अक्षय ऊर्जा तकनीक का उपयोग करते हुए सौर ऊर्जा से जल आपूर्ति संयंत्र को चलाने का एक मॉडल।

 

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नीतियां और कानून

सूरज, हवा, पानी और धरती की गर्मी से बनी अक्षय ऊर्जा से प्रदूषण पर लगेगी लगाम

देश में मनाया गया अक्षय ऊर्जा दिवस : दोबारा इस्‍तेमाल योग्‍य संसाधनों से बिजली बनाकर ही पूरी हो सकेंगी दुनिया की तेजी से बढ़ती ऊर्जा जरूरतें

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

देश की अर्थव्‍यवस्‍था को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए सबसे ज़रूरी चीज है बिजली, क्‍योंकि बिजली से ही उद्योग-धंधे और अन्‍य आर्थिक क्रिया-कलाप चलते हैं। इसलिए आर्थिक रफ्तार को बनाए रखने के लिए देश में बिजली उत्‍पादन को भी उसी गति से बढ़ाना ज़रूरी है। पर, चिंता की बात यह है कि भारत आज भी बिजली उत्‍पादन का एक बड़ा हिस्‍सा विदेशों से आयात होने वाले कोयले जैसे जीवाश्‍मम ईंधन से चलने वाले थर्मल पावर प्‍लांट्स से प्राप्‍त करता है। इससे न केवल देश पर एक बड़ा अतिरिक्‍त आर्थिक बोझ पड़ रहा है, बल्कि यह ग्रीनहाउस गैसों के कारण वायु प्रदूषण और तापमान वृद्धि का भी एक बड़ा कारण बन रहा है। इसका सस्‍ता और सरल समाधान है अक्षय ऊर्जा यानी दोबारा इस्‍तेमाल योग्‍य संसाधनों से बिजली बनाना। इससे न केवल बिजली की लागत कम होती है, बल्कि यह प्रदूषण की समस्‍या से निजात पाने में भी काफी सहायक है। इसीलिए देश में अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने और लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए हर साल 20 अगस्‍त को अक्षय ऊर्जा दिवस मनाया जाता है। इसी कड़ी में इस साल भी 20 अगस्त को देश में अक्षय ऊर्जा दिवस मनाया गया। 

भारत में अक्षय ऊर्जा दिवस की शुरुआत 2004 में की गई थी। तत्कालीन गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय ने देश में अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के योगदान को देखते हुए 20 अगस्त को उनकी जयंती के अवसर पर अक्षय ऊर्जा के प्रति जन-जागरूकता का दिवस बनाने का फैसला किया था। 2004 में दिल्ली में करीब 12 हजार स्कूली बच्चों ने मानव शृंखला बनाकर इस अभियान की शुरुआत की गई थी। आज अक्षय ऊर्जा दिवस केवल जागरूकता का अवसर नहीं है। यह उस ऊर्जा बदलाव को समझने का दिन है, जो दुनिया की अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और ऊर्जा सुरक्षा तीनों को बदल रहा है। जिस बिजली के लिए कभी कोयला, तेल और गैस पर निर्भरता जरूरी मानी जाती थी, उसका बड़ा हिस्सा अब सूरज, हवा, पानी, जैविक पदार्थ और धरती की अंदरूनी गर्मी से पैदा किया जा रहा है।

अक्षय ऊर्जा क्या है और इसे ‘अक्षय’ क्यों कहा जाता है?

अक्षय ऊर्जा ऐसी ऊर्जा है, जिसका उत्‍पादन ऐसे संसाधनों से किया जाता है जिन्‍हें एक बार इस्‍तेमाल करने के बाद दोबारा भी यानी बार-बार इस्‍तेमाल करके बिजली बनाई जा सकती है। इस तरह इस्‍तेमाल के बाद भी ऊर्जा उत्‍पादन करने वाला संसाधन इस्‍तेमाल करने के बाद भी खत्‍म नहीं होता। इसीलिए इसे ‘अक्षय’ ऊर्जा कहा जाता है। मिसाल के तौर पर सूर्य लगातार ऊर्जा दे रहा है, हवा चलती रहती है, जलचक्र के कारण नदियों में पानी आता रहता है, जिससे इनसे बार-बार बिजली बनाई जा सकती है। इसी कारण इन्हें Renewable Energy यानी नवीकरणीय या अक्षय ऊर्जा कहा जाता है। इसी तरह पेड़-पौधों और कृषि अवशेषों से जैविक पदार्थ बनते ही रहते हैं और पृथ्वी के भीतर लगातार भी गर्मी मौजूद रहता है, जिससे भूतापीय ऊर्जा बनाई जाती है। 

