शहरी इलाकों में सहायक नदियां और नाले अकसर अतिक्रमण का शिकार हो जाते हैं। इससे न केवल जल निकासी प्रभावित होती है, बल्कि भूजल के रिचार्ज में भी बाधा उत्‍पन्‍न होती है।  

 

फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल

नीतियां और कानून

सड़क या श्मशान जैसी सार्वजनिक ज़रूरतों के लिए प्राकृतिक जल मार्गों को नष्ट नहीं किया जा सकता : राजस्थान हाईकोर्ट

दौसा जिले की एक जनहित याचिका की सुनवाई में राजस्थान हाईकोर्ट की बेंच ने अपने फैसले में की महत्‍वपूर्ण टिप्‍पणी। राज्य सरकार को दिया अतिक्रमण हटाने का निर्देश

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

सड़क, पार्क, स्‍टेडियम या श्मशान जैसी सार्वजनिक ज़रूरतों की चीजें लोगों के लिए यकीनन जरूरी हैं, पर इनका विकास जल स्रोतों और प्राकृतिक जल मार्गों की बलि चढ़ाकर नहीं किया जाना चाहिए। यह महत्‍वपूर्ण बात राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने एक हालिया फैसले में कही है। कोर्ट ने यह टिप्‍पणी “गैर मुमकिन नाला” से संबंधित एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के बाद अपने फैसले में दर्ज़ की है। 

इस केस में राजस्थान हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि 'गैर मुमकिन नाला' यानी प्राकृतिक जल निकासी और जल प्रवाह का मार्ग का इस्तेमाल किसी भी ऐसे काम के लिए नहीं बदला जा सकता, जो उसके मूल स्वरूप से अलग हो, जैसे कि सड़क या श्मशान बनाना आदि। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक जल मार्गों को सिर्फ़ इस आधार पर क्षतिग्रस्‍त या नष्‍ट नहीं किया जा सकता कि वह कार्य किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किया जा रहा है।

क्या था पूरा मामला ?

दौसा जिले के खटवा गांव में राजस्व रिकॉर्ड में गैर मुमकिन नाला दर्ज भूमि पर सड़क और श्मशान से जुड़े निर्माण कर दिए गए थे। इसके खिलाफ जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने भी स्वीकार किया कि संबंधित भूमि राजस्व रिकॉर्ड में गैर मुमकिन नाला के रूप में दर्ज है। कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया कि गैर मुमकिन नाला पर बने सड़क, श्मशान और अन्य अतिक्रमणों को हटाकर भूमि को उसकी मूल स्थिति में बहाल किया जाए। कोर्ट ने स्‍पष्‍ट कहा कि सार्वजनिक उपयोगिता (Public Utility) के नाम पर प्राकृतिक जल मार्गों को नष्ट नहीं किया जा सकता। 

क्या होता है गैर मुमकिन नाला?

सरकार के राजस्व रिकॉर्ड (Revenue Records) में "गैर मुमकिन नाला" उस भूमि को कहा जाता है जो प्राकृतिक रूप से पानी के बहाव, निकासी (drainage) या वर्षाजल के प्रवाह के लिए निर्धारित होती है। "गैर मुमकिन" का अर्थ है ऐसी जमीन जिस पर सामान्य खेती या अन्य नियमित उपयोग संभव नहीं माना जाता, जबकि "नाला" प्राकृतिक जल मार्ग को दर्शाता है। यह केवल एक गड्ढा या सीवर लाइन नहीं होता, बल्कि किसी क्षेत्र की प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली का हिस्सा होता है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि गैर मुमकिन नाला एक प्राकृतिक जल प्रवाह और जल निकासी चैनल है, जो क्षेत्र की पारिस्थितिकी और हाइड्रोलॉजिकल सिस्टम का अभिन्न हिस्सा होता है। इसलिए इसका स्वरूप बदलकर सड़क, श्मशान, भवन या अन्य निर्माण नहीं किए जा सकते, भले ही उन्हें "सार्वजनिक हित" का काम बताया जाए। कोर्ट ने माना कि प्राकृतिक नालों को पाटने या उन पर निर्माण करने से:

  • वर्षाजल निकासी बाधित होती है,

  • बाढ़ का खतरा बढ़ता है,

  • भूजल रिचार्ज प्रभावित होता है,

  • पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ता है।

भूमि के उपयोग पर नहीं चलेगी सरकारी मनमानी

हाईकोर्ट ने “गैर मुमकिन नाला” का इस्तेमाल उसके रिकॉर्ड में दर्ज मूल स्वरूप से अलग कामों के लिए करने जैसे कि सड़क बनाना और श्मशान के लिए ज़मीन के इस्तेमाल की अनुमति देने के खिलाफ दायर की गई  एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सरकारी मनमानी के खिलाफ़ सख्‍त रवैया दिखाया। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह संबंधित ज़मीन सड़क, श्मशान के ढांचे या अतिक्रमण को हटाए। साथ ही जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की डिवीज़न बेंच ने टिप्पणी की कि राज्य सरकार प्राकृतिक जल मार्गों के संरक्षण के प्रति अपने वैधानिक और संवैधानिक दायित्वों को निभाने में नाकाम रही है।

