पानी में कोलीफॉर्म और ई-कोलाई बैक्टीरिया से बढ़ जाता है  जल जनित रोग का खतरा। 

 

फोटो : विकी कॉमंस 

प्रदूषण और जलगुणवत्ता

अरबी की जड़ करेगी बीमारी फैलाने वाले कोलीफॉर्म बैक्टीरिया का पानी से सफाया

आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने विकसित किया कम खर्च वाला प्राकृतिक फिल्‍टरेशन मॉडल

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

पानी से फैलने वाली संक्रामक बीमारियां यानी जल जनित रोग भारत में दशकों से एक बड़ी स्‍वास्‍थ्‍य चुनौती बनी हुई हैं। पानी में मौजूद कोलीफॉर्म, ई-कोलाई और अन्‍य बैक्टीरिया के कारण होने वाले इन रोगों पर नियंत्रण के लिए सरकार को हर साल करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। इसे लेकर एक राहत भरी खबर सामने आई है। 

असम के गुवाहाटी स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी गुवाहाटी सब्‍जी के रूप में खाई जाने वाली अरबी (घुइयां) की जड़ से इन जीवाणुओं को साफ करने का एक सस्‍ता, कारगर और प्रकृति आधारित तरीका ढूंढ निकाला है। संस्‍थान के शोधकर्ताओं की टीम ने अरबी के पौधे, बजरी और पानी के बहाव की विशेष व्यवस्था से एक ऐसा तकनीकी मॉडल विकसित किया है, जो बहुत कम ऊर्जा का इस्‍तेमाल कर प्रदूषित पानी को साफ कर सकता है।

नदियों, नहरों, तालाबों और झीलों जैसे सतही जल स्रोतों में अनुपचारित मल जल यानी सीवेज के पहुंचने से इनका पानी प्रदूषित होकर स्‍वास्‍थ्‍य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन जाता है। इस पानी में कोलीफॉर्म, ई-कोलाई बैक्टीरिया जैसे हानिकारक सूक्ष्मजीवों की भरमार हो जाती है। नतीजतन इस पानी को पीने या घरेलू कामों में इस्‍तेमाल करने से लोग उल्टी और पेट में ऐंठन से लेकर दस्‍त, पेचिश, कॉलरा, गैस्ट्रोएंटेराइटिस (पेट और आंतों में संक्रमण) और टाइफाइड जैसी गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। 

कुछ विशेष प्रकार के ई-कोलाई के संक्रमण से किडनी को गंभीर नुकसान या किडनी फेल होने तक की समस्‍या हो सकती है। जानवरों को यह पानी पिलाने पर वह भी गंभीर संक्रमण का शिकार हो सकते हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने इसी चुनौती से निपटने के लिए प्रकृति की मदद से एक आसान तरीका ढूंढ निकाला है।

ग्रमीण इलाकों के लिए उपयोगी 

यह तकनीक खास तौर पर ग्रमीण इलाकों में छोटे और मध्यम आकार के ऐसे जल स्रोतों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है, जहां घरों, गाय-भैंस के तबेलों या सुअर पालन केंद्रों आदि का मलजल पानी को प्रदूषित करता है। ऐसे ग्रामीण इलाकों में बड़े और महंगे अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र लगाना मुश्किल होता है। इसलिए वहां अरबी के पौधों की मदद से पानी की सफाई करने वाले इस मॉडल का इस्तेमाल एक व्यावहारिक विकल्प बन सकता है।

इस तरह विकसित हुआ अनूठा मॉडल

आईआईटी गुवाहाटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के वेस्ट मैनेजमेंट रिसर्च ग्रुप द्वारा की गई रिसर्च के आधार पर इस प्रकृति आधारित वाटर फिल्‍टरेशन मॉडल को तैयार किया गया है। इसमें विशेष रूप से तैयार की गई हल्‍की ढाल वाली कृत्रिम आर्द्रभूमि प्रणाली में पानी को सीधे एक दिशा में बहने देने के बजाय, अंदर बजरी डाल कर बनाई गई अवरोधक पट्टियों की मदद से टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजारा जाता है। पानी को गुजारने वाले इस रास्‍ते में अरबी (कोलोकेशिया एस्कुलेंटा) के पौधों को लगाकर उसकी जड़ों की मदद से पानी को प्राकृतिक तरीके से साफ किया जाता है। 