इसके विपरीत कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस बनने में लाखों-करोड़ों वर्ष लगते हैं। इनका भंडार सीमित है और इनके जलने से बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड तथा अन्य प्रदूषक निकलते हैं। हालांकि अक्षय ऊर्जा को पूरी तरह पर्यावरणीय प्रभाव से मुक्त मानना भी सही नहीं होगा। बड़े बांधों से नदियों और पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है, सौर परियोजनाओं के लिए भूमि की जरूरत होती है, पवन टर्बाइनों से पक्षियों और चमगादड़ों पर प्रभाव पड़ सकता है तथा सौर पैनल, बैटरी और टर्बाइन बनाने के लिए खनिज संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था का लक्ष्य केवल अधिक अक्षय ऊर्जा लगाना नहीं, बल्कि कम पर्यावरणीय प्रभाव वाली अक्षय ऊर्जा व्यवस्था तैयार करना है।

दुनिया में अक्षय ऊर्जा की शुरुआत कब हुई?

अक्षय ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली के आविष्कार से बहुत हो चुका था। मनुष्य हजारों साल से लकड़ी और अन्य जैविक पदार्थ जलाकर ऊर्जा प्राप्त करता रहा है। पानी के पहियों का इस्तेमाल अनाज पीसने और यांत्रिक कामों के लिए तथा पवनचक्कियों का इस्तेमाल सिंचाई और अनाज पीसने के लिए होता रहा है।

लेकिन अगर सवाल यह हो कि अक्षय स्रोत से बिजली पैदा करने वाला पहला आधुनिक बिजली संयंत्र कौन सा था, तो इसका जवाब जलविद्युत में मिलता है। 30 सितंबर 1882 को अमेरिका के विस्कॉन्सिन राज्य के एपलटन में फॉक्स नदी पर Vulcan Street Plant ने काम शुरू किया। इसकी क्षमता करीब 12.5 किलोवाट थी। पानी के पहिए से घूमने वाली मशीन ने जनरेटर चलाया और दो पेपर मिलों तथा एक घर को बिजली उपलब्ध कराई। अमेरिकी सोसायटी ऑफ मैकेनिकल इंजीनियर्स इसे दुनिया के शुरुआती केंद्रीय जलविद्युत स्टेशनों में महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानती है।

इसके बाद अक्षय ऊर्जा की दूसरी तकनीकें तेजी से विकसित हुईं। 1887 में स्कॉटलैंड के इंजीनियर जेम्स ब्लाइथ ने बिजली पैदा करने वाली पवन टर्बाइन बनाई। यह टर्बाइन उनके मैरीकिर्क स्थित घर में बिजली और बैटरी चार्ज करने के लिए इस्तेमाल हुई।

सौर बिजली के क्षेत्र में 1982 के अंत में अमेरिका के कैलिफोर्निया में ARCO Solar का 1 मेगावाट का Lugo/Hesperia Solar Plant पहला 1-MW स्तर का सौर पार्क बना।

भूतापीय बिजली का पहला प्रयोग इटली के Larderello में 1904 में हुआ, जब भूतापीय भाप से बिजली बनाकर कुछ बल्ब जलाए गए। 1913 में वहीं 250 किलोवाट का दुनिया का पहला वाणिज्यिक भूतापीय बिजली संयंत्र स्थापित हुआ।

इस तरह आधुनिक अक्षय बिजली का इतिहास एक ही तकनीक की कहानी नहीं है, बल्कि पानी, हवा, धरती की गर्मी और सूरज की ऊर्जा को बिजली में बदलने की लगातार विकसित होती तकनीकों का इतिहास है।

भारत में अक्षय ऊर्जा की शुरुआत

भारत में अक्षय ऊर्जा के आधुनिक बिजली उत्पादन का इतिहास भी काफी पुराना है। 10 नवंबर 1897 को पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग के पास सिद्रापोंग हाइडल पावर स्टेशन शुरू हुआ। इसकी शुरुआती क्षमता 2×65 किलोवाट यानी 130 किलोवाट थी। इसे भारत का सबसे पुराना जलविद्युत बिजली स्टेशन माना जाता है।

