सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरणीय मंजूरी के 'बैक डेट ग्रीन क्लीयरेंस' की व्यवस्था पर रोक लगा दी है।
स्रोत : पिक्सा
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में केंद्र सरकार की उस व्यवस्था को रद्द कर दिया है, जिसके तहत बिना पूर्व पर्यावरण मंजूरी (Prior Environmental Clearance) के शुरू हो चुकी परियोजनाओं को बाद में यानी 'एक्स पोस्ट फैक्टो' या पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने का रास्ता खुला था।
यह फैसला वनशक्ति और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (Vanashakti & Anr. v. Union of India & Ors.) (रिट याचिका (सिविल) संख्या 1394/2023 एवं संबद्ध मामलों) में सुनाया गया। सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने 29 जुलाई 2026 को निर्णय देते हुए 7 जुलाई 2021 के उस ऑफिस मेमोरेंडम को रद्द कर दिया, जो बिना पूर्व पर्यावरण मंजूरी शुरू परियोजनाओं को 'एक्स पोस्ट फैक्टो' पर्यावरणीय मंजूरी का रास्ता देता था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मूल सुरक्षा उपायों को महज एक कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के जरिये कमजोर नहीं किया जा सकता। यह फैसला न केवल पर्यावरणीय कानूनों की सख्ती को दोबारा स्थापित करता है, बल्कि उद्योगों को यह स्पष्ट संदेश भी देता है कि पहले नियमों का पालन करना होगा, बाद में राहत की उम्मीद नहीं की जा सकती।
भारत में लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण और विकास परियोजनाओं के बीच संतुलन को लेकर बहस चलती रही है। एक ओर सरकारें औद्योगिक विकास, आधारभूत ढांचे के विस्तार और निवेश आकर्षित करने को प्राथमिकता देती रही हैं, तो दूसरी ओर पर्यावरणविद लगातार यह सवाल उठाते रहे हैं कि यदि विकास की कीमत जंगलों, नदियों, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों को चुकानी पड़े तो वह टिकाऊ विकास नहीं कहा जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में इस बहस का सबसे विवादित पहलू रहा है, बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के शुरू हो चुकी परियोजनाओं को बाद में 'एक्स पोस्ट फैक्टो' (Ex Post Facto) यानी पिछली तारीख से पर्यावरणीय मंजूरी देने की व्यवस्था।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने इस व्यवस्था पर रोक लगाते हुए एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसे देश के पर्यावरणीय न्यायशास्त्र (Environmental Jurisprudence) में मील का पत्थर माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पर्यावरणीय कानूनों का मूल उद्देश्य किसी परियोजना के शुरू होने के बाद उसके नुकसान का हिसाब लगाना नहीं, बल्कि संभावित नुकसान को पहले ही रोकना है। इसलिए यदि कोई उद्योग, खनन परियोजना, निर्माण कार्य या अन्य विकास परियोजना बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के शुरू होती है, तो बाद में उसे मंजूरी देकर उस उल्लंघन को वैध नहीं बनाया जा सकता।
इस फैसले ने केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उद्योगों और सरकारी एजेंसियों को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि पर्यावरणीय नियम कोई औपचारिकता नहीं हैं। उन्हें परियोजना की शुरुआत से पहले पूरी गंभीरता के साथ लागू करना होगा। पर्यावरणविदों का मानना है कि इससे पिछले कुछ वर्षों में विकसित हो रही उस प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगेगा, जिसमें पहले निर्माण शुरू कर दिया जाता था और बाद में किसी न किसी प्रक्रिया के जरिए पर्यावरणीय मंजूरी हासिल कर ली जाती थी।
भारत में पर्यावरणीय मंजूरी की व्यवस्था पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 और पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना, 2006 के तहत संचालित होती है। इसका मूल सिद्धांत बिल्कुल स्पष्ट है—किसी भी ऐसी परियोजना, जिसका पर्यावरण पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है, उसे शुरू करने से पहले पर्यावरणीय मंजूरी लेना अनिवार्य होगा।
