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भूजल

मुंबई के भूजल में मिले खारे पानी के क्षेत्र: समुद्री जल प्रवेश का खतरा कितना गंभीर?

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

  • शिवाजी पार्क-दादर, फोर्ट और मुलुंड ईस्ट में अलग-अलग गहराइयों पर अत्यधिक खारा भूजल मिला है।

  • CGWB के अध्ययन में मुंबई का करीब 35 प्रतिशत क्षेत्र समुद्री जल प्रवेश के लिहाज से अधिक संवेदनशील पाया गया है।

  • पानी की मात्रा के लिहाज से मुंबई का भूजल ‘सुरक्षित’ है। लेकिन तटीय इलाकों में खारापन चिंता बढ़ा रहा है।

  • वर्षाजल संचयन अकेला समाधान नहीं है। भूजल निकासी और पानी की गुणवत्ता पर भी नजर रखनी होगी।

शिवाजी पार्क-दादर में केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की ड्रिलिंग के दौरान 18.5 मीटर की गहराई पर अत्यधिक खारा पानी मिला। फोर्ट में 71 मीटर नीचे खारा पानी मिला। मुलुंड ईस्ट में यह 131 मीटर की गहराई पर मिला। इन स्थानों पर पानी की विद्युत चालकता 10,000 माइक्रोसीमेंस प्रति सेंटीमीटर से अधिक थी। यह बहुत अधिक खारेपन का संकेत है।

इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर CGWB ने शिवाजी पार्क-दादर और क्रीक से सटे इलाकों में भूजल निकालने पर रोक लगाने की सिफारिश की है। फोर्ट में 60 मीटर से अधिक गहरे बोरवेल नहीं खोदने और तटीय क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता की लगातार निगरानी करने को कहा गया है।

ये तथ्य मुंबई की जलभृत प्रबंधन योजना 2024-25 में दर्ज हैं। यह अध्ययन राष्ट्रीय जलभृत मानचित्रण एवं प्रबंधन कार्यक्रम (NAQUIM 2.0) के तहत किया गया है। अध्ययन में 603 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को शामिल किया गया। इसमें भूजल की मात्रा, गुणवत्ता और खारेपन के खतरे की जांच की गई।

मुंबई की जमीन के नीचे क्या मिला?

मुंबई मुख्यतः बेसाल्ट चट्टानों पर बसी है। यहां भूजल किसी एक परत में नहीं मिलता। पानी बेसाल्ट चट्टानों की दरारों और छिद्रों में जमा होता है। CGWB ने शहर में दो प्रमुख जलभृत समूह पहचाने हैं। पहला जलभृत 30 मीटर तक है। दूसरा 30 से 172 मीटर की गहराई में है।

चट्टानों की बनावट हर जगह एक जैसी नहीं है। इसलिए अलग-अलग गहराई पर पानी की गुणवत्ता भी बदल सकती है। किसी बोरवेल में मीठा पानी और उससे कुछ दूरी या गहराई पर खारा पानी मिलना संभव है। इसलिए किसी एक स्थान के नतीजे को पूरे मुंबई पर लागू नहीं किया जा सकता।

तटीय इलाकों में जमीन के नीचे मीठे और खारे पानी के बीच प्राकृतिक संतुलन रहता है। मीठे भूजल का दबाव समुद्र के पानी को जमीन की ओर बढ़ने से रोकता है।

CGWB के अध्ययन में फोर्ट, शिवाजी पार्क-दादर, मुलुंड ईस्ट और माहिम की कुछ जगहों पर बहुत अधिक खारा भूजल मिला। समुद्री पानी के खतरे को समझने के लिए GALDIT मॉडल का इस्तेमाल किया गया। मॉडल में समुद्र से दूरी, भूजल स्तर और पानी के खारेपन को देखा गया।

अध्ययन के अनुसार पश्चिमी और दक्षिणी तट के उथले जलभृत अधिक संवेदनशील हैं। पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में, खासकर क्रीक के आसपास, गहरे जलभृतों में भी खतरा अधिक पाया गया। GALDIT मॉडल के अनुसार अध्ययन क्षेत्र का करीब 35 प्रतिशत हिस्सा समुद्री जल प्रवेश के प्रति अधिक संवेदनशील है।

इसका अर्थ केवल इतना है कि इन इलाकों में खतरा अधिक है। इससे समुद्री पानी के वास्तविक प्रवेश की पुष्टि नहीं होती। इसके लिए कई वर्षों के स्थानीय आंकड़े चाहिए।

समुद्र का खारा पानी जलभृत में कैसे बढ़ सकता है?