बाद में भारत ने सौर, पवन, बायोमास और छोटी जलविद्युत परियोजनाओं पर भी काम शुरू किया। 1970 के दशक के तेल संकटों के बाद ऊर्जा आत्मनिर्भरता भारत की अक्षय ऊर्जा नीति का एक महत्वपूर्ण आधार बनी। 1981 में Commission for Additional Sources of Energy (CASE) बनाया गया और 1982 में Department of Non-Conventional Energy Sources (DNES) अस्तित्व में आया। 1992 में यह मंत्रालय बना और 2006 में इसका नाम Ministry of New and Renewable Energy यानी MNRE रखा गया।

भारत में अक्षय ऊर्जा की मौजूदा स्थिति

भारत अब दुनिया के प्रमुख अक्षय ऊर्जा बाजारों में शामिल है। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार 31 जुलाई 2026 तक भारत की कुल अक्षय ऊर्जा स्थापित क्षमता 291.73 GW थी। इसमें बड़े जलविद्युत संयंत्र भी शामिल हैं। केवल बड़े जलविद्युत को छोड़कर अक्षय ऊर्जा क्षमता 239.66 GW थी।

स्रोतभारत में स्थापित क्षमता, 31 जुलाई 2026
सौर ऊर्जा164.59 GW
पवन ऊर्जा58.14 GW
बड़े जलविद्युत52.06 GW
बायोमास खोई सह-उत्पादन9.82 GW
छोटी जलविद्युत5.18 GW
बायोमास गैर-खोई सह-उत्पादन1.05 GW
वेस्ट-टू-एनर्जी0.32 GW
ऑफ-ग्रिड वेस्ट-टू-एनर्जी0.55 GW
कुल अक्षय ऊर्जा291.73 GW

सौर ऊर्जा अब भारत के अक्षय ऊर्जा विस्तार का सबसे बड़ा आधार बन चुकी है। जुलाई 2026 तक अकेले सौर क्षमता करीब 164.6 GW थी।

दुनिया के स्तर पर भी तस्वीर तेजी से बदल रही है। IRENA के अनुसार 2025 के अंत तक वैश्विक अक्षय बिजली क्षमता 5,149 GW पहुंच गई और अकेले 2025 में 692 GW नई क्षमता जुड़ी। इसमें सौर ऊर्जा की हिस्सेदारी सबसे ज्यादा रही।

अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोतों से कैसे बनती है बिजली?

1. सौर ऊर्जा

सौर पैनल में लगे फोटोवोल्टिक सेल सूर्य के प्रकाश को सीधे बिजली में बदलते हैं। जब सूर्य की रोशनी सेल पर पड़ती है तो उसमें मौजूद अर्धचालक पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों की गति पैदा होती है और विद्युत धारा बनती है। इन्वर्टर इस बिजली को ग्रिड या घरेलू उपकरणों के लिए उपयोगी रूप में बदलता है। सूर्य की गर्मी से बिजली बनाने के लिए Concentrated Solar Power (CSP) तकनीक भी इस्तेमाल होती है। इसमें दर्पण सूर्य की किरणों को एक स्थान पर केंद्रित करके किसी तरल पदार्थ को गर्म करते हैं। उससे भाप बनती है और भाप टर्बाइन चलाती है। दुनिया में सौर ऊर्जा का सबसे बड़ा उत्पादक देश चीन है। 2025 में चीन ने अकेले करीब 370 GW सौर PV क्षमता जोड़ी। दुनिया का सबसे बड़ा परिचालन सिंगल-साइट PV संयंत्र फिलहाल चीन के शिनजियांग स्थित Midong Solar Project को माना जाता है, जिसकी क्षमता करीब 3.5 GW है। भारत में गुजरात का खावड़ा रिन्यूएबल एनर्जी पार्क इससे कहीं बड़े पैमाने का हाइब्रिड सौर-पवन प्रोजेक्ट है। इसकी अंतिम नियोजित क्षमता 30 GW है और मार्च 2026 तक वहां 9.4 GW क्षमता चालू हो चुकी थी।

