हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में शिवालिक पहाड़ियों के बीच ब्यास नदी पर बना पौंग बांध भी उत्तर भारत के प्रमुख बांधों में शुमार है।
स्रोत : विकी कॉमंस
नदियों और बांधों में गाद भर जाना सरकार के लिए हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है। क्योंकि, इससे बांध की जल भंडारण क्षमता घट जाती है और जल विद्युत उत्पादन में भी कमी आती है। इसीलिए सरकार को समय-समय पर बांधों और उनके जलाशयों की सफाई करवानी पड़ती है। बड़ी-बड़ी मशीनों की मदद से गाद निकालने में करोड़ो रुपये खर्च होते हैं। पर, अगर बांध के जलाशय में जमा गाद खर्चा कराने के बजाय सरकार की कमाई का जरिया बन जाए, तो ‘आम के आम, गुठलियों के दाम’ वाली कहावत चरितार्थ होती दिखती है। हिमाचल प्रदेश में कुछ ऐसा ही होने वाला है। यहां गोबिंद सागर जलाशय के सीर खड्ड क्षेत्र में 50 मिलियन घन मीटर जमा गाद से सरकार को करीब 1600 करोड़ रुपये की कमाई़ होने की उम्मीद है। भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (BBMB) इस गाद की नीलामी करने जा रहा है। इस कदम से भाखड़ा एवं पौंग बांध के जलाशयों की गाद हिमाचल सरकार का कोष भरने का काम करेगी।
देश की ऊर्जा और सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले दोनों बांधों पर मंडराते गाद (सिल्ट) से बांधों के ढांचे के लिए बढ़ते खतरे और इनकी घटती जल-संग्रहण क्षमता के मुद्दे के तूल पकड़ने के बाद BBMB हरकत में आ गया है। बीबीएमबी ने दोनों बांधों के जलाशयों में जमा गाद की निकासी की योजना तैयार की है।
एक मीडिया रिपोर्ट में BBMB के अध्यक्ष इंजीनियर मनोज त्रिपाठी के हवाले से बताया गया है कि भाखड़ा व पौंग जलाशयों से गाद की वैज्ञानिक निकासी और उसकी नीलामी से हिमाचल सरकार को करीब 1,600 करोड़ रुपये का राजस्व मिलेगा। गोबिंद सागर जलाशय के सीर खड्ड क्षेत्र में तकरीबन पांच करोड़ (50 मिलियन) घन मीटर गाद जमा है। इससे गोबिंद सागर की जल संग्रहण क्षमता में 26.14 प्रतिशत की गिरावट आई है। बांध की मृत भंडारण क्षमता (Dead storage capacity) 47.68 प्रतिशत और जीवंत भंडारण क्षमता (Live storage capacity) 19.10 प्रतिशत तक प्रभावित हुई है।
दोनों बांधों से सिल्ट की सफाई के साथ ही BBMB राज्य में करीब 13,000 मेगावाट 13,000 मेगावाट ग्रीन एनर्जी के उत्पादन के लिए पंप्ड स्टोरेज जलविद्युत परियोजनाएं स्थापित करने पर भी काम कर रहा है। इसमें लगभग 65,000 करोड़ की लागत आने का अनुमान है। हाइड्रो पावर की इन परियोजनाओं से राज्य में बुनियादी ढांचे का काया कल्प होने की उम्मीद है। साथ ही इससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होने की भी संभावना है। इसके अलावा, ब्यास-सतलुज लिंक के तहत 990 मेगावाट के डैहर पावर हाउस की 50 वर्ष पुरानी मशीनों के आधुनिकीकरण की तैयारी भी की जा रही है। साथ ही राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए सुंदरनगर झील को लैंडस्केपिंग करके संवारने के लिए भी 10 करोड़ की योजना का प्रस्ताव तैयार किया गया है।