तटीय इलाकों में जमीन के नीचे मीठे और खारे पानी के बीच प्राकृतिक संतुलन रहता है। मीठे भूजल का दबाव समुद्र के पानी को जमीन की ओर बढ़ने से रोकता है। ज्यादा पानी निकालने से भूजल का स्तर गिर सकता है। बारिश का पानी कम पहुंचे तो समस्या और बढ़ती है। इससे खारा पानी मीठे जलभृत की ओर बढ़ सकता है।

खारापन केवल समुद्र की ओर से नहीं आता। अधिक पंपिंग से नीचे की खारी परत का पानी ऊपर भी उठ सकता है। इसे ‘सलाइन अपकोनिंग’ कहते हैं। समुद्र की ओर से खारे पानी का जमीन के भीतर बढ़ना ‘समुद्री जल प्रवेश’ है।

मुंबई की जलभृत प्रबंधन योजना भी कहती है कि शहर के कुछ हिस्सों में मीठे जलभृतों के बीच खारे पानी की परतें मौजूद हैं। ज्यादा पंपिंग से खारा पानी ऊपर आ सकता है। खारेपन की वजह हर जगह एक नहीं होती। इसके लिए स्थानीय जांच जरूरी है। खारापन प्राकृतिक भी हो सकता है। मानवीय गतिविधियां भी इसे बढ़ा सकती हैं।

‘सुरक्षित’ भूजल के बीच स्थानीय खतरा

पूरे मुंबई में भूजल की मात्रा अभी चिंताजनक नहीं है। CGWB के 2025 आकलन के अनुसार मुंबई सिटी में सालाना निकासी योग्य भूजल 14.77 मिलियन घनमीटर है और निकासी 6.80 मिलियन घनमीटर। यहां भूजल निकासी का स्तर 46.03 प्रतिशत है। मुंबई उपनगर में 72.63 मिलियन घनमीटर निकासी योग्य भूजल के मुकाबले 18.70 मिलियन घनमीटर निकाला जाता है और निकासी का स्तर 25.74 प्रतिशत है। मुंबई, अंधेरी, कुर्ला और बोरीवली की आकलन इकाइयां सुरक्षित श्रेणी में हैं।

रिपोर्ट के अनुसार शहर को हर दिन 4,505 मिलियन लीटर पानी की जरूरत है, जबकि नगर निगम करीब 4,000 मिलियन लीटर की आपूर्ति करता है। दोनों के बीच 505 MLD का अंतर है। 

‘सुरक्षित’ श्रेणी केवल पानी की मात्रा बताती है। इससे पानी की गुणवत्ता का पता नहीं चलता। स्थानीय स्थिति भी अलग हो सकती है। शहर का औसत सामान्य हो सकता है। फिर भी किसी इलाके में अधिक पानी निकाला जा सकता है। तटीय इलाकों में यह अंतर खास मायने रखता है। पानी मौजूद हो सकता है। लेकिन अधिक खारापन उसे कई कामों के लिए अनुपयुक्त बना सकता है।

2014 से 2023 के आंकड़ों में मुंबई सिटी के भूजल स्तर में मानसून से पहले और बाद, दोनों अवधियों में गिरावट का रुझान मिला है। मुंबई उपनगर में स्थिति आम तौर पर स्थिर या बेहतर है, हालांकि वहां भी कुछ स्थानों पर गिरावट दर्ज हुई है।

शहर की पानी की जरूरत और छिपा हुआ भूजल

मुंबई की मुख्य पेयजल व्यवस्था सात झीलों से आने वाले सतही जल पर निर्भर है। भूजल आम तौर पर पीने के बजाय निर्माण कार्य, शौचालयों की फ्लशिंग, वाहन धोने, बागवानी, होटल, मॉल और हाउसिंग सोसायटियों की दूसरी जरूरतों में इस्तेमाल होता है।