2. पवन ऊर्जा

पवन टर्बाइन के ब्लेड हवा की गति से घूमते हैं। ब्लेड का घूर्णन एक शाफ्ट के जरिए जनरेटर को चलाता है और यांत्रिक ऊर्जा बिजली में बदल जाती है। चीन पवन ऊर्जा में भी दुनिया का सबसे बड़ा देश है। 2025 के अंत तक चीन की संचयी पवन क्षमता 691 GW से अधिक बताई गई है। दुनिया के सबसे बड़े पवन ऊर्जा समूहों में चीन का Gansu Wind Farm प्रमुख है। इसकी नियोजित/विस्तारित क्षमता लगभग 30 GW है। यह एक अकेली टर्बाइन या एकल संयंत्र के बजाय बड़े पवन फार्मों का समूह है।

भारत में तमिलनाडु का मुप्पंडल विंड फार्म प्रमुख है। इसकी स्थापित क्षमता करीब 1,500 MW है।

3. जलविद्युत

जलविद्युत में बहते या ऊंचाई से गिरते पानी की स्थितिज और गतिज ऊर्जा का इस्तेमाल किया जाता है। पानी टर्बाइन को घुमाता है और टर्बाइन जनरेटर से जुड़ी होती है। इस तरह पानी की ऊर्जा बिजली में बदल जाती है। जलविद्युत आज भी दुनिया की सबसे बड़ी अक्षय बिजली तकनीकों में से एक है। 2024 में हाइड्रोपावर ने दुनिया की करीब 14% बिजली पैदा की थी। जलविद्युत उत्पादन में चीन दुनिया में सबसे आगे है। दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत संयंत्र चीन का थ्री गॉर्जेस डैम है, जिसकी स्थापित क्षमता करीब 22.5 GW है। भारत में कोयना जलविद्युत परियोजना, महाराष्ट्र सबसे बड़ी पूर्ण हो चुकी जलविद्युत परियोजनाओं में है, जिसकी क्षमता करीब 1,960 MW है।

4. बायोमास ऊर्जा

बायोमास में लकड़ी, कृषि अवशेष, गन्ने की खोई, फसल का कचरा, पशु अपशिष्ट और अन्य जैविक पदार्थ शामिल होते हैं। इन्हें सीधे जलाकर भाप बनाई जा सकती है। भाप टर्बाइन चलाकर बिजली पैदा करती है। दूसरी तकनीक में बायोमास का गैसीकरण किया जाता है, जिससे ज्वलनशील गैस बनती है और उसे इंजन या टर्बाइन में इस्तेमाल करके बिजली बनाई जाती है। बायोगैस से भी जनरेटर चलाए जा सकते हैं। दुनिया में बायोएनर्जी की स्थापित क्षमता 2025 के अंत में करीब 154 GW थी। 2025 में इसकी नई क्षमता वृद्धि में जापान, चीन और ब्राजील प्रमुख रहे। बड़े बायोमास बिजली संयंत्रों में ब्रिटेन का Drax Power Station उल्लेखनीय है। इसके चार बायोमास यूनिटों की कुल क्षमता करीब 2.6 GW है। भारत में बायोमास परियोजनाएं अपेक्षाकृत छोटी और विकेंद्रीकृत हैं। उपलब्ध संयंत्र डेटाबेस में राजस्थान का Jaisalmer Godawari करीब 50 MW का बड़ा बायोमास संयंत्र दर्ज है।

5. ज्वारीय और समुद्री ऊर्जा

समुद्र में ऊर्जा के कई रूप हैं। ज्वारीय ऊर्जा में चंद्रमा और सूर्य के गुरुत्वाकर्षण से पैदा होने वाले ज्वार-भाटे का इस्तेमाल किया जाता है। बांध जैसे बैराज बनाकर पानी को नियंत्रित किया जाता है और उसके आने-जाने से टर्बाइन घुमाई जाती हैं। दूसरी तकनीक में समुद्री धाराओं के भीतर पानी के नीचे टर्बाइन लगाई जाती हैं। समुद्री लहरों से भी ऊर्जा निकाली जा सकती है। इसमें लहरों की ऊपर-नीचे होने वाली गति को यांत्रिक ऊर्जा और फिर बिजली में बदला जाता है। फ्रांस का La Rance Tidal Power Station 1966 में शुरू हुआ और इसकी क्षमता 240 MW थी। बाद में दक्षिण कोरिया का Sihwa Lake Tidal Power Station 254 MW की क्षमता के साथ दुनिया का सबसे बड़ा ज्वारीय बिजली संयंत्र बन गया। भारत में समुद्री ऊर्जा की संभावनाएं गुजरात की खंभात और कच्छ की खाड़ी तथा पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में हैं। हालांकि भारत में अभी बड़े पैमाने का व्यावसायिक ज्वारीय बिजली संयंत्र स्थापित नहीं है। 2002 में सरकार ने संसद में स्पष्ट किया था कि देश में तब तक कोई tidal power plant स्थापित नहीं हुआ था।

