उत्‍तर प्रदेश में घटते भूजल स्‍तर के कारण कुओं और नलकूपों के सूखने की समस्‍या बढ़ती जा रही है।

 

स्रोत : विकी कॉमंस

भूजल

यूपी में भूजल की स्थिति चिंताजनक - सिंचाई, पेयजल पर बढ़ता दबाव

राज्य के अनेक जिले व ब्‍लॉक 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड', 'क्रिटिकल' और 'सेमी-क्रिटिकल' श्रेणियों में पहुंच चुके हैं

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

देश के सबसे ज्‍यादा आबादी वाले राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में बीते दिनों 16 से 23 जुलाई तक राज्‍यव्‍यापी स्‍तर पर भूजल सप्‍ताह मनाया गया है। इस मौके पर राजधानी लखनऊ से लेकर प्रदेश के विभिन्‍न जिलों में कार्यक्रमों का आयोजन कर भूजल संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक किया गया। इस मौके पर राज्‍य में भूजल के अत्‍यधिक दोहन पर और उसकी तुलना में ग्राउंड वाटर रिचार्ज काफी कम रहने को लेकर चिंता भी जताई गई। खुद राज्‍य सरकार के जिलावार आंकड़े बताते हैं कि यूपी में भूजल स्‍तर की स्थिति काफी चिंताजनक हो चली है। प्रस्तुत है यूपी के सभी जिलों में जनवरी 2026 से मई 2026 के बीच रिकॉर्ड किया गया औसत भूजल स्तर। इस डाटा की टेलीमेट्री, प्रत्येक छह घंटे की है। यह डेटासेट उत्तर प्रदेश भूजल विभाग द्वारा संकलित किया गया है। इसमें राज्य के विभिन्न टेलीमेट्री आधारित निगरानी केंद्रों से प्रत्येक छह घंटे के अंतराल पर दर्ज किए गए भूजल स्तर के आंकड़े शामिल हैं। यह डेटासेट भूजल स्तर में होने वाले समयानुसार बदलावों की निगरानी, भूजल संसाधनों के आकलन, जल प्रबंधन तथा शोध एवं नीति निर्माण के लिए उपयोगी है।

उत्तर प्रदेश देश के उन राज्यों में शामिल है जहां कृषि, पेयजल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा भूजल पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) और उत्तर प्रदेश भूजल विभाग के अनुसार राज्य में करोड़ों लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से भूजल पर निर्भर हैं। प्रदेश में लगभग 75 से 80% सिंचाई और ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश पेयजल आपूर्ति का आधार भूजल ही है। हरित क्रांति के बाद नलकूपों और सबमर्सिबल पंपों की संख्या तेजी से बढ़ी, जिससे कई क्षेत्रों में भूजल का दोहन प्राकृतिक पुनर्भरण (Recharge) की तुलना में अधिक हो गया।

CGWB के नवीनतम आकलनों के अनुसार उत्तर प्रदेश की अधिकांश आकलन इकाइयां (Assessment Units/Blocks) अभी भी सुरक्षित श्रेणी में हैं, लेकिन पश्चिमी, बुंदेलखंड और बड़े शहरों के आसपास के कई ब्लॉकों में स्थिति चिंताजनक है। राज्य के अनेक ब्लॉक 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड', 'क्रिटिकल' और 'सेमी-क्रिटिकल' श्रेणियों में पहुंच चुके हैं। 

इसका अर्थ है कि इन क्षेत्रों में जितना भूजल निकाला जा रहा है, उसकी भरपाई प्राकृतिक रूप से नहीं हो पा रही है। लगातार गिरते जलस्तर के कारण किसानों को अधिक गहराई तक बोरिंग करनी पड़ रही है। इससे सिंचाई की लागत बढ़ रही है, बिजली की खपत बढ़ रही है और छोटे किसानों पर आर्थिक बोझ भी बढ़ रहा है। दूसरी ओर, कई शहरों में गर्मियों के दौरान हैंडपंप और उथले नलकूप सूखने की घटनाएं भी बढ़ी हैं।