इस उपचार प्रणाली की विशेष बनावट के कारण पानी इसके भीतर अधिक समय तक रहता है। इससे उसे पौधों की जड़ों, बजरी और उपयोगी सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आने का ज्यादा मौका मिलता है। ये सूक्ष्मजीव और पौधों की जड़ें मिलकर पानी में मौजूद प्रदूषकों को कम करने में मदद करते हैं। पानी के बहाव के दौरान ऑक्सीजन की उपलब्धता में होने वाले बदलाव भी पानी के जैविक उपचार की प्रक्रियाओं को बढ़ावा देते हैं।

बैक्‍टीरिया की संख्‍या में आई भारी कमी

शोधकर्ताओं ने अपने परीक्षण में पाया कि उनके द्वारा तैयार की गई इस फिल्‍टरेशन प्रणाली से पानी में मौजूद कोलीफॉर्म, ई-कोलाई और अन्‍य बैक्टीरिया के जैविक प्रदूषण को उल्‍लेखनीय रूप से कम किया गया। इसके साथ ही यह पानी में खेतों की मिट्टी के साथ बह कर आने वाले, नाइट्रोजन, पोटेशियम, फास्‍फोरस जैसे पोषक तत्वों, बारीक ठोस कणों और हानिकारक धातुओं को कम करने में सफल हुई। परीक्षण के नतीजों में इस प्रणाली की मदद से पानी में मौजूद टोटल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया की मात्रा करीब 60,000 से घटकर 1,200 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर पाई गई।इसी तरह ई कोलाई का स्तर करीब 2,200 से घटकर 350 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर पर आ गया। 

अरबी के पौधों की वृद्धि भी बढ़ी

इस परीक्षण की एक खास बात यह रही कि इसमें पानी की सफाई के साथ अरबी के पौधों की वृद्धि (ग्रोथ) भी अच्छी देखने को मिली। अध्ययन में उनके तने की लंबाई लगभग दोगुनी हो गई, जबकि पौधों के कुल जैवभार (Biomass) में चार गुने से भी अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस तरह अरबी पौधे प्रदूषित पानी को साफ करने के साथ ही खुद भी अच्छी तरह से विकसित हुए। हालांकि, सूक्ष्मजीवों की संख्या में भारी कमी आने के बावजूद उपचारित पानी को पूरी तरह रोगाणु मुक्त नहीं कहा जा सकता। इसके सुरक्षित इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए पानी की गुणवत्ता और संभावित स्वास्थ्य जोखिमों की जांच की जरूरत बनी रही। इस प्रणाली से साफ किए पानी का इस्तेमाल कुछ गैर-पेय जरूरतों, जैसे नियंत्रित सिंचाई, के लिए किए जाने की संभावना है। लेकिन इसके लिए पानी की गुणवत्ता की अतिरिक्त जांच, खेतों और फसलों पर संभावित प्रभावों का आकलन तथा संबंधित मानकों का पालन किया जाना भी जरूरी होगा।

पानी में इंसानों और पशुओं के मल से  कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पनपते हैं।

बैक्टीरिया के साथ जैविक प्रदूषण, अमोनिया में भी कमी

इस शोध की एक खासियत यह भी है कि इसकी उपयोगिता केवल कोलीफॉर्म और ई-कोलाई बैक्टीरिया घटाने तक सीमित नहीं रही। बल्कि, Journal of Environmental Management में प्रकाशित अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार इस प्रणाली ने सूअर पालन केंद्र से निकले अपशिष्ट जल में कार्बनिक प्रदूषण और अमोनिया की मात्रा भी घटाई। परीक्षण के दौरान पानी में रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD) 2,607 से घटकर 177 मिलीग्राम प्रति लीटर और जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD₅) 1,175 से घटकर 51 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गई। अमोनिया का स्तर भी 173.2 से घटकर 37.8 मिलीग्राम प्रति लीटर हुआ। ये परिणाम बताते हैं कि प्रणाली एक साथ कई तरह के प्रदूषण पर असर डाल सकती है।