6. भू-तापीय ऊर्जा

पृथ्वी के भीतर मौजूद गर्मी से गर्म पानी और भाप बनती है। जब यह भाप सतह पर लाई जाती है तो सीधे टर्बाइन घुमा सकती है। कुछ परियोजनाओं में गर्म पानी को कम दबाव वाले वातावरण में लाकर भाप बनाई जाती है, जबकि अन्य में गर्म पानी की ऊष्मा को दूसरे द्रव में स्थानांतरित कर टर्बाइन चलाई जाती है। भू-तापीय बिजली का पहला व्यावसायिक संयंत्र 1913 में इटली के Larderello में 250 किलोवाट क्षमता के साथ शुरू हुआ था। आज अमेरिका दुनिया में भू-तापीय बिजली क्षमता में सबसे आगे है। 2025 के अंत में उसकी क्षमता करीब 3.95 GW थी। अमेरिका के कैलिफोर्निया में The Geysers दुनिया का सबसे बड़ा विकसित भू-तापीय विद्युत परिसर है। वहां कई संयंत्र मिलकर बिजली पैदा करते हैं। भारत में हिमाचल प्रदेश का मणिकरण, लद्दाख का पुगा और छत्तीसगढ़ का तातापानी जैसे क्षेत्र भू-तापीय ऊर्जा की संभावनाओं के लिए जाने जाते हैं, लेकिन भारत में इसकी व्यावसायिक क्षमता अभी बहुत सीमित है।

एक नजर में: दुनिया में अक्षय ऊर्जा उत्‍पादन की स्थिति

ऊर्जा स्रोतप्रमुख उत्पादक देशप्रमुख/सबसे बड़ा संयंत्र या परियोजनाक्षमता
सौर ऊर्जाचीनMidong Solar Project, चीनलगभग 3.5 GW
पवन ऊर्जाचीनGansu Wind Farm, चीनलगभग 30 GW
जलविद्युतचीनThree Gorges, चीनलगभग 22.5 GW
बायोमासचीन, ब्राजील, जापान आदिDrax Power Station, ब्रिटेनलगभग 2.6 GW
ज्वारीय ऊर्जादक्षिण कोरियाSihwa Lake, दक्षिण कोरिया254 MW
भू-तापीय ऊर्जाअमेरिकाThe Geysers, कैलिफोर्नियाबहु-संयंत्र परिसर

यहां "सबसे बड़ा" अलग-अलग तकनीकों में स्थापित क्षमता, परिचालन क्षमता या परियोजना की नियोजित क्षमता के आधार पर अलग अर्थ रख सकता है। खासकर सौर और पवन में कई विशाल "पार्क" अनेक परियोजनाओं का समूह होते हैं।

नई तकनीकें बदल रही हैं अक्षय ऊर्जा की तस्वीर

अक्षय ऊर्जा की अगली क्रांति केवल बड़े सौर और पवन पार्कों की नहीं होगी। सोलर प्लस बैटरी, हाइब्रिड सौर-पवन परियोजनाएं, फ्लोटिंग सोलर, एग्रीवोल्टिक्स, समुद्र में तैरते पवन संयंत्र, आधुनिक भू-तापीय तकनीक और AI आधारित स्मार्ट ग्रिड इस बदलाव को आगे बढ़ा रहे हैं।

सबसे महत्वपूर्ण बदलाव ऊर्जा भंडारण में हो रहा है। बैटरी की कीमत और क्षमता में सुधार से दिन में पैदा हुई सौर बिजली को रात में इस्तेमाल करना संभव हो रहा है। IRENA के अनुसार 2025 तक सौर-पवन और बैटरी स्टोरेज को मिलाकर चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराना कई अच्छे संसाधन वाले क्षेत्रों में जीवाश्म ईंधन के मुकाबले प्रतिस्पर्धी हो चुका है।

सौर ऊर्जा में बाइफेशियल पैनल दोनों तरफ से प्रकाश लेकर उत्पादन बढ़ा सकते हैं। ट्रैकिंग सिस्टम पैनलों को सूर्य की दिशा के अनुसार घुमाते हैं। फ्लोटिंग सोलर पानी की सतह का इस्तेमाल करता है, जबकि एग्रीवोल्टिक्स में एक ही जमीन पर खेती और सौर बिजली उत्पादन को जोड़ा जाता है।