याचिका में यह तर्क दिया गया कि गैर मुमकिन नाला, जो कि एक प्राकृतिक जल मार्ग है, उसका इस्तेमाल किसी भी ऐसे काम के लिए नहीं किया जा सकता, जिसकी क़ानूनी तौर पर अनुमति न हो। यह भी तर्क दिया गया कि राज्य सरकार का यह काम क़ानून के ख़िलाफ़ था और पर्यावरण संरक्षण तथा प्राकृतिक संसाधनों के बचाव से जुड़े संवैधानिक आदेश का उल्लंघन था।

राज्य सरकार की ‘सार्वजनिक उपयोग' की दलील हुई खारिज

दूसरी ओर, राज्य सरकार के वकील ने तर्क दिया कि सड़क और श्मशान का विकास सार्वजनिक उपयोगिता के उद्देश्यों के लिए किया गया। इसलिए इस मामले में कोर्ट के किसी भी हस्तक्षेप की ज़रूरत नहीं थी। हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकार के तर्क को ख़ारिज करते हुए यह राय दी कि संबंधित ज़मीन, जो कि एक प्राकृतिक जल निकासी और जल प्रवाह का मार्ग है, उस क्षेत्र के पारिस्थितिक ढांचे और जल-प्रणाली का एक अभिन्न अंग है। ऐसी ज़मीनों का इस्तेमाल किसी भी ऐसे काम के लिए नहीं किया जा सकता, जो उनके मूल स्वरूप से अलग हो, भले ही वह काम किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए ही क्यों न हो।

जल निकायों, प्राकृतिक जल-निकास मार्गों, जलग्रहण क्षेत्रों और पारंपरिक जल-मार्गों का संरक्षण राजस्थान जैसे राज्य में और भी अधिक महत्व रखता है, जहां की पारिस्थितिक स्थितियां और जल की कमी, प्रत्येक प्राकृतिक जल संसाधन के संरक्षण को बेहद ज़रूरी बना देती हैं। किसी भी प्राकृतिक जल-मार्ग में कोई भी रुकावट या बदलाव, जल-निकास के तरीकों, भूजल पुनर्भरण और पर्यावरणीय संतुलन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने की क्षमता रखता है।
राजस्‍थान हाईकोर्ट

शहरों के आसपास मौजूद छोटी नदियां, सहायक नदियां और नाले बड़ी नदियों को पानी देने के साथ ही भूजल स्‍तर को बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। पर अंधाधुंध और अनियोजित तरीके से हो रहा शहरी विस्‍तार इन महत्‍वपूर्ण जलस्रोतों को निगलता जा रहा है। 

प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक के रूप में काम करे सरकार

न्यायालय ने  संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण के अधिकार, और अनुच्छेद 48-A तथा 51-A के तहत कर्तव्यों पर ज़ोर देते हुए कहा कि 'लोक न्यास सिद्धांत' (Public Trust Doctrine) राज्य को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षक के रूप में कार्य करने के लिए बाध्य करता है। साथ ही आम जनता और आने वाली पीढ़ियों के लाभ के लिए इन संसाधनों के संरक्षण को अनिवार्य बनाता है। न्यायालय ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों के विनाश की कीमत पर 'लोक उपयोगिता' (Public Utility) को प्राप्त नहीं किया जा सकता, जबकि राज्य इन संसाधनों के संरक्षण के लिए संवैधानिक और कानूनी रूप से बाध्य है। कोर्ट ने यह माना कि प्रशासनिक सुविधा या विकास संबंधी दबाव, किसी ऐसे कार्य को वैध नहीं ठहरा सकते, जो अन्यथा कानून की दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हों औरजो पारिस्थितिक संतुलन को नष्ट करने वाले हों। इन सख्‍त टिप्‍पणियों के साथ कोर्ट ने राज्य को निर्देश दिया गया कि वह प्राकृतिक जल मार्गों वाली भूमि पर किए गए किसी भी निर्माण या अतिक्रमण को हटाए। साथ ही उस भूमि को उसकी मूलप्रकृति के अनुरूप ही सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज करे।

जब तक प्राकृतिक जल निकायों (Water Bodies) और जल मार्गों को पूरी लगन से सुरक्षित और संरक्षित नहीं किया जाता, तब तक आम नागरिक के गरिमापूर्ण और टिकाऊ जीवन का अधिकार गंभीर ख़तरे में बना रहेगा। हालांकि बढ़ते शहरीकरण, विकास विस्तार और जनसंख्या के दबाव के कारण ज़मीन के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग तरह की मांगें उठ सकती हैं, लेकिन ऐसे कारणों के आधार पर उन कामों को सही नहीं ठहराया जा सकता जो क़ानून के ख़िलाफ़ हों और जो पारिस्थितिक संतुलन को बिगाड़ते हों।
राजस्थान हाईकोर्ट

पर्यावरणीय दृष्टि से यह फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

भारत के कई शहरों और गांवों में प्राकृतिक नालों, तालाबों और जल निकासी मार्गों पर अतिक्रमण कर निर्माण कर दिए गए हैं। इसके परिणामस्वरूप थोड़ी सी भारी बारिश में भी जलभराव और शहरी बाढ़ की घटनाएं बढ़ रही हैं। राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि प्राकृतिक जल मार्ग केवल खाली पड़ी जमीन नहीं हैं, बल्कि जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण की बुनियादी संरचना हैं।

आपके जल एवं पर्यावरण विषयक लेख के लिए यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण हो सकता है कि कैसे राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज गैर मुमकिन नाले को भी न्यायालय ने एक मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन माना और उसके संरक्षण को संविधान के अनुच्छेद 21 (स्वच्छ एवं स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार) से जोड़ा।

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