भाखड़ा और पौंग बांध उत्तर भारत की जलापूर्ति, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और बिजली उत्पादन व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन बांधों की क्षमता को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि इनमें कितना पानी जमा हो सकता है। इनके जलाशयों में मृत भंडारण, जीवंत भंडारण, अधिकतम जलस्तर, न्यूनतम जलस्तर, जलग्रहण क्षेत्र और जलाशय की उपयोगी क्षमता जैसी कई तकनीकी अवधारणाएं भी महत्वपूर्ण होती हैं।
किसी बांध के जलाशय में जमा पानी का वह हिस्सा, जो सामान्य संचालन के दौरान उपलब्ध निकास व्यवस्था के माध्यम से बाहर नहीं निकाला जा सकता, मृत भंडारण (Dead Storage) कहलाता है। यह जल स्तर आमतौर पर जलाशय के न्यूनतम उपयोग किए जाने वाले जलस्तर यानी न्यूनतम ड्रॉडाउन स्तर (Minimum Drawdown Level यानी MDDL) से नीचे जमा रहता है। हालांकि, विशेष पंपिंग या निकासी व्यवस्था करके इसके कुछ हिस्से का उपयोग करना भी संभव होता है। यह क्षमता बांध के कुल भंडारण का हिस्सा होती है, लेकिन इसे नियमित सिंचाई, पेयजल या बिजली उत्पादन के लिए उपलब्ध पानी में शामिल नहीं किया जाता।
मृत भंडारण का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य जलाशय में तलछट (गाद, मिट्टी और रेत) के जमाव के लिए जगह उपलब्ध कराना भी है। नदियां अपने साथ लगातार तलछट लाती हैं, जो समय के साथ जलाशय की निचली सतह पर जमा होती रहती है। यदि इस तलछट के लिए पर्याप्त जगह न हो तो वह धीरे-धीरे जलाशय की उपयोगी भंडारण क्षमता को कम कर सकती है। इसे देखते हुए बांध की डिजाइन तैयार करते समय उसके मृत भंडारण का निर्धारण महत्वपूर्ण होता है।
बांध के जलाशय में जमा पानी का वह हिस्सा, जिसका उपयोग सिंचाई, पेयजल आपूर्ति, औद्योगिक जरूरतों और बिजली उत्पादन जैसे कार्यों के लिए किया जा सकता है, जीवंत भंडारण (Live Storage) कहलाता है। तकनीकी रूप से यह जलाशय के पूर्ण जलाशय स्तर (Full Reservoir Level यानी FRL) और न्यूनतम उपयोगी जलस्तर (MDDL) के बीच उपलब्ध पानी की मात्रा होती है। इसे बांध की उपयोगी भंडारण क्षमता भी कहा जाता है।
जीवंत भंडारण क्षमता किसी बांध की उपयोगिता और संचालन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी के आधार पर यह तय किया जाता है कि जलाशय में कितना पानी अलग-अलग जरूरतों के लिए उपलब्ध है और सूखे या कम वर्षा की स्थिति में कितने समय तक जलापूर्ति की जा सकती है। बिजली उत्पादन के लिए भी जलाशय के उपयोगी जलस्तर और उपलब्ध पानी की मात्रा का विशेष महत्व है। जलाशय का जलस्तर घटने पर टरबाइन के लिए उपलब्ध पानी का दबाव और बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि जीवंत भंडारण स्थिर मात्रा नहीं है। जलाशय में गाद जमा होने, जलस्तर में बदलाव और समय-समय पर किए जाने वाले आकलन के कारण इसकी वास्तविक उपलब्ध क्षमता बदल सकती है।
भाखड़ा बांध हिमाचल प्रदेश में सतलज नदी पर बनाया गया कंक्रीट ग्रेविटी बांध (Concrete gravity dam) है। इसके पीछे बने जलाशय को गोबिंद सागर (Gobind Sagar) कहा जाता है। यह जलाशय हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में स्थित है और राज्य की सिंचाई, बिजली उत्पादन तथा जल प्रबंधन संबंधी जरूरतों के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है। BBMB की परियोजना की आधिकारिक जानकारी के अनुसार इसकी प्रमुख तकनीकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:
बांध का प्रकार : कंक्रीट स्ट्रेट ग्रेविटी डैम (Concrete Straight Gravity Dam)। इसमें बांध के विशाल कंक्रीट ढांचे का वजन पानी के दबाव को संतुलित करता है।
बांध की ऊंचाई : सबसे गहरी नींव से 225.55 मीटर (740 फीट)।
बांध के जलाशय का नाम : गोबिंद सागर।
जलाशय का कुल जलग्रहण क्षेत्र : लगभग 56,980 वर्ग किलोमीटर।
जलाशय का क्षेत्रफल : लगभग 168.35 वर्ग किलोमीटर।
जलाशय की अधिकतम निर्धारित जलस्तर सीमा (MWL) : 1690 फीट।
पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) : 1680 फीट।
जलाशय की अधिकतम लंबाई : लगभग 96.56 किलोमीटर।
बिजली उत्पादन क्षमता : भाखड़ा के दोनों बिजली घरों की स्थापित क्षमता मिलाकर 1,379 मेगावाट है।
हालांकि, गोबिंद सागर जलाशय की भंडारण क्षमता के आंकड़े अलग-अलग संदर्भ स्तरों और क्षमता आकलनों में कुछ भिन्नताएं देखने को मिलती हैं।
नदियों पर बने विशालकाय बांधों के जरिये सिचाई, जलापूर्ति और बिजली बनाने जैसी जरूरतें पूरी की जाती है। बांध की पूरी क्षमता के इस्तेमाल के लिए समय-समय पर इनके तल में जमने वाली गाद की सफाई जरूरी होती है।
पौंग बांध हिमाचल प्रदेश में ब्यास नदी पर बनाया गया है। इसके पीछे बने विशाल जलाशय को महाराणा प्रताप सागर (Maharana Pratap Sagar) कहा जाता है। यह बांध मुख्य रूप से जल भंडारण, सिंचाई, बिजली उत्पादन और बाढ़ प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण है। इसके जलाशय का एक बड़ा हिस्सा वन्यजीवों और प्रवासी पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास है। इसी जलाशय में पौंग बांध पक्षी अभयारण्य स्थित है, जिसे रामसर स्थल का दर्जा प्राप्त है। इसके बारे में BBMB की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध विवरणों के अनुसार इसकी प्रमुख तकनीकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:
बांध का प्रकार : अर्थ कोर ग्रेवल शेल (Earth Core Gravel Shell)। इसमें बीच में मिट्टी का अभेद्य कोर और दोनों ओर बजरी तथा पत्थरों की परतें होती हैं।
बांध की ऊंचाई : सबसे गहरी नींव से लगभग 132.6 मीटर (435 फीट)।
जलाशय का नाम : महाराणा प्रताप सागर।
जलग्रहण क्षेत्र : लगभग 12,560 वर्ग किलोमीटर।
डिजाइन पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) : 1400 फीट।
डिजाइन अधिकतम जलस्तर (MWL) : 1421 फीट।
बांध का शीर्ष स्तर : 1430 फीट।
कुल भंडारण क्षमता : लगभग 8,570 मिलियन घन मीटर (8.57 BCM)।
जीवंत भंडारण क्षमता : लगभग 7,290 मिलियन घन मीटर (7.29 BCM)।
बिजली उत्पादन क्षमता : 396 मेगावाट (6 इकाइयां, प्रत्येक 66 मेगावाट)।
पौंग जलाशय के लिए डिजाइन FRL 1400 फीट होने के बावजूद BBMB के कुछ दस्तावेजों में कम किया गया FRL 1390 फीट भी दर्ज है। इसका तात्पर्य जलाशय के संचालन और निर्धारित जलस्तर प्रबंधन से है।
बांधों के महत्व को समझने के लिए उसके आकार-प्रकार के अलावा उसकी जलभंडारण क्षमताओं से जुड़े विभिन्न तकनीकी पहलुओं को समझना ज़रूरी है। क्योंकि, यह पहलू उसके इस्तेमाल और उपियोगिता से जुड़े होते हैं। इसे संक्षेप में कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है।
बांध में जलाशय के उस हिस्से में जमा पानी की मात्रा, जिसे सामान्य परिस्थितियों में बांध के निकास द्वारों से गुरुत्वाकर्षण के जरिए बाहर नहीं निकाला जा सकता, मृत भंडारण क्षमता कहलाती है। यह आमतौर पर जलाशय के सबसे निचले निकास स्तर से नीचे जमा रहता है।