भविष्य की एक और महत्वपूर्ण तकनीक ग्रीन हाइड्रोजन है। अक्षय बिजली से पानी का इलेक्ट्रोलिसिस करके हाइड्रोजन बनाई जाती है। इसका इस्तेमाल इस्पात, उर्वरक, रिफाइनरी, जहाजरानी और उन उद्योगों में किया जा सकता है जहां सीधे बिजली का इस्तेमाल कठिन है।

भूतापीय क्षेत्र में Enhanced Geothermal Systems यानी EGS जैसी तकनीकें उन क्षेत्रों से भी धरती की गर्मी निकालने की संभावना पैदा कर रही हैं जहां प्राकृतिक रूप से गर्म पानी या भाप आसानी से उपलब्ध नहीं है।

अक्षय ऊर्जा के एक स्रोत के रूप में समुद्र की लहरों और ज्‍वार-भाटा के वेग से बिजली बनाने की तकनीक भी तेजी से लोकप्रिय हो रही है। 

अक्षय ऊर्जा के कुछ कम प्रचलित भविष्‍यवादी तरीके

मुख्यधारा की सौर, पवन, जलविद्युत और बायोमास के अलावा कई ऐसी कम प्रचलित या उभरती ऊर्जा-तकनीकें हैं, जिन पर यूरोप, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया आदि देशों में पायलट या सीमित व्यावसायिक स्तर पर काम हो रहा है। इनमें से कई अभी बड़े बिजली संयंत्रों का विकल्प नहीं हैं, बल्कि स्थानीय या छोटे स्तर की बिजली के लिए उपयोगी हैं।

  • समुद्री लहरों से बिजली
    समुद्र की लहरों के ऊपर-नीचे होने या आगे-पीछे की गति को फ्लोटिंग डिवाइस और टर्बाइन के जरिए बिजली में बदला जाता है। यह तकनीक अभी मुख्यतः पायलट और प्रदर्शन परियोजनाओं के स्तर पर है।

  • ज्वार-भाटा और समुद्री धाराओं से बिजली
    ज्वार आने-जाने या समुद्री धाराओं के बहाव से पानी के नीचे लगी टर्बाइन घूमती हैं और जनरेटर बिजली बनाता है। ज्वारीय ऊर्जा समुद्री ऊर्जा की अपेक्षाकृत परिपक्व तकनीकों में है।

  • खारे पानी से ‘ब्लू एनर्जी’
    नदी के मीठे पानी और समुद्र के खारे पानी के बीच लवणता के अंतर से पैदा ऊर्जा को झिल्ली आधारित तकनीकों, जैसे Reverse Electrodialysis और Pressure-Retarded Osmosis, से बिजली में बदला जाता है। नीदरलैंड और फ्रांस में इसके प्रदर्शन संयंत्र लगाए गए हैं।

  • समुद्र के तापमान अंतर से बिजली (OTEC)
    समुद्र की सतह के गर्म पानी और गहराई के ठंडे पानी के तापमान अंतर का इस्तेमाल करके टर्बाइन चलाई जाती है। उष्णकटिबंधीय समुद्री क्षेत्रों में इसकी संभावना है, लेकिन अभी यह शुरुआती तकनीकी अवस्था में है।

  • सड़कों और स्पीड ब्रेकर से बिजली
    वाहनों के वजन और सड़क के कंपन से पैदा यांत्रिक ऊर्जा को पाइजोइलेक्ट्रिक, हाइड्रोलिक या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सिस्टम से बिजली में बदला जा सकता है। फिलहाल इसका उपयोग मुख्यतः सेंसर, स्ट्रीट लाइट और छोटे उपकरणों जैसी जरूरतों के लिए सीमित है।

  • लोगों के चलने से बिजली
    फर्श या फुटपाथ में लगाए गए पाइजोइलेक्ट्रिक पदार्थ पैरों के दबाव और कंपन को विद्युत ऊर्जा में बदलते हैं। ऐसी तकनीक का इस्तेमाल प्रयोगात्मक रूप से भीड़भाड़ वाले स्थानों में छोटे उपकरणों और लाइटिंग के लिए किया गया है।