BMC की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2024-25 के अनुसार शहर को हर दिन 4,505 मिलियन लीटर पानी की जरूरत है, जबकि नगर निगम करीब 4,000 मिलियन लीटर की आपूर्ति करता है। दोनों के बीच 505 MLD का अंतर है। 

अलग-अलग रिपोर्टों में मुंबई की जलापूर्ति के आंकड़ों में कुछ अंतर मिलता है। यहां BMC की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2024-25 के आंकड़े लिए गए हैं। इस कमी का कितना हिस्सा भूजल से पूरा होता है, इसका आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। फिर भी शहर में टैंकर और बोरवेल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है।

जून 2026 में प्रकाशित मोंगाबे-इंडिया की एक पड़ताल में भूजल कार्यकर्ता सुरेश कुमार ढोका ने RTI से मिली जानकारी के आधार पर दावा किया कि मुंबई के 17,364 कुओं और बोरवेलों का इस्तेमाल व्यावसायिक पानी की आपूर्ति में हो रहा है।

दूसरी ओर, CGWB की योजना में मुंबई में 18,911 भूजल निकासी संरचनाएं दर्ज हैं। इनमें 4,638 कुएं, 12,561 ट्यूबवेल और 1,712 रिंगवेल शामिल हैं। यह सभी भूजल संरचनाओं का आंकड़ा है, जबकि RTI आधारित दावा व्यावसायिक उपयोग से जुड़ा है। इसलिए दोनों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

इसी पड़ताल में मुंबई वाटर टैंकर एसोसिएशन ने दावा किया है कि शहर में करीब 2,100 टैंकर प्रतिदिन 550 MLD पानी पहुंचाते हैं। इस आंकड़े की सरकारी पुष्टि नहीं हुई है। इसकी तुलना BMC की बताई 505 MLD की आपूर्ति-कमी से भी नहीं की जा सकती, क्योंकि दोनों आंकड़े अलग-अलग स्रोतों और आकलन पर आधारित हैं। फिर भी यह दावा शहर में निजी जल आपूर्ति के बड़े कारोबार की ओर इशारा करता है।

शहर में कितना भूजल निकाला जा रहा है, इसका सही आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। कुओं की संख्या जानना पर्याप्त नहीं, क्योंकि हर कुएं से समान मात्रा में पानी नहीं निकलता। हर बोरवेल से होने वाली निकासी दर्ज होनी चाहिए। तभी भूजल पर दबाव का पता चलेगा।

कंक्रीट, बेसमेंट और पुनर्भरण की चुनौती

मुंबई में भारी बारिश होती है, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा पक्की सतहों और नालों से बहकर समुद्र में चला जाता है। पक्की जमीन बारिश के पानी का जमीन में रिसाव घटा देती है। गहरे बेसमेंट बनाते समय जमीन का पानी बाहर निकालना पड़ता है।

इसे डीवॉटरिंग कहते हैं। मुंबई में इससे कितना भूजल निकलता है, इसका समग्र आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसके असर की जांच निर्माण स्थल और आसपास के इलाके के स्तर पर होनी चाहिए।

वर्षाजल संचयन मदद कर सकता है। लेकिन हर जगह एक जैसी व्यवस्था नहीं बनाई जा सकती। CGWB ने उन स्थानों में पुनर्भरण को प्राथमिकता देने को कहा है जहां मानसून के बाद भी भूजल पांच मीटर से अधिक गहराई पर रहता है। रिपोर्ट में सायन, मझगांव, बोरीवली ईस्ट, चांदीवली और विले पार्ले वेस्ट जैसे क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं। पुराने सूखे कुओं से बारिश का पानी जमीन में पहुंचाया जा सकता है। इससे पहले उनकी सफाई और पानी को छानना जरूरी है।

पुनर्भरण से पहले पानी की गुणवत्ता जांचना जरूरी है। गंदा पानी सीधे जमीन में नहीं उतारना चाहिए। इससे भूजल दूषित हो सकता है। रिचार्ज संरचना बनाने से पहले भूजल की गहराई और मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता देखनी चाहिए। केवल रिचार्ज पिट बना देना काफी नहीं है। यह भी देखना होगा कि उससे भूजल को कितना लाभ हुआ।

