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क्लोरीन एक ऐसा रसायन, जिसका इस्तेमाल पानी को कीटाणुओं से मुक्त करने के लिए किया जाता है। लेकिन रिसाव की स्थिति में यही गैस इंसानी जिंदगी के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। 24 अगस्त 2026 की रात नागपुर के गोधनी स्थित जलशुद्धीकरण केंद्र में हुए क्लोरीन गैस रिसाव ने इस विरोधाभास को बेहद करीब से सामने ला दिया।
देखते ही देखते आसपास के इलाकों में अफरा-तफरी मच गई, लोगों को सांस लेने में परेशानी और आंखों में जलन जैसी शिकायतें होने लगीं और बड़ी संख्या में लोगों को अस्पताल पहुंचाना पड़ा। बाद की रिपोर्टों में अस्पताल में भर्ती लोगों की संख्या 56 बताई गई, जिनमें 8 मरीज ICU में उपचाराधीन थे।
यह सिर्फ एक गैस रिसाव की बात नहीं है। यह उस रसायन के बारे में है, जो एक तरफ करोड़ों लोगों तक सुरक्षित पानी पहुंचाने में मदद करता है और दूसरी तरफ सुरक्षा में जरा-सी चूक होने पर जानलेवा साबित हो सकता है।
क्लोरीन एक अत्यंत महत्वपूर्ण रासायनिक तत्व है, जिसका रासायनिक प्रतीक Cl और परमाणु क्रमांक 17 है। यह आवर्त सारणी के समूह 17 में स्थित है और हैलोजन तत्वों के परिवार का सदस्य है। सामान्य तापमान पर शुद्ध क्लोरीन पीले-हरे रंग की गैस होती है तथा इसकी गंध तीखी और दम घोंटने वाली होती है। रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के अनुसार क्लोरीन का सापेक्ष परमाणु द्रव्यमान 35.45 है और 20°C पर यह गैसीय अवस्था में रहता है।
क्लोरीन का महत्व केवल रसायन विज्ञान तक सीमित नहीं है। जल शोधन, स्विमिंग पूल की सफाई, कागज और कपड़ा उद्योग, प्लास्टिक निर्माण, औषधि निर्माण तथा अनेक औद्योगिक रासायनिक प्रक्रियाओं में क्लोरीन या इसके यौगिकों का व्यापक उपयोग होता है। विशेष रूप से पानी में हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नियंत्रित करने के लिए क्लोरीन का उपयोग सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
क्लोरीन का इतिहास काफी पुराना है। 1774 में स्वीडन में रसायनज्ञ कार्ल विल्हेल्म शीले (Carl Wilhelm Scheele) ने हाइड्रोक्लोरिक अम्ल को मैंगनीज डाइऑक्साइड के साथ गर्म करके एक हरे-पीले रंग की गैस प्राप्त की। उस समय शीले यह पहचान नहीं पाए थे कि उन्होंने एक नए तत्व को अलग किया है।
बाद में ब्रिटिश रसायनज्ञ सर हम्फ्री डेवी (Humphry Davy) ने इस पदार्थ का अध्ययन किया और 1810 में निष्कर्ष निकाला कि यह ऑक्सीजन युक्त यौगिक नहीं, बल्कि स्वयं एक स्वतंत्र रासायनिक तत्व है। Chlorine नाम यूनानी शब्द chloros से संबंधित है, जिसका अर्थ पीला-हरा होता है। इस खोज ने रसायन विज्ञान के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया और आगे चलकर क्लोरीन के औद्योगिक उपयोगों का विस्तार हुआ।
क्लोरीन के कई विशिष्ट भौतिक गुण हैं। इसके प्रमुख गुण इस प्रकार है -
रासायनिक प्रतीक - Cl
परमाणु क्रमांक - 17
सापेक्ष परमाणु द्रव्यमान -35.45
आवर्त सारणी का समूह - 17
आवर्त - 3
सामान्य तापमान पर अवस्था - गैस
रंग - पीला-हरा
गलनांक - लगभग - 101.5°C
क्वथनांक - लगभग -34.04°C
इलेक्ट्रॉन विन्यास - [Ne] 3s² 3p⁵
प्रमुख प्राकृतिक समस्थानिक - Cl-35 और Cl-37
ये आंकड़े रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के आवर्त सारणी संबंधी डेटा पर आधारित हैं।
क्लोरीन अत्यधिक क्रियाशील अधातु है। यह इलेक्ट्रॉन ग्रहण करने की प्रवृत्ति के कारण अनेक अन्य तत्वों के साथ आसानी से यौगिक बनाता है। प्रकृति में मुक्त क्लोरीन सामान्यतः नहीं पाया जाता, बल्कि यह विभिन्न यौगिकों के रूप में मौजूद रहता है।
