फ़ोटो - विकीकॉमंस

प्रदूषण और जलगुणवत्ता

भूजल में नाइट्रेट: कैसे बढ़ रहा है खतरा, किन जिलों में सबसे ज्यादा समस्या और क्या है समाधान ?

इस लेख में भारत में भूजल में बढ़ते नाइट्रेट प्रदूषण की स्थिति, इसके प्रमुख कारणों, प्रभावित राज्यों एवं जिलों, मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों तथा रोकथाम एवं नियंत्रण के उपायों की विस्तृत जानकारी है।

Author : सयाली पराते

आज कई क्षेत्रों में यही पानी धीरे-धीरे प्रदूषित हो रहा है। भूजल में पाए जाने वाले रासायनिक प्रदूषकों में नाइट्रेट (Nitrate) एक प्रमुख चिंता का विषय बन चुका है। नाइट्रेट पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्व है, लेकिन जब इसकी मात्रा पानी में अधिक हो जाती है तो यह मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए खतरा बन सकता है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में नाइट्रेट प्रदूषण की समस्या मुख्य रूप से खेती में रासायनिक उर्वरकों के अधिक उपयोग, पशु अपशिष्ट और घरेलू सीवेज के कारण बढ़ रही है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पीने के पानी के लिए भूजल पर निर्भर है, इसलिए पानी में बढ़ता नाइट्रेट एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बन गया है।

नाइट्रेट क्या है?

नाइट्रेट (NO3) नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का एक यौगिक है। यह प्राकृतिक रूप से हवा, मिट्टी, पानी और कुछ खाद्य पदार्थों में पाया जाता है। पौधों और जानवरों को जीवित रहने और बढ़ने के लिए नाइट्रेट की आवश्यकता होती है और मानव शरीर भी इस यौगिक का उत्पादन करता है। नाइट्रेट नाइट्रोजन का एक प्रमुख रूप है, जो पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक होता है।

बहुत सारी जगहों पर उद्योग में, नाइट्रेट का उपयोग फसलों और लॉन के लिए उर्वरक के रूप में किया जाता है। इसके अलावा, नाइट्रेट का उपयोग खाद्य संरक्षण, कुछ औषधीय दवाओं के साथ-साथ गोला-बारूद और विस्फोटकों के निर्माण में भी किया जाता है। 

फसल उत्पादन बढ़ाने के लिए किसान नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों जैसे यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य रासायनिक खादों का उपयोग करते है। पौधे अपनी आवश्यकता के अनुसार नाइट्रेट को ग्रहण कर लेते है, लेकिन अतिरिक्त मात्रा मिट्टी में जमा होकर बारिश या सिंचाई के पानी के साथ नीचे जाकर भूजल में मिल सकती है। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण को जन्म देती है।

नाइट्रेट और नाइट्राइट में अंतर

नाइट्राइट (NO2) और नाइट्रेट (NO3) दोनों नाइट्रोजन आधारित आयन हैं जो प्राकृतिक रूप से मिट्टी, पानी और कुछ खाद्य पदार्थों में पाए जाते है। रासायनिक रूप से, इनमें केवल एक ऑक्सीजन परमाणु का अंतर होता है। लेकिन यह छोटा सा बदलाव इनके व्यवहार, स्थिरता और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों में महत्वपूर्ण अंतर पैदा करता है।

नाइट्रेट आमतौर पर अधिक स्थिर और कम प्रतिक्रियाशील होते है। हालांकि नाइट्राइट रासायनिक रूप से अधिक सक्रिय होते है और नाइट्रोसेमाइन के निर्माण का कारण बन सकते है, जो हानिकारक माने जाते है। इन दोनों यौगिकों की निगरानी करना आवश्यक है विशेष रूप से उन मामलों में जहां ये पीने के पानी, खाद्य उत्पादों या दवाइयों के अवयवों में प्रवेश कर सकते है। कई बार लोग नाइट्रेट और नाइट्राइट को एक ही समझ लेते है, लेकिन दोनों अलग-अलग रासायनिक रूप है।

नाइट्रेट (NO3) -  नाइट्रोजन का अधिक स्थिर रूप है और पानी में आसानी से घुल जाता है।

नाइट्राइट (NO2) - नाइट्रेट की तुलना में कम स्थिर होता है और शरीर में अधिक प्रतिक्रियाशील हो सकता है। प्राकृतिक चक्र में नाइट्रेट और नाइट्राइट दोनों नाइट्रोजन चक्र का हिस्सा है।

पानी में नाइट्रेट की सुरक्षित सीमा कितनी है?

