर पड़ा हरा या संदिग्ध रंग का कचरा हटाया जा सकता है, लेकिन यदि उससे निकलने वाले प्रदूषक भूजल में पहुंच चुके हैं तो समस्या कहीं अधिक जटिल हो जाती है। यही वजह है कि पुरवामीर में केवल कचरे के ढेर हटाने से मामला खत्म नहीं होगा। यह पता लगाना भी जरूरी है कि प्रदूषण भूजल में कितनी गहराई तक पहुंचा है, किस दिशा में फैल रहा है और आसपास के कितने जलस्रोत इसकी चपेट में हैं। इसके लिए नियमित और पारदर्शी भूजल मॉनिटरिंग जरूरी है।
कानपुर के आसपास क्रोमियम प्रदूषण पर हुए वैज्ञानिक अध्ययनों में भी इस तरह के रिसाव की पुष्टि हुई है। IIT कानपुर समेत शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में क्रोमियम कचरे के स्रोत से भूजल और मिट्टी में इसके पहुंचने की प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया था। शोध में पाया गया कि क्रोमियम भूजल में घुलित और सूक्ष्म कणों से जुड़े रूपों में मौजूद हो सकता है, जिससे इसका भूजल तंत्र में व्यवहार जटिल हो जाता है।
पुरवामीर में सामने आया मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि खतरा केवल उन स्थानों तक सीमित नहीं रहता जहां क्रोमियमयुक्त कचरा दिखाई दे रहा है। खुले में पड़े कचरे पर बारिश पड़ने के बाद उसके रासायनिक घटक मिट्टी में नीचे जा सकते हैं। यदि प्रदूषक भूजल तक पहुंच जाए तो उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रह सकता है और प्रदूषण का फैलाव उस जगह से आगे भी हो सकता है।
कानपुर क्षेत्र में पहले भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। रानिया, कानपुर देहात में क्रोमियमयुक्त कचरे से भूजल प्रदूषण का मामला वर्षों से NGT की निगरानी में रहा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के मुताबिक वहां क्रोमियम कचरे से मिट्टी के साथ भूजल भी प्रभावित हुआ और हेक्सावेलेंट क्रोमियम का प्रदूषण आसपास के गांवों की दिशा में फैला।
यानी पुरवामीर की समस्या को किसी एक जगह पर अवैध तरीके से कचरा फेंके जाने की घटना मानकर खत्म कर देना पर्याप्त नहीं होगा। यह उस औद्योगिक कचरा प्रबंधन व्यवस्था पर भी सवाल है, जिसके तहत खतरनाक कचरे को सुरक्षित तरीके से संग्रहित, परिवहन और निस्तारित किया जाना चाहिए।
पुरवामीर और आसपास के इलाकों में तत्काल प्राथमिकता उन सभी स्थानों की पहचान और सुरक्षित घेराबंदी होनी चाहिए जहां क्रोमियमयुक्त कचरा पड़ा है। इसके बाद कचरे को वैज्ञानिक तरीके से हटाकर अधिकृत खतरनाक कचरा निस्तारण सुविधा तक पहुंचाना और प्रभावित मिट्टी तथा भूजल की निगरानी करना जरूरी होगा।
इसके साथ यह भी पता लगाना होगा कि कचरा कहां से आया, किसने उसका परिवहन किया और उसे खुले में किसकी अनुमति या लापरवाही से डाला गया। हालिया रिपोर्टों में पुरवामीर के अलावा आसपास के कई स्थानों पर क्रोमियमयुक्त कचरा मिलने की बात सामने आई है। इससे संकेत मिलता है कि समस्या केवल एक डंपिंग साइट तक सीमित नहीं हो सकती।
| स्थान | प्रभावित/अध्ययन क्षेत्र | क्रोमियम संबंधी निष्कर्ष | स्रोत/अध्ययन का संदर्भ | स्रोत का प्रकार |
|---|---|---|---|---|
| वाराणसी | काशी विद्यापीठ क्षेत्र | क्रोमियम > 0.05 mg/L | CGWB का उत्तर प्रदेश भूजल गुणवत्ता प्रोफाइल | CGWB |
| कानपुर | कानपुर नगर/औद्योगिक क्षेत्र | क्रोमियम > 0.05 mg/L | CGWB रिकॉर्ड; कानपुर में क्रोमियम प्रदूषण पर वैज्ञानिक अध्ययन भी उपलब्ध | CGWB |
| उन्नाव | उन्नाव जिला | क्रोमियम > 0.05 mg/L | CGWB का उत्तर प्रदेश भूजल गुणवत्ता प्रोफाइल | CGWB |
| गाजियाबाद | मेरठ रोड औद्योगिक क्षेत्र के आसपास | कुछ भूजल नमूनों में 0.05 mg/L से अधिक | 250 भूजल नमूनों पर वैज्ञानिक अध्ययन | वैज्ञानिक अध्ययन |
