फोटो: नेवता बांध, जयपुर जिला, राजस्थान | Editm497 / विकिमीडिया कॉमन्स | सीसी बाय-एसए 4.0
हिंगोनिया बांध का निर्माण 1889 में हुआ था और यह बांडी नदी पर स्थित है।
बांडी नदी और दूसरी जलधाराओं से हिंगोनिया बांध तक पानी पहुंचता है।
NGT ने हिंगोनिया का क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र, भूमि रिकॉर्ड और फुल टैंक लेवल (FTL) की जानकारी मांगी है।
जयपुर के हिंगोनिया बांध का मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में है। इस मामले का संबंध बांध के आसपास हुए निर्माण, उसके डूब क्षेत्र और जलग्रहण क्षेत्र से है। लेकिन यह सवाल केवल हिंगोनिया तक सीमित नहीं है। इससे सवाल उठता है कि क्या किसी बांध, तालाब या झील को उसके जलग्रहण क्षेत्र और पानी पहुंचाने वाले प्राकृतिक रास्तों से अलग करके बचाया जा सकता है?
किसी बांध या तालाब को हम अक्सर उसमें जमा पानी से पहचानते हैं। जहां तक पानी दिखाई देता है, आम तौर पर उसी को जलाशय मान लिया जाता है। लेकिन किसी जलाशय को केवल उसमें दिखाई देने वाले पानी से नहीं समझा जा सकता। उसमें पानी केवल सीधे हुई बारिश से नहीं आता। आसपास के जलग्रहण क्षेत्र का पानी भी छोटी धाराओं और नालों से होकर वहां पहुंचता है। इसलिए जलाशय को उसके जलग्रहण क्षेत्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
अगर इस रास्ते में निर्माण हो जाए या नाले बंद हो जाएं तो पानी का प्राकृतिक रास्ता बदल सकता है। जमीन की ढलान में बदलाव का भी असर पड़ सकता है। इससे जलाशय के साथ आसपास की जल निकासी व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। जयपुर का हिंगोनिया बांध इसी संबंध को समझने का एक उदाहरण है।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की संयुक्त समिति की रिपोर्ट में हिंगोनिया को जयपुर जिले में बांडी नदी पर बना ऐतिहासिक बांध बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार इस बांध का निर्माण 1889 में हुआ था। हिंगोनिया केवल ऐसी जगह नहीं है जहां बरसात का पानी जमा होता है। यह पुराने सिंचाई तंत्र का भी हिस्सा रहा है।
संयुक्त समिति की रिपोर्ट के अनुसार हिंगोनिया बांध से चार नहरें जुड़ी हैं। ये नहरें बुकनी, हिंगोनिया, कांस्या और राताखेड़ा सहित आसपास के इलाकों की ओर जाती हैं। इनका संबंध सिंचाई से है। लेकिन मौजूदा विवाद केवल बांध में जमा पानी तक सीमित नहीं है। सवाल आसपास की जमीन, डूब क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र और बांडी नदी के बहाव का भी है।
हिंगोनिया बांध से जुड़ा मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच में चल रहा है। NGT के निर्देश पर एक संयुक्त समिति बनाई गई थी। इस समिति में जल संसाधन विभाग, शहरी विकास विभाग, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (RSPCB) के प्रतिनिधि शामिल थे।
जलाशय में पानी का स्तर मौसम के साथ बदलता रहता है। इसलिए जलाशय की सीमा समझने के लिए फुल टैंक लेवल (FTL) के साथ उसके डूब क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र और पानी आने-जाने के रास्तों को भी देखना जरूरी है।
समिति की रिपोर्ट में बांध के डूब क्षेत्र और जलग्रहण क्षेत्र में निर्माण और दूसरी गतिविधियों की बात कही गई है। समिति ने यह भी पाया कि राष्ट्रीय राजमार्ग के निर्माण के दौरान बनाई गई करीब 350 मीटर लंबी पुरानी सर्विस रोड बांडी नदी के प्राकृतिक बहाव में बाधा डाल रही थी। और तो और नदी के जलग्रहण क्षेत्र में अतिक्रमण से नदी का जलीय वातावरण प्रभावित हो सकता है। इस प्राकृतिक असंतुलन के कारण नदी के जलीय ईकोसिस्टम पर भारी असर पड़ सकता है।
रिपोर्ट में डूब क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र और बांडी नदी के बहाव से जुड़े मुद्दों की भी बात की गई है। मामला अभी NGT में है, इसलिए जमीन और अतिक्रमण को लेकर स्थिति पूरी तरह साफ नहीं हुई है। लेकिन यहां एक सवाल उठता है। किसी जलाशय को बचाने के लिए उसकी सीमा आखिर कहां तक मानी जाए?