शिशु स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए, पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) और पेंसिल्वेनिया पर्यावरण संरक्षण विभाग (डीईपी) ने सार्वजनिक जल आपूर्ति में नाइट्रेट के लिए मानक और सीमाएं निर्धारित की है। इसके अनुसार आपूर्ति में 45 मिलीग्राम/लीटर से अधिक नाइट्रेट या 10 मिलीग्राम/लीटर से अधिक नाइट्रेट-नाइट्रोजन नहीं होना चाहिए। हालांकि निजी कुएं ईपीए या डीईपी के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते है, फिर भी यह सलाह दी जाती है कि वे इन सीमाओं का पालन करे।

नाइट्रेट आपके जल आपूर्ति में अन्य दूषित पदार्थों की उपस्थिति का संकेत दे सकता है। कीटनाशकों जैसे अन्य घुलनशील पदार्थ नाइट्रेट से अधिक हानिकारक हो सकते है। 

भारतीय मानक ब्यूरो के अनुसार पीने योग्य पानी में नाइट्रेट की अधिकतम स्वीकार्य सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर (mg/L) है। यदि पानी में नाइट्रेट की मात्रा इससे अधिक हो जाती है, तो यह स्वास्थ्य के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।

भूजल में नाइट्रेट बढ़ने के प्रमुख कारण

रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग -  कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए किसान नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का प्रयोग करते है। लेकिन जब खेतों में आवश्यकता से अधिक यूरिया या अन्य उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है, तो अतिरिक्त नाइट्रेट मिट्टी में रह जाता है। बारिश और सिंचाई के पानी के साथ यह नाइट्रेट जमीन के नीचे पहुंचकर भूजल को प्रभावित करता है।

पशुओं के अपशिष्ट से प्रदूषण - पशुओं के गोबर और मूत्र में नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होती है। जब पशु अपशिष्ट का उचित प्रबंधन नहीं किया जाता, तो यह मिट्टी में जाकर नाइट्रेट में बदल सकता है और भूजल को प्रदूषित कर सकता है।

सीवेज और घरेलू कचरा - शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बिना उपचारित सीवेज का रिसाव भी भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बढ़ा सकता है। खुले नाले, खराब सीवर व्यवस्था और कचरे का गलत निपटान इसके प्रमुख कारण हैं।

औद्योगिक गतिविधियां - कुछ उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट भी जल स्रोतों में नाइट्रोजन युक्त रसायनों को बढ़ा सकता है।

भारत में भूजल पीने के पानी का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है। ग्रामीण क्षेत्रों में करोड़ों लोग अपनी दैनिक जल आवश्यकताओं के लिए भूजल पर निर्भर है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में कृषि के तीव्र विस्तार, रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग, बढ़ती आबादी और अपर्याप्त अपशिष्ट प्रबंधन के कारण भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण तेजी से बढ़ा है। 

यह प्रदूषण केवल जल की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता, बल्कि मानव स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण के लिए भी गंभीर चुनौती बन चुका है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI) के अनुसार, कई क्षेत्रों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा सुरक्षित सीमा से अधिक पाई जा रही है। 

भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण के प्रमुख कारण

भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण कृषि में यूरिया, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का अत्यधिक एवं असंतुलित उपयोग है। फसलें जितनी नाइट्रोजन उपयोग नहीं कर पातीं, उतनी अतिरिक्त नाइट्रेट वर्षा या सिंचाई के पानी के साथ मिट्टी की गहराई में चली जाती है और अंत में भूजल में मिल जाती है।

इसके अलावा पशुओं के गोबर का अनुचित निस्तारण, सेप्टिक टैंक का रिसाव, घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट तथा ठोस कचरे के खुले डंपिंग स्थल भी नाइट्रेट प्रदूषण के प्रमुख स्रोत है। अधिक सिंचाई, रेतीली मिट्टी तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में नाइट्रेट का रिसाव और भी तेज़ी से होता है। 

भूजल में नाइट्रेट कैसे पहुंचता है?