समुद्री जल और सामान्य नमक में क्लोरीन का महत्वपूर्ण रूप क्लोराइड आयन (Cl⁻) है। सोडियम क्लोराइड यानी सामान्य नमक का रासायनिक सूत्र NaCl है। क्लोरीन हाइड्रोजन के साथ प्रतिक्रिया करके हाइड्रोजन क्लोराइड (HCl) बना सकता है। पानी में HCl घुलने पर हाइड्रोक्लोरिक अम्ल का विलयन प्राप्त होता है। क्लोरीन के यौगिकों का उपयोग रासायनिक उद्योग में बड़े पैमाने पर किया जाता है।
प्रकृति में क्लोरीन - क्लोरीन पृथ्वी पर मुख्यतः यौगिकों के रूप में पाया जाता है। इसका सबसे सामान्य उदाहरण सोडियम क्लोराइड है, जो समुद्री जल और नमक की चट्टानों में पाया जाता है। समुद्र के पानी में बड़ी मात्रा में क्लोराइड आयन मौजूद होते हैं। इसी कारण समुद्री जल को क्लोरीन यौगिकों का एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक स्रोत माना जा सकता है।
मानव शरीर के लिए भी क्लोराइड आयन महत्वपूर्ण है। क्लोराइड शरीर में द्रव संतुलन बनाए रखने और पेट में पाचन के लिए आवश्यक हाइड्रोक्लोरिक अम्ल के निर्माण में भूमिका निभाता है।
क्लोरीन का उत्पादन - औद्योगिक स्तर पर क्लोरीन का उत्पादन मुख्यतः सोडियम क्लोराइड के जलीय विलयन यानी नमकीन पानी (brine) के विद्युत अपघटन द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया को क्लोर-एल्कली प्रक्रिया कहा जाता है।
इस प्रक्रिया से क्लोरीन के साथ-साथ अन्य महत्वपूर्ण रसायन, विशेषकर सोडियम हाइड्रॉक्साइड (NaOH) और हाइड्रोजन (H₂) भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इस प्रकार क्लोरीन का औद्योगिक उत्पादन केवल एक रसायन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे अनेक दूसरे महत्वपूर्ण औद्योगिक पदार्थ भी प्राप्त होते हैं।
जल शोधन में क्लोरीन का महत्व - क्लोरीन का सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण उपयोग पेयजल के कीटाणुशोधन में है। पानी में मौजूद अनेक हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नियंत्रित करने के लिए क्लोरीन या क्लोरीन-आधारित कीटाणुनाशकों का उपयोग किया जाता है। इसी कारण नगरों की जल आपूर्ति और स्विमिंग पूलों में क्लोरीन का उपयोग व्यापक है।
जल शोधन में क्लोरीन का एक बड़ा लाभ यह है कि इसका कुछ अवशिष्ट प्रभाव पानी को वितरण प्रणाली में आगे बढ़ने के दौरान दोबारा सूक्ष्मजीवी संदूषण से बचाने में मदद कर सकता है।
हालांकि पानी में क्लोरीन की मात्रा का उचित नियंत्रण आवश्यक है। अमेरिकी EPA के पेयजल नियमों में क्लोरीन के लिए अधिकतम अवशिष्ट कीटाणुनाशक स्तर (MRDL) 4.0 mg/L निर्धारित है, EPA यह भी बताता है कि बहुत अधिक स्तर पर आंख और नाक में जलन तथा पेट संबंधी असुविधा जैसे प्रभाव हो सकते है।
स्विमिंग पूल में क्लोरीन - स्विमिंग पूल में बड़ी संख्या में लोग पानी के संपर्क में आते हैं। पसीना, त्वचा से निकलने वाले पदार्थ और अन्य जैविक पदार्थ पानी को दूषित कर सकते हैं। इसलिए पूल के पानी को स्वच्छ रखने और सूक्ष्मजीवों को नियंत्रित करने के लिए क्लोरीन-आधारित कीटाणुनाशकों का प्रयोग किया जाता है।
क्लोरीन की मात्रा बहुत कम होने पर कीटाणु नियंत्रण पर्याप्त नहीं हो सकता, जबकि अत्यधिक मात्रा में क्लोरीन से आंखों और त्वचा में जलन हो सकती है। इसलिए पूल के पानी में उचित रासायनिक संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
उद्योगों में क्लोरीन के उपयोग - क्लोरीन का औद्योगिक महत्व बहुत व्यापक है। इसका प्रयोग अनेक रसायनों और उपभोक्ता उत्पादों के निर्माण में किया जाता है। रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री के अनुसार क्लोरीन का उपयोग कागज, पेंट, कपड़ा और कीटनाशक सहित अनेक उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।
