बाढ़ का मैदान खत्म होने और प्रदूषण के कारण छोटी नदियां और मौसमी धाराएं अकसर सिमट कर विलुप्त होने के कगार पर पहुंच जाती हैं।
फोटो : विकी कॉमंस
उत्तर प्रदेश के शामली में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (NGT) के निर्देश पर बाबरी क्षेत्र की कृष्णा नदी के बाढ़ मैदान (फ्लड प्लेन) के वैज्ञानिक निर्धारण के लिए हाल ही में क्षेत्र में सर्वे कार्य शुरू किया गया है। इस वैज्ञानिक सर्वेक्षण से कृष्णा नदी के बाढ़ मैदान के इलाकों का निर्धारण कर उसका नक्शा तैयार किया जाएगा। इससे इस बात को समझने और तय करने का एक दस्तावेजी आधार तैयार हो जाएगा कि कृष्णानदी का प्राकृतिक विस्तार कहां तक है? किन इलाकों में कहां-कहां नदी के बाढ़ मैदान पर अतिक्रमण हुआ है और बाढ़ के पानी के फैलने के लिए कौन-सी जमीनें जरूरी हैं। सर्वे के बाद अतिक्रमण हटाने या नदी की जमीन को मुक्त कराने की कार्रवाई भी इस नक्शे के आधार पर शुरू की जा सकती है। हालांकि इसके लिए सर्वे के निष्कर्ष, राजस्व अभिलेखों से उनका मिलान करने जैसी सरकारी कार्यवाहियां भी करनी होंगी।
यह सर्वे उत्तर प्रदेश भू-स्थानिक निदेशालय तथा भारतीय सर्वेक्षण विभाग की संयुक्त टीम द्वारा ड्रोन से किया जा रहा है। सर्वेक्षण के तहत बाबरी क्षेत्र में कृष्णा नदी के दोनों किनारों से लगभग पांच किलोमीटर के दायरे में स्थित पांच गांवों हिरणवाड़ा, बाबरी, कैड़ी, बंतीखेड़ा और हाथी करौदा में मानचित्र बनाया जाएगा। ड्रोन की सहायता से नदी के प्रवाह, भू-आकृति, जलभराव क्षेत्रों और बाढ़ प्रभावित भूभाग का सटीक आंकलन किया जा जा रहा है, जिससे भविष्य में पर्यावरण संरक्षण और बाढ़ प्रबंधन की योजनाओं को प्रभावी ढंग से तैयार किया जा सके। सर्वे की पूरी प्रक्रिया सरकारी स्तर पर निर्धारित मानकों के अनुरूप की जा रही है। प्रशासन ने इस इलाके के तहत आने वाले गांवों के ग्रामीणों से सर्वेक्षण दल का सहयोग करने की अपील की है, ताकि एनजीटी के निर्देशों के अनुसार सर्वे को ठीक ढंग से पूरा किया जा सके।
कृष्णा नदी की बदहाली का मुद्दा केवल हालिया ड्रोन सर्वे से जुड़ा नहीं है। नदी में प्रदूषित पानी छोड़े जाने, औद्योगिक अपशिष्ट और अतिक्रमण को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लंबे समय से शिकायतें उठती रही हैं। वर्ष 2018 में प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट के मुताबि राष्ट्रीय हरित अधिकरण ने पश्चिमी यूपी की काली, हिंडन और कृष्णा नदियों के किनारे स्थित प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए थे। यह घटनाक्रम बताता है कि इन नदियों का प्रदूषण वर्षों से एनजीटी जैसे प्राधिकरण और नियामक संस्थाओं के संज्ञान में रहा है।
कृष्णा नदी को लेकर समय समय पर प्रकाशित स्थानीय मीडिया रिपोर्टों में एनजीटी के हस्तक्षेप के बाद सीवेज शोधन संयंत्रों की योजनाओं का उल्लेख मिलता है। सितंबर 2024 की एक रिपोर्ट में शामली, बनत, बंतीखेड़ा में 400 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित एसटीपी बनाने की योजना की जानकारी दी गई थी। उस समय रिपोर्ट में योजनाओं की स्वीकृति के बावजूद निर्माण में देरी की बात कही गई थी। जून 2025 की रिपोर्ट में भी इन परियोजनाओं की प्रगति को लेकर सवाल उठाए गए थे।