खेतों में आवश्यकता से अधिक उर्वरक का इस्तेमाल इसका सबसे बड़ा कारण हो सकता है। पौधे केवल सीमित मात्रा में ही नाइट्रोजन का उपयोग कर पाते है। शेष नाइट्रेट पानी में आसानी से घुलकर मिट्टी की परतों से नीचे की ओर रिसता है। धीरे-धीरे यह जलभृत तक पहुंच जाता है और भूजल को प्रदूषित कर देता है। यही प्रक्रिया लीचिंग कहलाती है। भूजल में एक बार नाइट्रेट पहुंच जाने के बाद इसे प्राकृतिक रूप से हटने में कई वर्ष लग सकते है। 

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

भूजल में नाइट्रेट की अधिक मात्रा मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के अनुसार पीने के पानी में नाइट्रेट की स्वीकार्य सीमा 45 मिलीग्राम प्रति लीटर है। इससे अधिक मात्रा वाला पानी लंबे समय तक पीने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं  उत्पन्न हो सकती है। 

ब्लू बेबी सिंड्रोम - नाइट्रेट प्रदूषण का सबसे गंभीर प्रभाव छोटे बच्चों पर पड़ता है। जब अधिक मात्रा में नाइट्रेट शरीर में पहुंचता है, तो यह रक्त में हीमोग्लोबिन को प्रभावित कर सकता है। इससे रक्त की ऑक्सीजन पहुंचाने की क्षमता कम हो जाती है।

इस स्थिति को मेटहीमोग्लोबिनेमिया (Methemoglobinemia) कहते है, जिसे सामान्य भाषा में ब्लू बेबी सिंड्रोम कहा जाता है। इसके लक्षण त्वचा का नीला पड़ना, सांस लेने में परेशानी, कमजोरी और थकान

गर्भवती महिलाओं और शिशुओं पर खतरा - छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं में नाइट्रेट युक्त पानी का प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है। इसलिए पेयजल की गुणवत्ता की जांच जरूरी है।

लंबे समय तक सेवन के प्रभाव - लंबे समय तक अधिक नाइट्रेट वाला पानी पीने से स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वैज्ञानिक अध्ययनों में नाइट्रेट और कुछ स्वास्थ्य समस्याओं के बीच संभावित संबंधों का अध्ययन किया गया है।

कृषि और पर्यावरण पर प्रभाव

नाइट्रेट प्रदूषण केवल पीने के पानी तक सीमित नहीं है। यह नदियों, तालाबों और झीलों में पहुंचकर यूट्रोफिकेशन की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है। इससे शैवाल की अत्यधिक वृद्धि होती है, जल में घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है और मछलियों सहित अन्य जलीय जीवों का जीवन प्रभावित होता है। लगातार बढ़ता नाइट्रेट प्रदूषण जल पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को भी बिगाड़ देता है। 

देश के 423 जिलों के भूजल में पाया गया नाइट्रेट 

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की रिपोर्ट के अनुसार देश के 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 423 जिलों के कुछ हिस्सों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा 45 mg/l से अधिक पाई गई है, जो पेयजल के लिए निर्धारित मानकों से अधिक है। 

राज्यवार आंकड़ों में उत्तर प्रदेश सबसे अधिक प्रभावित राज्य है, जहां 59 जिलों में नाइट्रेट प्रदूषण दर्ज किया गया है। इसके बाद मध्य प्रदेश के 51 जिले, राजस्थान के 33 जिले, महाराष्ट्र के 30 जिले, जबकि कर्नाटक और तमिलनाडु के 29-29 जिले नाइट्रेट से प्रभावित हैं। 

इसके अलावा ओडिशा (28), गुजरात (24), हरियाणा और पंजाब (21-21) जैसे राज्यों में भी बड़ी संख्या में जिले प्रभावित पाए गए है। वहीं, असम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, मणिपुर, मेघालय, नागालैंड, त्रिपुरा और अंडमान-निकोबार जैसे राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में नाइट्रेट प्रभावित जिलों की संख्या दर्ज नहीं की गई है।