गर्मियों में किसी तालाब या बांध का पानी काफी पीछे चला जाता है। कई बार उसका बड़ा हिस्सा सूखा दिखाई देने लगता है। लेकिन सूखी दिख रही पूरी जमीन को सामान्य खाली जमीन नहीं माना जा सकता।
जलाशय में पानी का स्तर मौसम के साथ बदलता रहता है। इसलिए जलाशय की सीमा समझने के लिए फुल टैंक लेवल (FTL) के साथ उसके डूब क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र और पानी आने-जाने के रास्तों को भी देखना जरूरी है।
फुल टैंक लेवल सामान्य तौर पर उस निर्धारित स्तर को बताता है जहां तक कोई जलाशय अपनी तय क्षमता के अनुसार पानी रख सकता है। इसलिए किसी एक मौसम में दिखाई देने वाली पानी की सीमा और जलाशय की निर्धारित सीमा अलग हो सकती है।
यही वजह है कि हिंगोनिया के मामले में जलाशय की सीमा के साथ डूब क्षेत्र, जलग्रहण क्षेत्र और भूमि रिकॉर्ड को भी देखना जरूरी है। किसी एक मौसम में दिखाई देने वाली पानी की सीमा के आधार पर ही जलाशय की पूरी सीमा तय नहीं की जा सकती।
जलग्रहण क्षेत्र को एक साधारण उदाहरण से समझ सकते हैं। किसी इलाके में बारिश होती है तो पानी ऊंची जमीन से नीचे की ओर बहता है। रास्ते में वह छोटी धाराओं और नालों से जुड़ता है। आखिर में यह पानी किसी बांध, तालाब या दूसरे जलाशय तक पहुंचता है।
जिस पूरे इलाके से यह पानी आता है, वही उस जलाशय का जलग्रहण क्षेत्र होता है। यानी जलाशय और उसका जलग्रहण क्षेत्र एक ही जल व्यवस्था के हिस्से हैं। हिंगोनिया में भी पानी कई रास्तों से बांध तक पहुंचता है। NGT के रिकॉर्ड के अनुसार बांडी नदी के रास्ते कालख बांध फीडर, सरदिया नदी और कुछ छोटी जलधाराओं से हिंगोनिया बांध को पानी मिलता है। इनमें बांडी नदी पानी पहुंचाने वाले प्रमुख स्रोतों में है।
लेकिन शहर फैलने के साथ यह व्यवस्था बदल सकती है। मकान, सड़क, पार्किंग और दूसरी पक्की सतहें बढ़ती हैं। प्राकृतिक नालों और छोटी धाराओं के रास्ते भी बदल सकते हैं।
राष्ट्रीय जल नीति, 2012 भी नदियों, झीलों, तालाबों और जल निकासी के प्राकृतिक रास्तों पर अतिक्रमण रोकने पर जोर देती है। ऐसे में केवल जलाशय को बचाना पर्याप्त नहीं है। उस तक पानी पहुंचाने वाले प्राकृतिक रास्तों को भी बचाना जरूरी है।
NGT के रिकॉर्ड के अनुसार बांडी नदी के रास्ते कालख बांध फीडर, सरदिया नदी और कुछ छोटी जलधाराओं से हिंगोनिया बांध को पानी मिलता है। इनमें बांडी नदी पानी पहुंचाने वाले प्रमुख स्रोतों में है।
पानी के प्राकृतिक रास्ते को रोक देने से पानी खत्म नहीं होता। वह दूसरी दिशा में बह सकता है या किसी दूसरी जगह जमा हो सकता है।
इसलिए शहरों में नाले, छोटी धाराएं, बाढ़ क्षेत्र और जलाशय केवल खाली जमीन नहीं हैं। ये प्राकृतिक जल निकासी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
हिंगोनिया में इसे सीधे देखा जा सकता है। NGT की संयुक्त समिति ने बांडी नदी के प्राकृतिक बहाव में रुकावट के साथ बांध से जुड़ी नहरों के कुछ हिस्सों में भी बाधाओं का ज़िक्र किया है।
इसलिए यहां बांध, नदी और नहरों को अलग-अलग देखने के बजाय एक जुड़े हुए जल तंत्र के रूप में देखने की जरूरत है।
हिंगोनिया का मामला अकेला नहीं है। जल शक्ति मंत्रालय की पहली जल निकाय गणना में देश भर में 24,24,540 जल निकाय दर्ज किए गए। इनमें तालाब, टैंक, झील, जलाशय और जल संरक्षण से जुड़ी दूसरी संरचनाएं शामिल थीं।
इसी गणना में 38,496 जल निकायों यानी करीब 1.6 प्रतिशत पर अतिक्रमण दर्ज किया गया। अतिक्रमण वाले जल निकायों में सबसे बड़ी संख्या तालाबों की थी। इसके बाद टैंक थे। ये आंकड़े बताते हैं कि जल निकायों पर अतिक्रमण केवल किसी एक शहर या एक जलाशय तक सीमित समस्या नहीं है।