क्लोरीन से बनने वाले महत्वपूर्ण पदार्थों में PVC (पॉलीविनाइल क्लोराइड) भी शामिल है। PVC का उपयोग खिड़की के फ्रेम, पानी की पाइप, विद्युत तारों की इंसुलेशन सामग्री, फर्श और कई अन्य उत्पादों में होता है। RSC के अनुसार उत्पादित क्लोरीन का लगभग 20% PVC के निर्माण में उपयोग होता है।
कागज और कपड़ा उद्योग में उपयोग - क्लोरीन और इसके यौगिकों का उपयोग कागज तथा कपड़ा उद्योग में ब्लीचिंग और अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं में किया गया है। आधुनिक उद्योग में पर्यावरणीय प्रभावों को ध्यान में रखते हुए विभिन्न ब्लीचिंग तकनीकों का उपयोग किया जाता है।
क्लोरीन-आधारित रसायनों की ब्लीचिंग क्षमता का संबंध उनकी ऑक्सीकरण क्षमता से है। यही गुण उन्हें कुछ प्रकार के औद्योगिक उपचार और कीटाणुशोधन के लिए उपयोगी बनाता है।
औषधि निर्माण में क्लोरीन की भूमिका - क्लोरीन आधुनिक औषधि उद्योग में भी महत्वपूर्ण है। अनेक दवाओं के निर्माण में क्लोरीन या क्लोरीन युक्त रासायनिक मध्यवर्ती पदार्थ किसी न किसी चरण में उपयोग किए जाते हैं। Royal Society of Chemistry के अनुसार लगभग 85% फार्मास्यूटिकल्स के निर्माण में किसी चरण पर क्लोरीन या उसके यौगिकों का उपयोग होता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी ऐसी दवाओं में मुक्त क्लोरीन मौजूद होता है। अक्सर क्लोरीन का उपयोग रासायनिक संश्लेषण की प्रक्रिया में एक मध्यवर्ती या प्रतिक्रियाशील समूह के रूप में होता है।
क्लोरीन और प्लास्टिक उद्योग - आज के समय में क्लोरीन का एक महत्वपूर्ण उपयोग PVC के निर्माण में होता है। PVC अपेक्षाकृत बहुमुखी प्लास्टिक है और इसका इस्तेमाल निर्माण, विद्युत, चिकित्सा तथा घरेलू क्षेत्रों में किया जाता है।
उदाहरण के लिए PVC से पानी की पाइप, विद्युत तारों की इन्सुलेशन सामग्री, फर्श की सामग्री और कुछ चिकित्सा उत्पाद बनाए जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि क्लोरीन केवल सफाई या जल शोधन से जुड़ा रसायन नहीं है, बल्कि आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था में भी इसकी बड़ी भूमिका है।
घरेलू ब्लीच में सामान्यतः सोडियम हाइपोक्लोराइट (NaOCl) जैसे क्लोरीन-आधारित यौगिक का उपयोग किया जाता है। यह मुक्त क्लोरीन गैस के समान पदार्थ नहीं है, बल्कि पानी में घुला हुआ एक अलग रासायनिक यौगिक है।
सोडियम हाइपोक्लोराइट का उपयोग सफाई, सतहों के कीटाणुशोधन और कुछ जल-शोधन प्रक्रियाओं में किया जाता है। लेकिन इसके साथ सावधानी आवश्यक है।
विशेष रूप से ब्लीच को अम्लीय क्लीनर या अन्य असंगत सफाई रसायनों के साथ मिलाना खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इससे जहरीली गैसें उत्पन्न हो सकती हैं। CDC के अनुसार सोडियम हाइपोक्लोराइट वाले उत्पाद अम्लों के संपर्क में आने पर क्लोरीन गैस छोड़ सकते हैं।
भारत में क्लोरीन का उत्पादन मुख्य रूप से क्लोर-एल्कली उद्योग में होता है। इस प्रक्रिया में नमक के घोल (ब्राइन) का इलेक्ट्रोलिसिस करके कास्टिक सोडा, क्लोरीन और हाइड्रोजन तैयार किए जाते हैं। क्लोरीन, कास्टिक सोडा के उत्पादन के दौरान निकलने वाला सह-उत्पाद है।
एक टन कास्टिक सोडा के साथ लगभग 0.7 टन क्लोरीन बनता है। भारत दुनिया के प्रमुख क्लोर-एल्कली उत्पादकों में शामिल है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार 2024 में देश में कास्टिक सोडा का उत्पादन लगभग 36 लाख टन से अधिक रहा। यानी कि देश में क्लोरीन का उत्पादन 25 लाख टन से अधिक रहता है।
क्लोरीन का उपयोगी होना और उसका सुरक्षित होना दो अलग-अलग बातें हैं। मुक्त क्लोरीन गैस विषैली और अत्यधिक उत्तेजक गैस है। अधिक सांद्रता में इसके संपर्क से आंखों, त्वचा और श्वसन तंत्र को गंभीर नुकसान हो सकता है। CDC के अनुसार क्लोरीन गैस नम ऊतकों जैसे आंखों, गले और फेफड़ों के संपर्क में आने पर ऐसे रासायनिक प्रभाव पैदा कर सकती है जो इन ऊतकों को नुकसान पहुंचाते है।