क्र. सं.राज्य/केंद्र शासित प्रदेशप्रभावित जिलों की संख्यानाइट्रेट (45 मि.ग्रा./लीटर से अधिक) वाले जिले
1आंध्र प्रदेश13श्रीकाकुलम, विजयनगरम, विशाखापट्टनम, पूर्व गोदावरी, पश्चिम गोदावरी, कृष्णा, गुंटूर, प्रकाशम, नेल्लोर, चित्तूर, कडप्पा, कुरनूल, अनंतपुर
2तेलंगाना10आदिलाबाद, निजामाबाद, करीमनगर, वारंगल, खम्मम, हैदराबाद, महबूबनगर, मेडक, रंगारेड्डी, नलगोंडा
5बिहार10औरंगाबाद, बांका, भागलपुर, भोजपुर, दरभंगा, कैमूर (भभुआ), पटना, रोहतास, सारण, सिवान
6छत्तीसगढ़12बस्तर, बिलासपुर, दंतेवाड़ा, धमतरी, जशपुर, कांकेर, कवर्धा, कोरबा, महासमुंद, रायगढ़, रायपुर, राजनांदगांव
7दिल्ली8पूर्वी दिल्ली, मध्य दिल्ली, नई दिल्ली, उत्तरी दिल्ली, उत्तर-पश्चिम दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली, दक्षिण-पश्चिम दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली
9गुजरात24अहमदाबाद, अमरेली, आनंद, बनासकांठा, भरूच, भावनगर, दाहोद, जामनगर, जूनागढ़, कच्छ, खेड़ा, महेसाणा, नर्मदा, नवसारी, पंचमहल, पाटन, पोरबंदर, राजकोट, साबरकांठा, सूरत, सुरेंद्रनगर, वडोदरा, गांधीनगर, डांग
10हरियाणा21अंबाला, भिवानी, फरीदाबाद, फतेहाबाद, गुरुग्राम, हिसार, झज्जर, जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, महेंद्रगढ़, पंचकूला, पानीपत, रेवाड़ी, रोहतक, सिरसा, सोनीपत, यमुनानगर, मेवात, पलवल
11हिमाचल प्रदेश6ऊना, सोलन, हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी, कुल्लू
12जम्मू एवं कश्मीर6जम्मू, कठुआ, अनंतनाग, कुपवाड़ा, राजौरी, सांबा
13झारखंड11चतरा, गढ़वा, गोड्डा, गुमला, लोहरदगा, पाकुड़, पलामू, पश्चिमी सिंहभूम, पूर्वी सिंहभूम, रांची, साहिबगंज
14कर्नाटक29बागलकोट, बेंगलुरु, बेलगावी, बल्लारी, बीदर, बीजापुर, चिकमगलूर, चित्रदुर्ग, दावणगेरे, धारवाड़, गदग, कलबुर्गी, हासन, हावेरी, कोडगु, कोलार, कोप्पल, मांड्या, रायचूर, शिवमोग्गा, उडुपी, उत्तर कन्नड़, चामराजनगर, चिक्कबल्लापुर, मैसूर, रामनगर, बेंगलुरु ग्रामीण, तुमकुरु, यादगिर
15केरल11अलप्पुझा, इडुक्की, कोल्लम, कोट्टायम, कोझिकोड, मलप्पुरम, पलक्कड़, पथानमथिट्टा, तिरुवनंतपुरम, त्रिशूर, वायनाड
16मध्य प्रदेश51आगर मालवा, अलीराजपुर, अनूपपुर, अशोकनगर, बालाघाट, बड़वानी, बैतूल, भिंड, भोपाल, बुरहानपुर, छतरपुर, छिंदवाड़ा, दमोह, दतिया, देवास, धार, डिंडोरी, गुना, ग्वालियर, हरदा, नर्मदापुरम (होशंगाबाद), इंदौर, जबलपुर, झाबुआ, खंडवा, खरगोन, कटनी, मंडला, मंदसौर, मुरैना, नरसिंहपुर, नीमच, पन्ना, रायसेन, राजगढ़, रतलाम, रीवा, सागर, सतना, सीहोर, सिवनी, शहडोल, शाजापुर, श्योपुर, शिवपुरी, सीधी, सिंगरौली, टीकमगढ़, उज्जैन, उमरिया, विदिशा
17महाराष्ट्र30अहमदनगर, अकोला, अमरावती, औरंगाबाद, बीड, भंडारा, बुलढाणा, चंद्रपुर, धुले, गढ़चिरौली, गोंदिया, हिंगोली, जलगांव, जालना, कोल्हापुर, लातूर, मुंबई (शहरी), नागपुर, नांदेड़, नंदुरबार, नासिक, उस्मानाबाद, परभणी, पुणे, सांगली, सतारा, सोलापुर, वर्धा, वाशिम, यवतमाल
21ओडिशा28अंगुल, बालासोर, बरगढ़, भद्रक, बोलांगीर, बौध, कटक, देवगढ़, ढेंकानाल, गजपति, गंजाम, जगतसिंहपुर, जाजपुर, झारसुगुड़ा, कालाहांडी, केंद्रापड़ा, क्योंझर, खुर्दा, कोरापुट, मलकानगिरी, मयूरभंज, नुआपड़ा, नयागढ़, फुलबनी, पुरी, संबलपुर, सुंदरगढ़, सोनपुर
22पंजाब21अमृतसर, बरनाला, बठिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, जालंधर, कपूरथला, लुधियाना, मानसा, मोगा, मुक्तसर, नवांशहर, पटियाला, रूपनगर, रोपड़, संगरूर, तरनतारन, एसएएस नगर
23राजस्थान33अजमेर, अलवर, बांसवाड़ा, बारां, बाड़मेर, बूंदी, भरतपुर, भीलवाड़ा, बीकानेर, चित्तौड़गढ़, चूरू, दौसा, धौलपुर, डूंगरपुर, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, जयपुर, जैसलमेर, जालौर, झालावाड़, झुंझुनूं, जोधपुर, करौली, कोटा, नागौर, पाली, प्रतापगढ़, राजसमंद, सिरोही, सीकर, सवाई माधोपुर, टोंक, उदयपुर
24तमिलनाडु29चेन्नई, कोयंबटूर, कुड्डालोर, धर्मपुरी, डिंडीगुल, इरोड, कांचीपुरम, कन्याकुमारी, करूर, मदुरै, नमक्कल, नीलगिरि, पेरम्बलूर, पुदुकोट्टई, रामनाथपुरम, सलेम, शिवगंगा, थेनी, तिरुवन्नामलाई, तंजावुर, तिरुनेलवेली, तिरुवल्लूर, तिरुचिरापल्ली, तूतीकोरिन, वेल्लोर, विलुप्पुरम, विरुधुनगर, नागपट्टिनम, तिरुप्पुर
26उत्तर प्रदेश59आगरा, अलीगढ़, प्रयागराज, अंबेडकर नगर, औरैया, आजमगढ़, बदायूं, बागपत, बलरामपुर, बांदा, बाराबंकी, बरेली, बस्ती, बिजनौर, बुलंदशहर, चित्रकूट, एटा, फतेहपुर, फिरोजाबाद, गौतम बुद्ध नगर, गाजियाबाद, गाजीपुर, हमीरपुर, हरदोई, हाथरस, जौनपुर, झांसी, कन्नौज, कानपुर देहात, लखीमपुर खीरी, महोबा, मथुरा, मेरठ, मऊ, मुरादाबाद, मुजफ्फरनगर, मिर्जापुर, रायबरेली, संत रविदास नगर, शाहजहाँपुर, सीतापुर, सोनभद्र, सुल्तानपुर, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, उन्नाव, बलिया, फर्रुखाबाद, अमरोहा (जेपी नगर), जालौन, कानपुर नगर, कासगंज, कौशाम्बी, ललितपुर, लखनऊ, मैनपुरी, सहारनपुर, शामली, वाराणसी
27उत्तराखंड4अल्मोड़ा, देहरादून, हरिद्वार, ऊधम सिंह नगर
28पश्चिम बंगाल5बाँकुड़ा, बर्धमान, बीरभूम, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना
30दमन एवं दीव1दीव
31पुडुचेरी1कराईकल
कुल23 राज्य/केंद्र शासित प्रदेश423 जिलों के भागवर्ष 2019