इस प्रक्रिया के तहत परियोजना का पर्यावरण प्रभाव आकलन (Environmental Impact Assessment) किया जाता है। विशेषज्ञ समिति परियोजना का परीक्षण करती है, प्रभावित क्षेत्र के लोगों से सार्वजनिक सुनवाई के माध्यम से राय ली जाती है और उसके बाद यह तय किया जाता है कि परियोजना को किन शर्तों के साथ मंजूरी दी जाए या उसे मंजूरी दी भी जाए अथवा नहीं।
लेकिन वर्ष 2021 में केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक ऑफिस मेमोरेंडम (Office Memorandum) जारी किया। इसके माध्यम से उन परियोजनाओं के लिए एक प्रक्रिया निर्धारित की गई, जो बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के पहले ही शुरू हो चुकी थीं। इन परियोजनाओं को पर्यावरणीय क्षति का आकलन, क्षतिपूरक उपायों और अन्य औपचारिकताओं के आधार पर बाद में मंजूरी मिलने की संभावना उपलब्ध कराई गई। इसे ही सामान्य भाषा में 'एक्स पोस्ट फैक्टो पर्यावरण मंजूरी' या 'बैक डेट ग्रीन क्लीयरेंस' कहा जाने लगा।
पर्यावरणविदों और कई सामाजिक संगठनों ने इस व्यवस्था का विरोध किया। उनका तर्क था कि यदि उद्योगों को यह भरोसा मिल जाए कि नियम तोड़ने के बाद भी अंततः मंजूरी मिल सकती है, तो पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी की पूरी व्यवस्था ही अर्थहीन हो जाएगी। इससे कानून का पालन करने वाले उद्योगों और नियमों की अनदेखी करने वालों के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा। इसी व्यवस्था को चुनौती देते हुए मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा।
मिर्ज़ापुर की मड़िहान तहसील की पत्थर खदान में पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन करते हुए खुदाई भूजल स्तर तक पहुंचने के बावजूद हो रहा खनन।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया फैसले में स्पष्ट किया कि पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी (Prior Environmental Clearance) केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच है। इसका उद्देश्य किसी परियोजना से होने वाले संभावित नुकसान का पहले ही आकलन करना और आवश्यक होने पर उसे रोकना या उसके लिए कड़ी शर्तें तय करना है।
अदालत ने कहा कि यदि किसी परियोजना को पहले ही शुरू होने दिया जाए और बाद में उसके लिए पर्यावरणीय मंजूरी दे दी जाए, तो पूरी पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में सार्वजनिक सुनवाई, विशेषज्ञों के मूल्यांकन और पर्यावरणीय जोखिमों के वैज्ञानिक आकलन जैसी प्रक्रियाएं महज कागजी औपचारिकता बनकर रह जाती हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी कहा कि पर्यावरणीय कानूनों की मूल भावना को किसी कार्यालय ज्ञापन (Office Memorandum) के माध्यम से बदला नहीं जा सकता। यदि किसी वैधानिक व्यवस्था में परिवर्तन करना हो, तो उसके लिए विधिक प्रक्रिया अपनानी होगी। प्रशासनिक आदेशों के जरिए पर्यावरणीय सुरक्षा मानकों को कमजोर नहीं किया जा सकता।
हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका यह निर्णय भविष्य में लागू होगा। यानी पहले से इस व्यवस्था के तहत दी गई मंजूरियां स्वतः निरस्त नहीं मानी जाएंगी। लेकिन आगे से बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के शुरू होने वाली परियोजनाओं को इस तरह का संरक्षण नहीं मिल सकेगा।
| तथ्य | जानकारी |
|---|---|
| मूल कानून | पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 |
| वर्तमान EIA व्यवस्था | EIA Notification, 2006 |
| पूर्व पर्यावरण मंजूरी (Prior EC) | परियोजना शुरू होने से पहले अनिवार्य |
| मंजूरी देने वाली संस्था | MoEFCC तथा SEIAA |
| किन परियोजनाओं पर लागू | खनन, ताप विद्युत, सीमेंट, रसायन, राजमार्ग, बंदरगाह, हवाई अड्डे, नदी घाटी, बड़े निर्माण आदि |
