वेटलैंड्स पर्यावरण के लिए काफी महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि यह भूजल रिचार्ज में अहम भूमिका निभाने के साथ ही पक्षियों और अन्य जीवों को एक अनुकूल आश्रय स्थल भी प्रदान करते हैं।
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भारी बारिश के पानी से नदियों का जलस्तर बढ़ने से उत्तर बिहार का तकरीबन पूरा इलाका बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। इस बीच राज्य सरकार ने वेट लैंड्स के संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। इसके तहत सीवान जिले की 48 आर्द्रभूमियों का डिजिटल सर्वेक्षण कराया जा रहा है। इसके लिए बिहार सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग की ओर से विकसित Save Bihar Wetlands ऐप और डिजिटल मैपिंग की तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
इस सर्वे का मकसद जिले में कितनी आर्द्रभूमियां, ताल, तालाब, चौर, जलभराव वाले क्षेत्रों का पता लगा कर उनकी वास्तविक स्थिति, भौगोलिक सीमा और संरक्षण की जरूरत को डिजिटल रिकॉर्ड में दर्ज करना है। बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण राज्य की आर्द्रभूमियों की सूची तैयार करने, उनके डिजिटल इन्वेंटरी को विकसित करने और संरक्षण के लिए जरूरी दस्तावेज तैयार करने की जिम्मेदारियों के तहत यह सर्वे कर रहा है।प्राधिकरण की वेबसाइट पर आर्द्रभूमियों की ग्राउंड ट्रुथिंग और डिजिटल बाउंड्री डिमार्केशन के लिए व्यवस्था की गई है। इस डिजिटल सर्वे के आधार पर सीवान का डिजिटल वेटलैंड मैप अपडेट किया जा रहा है।
किसी आर्द्रभूमि को बचाने के लिए सबसे पहले इस बात की स्पष्ट जानकारी होना जरूरी है कि यह वेट लैंड कहां है, उसका वास्तविक विस्तार कितना है और समय के साथ उसकी सीमा या जल क्षेत्र में कितना बदलाव आया है। पारंपरिक रिकॉर्ड में कई बार चौर, तालाब, जलभराव वाले क्षेत्र या मौसमी आर्द्रभूमियां अलग-अलग नामों से दर्ज होती हैं और इनके विवरणों में भी भिन्ना देखने को मिलती है। ऐसे में एक डिजिटल नक्शा तैयार करना इन वेट लैंड्स के संरक्षण के लिए आधारभूत दस्तावेज बन सकता है।
बिहार राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के अनुसार राज्य में राष्ट्रीय आर्द्रभूमि एटलस के आधार पर राज्य में कुल 21,998 आर्द्रभूमियां हैं, जिनका कुल क्षेत्र करीब 4.03 लाख हेक्टेयर है। इनमें 2.25 हेक्टेयर से बड़ी 4,416 आर्द्रभूमियां करीब 3.86 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 30 जनवरी 2026 की आधिकारिक सूची के अनुसार राज्य में अभी छह रामसर साइट भी हैं-
| रामसर साइट | जिला | क्षेत्रफल (हेक्टेयर) |
|---|---|---|
| काबरताल वेटलैंड | बेगूसराय | 2620.0 |
| नागी पक्षी अभयारण्य | जमुई | 205.817 |
| नकटी पक्षी अभयारण्य | जमुई | 332.608 |
| गोकुल जलाशय | बक्सर | 448.0 |
| उदयपुर झील | पश्चिम चंपारण | 319.0 |
| गोगाबिल झील | कटिहार | 86.63 |