उत्‍तर प्रदेश में भूजल की स्थिति पर एक नज़र

संकेतकस्थिति
सिंचाई में भूजल की हिस्सेदारीलगभग 75–80%
ग्रामीण पेयजल का प्रमुख स्रोतभूजल
संकटग्रस्त क्षेत्रपश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड, बड़े शहरी क्षेत्र
प्रमुख प्रभावित जिलेगौतमबुद्ध नगर, गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, हापुड़, शामली, मुजफ्फरनगर, बुलंदशहर, झांसी, ललितपुर, जालौन, महोबा, बांदा, हमीरपुर, चित्रकूट
प्रमुख सरकारी योजनाएंअटल भूजल योजना, अमृत सरोवर, कैच द रेन, मनरेगा के जल संरक्षण कार्य
प्रमुख चुनौतियांअत्यधिक दोहन, कम रिचार्ज, शहरीकरण, आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट प्रदूषण

पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड सबसे अधिक दबाव वाले क्षेत्र

पूरे प्रदेश में भूजल संकट एक समान नहीं है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बुंदेलखंड और तेजी से शहरीकरण वाले क्षेत्रों में स्थिति अपेक्षाकृत अधिक गंभीर है। मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, बागपत, हापुड़, शामली, मुजफ्फरनगर और बुलंदशहर जैसे जिलों में उद्योग, शहरी विस्तार और गहन सिंचाई के कारण भूजल पर अत्यधिक दबाव है। वहीं बुंदेलखंड के झांसी, ललितपुर, जालौन, महोबा, हमीरपुर, बांदा और चित्रकूट जैसे जिलों में कम वर्षा, कठोर चट्टानी भूभाग और बार-बार पड़ने वाले सूखे के कारण भूजल का पुनर्भरण सीमित रहता है।

दूसरी ओरृ राजधानी लखनऊ, कानपुर नगर, आगरा, वाराणसी और प्रयागराज जैसे बड़े शहरों में भी आबादी बढ़ने के साथ भूजल दोहन लगातार बढ़ा है। शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट का विस्तार होने से वर्षा का पानी जमीन में कम समा पाता है, जिससे प्राकृतिक रिचार्ज प्रभावित होता है। यदि वर्तमान दर से दोहन जारी रहा तो आने वाले वर्षों में कई नए क्षेत्र भी जल संकट की श्रेणी में पहुंच सकते हैं।

भूजल दोहन की श्रेणियां क्या बताती हैं?

केंद्रीय भूजल बोर्ड भूजल की स्थिति का आकलन वार्षिक पुनर्भरण और कुल निकासी के आधार पर करता है। यदि किसी क्षेत्र में निकासी पुनर्भरण से अधिक हो जाती है तो उसे 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' माना जाता है। 90 से 100 प्रतिशत दोहन वाले क्षेत्रों को 'क्रिटिकल' और 70 से 90 प्रतिशत वाले क्षेत्रों को 'सेमी-क्रिटिकल' श्रेणी में रखा जाता है।

उत्तर प्रदेश में अधिकांश आकलन इकाइयां अभी भी 'सेफ' श्रेणी में हैं, लेकिन जिन क्षेत्रों में भूजल का दोहन लगातार बढ़ रहा है, वहां नई बोरिंग पर नियंत्रण, वर्षा जल संचयन और कृत्रिम भूजल पुनर्भरण जैसी गतिविधियों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।

भूजल दोहन की श्रेणियां क्या बताती हैं ? केंद्रीय भूजल बोर्ड भूजल की स्थिति का आकलन वार्षिक पुनर्भरण और कुल निकासी के आधार पर करता है। यदि किसी क्षेत्र में निकासी पुनर्भरण से अधिक हो जाती है तो उसे 'ओवर-एक्सप्लॉइटेड' माना जाता है। 90 से 100 प्रतिशत दोहन वाले क्षेत्रों को 'क्रिटिकल' और 70 से 90 प्रतिशत वाले क्षेत्रों को 'सेमी-क्रिटिकल' श्रेणी में रखा जाता है। उत्तर प्रदेश में अधिकांश आकलन इकाइयां अभी भी 'सेफ' श्रेणी में हैं, लेकिन जिन क्षेत्रों में भूजल का दोहन लगातार बढ़ रहा है, वहां नई बोरिंग पर नियंत्रण, वर्षा जल संचयन और कृत्रिम भूजल पुनर्भरण जैसी गतिविधियों की आवश्यकता लगातार बढ़ रही है।

भूजल संरक्षण के लिए क्‍या कर रही सरकार?

उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में भूजल संरक्षण को लेकर कई कार्यक्रम शुरू किए हैं। इनमें 'अटल भूजल योजना' सबसे प्रमुख है। यह योजना भारत सरकार और विश्व बैंक की सहायता से संचालित की जा रही है। 

प्रदेश के जल संकट वाले विकासखंडों में ग्राम पंचायत स्तर पर जल बजट, जल सुरक्षा योजना और सामुदायिक भागीदारी से भूजल प्रबंधन को बढ़ावा दिया जा रहा है। राज्य सरकार 'अमृत सरोवर' अभियान के तहत हजारों तालाबों का निर्माण और पुनर्जीवन कर चुकी है। इन जलाशयों का उद्देश्य केवल जल संग्रहण ही नहीं बल्कि भूजल पुनर्भरण बढ़ाना भी है।

इसके अलावा 'कैच द रेन' अभियान के तहत सरकारी भवनों, स्कूलों, पंचायत भवनों और शहरी क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन संरचनाएं विकसित की जा रही हैं। नगर निकायों और विकास प्राधिकरणों के माध्यम से नए भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। मनरेगा और अब विकसित भारत - G RAM G योजना के तहत खेत तालाब, चेक डैम, सोख्ता गड्ढे, परकोलेशन टैंक और जल संरक्षण से जुड़े हजारों कार्य कराए जा रहे हैं, जिनका सीधा लाभ भूजल रिचार्ज को मिलता है।

भूजल के अत्‍यधिक दोहन पर लगाम लगाने के लिए संकटग्रस्‍त जिलों में किसानों को कम पानी वाली फसलों, सूक्ष्म सिंचाई और वर्षा जल संचयन के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। इसी क्रम में 16 से 23 जुलाई तक राज्‍यव्‍यापी स्‍तर पर भूजल सप्‍ताह मना कर लोगों को तेजी से घटते भूजल की समस्‍या के प्रति जागरूक और रेन वाटर हार्वेस्टिंग को अपना कर ग्राउंड वाटर रिचार्ज में सहयोग के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया गया है। इसके बारे में विस्‍तार से जानने के लिए आप हमारी स्‍टोरी यूपी में भूजल सप्ताह : लखनऊ से प्रयागराज तक ग्राउंड वाटर बचाने के लिए चला बड़ा अभियान पढ़ सकते हैं।

तालाबों, आर्द्रभूमि और नदियों की बड़ी भूमिका

भूजल संरक्षण के लिए वर्षा जल संचयन बहुत महत्‍वपूर्ण है पर केवल रेन वाटर हार्वेस्टिंग ही पर्याप्त नहीं हैं। पारंपरिक तालाब, झीलें, आर्द्रभूमियां और नदी तंत्र भूजल पुनर्भरण के सबसे प्रभावी प्राकृतिक स्रोत हैं।

उत्तर प्रदेश में बीते वर्षों में अनेक तालाबों का अतिक्रमण हुआ। कई नदियां और तालाब गाद से भर गए। अब सरकार इनके पुनर्जीवन पर जोर दे रही है। अमृत सरोवर, नमामि गंगे, मनरेगा और ग्राम पंचायतों के माध्यम से तालाबों की खुदाई कर उन्‍हें गहरा किया जा रहा है। 

इससे वर्षा का अधिक पानी संचित होता है और यह ज्‍यादा समय तक रुकता भी है। यह धीरे-धीरे जमीन में समाकर भूजल स्तर बढ़ाने में मदद करता है। गंगा, यमुना, घाघरा, गोमती और उनकी सहायक नदियों के बाढ़ क्षेत्र (Floodplain) प्राकृतिक भूजल बैंक की तरह काम करते हैं। यदि इन क्षेत्रों का संरक्षण किया जाए तो भूजल पुनर्भरण में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