शामली की कृष्णा नदी पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उन छोटी नदियों में शामिल है, जिनकी स्थानीय जल निकासी और कृषि व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका रही है। यह महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश से होकर बहने वाली बड़ी कृष्णा नदी से अलग है। इसका उद्गम सहारनपुर जिले में रामपुर मनिहारन के निकट प्राकृतिक जलस्रोत से होता है। इसके बाद यह सहारनपुर में नानौता क्षेत्र से गुजरती हुई चंदेनामाल के पास शामली जिले में प्रवेश करती है। इसके बाद यह जलालाबाद देहात, थानाभवन, बनत और शामली के आसपास के क्षेत्रों में प्रवाहित होती है। शामली जिले में नदी की लंबाई करीब 69 किलोमीटर है। इसे पश्चिमी यूपी की कृष्णा या कृष्णी नदी के नाम से भी जाना जाता है। इसका महत्व केवल इसके पानी तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसके किनारे की जमीन, बरसात में पानी फैलने वाले क्षेत्र और आसपास के प्राकृतिक जल निकासी मार्ग भी स्थानीय पारिस्थिति तंत्र का हिस्सा हैं। इसलिए नदी के बाढ़ मैदान का निर्धारण करते समय केवल वर्तमान जलधारा की चौड़ाई देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पूरे पारिस्थितिक तंत्र का भी सर्वे करने की भी जरूरत है।
कृष्णा नदी की बदहाली के पीछे मुख्य रूप से दो तरह की समस्याएं हैं। पहली समस्या नदी के प्राकृतिक क्षेत्र पर अतिक्रमण की है। दूसरी समस्या घरेलू सीवेज तथा औद्योगिक अपशिष्ट से होने वाले प्रदूषण के कारण नदी के गंदा होकर सूखते जाने की है। स्थानीय मीडिया रिपोर्ट के अनुसार नदी के किनारों पर खेती किए जाने और जमीन पर कब्जे की शिकायतें लंबे समय से सामने आती रही हैं। कुछ वर्ष पहले नदी के पुनर्जीवन के लिए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी हुई थी, लेकिन बाद में फिर से अवैध कब्जे कर लिए गए। इसके अलावा नदी की जमीन पर खेती किए जाने और गतिविधियों के विस्तार से भी उसका प्राकृतिक फैलाव प्रभावित हुआ है। इसके कारण बरसात के दौरान नदी में अधिक पानी आने पर उसके फैलने के लिए उपलब्ध जगह कम हो जाती है। इसलिए नदी के बाढ़ मैदान का निर्धारण जरूरी है। नदी में प्रदूषण की समस्या ने संकट को और गंभीर बना दिया है। शामली, थानाभवन और आसपास की बस्तियों के सीवेज तथा कुछ औद्योगिक अपशिष्ट के नदी में पहुंचने की रिपोर्ट प्रकाशित होती रही हैं। दिसंबर 2024 की एक रिपोर्ट में नदी के किनारों पर खेती और अतिक्रमण के अलावा इसमें अनट्रीटेड सीवेज छोड़े जाने की बात बताई गई है। इस तरह कृष्णा नदी का संकट केवल जलधारा के सिकुड़ने का नहीं, बल्कि उसके जल की गुणवत्ता और प्राकृतिक कामकाज के प्रभावित होने का भी है।
किसी भी नदी का बाढ़ मैदान वह प्राकृतिक क्षेत्र है, जहां नदी अधिक जलप्रवाह के दौरान अपने तटों से बाहर फैल सकती है। यह क्षेत्र नदी के लिए अतिरिक्त जगह उपलब्ध कराने के साथ-साथ जलभराव को नियंत्रित करने, तलछट के जमाव और नदी से जुड़े पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने में भी भूमिका निभाता है। बाढ़ मैदान को केवल खाली जमीन मानना सही नहीं है। उसका स्वरूप नदी के प्रवाह, आसपास की ऊंचाई, मिट्टी और जल निकासी व्यवस्था से तय होता है।