इनमें काबरताल बिहार की पहली रामसर साइट थी, जिसे 2020 में अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि के रूप में नामित किया गया। नागी और नकटी को 2024 में सूची में शामिल किया गया, जबकि गोकुल जलाशय, उदयपुर झील और गोगाबिल झील 2025 में रामसर साइट बने। अभी सीवान की कोई आर्द्रभूमि रामसर साइट नहीं है। इसलिए जिले की 48 आर्द्रभूमियों का डिजिटल सर्वे इस संदर्भ में भविष्य में संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में रखा जा रहा है। सुरैला चौर में पक्षी अभयारण्य की सिफारिश पहले ही की जा चुकी है। उसके बाद सीवान की आर्द्र भमियों के इस डिजिटल सर्वे की प्रक्रिया को वेट लैंड्स के संरक्षण और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। इस सर्वे के जरिये डिजिटल सीमा-निर्धारण के बाद किसी आर्द्रभूमि की स्थिति पर आगे होने वाले संरक्षण, प्रबंधन, भूमि उपयोग और विकास संबंधी फैसलों के लिए अधिक स्पष्ट आधार तैयार हो सकता है।
सबसे ज्यादा आर्द्रभूमि भगवानपुर हाट प्रखंड में बताई गई है। यहां करीब 440.55 हेक्टेयर आर्द्रभूमि चिन्हित है। इसके बाद दरौंदा में करीब 249.94 हेक्टेयर और गोरेयाकोठी में करीब 139.76 हेक्टेयर आर्द्रभूमि दर्ज होने की जानकारी दी गई है।
| प्रखंड | आर्द्रभूमि क्षेत्रफल (हेक्टेयर) |
|---|---|
| भगवानपुर हाट | 440.55 |
| दरौंदा | 249.94 |
| गोरेयाकोठी | 139.76 |
| बसंतपुर | 134.18 |
| बड़हरिया | 119.15 |
| गुठनी | 90.77 |
| सीवान सदर | 74.24 |
| सिसवन | 73.68 |
| हसनपुरा | 65.63 |
| महाराजगंज | 57.66 |
| पचरुखी | 42.58 |
| मैरवा | 76.52 |
| दरौली | 28.62 |
| जीरादेई | 20.29 |
| रघुनाथपुर | 5.46 |
इस साल की शुरुआत में एशियन वॉटरबर्ड सेंसस के तहत 2,940 प्रवासी पक्षियों का रिकॉर्ड संजोए जाने के बाद अब वेट लैंड्स का यह डिजिटल सर्वे सीवान को देश के बड़े बर्ड टूरिज़्म सेंटर के रूप में उभारने का एक महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है। इससे जिले की 48 आर्द्रभूमियों की डिजिटल पहचान और सीमा-निर्धारण के साथ ही सुरैला चौर, चकरी ताल, घाघरा नदी तथा कमलदाह सरोवर जैसे स्थलों की जैव विविधता के संरक्षण के लिए व्यापक योजना तैयार करने की राह खुल सकती है। अगर इन दोनों प्रक्रियाओं को एक साथ जोड़ा जाता है, तो जिले में वेटलैंड आधारित संरक्षण और बर्ड टूरिज्म का अपना मॉडल विकसित किया जा सकता है। सुरैला चौर को पक्षी अभयारण्य के रूप में विकसित करने की सिफारिश और चकरी ताल को वेटलैंड पार्क बनाने का प्रस्ताव इसी दिशा में शुरुआती संकेत हैं। हालांकि, पर्यटन को बढ़ावा देने से पहले यहां की आर्द्र भूमियों के संरक्षण की बुनियाद मजबूत करना होगा। पक्षियों के लिए सुरक्षित जल क्षेत्र, स्वच्छ पानी, कचरा नियंत्रण और सीमित मानवीय हस्तक्षेप सुनिश्चित होने के बाद ही बर्ड टूरिज्म वास्तव में टिकाऊ बन सकेगा। इसलिए सीवान की आर्द्रभूमियों का डिजिटल सर्वे केवल नक्शे पर कुछ नीले हिस्से जोड़ने की कवायद नहीं है। यह उन जल क्षेत्रों को पहचान देने की कोशिश है, जिन पर स्थानीय जल व्यवस्था, जैव विविधता और आने वाले वर्षों में प्रकृति पर्यटन की संभावनाएं टिकी हुई हैं। अगर इन जल क्षेत्रों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए, तो यहां बर्ड वॉचिंग और प्रकृति पर्यटन विकसित किया जा सकता है। यानी स्थानीय ताल-चौर केवल पानी और खेती से जुड़ी जगह न रहकर जैव विविधता और पर्यटन के केंद्र भी बन सकते हैं।
सीवान की आर्द्रभूमियों में सुरैला चौर सबसे महत्वपूर्ण स्थल बनकर सामने आया है। करीब 130 एकड़ में फैले इस चौर में लगभग पूरे साल पानी की उपलब्धता इसे पक्षियों के प्रवास के लिए अनुकूल आवास बनाती है। एशियन वॉटरबर्ड सेंसस के दौरान यहां 17 पक्षी परिवारों की 30 प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई। सर्वेक्षण के आंकड़ों और जैव विविधता को देखते हुए सुरैला चौर को पक्षी अभयारण्य के रूप में विकसित करने की सिफारिश की गई है। यह अभी प्रस्ताव विचाराधीन है। इसे आगे बढ़ाने के लिए जरूरी प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा किया जाना बाकी है।