निगरानी के बिना मानचित्र अधूरा है

इंडिया वाटर पोर्टल को दिए एक इंटरव्यू में हाइड्रोजियोलॉजिस्ट हिमांशु कुलकर्णी ने जलभृतों को एक ‘अदृश्य संसाधन’ बताया है। उनके अनुसार भूजल का प्रबंधन अलग-अलग कुओं के बजाय पूरे जलभृत को ध्यान में रखकर होना चाहिए।

मुंबई की नई जलभृत प्रबंधन योजना भी इसी जरूरत पर जोर देती है। CGWB ने तटीय और अधिक खतरे वाले इलाकों में अतिरिक्त निगरानी कुएं बनाने की सिफारिश की है। रिपोर्ट में भूजल स्तर और पानी की गुणवत्ता के आंकड़े नियमित रूप से जुटाने तथा उन्हें GIS आधारित व्यवस्था से जोड़ने को कहा गया है।

फोर्ट, शिवाजी पार्क, मुलुंड और क्रीक से लगे इलाकों में मानसून से पहले और बाद पानी की जांच होनी चाहिए। इसमें जलस्तर, विद्युत चालकता, क्लोराइड और कुल घुले ठोस पदार्थों को देखा जाना चाहिए। आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, ताकि खारेपन में हो रहे बदलाव का पता चल सके। रिपोर्ट में अगली जांच की तारीख या निगरानी का तय कार्यक्रम नहीं दिया गया है। हालांकि नियमित रूप से आंकड़े जुटाने की सिफारिश की गई है।

रिचार्ज संरचना बनाने से पहले भूजल की गहराई और मिट्टी की पानी सोखने की क्षमता देखनी चाहिए। केवल रिचार्ज पिट बना देना काफी नहीं है।

CGWB की जलभृत प्रबंधन योजना में कुछ संवेदनशील इलाकों में भूजल निकासी रोकने की सिफारिश की गई है। महाराष्ट्र में भूजल नियमन के लिए महाराष्ट्र भूजल (विकास और प्रबंधन) अधिनियम, 2009 का ढांचा मौजूद है। लेकिन CGWB की रिपोर्ट यह नहीं बताती कि शिवाजी पार्क-दादर में रोक लागू करने का कोई अलग आदेश जारी हुआ है या इसकी निगरानी कौन करेगा।

शहर का औसत स्थानीय खतरे को छिपा सकता है

मुंबई का भूजल अभी समग्र रूप से ‘सुरक्षित’ श्रेणी में है। लेकिन हर इलाके की स्थिति एक जैसी नहीं है। फोर्ट, शिवाजी पार्क और मुलुंड में खारा पानी मिला है।

CGWB की रिपोर्ट ने यह नहीं कहा कि पूरे मुंबई के नीचे समुद्र तेजी से फैल रहा है। रिपोर्ट ने अधिक खतरे वाले इलाकों की पहचान की है। वहां ज्यादा पंपिंग से समस्या बढ़ सकती है। अब खतरे की नियमित जांच और रोकथाम जरूरी है।

हर कुएं और बोरवेल का रिकॉर्ड तथा पानी की नियमित जांच इस खतरे को समझने के लिए जरूरी है। मुंबई के लिए भूजल की मात्रा ही एकमात्र सवाल नहीं है। यह भी देखना होगा कि उसमें कितना पानी अब भी मीठा और इस्तेमाल लायक है।

पानी का स्वाद खारा होना उसकी गुणवत्ता का एक संकेत है, लेकिन सुरक्षित उपयोग तय करने के लिए केवल स्वाद पर्याप्त नहीं है। पीने के पानी के लिए TDS, क्लोराइड, नाइट्रेट और सूक्ष्मजीवों की जांच जरूरी है। CGWB के अनुसार अधिकांश नमूनों में जांचे गए रासायनिक मानक तय सीमा के भीतर थे। हालांकि कुछ स्थानों पर नाइट्रेट और विद्युत चालकता अधिक मिली। इसलिए इससे पूरे शहर का भूजल पीने योग्य होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

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