| मुरादाबाद | मुरादाबाद शहर | प्री-मानसून 0.048–0.072 mg/L; पोस्ट-मानसून 0.036–0.071 mg/L; कुछ नमूने 0.05 mg/L से ऊपर | हाइड्रोजियोकेमिकल अध्ययन | वैज्ञानिक अध्ययन |
| जौनपुर | Bas uhi River Basin | औसत लगभग 4.96 µg/L (0.00496 mg/L) | 2024 के भूजल अध्ययन में क्रोमियम की मौजूदगी; औसत 0.05 mg/L से कम | वैज्ञानिक अध्ययन |
| मथुरा | मथुरा जिला | संबंधित CGWB अध्ययन में सभी नमूने 0.05 mg/L की सीमा के भीतर | इसे क्रोमियम-प्रदूषित क्षेत्र के रूप में नहीं दिखाया जाना चाहिए | CGWB |
कानपुर में क्रोमियम प्रदूषण का संकट अचानक पैदा नहीं हुआ है। चमड़ा उद्योग और क्रोमियम आधारित औद्योगिक प्रक्रियाओं से निकलने वाले कचरे के कारण जिले और आसपास के क्षेत्रों में लंबे समय से इसकी चिंता रही है। वैज्ञानिक अध्ययनों में कानपुर के क्रोमियम कचरा डंप साइटों के आसपास भूजल में Cr(VI) की मौजूदगी दर्ज की गई है।
2019 में हुए IIT कानपुर के एक अध्ययन में क्रोमियम कचरे से प्रभावित क्षेत्र के भूजल में Cr(VI) की अत्यधिक सांद्रता दर्ज होने की बात सामने आई थी। अध्ययन ने यह भी रेखांकित किया कि ऐसे प्रदूषण का असर केवल पानी की गुणवत्ता तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आसपास की आबादी, पशुओं, कृषि उत्पादकता और पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है।
इस पुराने अनुभव को देखते हुए पुरवामीर में मिले नए कचरे को और गंभीरता से देखने की जरूरत है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अभी पानी कितना प्रदूषित है, बल्कि यह भी है कि यदि कचरा जमीन पर पड़ा रहा तो आने वाले वर्षों में प्रदूषण का दायरा कितना बढ़ सकता है।
क्रोमियम प्रदूषण के पुराने मामलों के कारण NGT पहले से ही कानपुर, कानपुर देहात और फतेहपुर में भारी धातु प्रदूषण से जुड़े मामलों की निगरानी कर रहा है। जुलाई 2026 की सुनवाई में ट्रिब्यूनल को बताया गया कि उत्तर प्रदेश सरकार ने IIT कानपुर को 2.65 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इसके तहत व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना है, जिसमें पर्यावरणीय नमूनों के साथ भूजल, मिट्टी और प्रदूषण के हॉटस्पॉट की मैपिंग शामिल है।
यह कदम महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी प्रदूषित इलाके की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केवल एक-दो पानी के नमूने पर्याप्त नहीं होते। भूजल की गहराई, प्रदूषण की दिशा, मिट्टी की प्रकृति, कचरे की मात्रा और आसपास के कुओं तथा हैंडपंपों की स्थिति को एक साथ देखना जरूरी होता है।
लेकिन इसी के साथ पुरवामीर में सामने आए ताजा कचरे का मामला प्रशासनिक निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल भी खड़ा करता है। यदि पहले से संवेदनशील माने जा रहे क्षेत्र में दोबारा खुले में क्रोमियमयुक्त कचरा पहुंच रहा है, तो केवल कचरे की सफाई या वैज्ञानिक अध्ययन समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
पुरवामीर की घटना इसलिए कानपुर के लिए एक चेतावनी है। यदि औद्योगिक कचरे का सुरक्षित निस्तारण सुनिश्चित नहीं किया गया और प्रदूषित भूजल की समय रहते पहचान नहीं हुई, तो आज जमीन पर दिखाई दे रहा जहरीला कचरा कल जमीन के नीचे मौजूद उस पानी को भी प्रभावित कर सकता है, जिस पर ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी निर्भर है। और भूजल में पहुंच चुका प्रदूषण सतह पर पड़े कचरे की तुलना में कहीं अधिक मुश्किल से हटाया जा सकता है।
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