सुरैला चौर के संरक्षण का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि आर्द्रभूमि का अस्तित्व केवल वहां दिखाई देने वाले पानी पर निर्भर नहीं होता। जल की उपलब्धता, आसपास की वनस्पति, पक्षियों के भोजन की उपलब्धता और मानव गतिविधियों का स्तर मिलकर किसी वेटलैंड की पारिस्थितिक स्थिति तय करते हैं। इसलिए यहां बर्ड टूरिज्म विकसित करने से पहले आवास संरक्षण और मानवीय गतिविधियों के नियमन को प्राथमिकता देना जरूरी होगा।
सिसवन प्रखंड के महेंद्रनाथ मंदिर स्थित कमलदाह सरोवर ने भी पक्षी विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। सर्वेक्षण में यहां 11 परिवारों की 31 प्रजातियों के कुल 2,042 पक्षी दर्ज किए गए। इनमें फेरुजिनस डक यानी व्हाइट-आइड पोचार्ड भी शामिल थी। इस प्रजाति को IUCN की रेड लिस्ट में निकट संकटग्रस्त (Near Threatened) श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट के अनुसार इसकी संख्या पिछली गणना की तुलना में बेहतर पाई गई। यह आंकड़ा दिखाता है कि सीवान की आर्द्रभूमियों को केवल स्थानीय तालाबों के रूप में देखने के बजाय उन्हें व्यापक जलपक्षी आवास के रूप में देखने की जरूरत है। कमलदाह सरोवर में धार्मिक पर्यटन का पहलू पहले से मौजूद है। यदि इसके साथ आर्द्रभूमि संरक्षण, पक्षी अवलोकन और प्रकृति पर्यटन को वैज्ञानिक तरीके से जोड़ा जाए, तो यह एक अलग तरह के स्थानीय पर्यटन मॉडल का आधार बन सकता है।
गुठनी प्रखंड का चकरी ताल भी इस सर्वे में एक महत्वपूर्ण आर्द्र भूमि वाले प्राकृतिक पर्यटन स्थल के रूप में सामने आया। बर्ड सेंसेस में यहां 14 पक्षी परिवारों की 27 प्रजातियां दर्ज की गईं। इसे देखते हुए इसके संरक्षण के लिए इसे वेटलैंड पार्क के रूप में विकसित करने और प्रदूषण रोकने के लिए नो डंपिंग नीति लागू करने की सिफारिश की गई है। यह पहल इस बात की ओर भी ध्यान दिलाती है कि वेटलैंड संरक्षण केवल पानी बचाने का मामला नहीं है। ठोस कचरा, अतिरिक्त जलीय वनस्पति, जल की गुणवत्ता और आसपास की मानवीय गतिविधियां भी पक्षियों के आवास को प्रभावित करती हैं। इसलिए चकरी ताल जैसे स्थल पर पार्क विकसित करने का अर्थ केवल घूमने की जगह बनाना नहीं होना चाहिए। इसे एक ऐसे वेटलैंड पार्क के रूप में विकसित करना होगा जहां जल क्षेत्र और पक्षियों के प्राकृतिक आवास को प्राथमिकता मिले।
वेटलैंड्स पारिस्थितिक तंत्र के लिए महत्वपूर्ण होने के साथ ही स्थनीय समुदायों को आजीविका उपलब्ध कराने का कार्य भी करते हैं।
सिसवन क्षेत्र से गुजरने वाली घाघरा नदी को भी इस पक्षी गणना में शामिल किया गया। यहां 9 परिवारों की 13 प्रजातियां दर्ज की गईं। इससे पता चलता है कि सीवान में जलपक्षियों का आवास केवल स्थिर तालाबों और चौरों तक सीमित नहीं है, बल्कि नदी का पारिस्थितिकी तंत्र भी पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि नदी क्षेत्र के सामने अलग तरह की चुनौतियां हैं। रिपोर्ट में घाघरा के आसपास बढ़ती मानवीय गतिविधियों को लेकर चिंता जताई गई है। ऐसे में नदी के किनारे के वेटलैंड, रेतीले हिस्से, उथले जल क्षेत्र और वनस्पति वाले इलाके जलपक्षियों के लिए किस तरह का आवास उपलब्ध कराते हैं, इसका अलग से अध्ययन संरक्षण योजना को ज्यादा प्रभावी बना सकता है।