किसी व्यक्ति पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह कितनी मात्रा में क्लोरीन के संपर्क में आया, कितनी देर तक संपर्क रहा और संपर्क किस प्रकार हुआ।
क्लोरीन के अनेक महत्वपूर्ण लाभ है -
पेयजल कीटाणुशोधन - हानिकारक सूक्ष्मजीवों को नियंत्रित करने में मदद करता है।
स्विमिंग पूल की स्वच्छता - पानी में सूक्ष्मजीवी नियंत्रण के लिए उपयोगी है।
औद्योगिक उपयोग - अनेक रसायनों और उत्पादों के निर्माण में महत्वपूर्ण कच्चा पदार्थ है।
PVC निर्माण - पाइप, विद्युत इंसुलेशन और अनेक प्लास्टिक उत्पादों के निर्माण में योगदान देता है।
कागज और कपड़ा उद्योग - ब्लीचिंग तथा अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं में उपयोग।
औषधि उद्योग - कई दवाओं के रासायनिक संश्लेषण में उपयोग।
सफाई और कीटाणुशोधन - क्लोरीन-आधारित यौगिक विभिन्न सैनिटाइजिंग उत्पादों में उपयोग किए जाते है।
क्लोरीन का उपयोग लाभदायक है, लेकिन इसके कुछ पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी पहलू भी हैं। जल के कीटाणुशोधन के दौरान कुछ परिस्थितियों में disinfection by-products (DBPs) बन सकते हैं। EPA के अनुसार इनमें ट्राइहैलोमीथेन (TTHMs) और हैलोजेनेटेड एसीटिक अम्ल (HAA5) जैसे पदार्थ शामिल हो सकते हैं, जिनके लिए पेयजल में नियामक सीमाएँ निर्धारित की जाती हैं।
इसलिए जल शोधन में केवल क्लोरीन डालना पर्याप्त नहीं है, सही मात्रा, पानी की गुणवत्ता, संपर्क समय और उपचार प्रक्रिया का वैज्ञानिक नियंत्रण भी जरूरी है।
कुछ आपातकालीन परिस्थितियों में, जब सामान्य जल आपूर्ति बाधित हो जाती है, जल को कीटाणुरहित करने के लिए उचित क्लोरीन-आधारित उत्पादों का इस्तेमाल किया जा सकता है। EPA की आपातकालीन जल-शोधन मार्गदर्शिका के अनुसार केवल उपयुक्त, बिना सुगंध वाला और लेबल के अनुसार कीटाणुशोधन के लिए इस्तेमाल योग्य घरेलू ब्लीच का उपयोग किया जाना चाहिए।
हालांकि यह समझना जरूरी है कि कीटाणुशोधन सभी प्रकार के जल प्रदूषकों को नहीं हटाता। उदाहरण के लिए, EPA बताता है कि उबालने या सामान्य कीटाणुशोधन से भारी धातुओं, लवणों और अधिकांश रासायनिक प्रदूषकों को हटाया नहीं जाता।
इसलिए संदिग्ध जल की स्थिति में स्थानीय स्वास्थ्य या जल प्राधिकरण की आधिकारिक सलाह का पालन करना सबसे सुरक्षित तरीका है।
क्लोरीन के विभिन्न रासायनिक रूपों के प्रभाव बिल्कुल अलग हो सकते है। मुक्त क्लोरीन गैस अत्यंत विषैली है, जबकि क्लोराइड आयन मानव शरीर के सामान्य जैविक कार्यों के लिए आवश्यक है। सामान्य नमक में मौजूद क्लोराइड शरीर में द्रव संतुलन से संबंधित प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है। पेट में मौजूद हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भी पाचन प्रक्रिया के लिए आवश्यक है।
इससे यह समझना महत्वपूर्ण है कि क्लोरीन शब्द सुनकर हर बार एक ही रासायनिक पदार्थ की कल्पना नहीं करनी चाहिए। क्लोरीन गैस, क्लोराइड आयन, सोडियम हाइपोक्लोराइट और अन्य क्लोरीन यौगिक रासायनिक रूप से अलग पदार्थ है।
क्लोरीन को केवल पानी साफ करने वाला रसायन समझना पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसा तत्व है जिसने आधुनिक रसायन विज्ञान, सार्वजनिक स्वास्थ्य और उद्योग के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है -लेकिन इसके लाभ तभी सुरक्षित रूप से प्राप्त किए जा सकते हैं जब इसके रासायनिक गुणों और संभावित खतरों को समझकर इसका उचित उपयोग किया जाए।
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