कृष्णा नदी के मामले में वैज्ञानिक निर्धारण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नदी के पुराने फैलाव वाले हिस्सों पर खेती, निर्माण या अन्य गतिविधियां हो गई हैं। ऐसे में केवल आज दिखाई देने वाली जलधारा के आधार पर नदी की सीमा तय करने से उसके वास्तविक विस्तार को नही जाना जा सकता। बाढ़ मैदान के ड्रोन सर्वे से जमीन की ऊंचाई, भू-आकृति और आसपास के क्षेत्र की विस्तृत तस्वीरें जुटाकर नदी के वास्तविक विस्तार को जानने में मदद मिलेगी। हालांकि, सर्वे की तस्वीरें अपने आप कानूनी सीमा तय नहीं करतीं। वैज्ञानिक नक्शे का राजस्व अभिलेखों, उपलब्ध पुराने नक्शों और संबंधित विभागों के रिकॉर्ड से मिलान जरूरी होगा। इसके बाद ही यह स्पष्ट किया जा सकेगा कि कौन-सी जमीन नदी या उसके बाढ़ मैदान का हिस्सा है और कहां अतिक्रमण की कार्रवाई की जरूरत है।
सर्वे का सबसे महत्वपूर्ण संभावित परिणाम नदी की जमीन और उसके बाढ़ मैदान की स्पष्ट पहचान है। यदि वैज्ञानिक अध्ययन और राजस्व रिकॉर्ड के मिलान से यह साबित होता है कि किसी भूखंड पर नदी के प्राकृतिक क्षेत्र का अतिक्रमण है, तो प्रशासन के लिए आगे की कार्रवाई का आधार मजबूत हो जाएगा। इससे नदी के किनारे की जमीन को लेकर विवादों में भी तथ्यात्मक स्पष्टता आएगी। हालांकि, सर्वे के बाद भी कई सवालों का उत्तर जरूरी होगा। क्या बाढ़ मैदान की सीमा को प्रशासन औपचारिक रूप से अधिसूचित या चिह्नित करेगा? क्या नदी की जमीन पर खेती करने वालों और स्थायी निर्माण करने वालों के मामलों को अलग-अलग देखा जाएगा? क्या सीमांकन के बाद जमीन पर खंभे लगाकर सीमा स्पष्ट की जाएगी? और क्या संबंधित विभाग नदी के प्राकृतिक जलमार्ग को बहाल करने के लिए समयबद्ध कार्ययोजना बनाएंगे? इन सवालों के जवाब केवल ड्रोन सर्वे से नहीं मिलेंगे। इसके लिए जिला प्रशासन, सिंचाई विभाग, राजस्व विभाग और पर्यावरण से जुड़े अधिकारियों की समन्वित कार्रवाई की जरूरत होगी। एनजीटी के निर्देशों का वास्तविक प्रभाव भी इसी बात से तय होगा कि वैज्ञानिक नक्शे को जमीन पर संरक्षण की कार्रवाई में बदला जाता है या नहीं।
कृष्णा नदी को पूरी तरह से पुनर्जीवित करके अपने मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए में बाढ़ मैदान की बहाली के साथ प्रदूषण नियंत्रण भी जरूरी है। मीडिया रिपोर्ट में शामली के लिए 40 एमएलडी, थानाभवन के लिए 10 एमएलडी और बनत तथा बंतीखेड़ा के लिए पांच-पांच एमएलडी क्षमता वाले सीवेज शोधन संयंत्रों की योजनाओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में इन योजनाओं की स्वीकृत लागत क्रमशः 206.02 करोड़, 97.71 करोड़, 48.71 करोड़ और 55.47 करोड़ रुपये बताई गई थी। नदी की जमीन के अतिक्रमण मुक्त होने पर भी यदि घरेलू सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट बिना पर्याप्त ट्रीटमेंट के उसमें पहुंचते रहेंगे, तो उसका पारिस्थितिक तंत्र बहाल नहीं हो सकेगा। इसलिए एसटीपी बनाने के साथ ही नदी में गिर रहे सभी नालों को इन संयंत्रों से जोड़ना और संयंत्रों का संचालन नियमित रूप किया जाना भी नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए जरूरी होगा। इसलिए कृष्णा नदी की बहाल करने के लिए दोनों मोर्चों पर काम करना होगा। ऐसा करने पर ही नदी के प्राकृतिक क्षेत्र की रक्षा और पानी की गुणवत्ता में सुधार हो सकेगा।
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