  • चुंबकीय/इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ऊर्जा हार्वेस्टिंग
    किसी सड़क, पुल या मशीन के कंपन से चुंबक और कॉइल के बीच सापेक्ष गति पैदा की जाती है, जिससे विद्युत धारा उत्पन्न होती है। इसे ‘फ्री एनर्जी’ नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ऊर्जा वास्तव में गति या कंपन से आती है और चुंबकीय प्रणाली उसे बिजली में बदलती है।

  • सड़क की गर्मी से बिजली
    धूप से गर्म हुई सड़क और अपेक्षाकृत ठंडी जमीन के बीच तापमान अंतर का इस्तेमाल थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर से छोटी मात्रा में बिजली बनाने के लिए किया जा सकता है। इसका संभावित उपयोग सड़क किनारे सेंसर और निगरानी उपकरणों में अधिक है।

  • वाहनों की हवा से बिजली
    तेज गति से गुजरती गाड़ियों से पैदा हवा के बहाव को छोटे विंड टर्बाइनों में भेजकर बिजली बनाई जा सकती है। इसे सड़क किनारे सेंसर, संकेतक और छोटे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के लिए इस्तेमाल करने पर शोध हो रहा है।

  • शरीर की गर्मी और हलचल से ऊर्जा
    इंसान के शरीर और आसपास के वातावरण के तापमान अंतर या शरीर की गति से बहुत कम मात्रा में बिजली हासिल की जा सकती है। यह मुख्यतः स्मार्टवॉच, स्वास्थ्य सेंसर और छोटे पहनने योग्य उपकरणों के लिए उपयोगी है, बड़े बिजली उत्पादन के लिए नहीं।

हालांकि इन वैकल्पिक तकनीकों का इस्‍तेमाल अपेक्षाकृ‍त बहुत ही छोटे पैमाने पर होने और इनकी लागत काफी अधिक होने के कारण इनको अभी सौर या पवन ऊर्जा के बराबर व्यावसायिक और व्‍यावहारिक विकल्प नहीं माना जा सकता। इनमें से कई का इस्‍तेमाल फिलहाल छोटी मात्रा में स्थानीय बिजली पैदा करने और बैटरी के बिना उपकरण चलाने जैसे कामों के लिए प्रायोगिक तौर पर ही किया जा रहा है। कम मात्रा में बिजली का उत्पादन और महंगा रखरखाव भी इसे काफी चुनौतीपूर्ण बताता है। फिर भी भविष्‍य की संभावनाओं के लिहाज़ से इन्‍हें पूर्णत: नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्‍योंकि इन तकनीकों पर हो रहे हालिया शोधों से इनकी लागत में कमी आने की संभावना है। खासकर, सड़क से ऊर्जा हासिल करने वाली तकनीकों की लागत काफी कम होने की उम्‍मीद है। ,

पवन चक्कियों और सोलर पैनलों के जरिये आज देश और दुनिया में सबसे ज्‍यादा अक्षय ऊर्जा का उत्‍पादन किया जा रहा है। 

जलवायु परिवर्तन के दौर में क्यों जरूरी है अक्षय ऊर्जा?

दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अब भी कोयला, तेल और गैस पर निर्भर है। इन्हें जलाने से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाता है। इसलिए बिजली उत्पादन को जीवाश्म ईंधन से हटाकर कम-कार्बन स्रोतों की ओर ले जाना जलवायु परिवर्तन से निपटने की केंद्रीय रणनीति है।

इस बदलाव का प्रभाव अब आंकड़ों में दिखाई दे रहा है। IEA के अनुसार 2025 में केवल सौर PV की तैनाती ने अनुमानित 1.5 अरब टन CO₂ के वार्षिक उत्सर्जन को टालने में योगदान दिया, जबकि पवन ऊर्जा से बचा उत्सर्जन करीब 1.1 अरब टन CO₂ था।

अक्षय ऊर्जा का फायदा केवल कार्बन उत्सर्जन कम करना नहीं है। इससे तेल और गैस के आयात पर निर्भरता घटती है, ऊर्जा की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलती है और ग्रामीण तथा दूरदराज क्षेत्रों में विकेंद्रीकृत बिजली उपलब्ध कराने का अवसर मिलता है।

लागत के मामले में भी अक्षय ऊर्जा ने बड़ा बदलाव किया है। IRENA के अनुसार 2025 में शुरू हुई utility-scale अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं में 90 प्रतिशत से अधिक परियोजनाओं से मिलने वाली बिजली नए जीवाश्म ईंधन संयंत्रों की तुलना में सस्ती थी।