भूजल के प्रदूषण और ग्राउंड वाटर की गुणवत्‍ता में गिरावट भी हाल के वर्षों में एक बड़ी समस्‍या बनकर उभरी है। रिसर्च में पता चला है कि भूमिगत टैंक में संग्रहित पेट्रोकेमिकल के रिसाव से भी कई स्‍थानों पर भूजल प्रदूषण हो रहा है।

खेती के तौर-तरीकों में बदलाव भी जरूरी

प्रदेश में भूजल का सबसे ज्‍यादा दोहन खेती के लिए किया जा रहा है। इस तरह कृषि क्षेत्र भूजल का सबसे बड़ा उपभोक्‍ता है। धान, गन्ना जैसी अधिक पानी मांगने वाली फसलें कई ऐसे क्षेत्रों में भी उगाई जा रही हैं जहां भूजल पहले से दबाव में है। 

पर्यावरणविद गुंजन मिश्रा का कहना है कि रेन वाटर हार्वेस्टिंग और अन्‍य तरीकों से भूजल संरक्षण के साथ ही खेती के तौर-तरीकों में बदलाव भी जरूरी है, क्‍योंकि भूजल का सबसे ज्‍यादा इस्‍तेमाल कृषि क्षेत्र में ही किया जा रहा है। ऐसे में  ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों का विस्तार, फसल विविधीकरण, धान की डायरेक्ट सीडिंग, मल्चिंग तथा सिंचाई के वैज्ञानिक प्रबंधन से लाखों घनमीटर पानी बचाया जा सकता है। यदि कृषि क्षेत्र में जल दक्षता बढ़ती है तो भूजल दोहन भी स्वतः कम होगा। 

भूजल की गिरती गुणवत्ता भी बन रही चुनौती

भूजल संकट केवल मात्रा का नहीं बल्कि गुणवत्ता का भी है। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में भूजल में आर्सेनिक और फ्लोराइड की समस्या पहले से दर्ज की जा चुकी है। पूर्वांचल के कुछ जिलों में आर्सेनिक तथा बुंदेलखंड एवं अन्य क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में फ्लोराइड की अधिकता स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय बनी हुई है। इसके अलावा कई शहरी क्षेत्रों में नाइट्रेट प्रदूषण भी बढ़ रहा है, जिसका संबंध अनियंत्रित सीवेज और रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जोड़ा जाता है। इसी कारण सरकार जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी, परीक्षण प्रयोगशालाओं के विस्तार तथा सुरक्षित पेयजल आपूर्ति पर भी जोर दे रही है। 

सरकार की ओर से  रेन वाटर हार्वेस्टिंग की टेक्निकल गाइड लाइंस भी जारी की जानी चाहिए, ताकि वर्षा जल संग्रहण ठीक ढंग से किया जा सके और इससे भूजल की गुणवत्‍ता में कोई गिरावट न आने पाए। कितना रेन वाटर हार्वेस्‍ट किया जा सकता है और कितना किया जाना चाहिए, इसकी सटीक जानकारी भी लोगों को दी जानी चाहिए। 
गुंजन मिश्र, पर्यावरणविद

निष्‍कर्ष : भूजल संरक्षण में जनभागीदारी सबसे जरूरी

भूजल संरक्षण के लिए सरकार, संस्‍थाओं और कई लोगों द्वारा व्‍यक्तिगत स्‍तर पर किए जा रहे प्रयास काफी महत्‍वपूर्ण हैं, पर केवल सरकारी योजनाओं से भूजल संकट का समाधान संभव नहीं है। इसके लिए प्रत्येक नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। घरों, विद्यालयों, कार्यालयों और उद्योगों में वर्षा जल संचयन अपनाना, अनावश्यक भूजल दोहन रोकना, पारंपरिक जल स्रोतों का संरक्षण करना और जल का विवेकपूर्ण उपयोग करना समय की आवश्यकता है।

उम्‍मीद है कि 'भूजल सप्ताह' जैसे अभियान इस दिशा में नई संभावनाओं के द्वार खोलेंगे, ताकि लोग भूजल संकट के बारे में जागरूक हो और यह समझ सकें कि भूजल एक असीमित संसाधन नहीं है। यदि आज इसके संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए गए तो भविष्य में पेयजल, कृषि और औद्योगिक विकास सभी पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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