बेहतर सफाई के लिए पानी को नौ दिन तक रोकना पड़ा

इस रिसर्च के बारे में साइंस जर्नल Pubmed में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक इस तकनीक के व्यावहारिक इस्तेमाल से जुड़ी एक महत्‍वपूण बात यह है कि अध्ययन में सबसे अच्छा परिणाम तब मिला, जब अपशिष्ट जल को उपचार प्रणाली में लगभग नौ दिन तक रहने दिया गया। इसका अर्थ है कि यह सामान्य घरेलू वाटर फिल्टर की तरह तुरंत पानी साफ करने वाली व्यवस्था नहीं है। 

इसे बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए पर्याप्त जगह, पानी के प्रवाह का नियमन और उपचार क्षमता की योजना बनानी होगी। शोध में इस्तेमाल रिएक्टर का सक्रिय आयतन केवल 24 लीटर था और परीक्षण नियंत्रित परिस्थितियों में किया गया। इसलिए खेतों, पशुपालन केंद्रों या गांवों में इसे लागू करने से पहले बड़े स्तर पर परीक्षण करना जरूरी होगा। यह पहलू तकनीक की संभावनाओं के साथ उसकी व्यावहारिक चुनौतियों को भी सामने लाता है।

कम खर्च और ऊर्जा की बचत

शोध दल के मुताबिक उसका मुख्‍य उद्देश्य प्रदूषित जल को जैविक रूप से पर्यावरण के लिए अधिक सुरक्षित बनाना था। इसी को ध्‍यान में रखते हुए पानी के बहाव को विशेष ढंग से नियंत्रित करके और पौधों तथा सूक्ष्मजीवों की प्राकृतिक सफाई क्षमता का इस्तेमाल करके यह विकसित की गई है। 

इस ऊर्जा-कुशल प्रणाली तकनीक की खासियत यह है कि इसमें बिजली की जरूरत बहुत कम पड़ती है। साथ ही इस प्रणाली का रख रखाव भी आसान होता है। अरबी के साधारण से पौधों और स्थानीय स्तर पर आसानी से उपलब्ध बजरी जैसी सामग्री का इस्तेमाल इसे सरल औश्र ग्रामीण क्षेत्रों के लिए खासतौर पर उपयोगी बनाता है।

गांवों के तालाबों तक पहुंचाना असली चुनौती

जर्नल ऑफ एनवायरमेंटल मैनेजमेंट में प्रकाशित इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इस तकनीक को बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले लंबी अवधि तक वास्तविक परिस्थितियों में इसकी प्रभावशीलता, लागत, रखरखाव और उपचारित पानी की सुरक्षा की जांच करना जरूरी है। इसे देखते हुए शोधकर्ताओं का अगला लक्ष्य प्रयोगशाला में विकसित की गई इस प्रणाली को ज़मीनी स्तर पर क्षेत्रीय परिस्थितियों में आजमा कर परीक्षण के नतीजों की पुष्टि करना है। यदि पायलट प्रोजेक्‍ट में भी उत्साहजनक नतीजे मिलते हैं, तो निश्चित रूप से प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित यह तकनीक ऐसे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए मददगार हो सकती है, जहां महंगी अपशिष्ट जल उपचार की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो सकती हैं। इससे प्रदूषित पानी को सीधे प्राकृतिक जल स्रोतों में जाने से रोक कर स्‍थानीय जल स्रोतों का प्रदूषण कम करने में निश्चित रूप से मिल सकती है।

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