| EIA प्रक्रिया के प्रमुख चरण | स्क्रीनिंग, स्कोपिंग, EIA, सार्वजनिक सुनवाई, विशेषज्ञ समीक्षा, अंतिम मंजूरी |
| सार्वजनिक सुनवाई का उद्देश्य | प्रभावित लोगों की आपत्तियां और सुझाव |
| सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का प्रभाव | बिना पूर्व मंजूरी शुरू परियोजनाओं को एक्स पोस्ट फैक्टो राहत नहीं |
इस फैसले ने पर्यावरणीय मंजूरी की पूरी व्यवस्था को लेकर चार महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए हैं-
पहला और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि पर्यावरणीय मंजूरी परियोजना शुरू होने से पहले ही प्राप्त करनी होगी। परियोजना शुरू होने के बाद मंजूरी देकर नियमों के उल्लंघन को नियमित नहीं किया जा सकता।
दूसरा, अदालत ने स्पष्ट कर दिया कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को किसी कार्यालय ज्ञापन या प्रशासनिक आदेश के माध्यम से कमजोर नहीं किया जा सकता। यदि सरकार किसी नियम में बदलाव चाहती है, तो उसे वैधानिक प्रक्रिया अपनानी होगी।
तीसरा, यह निर्णय पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) व्यवस्था की विश्वसनीयता को मजबूत करता है। इससे सार्वजनिक सुनवाई, वैज्ञानिक मूल्यांकन और विशेषज्ञ समितियों की भूमिका पहले की तरह महत्वपूर्ण बनी रहेगी।
चौथा, यह फैसला उद्योगों के लिए एक स्पष्ट चेतावनी भी है कि भविष्य में पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन कर बाद में राहत पाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
इस निर्णय का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि एक कार्यालय ज्ञापन रद्द कर दिया गया है। इसका महत्व इसलिए कहीं अधिक है क्योंकि यह भारत में 'रोकथाम आधारित पर्यावरण संरक्षण' (Preventive Environmental Protection) के सिद्धांत को फिर से मजबूत करता है।
पर्यावरणीय मंजूरी का उद्देश्य किसी परियोजना से हुए नुकसान की भरपाई करना नहीं, बल्कि उस नुकसान को पहले ही रोकना है। उदाहरण के लिए यदि किसी खनन परियोजना के कारण हजारों पेड़ कट चुके हों, किसी नदी का प्राकृतिक प्रवाह बदल चुका हो या किसी दुर्लभ वन्यजीव का आवास नष्ट हो गया हो, तो बाद में पर्यावरणीय मंजूरी देने से उस क्षति की वास्तविक भरपाई संभव नहीं होती। यही कारण है कि पर्यावरणीय कानून पहले मूल्यांकन और बाद में परियोजना शुरू करने की व्यवस्था पर आधारित हैं।
पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा बनने लगी थी कि यदि कोई परियोजना बिना मंजूरी के भी शुरू हो जाए, तो बाद में जुर्माना, क्षतिपूरक योजना या अन्य शर्तें पूरी कर उसे वैध कराया जा सकता है। इससे पर्यावरणीय अनुपालन की संस्कृति कमजोर पड़ने का खतरा था। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने उस सोच पर स्पष्ट रोक लगाने का प्रयास किया है।
इस निर्णय का एक बड़ा संदेश यह भी है कि पर्यावरणीय कानून विकास विरोधी नहीं हैं, बल्कि सतत विकास के आधार हैं। यदि परियोजनाओं की योजना बनाते समय ही पर्यावरणीय जोखिमों का वैज्ञानिक आकलन कर लिया जाए, तो विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों के बीच बेहतर संतुलन स्थापित किया जा सकता है।
यूपी में लेदर पार्क को पर्यावरण मंजूरी पर फिर होगी सुनवाई उत्तर प्रदेश की लेदर पार्क परियोजना को मिली पर्यावरण मंजूरी का मामला एक बार फिर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) में सुना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनजीटी ने करीब 13 साल पुराने इस मामले को दोबारा सुनवाई के लिए बहाल किया है। यह मामला वर्ष 2013 में दायर याचिका से जुड़ा है, जिसमें उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम को वर्ष 2011 में मिली पर्यावरण मंजूरी को चुनौती दी गई थी। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 18 फरवरी को आदेश देते हुए एनजीटी के वर्ष 2020 के फैसले को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि पर्यावरण मंजूरी की जांच करने का अधिकार एनजीटी के पास है और सभी पक्षों को सुनवाई का पूरा मौका दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एनजीटी की प्रधान पीठ ने मामले को फिर से खोल दिया है। अधिकरण ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को तय की जाए।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ऐसे समय आया है, जब पिछले एक दशक के दौरान देश में कई बड़ी विकास परियोजनाओं को लेकर यह आरोप बार-बार लगाए गए कि पर्यावरणीय नियमों को विकास की राह में बाधा मानकर उनकी अनदेखी की गई। कई मामलों में पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और स्थानीय समुदायों ने सवाल उठाए कि परियोजनाओं के पर्यावरणीय प्रभावों का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया गया या आवश्यक प्रक्रियाओं को जल्दबाजी में पूरा किया गया। वहीं, कई परियोजनाएं न्यायालयों और राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंचीं।
इन उदाहरणों ने यह चिंता पैदा की कि यदि नियमों के उल्लंघन के बाद भी परियोजनाओं को राहत मिलने लगेगी, तो पर्यावरणीय कानूनों का निवारक स्वरूप धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाएगा। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था को समाप्त करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस व्यापक प्रवृत्ति पर भी रोक लगाने का प्रयास है, जिसमें पहले काम शुरू करने और बाद में वैधानिक मंजूरी लेने की मानसिकता विकसित होती दिखाई दे रही थी।
अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, हवाई अड्डा, टाउनशिप और बिजली संयंत्र जैसी परियोजनाओं को लेकर देश-विदेश के पर्यावरण वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंताएं जताईं। इस परियोजना के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई, दुर्लभ उष्णकटिबंधीय वर्षावनों पर संभावित प्रभाव, समुद्री जैव विविधता, चमड़े की पीठ वाले कछुओं (Leatherback Turtle) के प्रजनन स्थलों तथा आदिम जनजातियों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सवाल उठे। आलोचकों का कहना था कि इतनी संवेदनशील पारिस्थितिकी वाले क्षेत्र में पर्यावरणीय जोखिमों का अत्यंत सतर्कता से आकलन किया जाना चाहिए था।
उत्तराखंड में चारधाम ऑल वेदर रोड परियोजना को लेकर भी लंबे समय तक पर्यावरणीय विवाद बना रहा। सड़क चौड़ीकरण के दौरान बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटाई, हजारों पेड़ों की कटाई और भूस्खलन की घटनाओं में वृद्धि को लेकर विशेषज्ञों ने चिंता व्यक्त की। हिमालय को दुनिया के सबसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में माना जाता है, जहां किसी भी बड़े निर्माण कार्य के दीर्घकालिक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। इस परियोजना को लेकर मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा और सड़क की चौड़ाई सहित कई पर्यावरणीय पहलुओं पर विस्तृत सुनवाई हुई।
छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य देश के सबसे घने वनों में गिना जाता है। यह हाथियों के महत्वपूर्ण आवागमन मार्ग (Elephant Corridor) का भी हिस्सा है। यहां प्रस्तावित कोयला खनन परियोजनाओं का स्थानीय आदिवासी समुदायों और पर्यावरण संगठनों ने लगातार विरोध किया। उनका कहना था कि खनन से न केवल घने जंगलों का नुकसान होगा, बल्कि क्षेत्र की जैव विविधता, जल स्रोतों और वनाधारित आजीविका पर भी गंभीर प्रभाव पड़ेगा। पर्यावरणीय स्वीकृतियों की प्रक्रिया और स्थानीय ग्राम सभाओं की सहमति को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे।
दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान तक फैली अरावली पर्वतमाला लंबे समय से अवैध खनन और अनियंत्रित निर्माण गतिविधियों की मार झेल रही है। सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित अधिकरण को कई बार हस्तक्षेप करना पड़ा। इसके बावजूद अनेक स्थानों पर अवैध खनन, फार्महाउस निर्माण और पहाड़ियों के समतलीकरण की शिकायतें लगातार सामने आती रहीं। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली केवल एक पर्वतमाला नहीं, बल्कि उत्तर-पश्चिम भारत के भूजल पुनर्भरण, मरुस्थलीकरण रोकने और दिल्ली-एनसीआर की वायु गुणवत्ता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल पश्चिमी घाट दुनिया के सबसे समृद्ध जैव विविधता क्षेत्रों में से एक है। यहां खनन, सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं और शहरी विस्तार को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं। माधव गाडगिल समिति और बाद में कस्तूरीरंगन समिति ने इस क्षेत्र के बड़े हिस्से को पारिस्थितिक दृष्टि से संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी। हालांकि इन सिफारिशों को लागू करने को लेकर लंबे समय तक मतभेद बने रहे और विकास तथा संरक्षण के बीच संतुलन का प्रश्न लगातार उठता रहा।
| वर्ष | मामला | प्रमुख पर्यावरणीय चिंता |
|---|---|---|
| 2020 | Draft EIA Notification | उल्लंघनों के नियमितीकरण और सार्वजनिक सुनवाई में प्रस्तावित छूट पर विवाद |
| 2021 | Ex Post Facto Office Memorandum | बिना पूर्व मंजूरी शुरू परियोजनाओं को बाद में मंजूरी का रास्ता |
| 2022 | ग्रेट निकोबार परियोजना | वर्षावन, समुद्री जैव विविधता, लेदरबैक कछुओं पर प्रभाव |
| 2021–24 | हसदेव अरण्य | वन कटाई, हाथी कॉरिडोर, आदिवासी आजीविका |
| लगातार | अरावली खनन | भूजल, हरित आवरण और वायु गुणवत्ता पर असर |
| लगातार | चारधाम परियोजना | हिमालयी पारिस्थितिकी, भूस्खलन और वन कटाई |
केवल परियोजनाओं के स्तर पर ही नहीं, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सरकार की कुछ नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों को लेकर भी पर्यावरणविदों ने चिंता जताई। उनका कहना था कि कई बदलावों का उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल बनाना था, लेकिन इससे पर्यावरणीय सुरक्षा उपाय अपेक्षाकृत कमजोर पड़ने का खतरा भी पैदा हुआ।
वर्ष 2020 में जारी मसौदा पर्यावरण प्रभाव आकलन (Draft EIA Notification, 2020) सबसे अधिक विवादों में रहा। इसमें कुछ श्रेणियों की परियोजनाओं को सार्वजनिक सुनवाई से छूट देने, अनुपालन रिपोर्ट की आवृत्ति कम करने और कुछ मामलों में उल्लंघन के बाद नियमितीकरण जैसे प्रावधानों को लेकर व्यापक विरोध हुआ। देशभर के पर्यावरण विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और नागरिक संगठनों ने लाखों आपत्तियां दर्ज कराईं। आलोचकों का कहना था कि इससे पर्यावरणीय निगरानी कमजोर हो सकती है, जबकि सरकार का तर्क था कि इसका उद्देश्य प्रक्रियाओं को अधिक व्यावहारिक और पारदर्शी बनाना है।
केंद्र सरकार द्वारा 2021 में जारी वही कार्यालय ज्ञापन इस पूरे विवाद का केंद्र बना, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया है। इस व्यवस्था ने बिना पूर्व पर्यावरणीय मंजूरी के शुरू हुई परियोजनाओं के लिए बाद में मंजूरी प्राप्त करने की प्रक्रिया उपलब्ध कराई थी। पर्यावरणविदों का कहना था कि इससे उद्योगों में यह संदेश जा सकता है कि पहले परियोजना शुरू कर देना और बाद में मंजूरी हासिल कर लेना भी एक व्यवहारिक विकल्प है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले ने इसी व्यवस्था पर पूर्ण विराम लगा दिया।
हाल के वर्षों में वन संरक्षण कानून में किए गए संशोधनों को लेकर भी व्यापक बहस हुई। सरकार ने इन्हें आधारभूत ढांचा परियोजनाओं, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास कार्यों के लिए आवश्यक बताया, जबकि कई पर्यावरण विशेषज्ञों और पूर्व वन अधिकारियों ने आशंका जताई कि इससे कुछ श्रेणियों की परियोजनाओं के लिए वन स्वीकृति की प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो सकती है और संवेदनशील वन क्षेत्रों पर दबाव बढ़ सकता है।