बांध में जलाशय के उस हिस्से में जमा पानी की मात्रा, जिसका उपयोग सिंचाई, पेयजल, बिजली उत्पादन और अन्य जरूरतों के लिए किया जा सकता है, जीवंत भंडारण क्षमता कहलाती है। यह न्यूनतम जलाशय स्तर (MDDL) और पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) के बीच का भंडारण होता है।
पूर्ण जलाशय स्तर वह अधिकतम सामान्य जलस्तर है, जहां तक बांध के जलाशय में पानी जमा किया जा सकता है। भाखड़ा के गोबिंद सागर का FRL 1680 फीट और पौंग के महाराणा प्रताप सागर का डिजाइन FRL 1400 फीट है। यह जलाशय की सामान्य भंडारण सीमा बताता है, न कि उसकी अधिकतम सुरक्षित जलस्तर सीमा।
बाढ़ जैसी असाधारण परिस्थितियों में जलाशय में पहुंच सकने वाला अधिकतम निर्धारित जलस्तर MWL कहलाता है। भाखड़ा बांध का MWL 1690 फीट और पौंग बांध का डिजाइन MWL 1421 फीट है। FRL और MWL के बीच का अंतर बाढ़ के अतिरिक्त पानी को अस्थायी रूप से समायोजित करने में मदद करता है।
MDDL जलाशय का वह न्यूनतम निर्धारित स्तर है, जिसके नीचे से सामान्य व्यवस्था के तहत पानी निकालना संभव या व्यावहारिक नहीं होता। यह निकास द्वारों और बिजली उत्पादन की तकनीकी व्यवस्था पर निर्भर करता है। MDDL और FRL के बीच उपलब्ध पानी को सामान्यतः जीवंत भंडारण क्षमता माना जाता है।
जलाशय में पानी जमा करने की कुल क्षमता को सकल भंडारण क्षमता कहते हैं। इसमें जीवंत और मृत दोनों तरह का भंडारण शामिल होता है। उदाहरण के लिए, पौंग बांध की डिजाइन सकल क्षमता लगभग 8.57 BCM और जीवंत क्षमता 7.29 BCM है। दोनों के बीच का अंतर उसकी मृत भंडारण क्षमता है।
भाखड़ा और पौंग जैसे हिमालयी नदी घाटियों में बने जलाशयों के लिए गाद का जमाव एक बड़ी दीर्घकालिक समस्या है, जो इसके पूरे ढ़ाचे को ही खतरे में डाल सकता है। पहला सवाल यह है कि बांध में इतनी बड़ी मात्रा में गाद आती कहां से है। इसका जवाब यह है कि पहाड़ी क्षेत्रों में तेज ढलान, मिट्टी का कटाव, भूस्खलन और भारी बारिश के कारण नदियां बड़ी मात्रा में तलछट लेकर आती हैं। यह तलछट जलाशयों की तलहटी में जमा होती रहती है और धीरे-धीरे उनकी भंडारण क्षमता को कम करती है।
इस संबंध में दिसंबर 2025 को लोकसभा में पूछे गए प्रश्न संख्या 3109 पर बिजली मंत्रालय की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार भाखड़ा जलाशय अपनी मूल सकल भंडारण क्षमता का लगभग 26% और जीवंत भंडारण क्षमता का लगभग 19% खो चुका था। वहीं पौंग जलाशय की सकल भंडारण क्षमता में लगभग 14% और जीवंत भंडारण क्षमता में करीब 12%की कमी दर्ज की गई थी। इसका सीधा असर जलाशयों की पानी जमा करने की क्षमता, सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी और बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। इसलिए जलाशयों की क्षमता का नियमित आकलन, कैचमेंट एरिया ट्रीटमेंट, मिट्टी के कटाव को रोकने और तलछट यानी गाद को हटाने के उपाय करना जरूरी है। इसी के मद्देनज़र गोबिंद सागर जलाशय में 5 करोड़ घन मीटर गाद जमा को निकालने की तैयारी की जा रही है। खासबात यह है कि गाद की इस सफाई पर खर्च के बजाय नीलामी के जरिये इससे करीब 1600 करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
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