सितंबर 2026 में NGT में हुई सुनवाई के दौरान बताया गया कि हिंगोनिया जल निकाय का दर्जा बदलकर आर्द्रभूमि किया गया है। इसके बाद NGT ने जल निकाय का कुल क्षेत्र और उसकी सीमा स्पष्ट करने को कहा। साथ ही नक्शा, राजस्व रिकॉर्ड, जलग्रहण क्षेत्र और फुल टैंक लेवल (FTL) की जानकारी भी मांगी गई। इससे सवाल केवल बांध की जमीन का नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे जल क्षेत्र के संरक्षण का भी हो जाता है।
भारत में आर्द्रभूमियों के संरक्षण के लिए आर्द्रभूमि (संरक्षण और प्रबंधन) नियम, 2017 लागू हैं। इन्हीं नियमों के तहत राज्यों में आर्द्रभूमि प्राधिकरण बनाए गए हैं। राजस्थान सरकार ने भी इन्हीं नियमों के तहत राजस्थान राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण का गठन किया है। लेकिन किसी जल निकाय को आर्द्रभूमि के रूप में पहचान लेना संरक्षण की शुरुआत है, अंत नहीं।
राजस्थान राज्य आर्द्रभूमि प्राधिकरण के कामों में आर्द्रभूमियों की सूची और डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना शामिल है। प्राधिकरण यह भी देखता है कि आर्द्रभूमि और उसके आसपास के प्रभाव क्षेत्र में किन गतिविधियों को नियंत्रित करने की जरूरत है।
इसका मतलब है कि किसी आर्द्रभूमि को समझते समय केवल उसमें मौजूद पानी को देखना पर्याप्त नहीं है। उसके आसपास के इलाके को भी साथ में देखना जरूरी है। वहां होने वाली गतिविधियां आर्द्रभूमि और उसकी जल व्यवस्था को प्रभावित कर सकती हैं।
इसी वजह से हिंगोनिया के मामले में जलग्रहण क्षेत्र और बांडी नदी को भी साथ में देखना जरूरी है। बांध तक पानी पहुंचाने वाली व्यवस्था को उसके जल क्षेत्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
शहरी जल निकायों के पुनर्जीवन को केंद्र सरकार के अटल नवीकरण और शहरी परिवर्तन मिशन 2.0 (AMRUT 2.0) में शामिल किया गया है। जुलाई 2026 में आवासन और शहरी कार्य मंत्रालय ने बताया कि इस मिशन के तहत करीब 1.21 लाख एकड़ जल निकाय क्षेत्र के पुनर्जीवन पर काम किया जा रहा है।
इन कामों में केवल गाद निकालना शामिल नहीं है। पानी आने-जाने के रास्तों में सुधार, किनारों की सुरक्षा और जैव विविधता बढ़ाने जैसे उपाय भी किए जा रहे हैं।
इससे एक बात साफ होती है। किसी जलाशय को फिर से बेहतर स्थिति में लाने का मतलब केवल उसकी खुदाई या सफाई करना नहीं है। इसके साथ यह देखना भी जरूरी है कि पानी कहां से और किन रास्तों से जलाशय तक पहुंचता है।
शहरों की योजना बनाते समय जमीन और पानी को अक्सर अलग-अलग देखा जाता है। एक विभाग सड़क बनाता है। दूसरा आवास की योजना तैयार करता है। कोई तीसरा विभाग जलाशय संभालता है। लेकिन बारिश का पानी इन प्रशासनिक सीमाओं के अनुसार नहीं बहता।
इसलिए शहर की योजना बनाते समय पानी के प्राकृतिक रास्तों को समझना जरूरी है। यह पता होना चाहिए कि बारिश का पानी कहां से आएगा, किस रास्ते से गुजरेगा और आखिर में कहां जमा होगा।
इसलिए जलाशय की सीमा और उसके जलग्रहण क्षेत्र को दर्ज करना केवल पर्यावरण का सवाल नहीं है। यह शहर की योजना का भी हिस्सा है।
हिंगोनिया बांध का मामला अभी NGT में है। इसलिए विवादित जमीन और उसकी सीमा को लेकर स्थिति अभी पूरी तरह साफ नहीं है।
लेकिन इससे एक सवाल जरूर उठता है। शहर अपने पुराने जलाशयों को किस रूप में देखते हैं? केवल पानी जमा करने वाली जगह के रूप में या एक बड़े जल तंत्र के हिस्से के रूप में?
अगर जलाशय को पूरे जल तंत्र का हिस्सा माना जाए तो केवल उसकी सीमा तय करना पर्याप्त नहीं होगा। उसके जलग्रहण क्षेत्र का नक्शा भी होना चाहिए। प्राकृतिक नालों और जलधाराओं को पहचानना होगा। फुल टैंक लेवल (FTL) और डूब क्षेत्र को भूमि रिकॉर्ड और शहरी नक्शों में स्पष्ट रखना होगा।
हिंगोनिया इसी बुनियादी बात की याद दिलाता है। जलाशय को बचाना है तो केवल पानी जमा होने की जगह नहीं, वहां तक पानी पहुंचने का रास्ता भी बचाना होगा।
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