सर्वेक्षण में कई तरह के जलपक्षी दर्ज किए गए। इनमें कम सीटीदार बतख, गड़वाल बतख, गौ बगुला, धूसर सिर वाली जलमुर्गी, छोटा बगुला, छोटा जलकौआ, मध्यम बगुला, बड़ा जलकौआ, यूरेशियन कूट, लाल कलगी वाली बतख, नदी टिटिहरी और सफेद गला रामचिरैया जैसी प्रजातियां शामिल हैं।
इन प्रजातियों की मौजूदगी का महत्व सिर्फ उनकी संख्या में नहीं है। अलग-अलग पक्षी अलग तरह के जल आवास और भोजन पर निर्भर करते हैं। इसलिए किसी एक वेटलैंड में पक्षियों की विविधता उस क्षेत्र में उपलब्ध अलग-अलग सूक्ष्म आवासों का भी संकेत दे सकती है।
डिजिटल सर्वे और पक्षी गणना जहां संरक्षण की संभावना दिखाते हैं, वहीं उपलब्ध सर्वेक्षण रिपोर्ट कुछ समस्याओं की ओर भी इशारा करती है। इसमें सुरैला चौर में पक्षियों के अनुकूल आवास बनाए रखने के लिए आवास प्रबंधन और बुनियादी सुविधाओं की जरूरत बताई गई है। चकरी ताल में ठोस कचरा प्रबंधन और अतिरिक्त झाड़ियों तथा वनस्पतियों की समय-समय पर सफाई की जरूरत बताई गई है। कमलदाह सरोवर में जल और वनस्पति प्रबंधन पर जोर दिया गया है।
इससे स्पष्ट है कि केवल किसी स्थल को ‘बर्ड साइट’ घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। पानी की गुणवत्ता, जलभराव की प्राकृतिक व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, पक्षियों के प्रजनन और विश्राम स्थलों की सुरक्षा तथा पर्यटन गतिविधियों की सीमा तय करना भी जरूरी होगा।
सीवान की 48 आर्द्रभूमियों का डिजिटल सर्वे एक महत्वपूर्ण पहला कदम है, लेकिन इसका असली फायदा तभी मिल पाएगा, जब सर्वे के डिजिटल डेटा को किसी संरक्षण योजना से जोड़ा जाए। हर वेटलैंड के लिए उसकी सीमा, जल क्षेत्र, मौसमी बदलाव, जैव विविधता, आसपास की मानवीय गतिविधियां, प्रदूषण के स्रोत और संरक्षण की प्राथमिकताएं दर्ज की जा सकती हैं।
बिहार राज्य आर्द्र भूमि प्राधिकरण की भूमिका में आर्द्र भूमियों की पहचान, सूचीकरण, डिजिटल इन्वेंटरी और उनके संरक्षण से संबंधित दस्तावेज तैयार करना शामिल है। केंद्र सरकार के Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017 के तहत जारी दिशा निर्देश भी आर्द्रभूमि की सीमा निर्धारित करने, उसके पारिस्थितिक चरित्र और प्रकृति को समझने पर जोर देते हैं। इसलिए सीवान में हो रहा डिजिटल सर्वे भविष्य में यह तय करने में मदद कर सकता है कि कौन-सी आर्द्र भूमि को किस तरह के संरक्षण की जरूरत है। कहीं पक्षी आवास प्राथमिकता हो सकता है, कहीं जल संरक्षण, कहीं कचरा प्रबंधन और कहीं नियंत्रित प्रकृति पर्यटन।
आर्द्र भूमियां बाढ़ के पानी को रोकने, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता को सहारा देने, स्थानीय जल चक्र को बनाए रखने और लोगों की आजीविका से जुड़ी कई संभावनाएं भी खोलती हैं। केंद्र सरकार के 2017 के वेटलैंड नियम भी आर्द्र भूमियों से मिलने वाली पारिस्थितिकी और जैव विविधता के महत्व को मान्यता देते हैं।
सीवान के मामले में इन सेवाओं को स्थानीय संदर्भ में देखने की जरूरत है। चौर और ताल केवल बरसात में पानी जमा करने वाली जमीन नहीं हैं। इनमें जमा पानी आसपास के कृषि क्षेत्र, भूजल, वनस्पति और जीव-जंतुओं के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है। वहीं प्रवासी पक्षियों का आगमन इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की एक दिखाई देने वाली पहचान है।
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