रोजगार की दृष्टि से भी यह बड़ा क्षेत्र बन चुका है। IRENA और ILO के अनुसार 2024 में दुनिया में अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में कम से कम 1.66 करोड़ रोजगार थे।

अक्षय ऊर्जा की राह में चुनौतियां भी कम नहीं

अक्षय ऊर्जा की सबसे बड़ी और पहली चुनौती यह है कि सौर और पवन ऊर्जा हर समय उपलब्ध नहीं होती। रात में सौर बिजली नहीं बनती और बादल, बारिश या कम हवा उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए केवल अधिक सौर और पवन संयंत्र लगाना पर्याप्त नहीं है। इनके साथ बड़े पैमाने पर बैटरी स्टोरेज, पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज और मजबूत ट्रांसमिशन नेटवर्क भी चाहिए।

दूसरी बड़ी चुनौती ग्रिड है। जहां बिजली बनती है और जहां उसकी जरूरत है, वहां के बीच पर्याप्त ट्रांसमिशन क्षमता नहीं होने पर बिजली को ग्रिड में डालना मुश्किल हो जाता है। भारत में भी यह समस्या अब सामने आ रही है। अगस्त 2026 की एक Reuters रिपोर्ट के अनुसार भारत में ट्रांसमिशन क्षमता की कमी के कारण कुछ अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं की बिजली ग्रिड तक नहीं पहुंच पा रही है।

तीसरी चुनौती जमीन, पानी और जैव विविधता की है। बड़े सौर पार्कों के लिए भूमि, बड़े बांधों के लिए नदी घाटियां और पवन परियोजनाओं के लिए बड़े भूभाग की जरूरत होती है। इसलिए अक्षय ऊर्जा विस्तार को पर्यावरणीय योजना और स्थानीय समुदायों की भागीदारी के साथ आगे बढ़ाना होगा।

चौथी चुनौती बैटरी और सौर पैनल जैसे उपकरणों के लिए जरूरी खनिजों की आपूर्ति है। लिथियम, निकेल, कोबाल्ट, तांबा और दुर्लभ खनिजों की मांग बढ़ रही है। भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा इसलिए केवल तेल और गैस की उपलब्धता का सवाल नहीं होगी, बल्कि खनिज और तकनीकी आपूर्ति शृंखला की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी।

भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था कैसी होगी?

अक्षय ऊर्जा का भविष्य किसी एक स्रोत पर निर्भर नहीं होगा। दिन में सौर ऊर्जा, तेज हवा के समय पवन ऊर्जा, जरूरत के समय जलविद्युत और स्टोरेज, उपलब्ध संसाधनों के अनुसार बायोमास तथा कुछ क्षेत्रों में भू-तापीय और समुद्री ऊर्जा मिलकर एक बहु-स्रोत ऊर्जा व्यवस्था बनाएंगे।

दुनिया पहले ही इस दिशा में आगे बढ़ चुकी है। 2025 में वैश्विक अक्षय ऊर्जा क्षमता में 692 GW की वृद्धि हुई और कुल क्षमता 5,149 GW पहुंच गई। सौर ऊर्जा ने अकेले 511 GW से अधिक नई क्षमता जोड़ी।

भारत के लिए यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की ऊर्जा मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने वाली है। भारत के सामने चुनौती केवल इतनी नहीं है कि कितनी अक्षय क्षमता लगाई जाए। असली चुनौती यह है कि अक्षय बिजली को विश्वसनीय, सस्ती, चौबीसों घंटे उपलब्ध और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ ऊर्जा व्यवस्था में कैसे बदला जाए।

अक्षय ऊर्जा दिवस का असली संदेश इसलिए केवल यह नहीं है कि सूरज और हवा से बिजली बनती है। इसका बड़ा संदेश यह है कि ऊर्जा का भविष्य अब प्रकृति से लड़ने के बजाय प्रकृति की उपलब्ध शक्तियों के साथ काम करने में है। आने वाले दशकों में जिस देश के पास सस्ती अक्षय बिजली, मजबूत ग्रिड, ऊर्जा भंडारण, आधुनिक तकनीक और अपनी आपूर्ति शृंखला होगी, वही जलवायु संकट के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती का भी बेहतर सामना कर सकेगा।

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