सड़क, रेलवे, ट्रांसमिशन लाइन, गैस पाइपलाइन और अन्य रैखिक (Linear) परियोजनाओं के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रक्रियाओं को सरल बनाने के प्रयास किए गए। सरकार का तर्क रहा कि इससे राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं में अनावश्यक देरी कम होगी। दूसरी ओर पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना था कि प्रक्रियाओं के सरलीकरण और पर्यावरणीय सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि अनेक रैखिक परियोजनाएं वन्यजीव गलियारों और संवेदनशील पारिस्थितिकी क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं।
पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा सार्वजनिक सुनवाई मानी जाती है। कई परियोजनाओं में स्थानीय समुदायों और पर्यावरण समूहों ने आरोप लगाया कि जनसुनवाई पर्याप्त पारदर्शी ढंग से नहीं हुई या लोगों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। विशेषज्ञों का मानना है कि पर्यावरणीय निर्णयों की विश्वसनीयता तभी बढ़ेगी, जब स्थानीय समुदायों की भागीदारी वास्तविक और प्रभावी होगी।
सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले का सबसे बड़ा प्रभाव संभवतः उद्योगों और परियोजना डेवलपरों की कार्यशैली पर पड़ेगा। अब कंपनियों के लिए यह मानकर चलना कठिन होगा कि यदि किसी कारणवश पर्यावरणीय मंजूरी नहीं मिली है, तब भी परियोजना शुरू कर दी जाए और बाद में कानूनी या प्रशासनिक प्रक्रिया के माध्यम से उसे नियमित करा लिया जाएगा।
यह निर्णय परियोजना नियोजन (Project Planning) के शुरुआती चरण में ही पर्यावरणीय जोखिमों का गंभीर आकलन करने की आवश्यकता को और मजबूत करता है। इससे पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्टों की गुणवत्ता, विशेषज्ञ समितियों की भूमिका और सार्वजनिक सुनवाई की प्रासंगिकता भी बढ़ने की संभावना है। साथ ही, यह उन उद्योगों के लिए भी सकारात्मक संकेत है जो शुरुआत से ही नियमों का पालन करते हैं और पर्यावरणीय मंजूरी प्राप्त करने के बाद ही परियोजनाएं शुरू करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल 'बैक डेट ग्रीन क्लीयरेंस' की व्यवस्था को खत्म करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश में पर्यावरणीय शासन (Environmental Governance) की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप भी माना जा सकता है। आने वाले समय में उद्योगों और परियोजना डेवलपरों पर यह दबाव बढ़ेगा कि वे किसी भी निर्माण या औद्योगिक गतिविधि की शुरुआत से पहले सभी पर्यावरणीय मंजूरियां प्राप्त करें। इससे 'पहले निर्माण, बाद में मंजूरी' जैसी कार्यशैली पर प्रभावी रोक लगने की संभावना है।
इस निर्णय से पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA), सार्वजनिक सुनवाई और विशेषज्ञ समितियों की भूमिका भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी। परियोजनाओं की योजना बनाते समय पर्यावरणीय जोखिमों का गंभीर आकलन करना अनिवार्य होगा, जिससे जंगलों, नदियों, आर्द्रभूमियों और जैव विविधता को होने वाले संभावित नुकसान को पहले ही कम किया जा सकेगा। साथ ही, स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी अधिक सार्थक बनने की उम्मीद है।
नीतिगत स्तर पर भी यह फैसला सरकारों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों को केवल प्रशासनिक आदेशों के जरिए कमजोर नहीं किया जा सकता। यदि विकास और पर्यावरण के बीच टिकाऊ संतुलन स्थापित करना है, तो कानून की मूल भावना का सम्मान करना होगा। ऐसे में यह निर्णय भविष्य की परियोजनाओं के लिए केवल एक कानूनी मिसाल नहीं, बल्कि "पहले पर्यावरणीय जवाबदेही, फिर विकास" के सिद्धांत को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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