रोकथाम और नियंत्रण के उपाय

नाइट्रेट प्रदूषण को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण उपाय संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना है। किसानों को मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए। नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों को एक साथ अधिक मात्रा में डालने के बजाय विभाजित खुराक में देना अधिक प्रभावी होता है।

इसके अलावा जैविक खादों का संतुलित उपयोग, फसल चक्र अपनाना, ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देना, वर्षा जल संचयन तथा भूजल पुनर्भरण जैसी तकनीकों का उपयोग भी प्रदूषण कम करने में सहायक है। ग्रामीण क्षेत्रों में सेप्टिक टैंक का वैज्ञानिक निर्माण और घरेलू अपशिष्ट का उचित प्रबंधन भी आवश्यक है। 

भूजल में नाइट्रेट प्रदूषण आज भारत के सामने उभरती हुई एक गंभीर पर्यावरणीय और सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। यह समस्या केवल कृषि तक सीमित नहीं, बल्कि जल प्रबंधन, स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ी हुई है। 

भूजल से नाइट्रेट हटाने की रणनीतियां 

भूजल में नाइट्रेट की अधिक मात्रा को कम करने और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए मुख्य रूप से दो प्रकार की रणनीतियां अपनाई जाती है। पहली बिना उपचार और दूसरी उपचार आधारित रणनीति। इन दोनों का उद्देश्य भूजल में नाइट्रेट की मात्रा को सुरक्षित स्तर तक लाना है।

बिना उपचार (Non-treatment) की रणनीति

बिना उपचार की रणनीति में ऐसे सरल उपाय अपनाए जाते हैं, जिनमें पानी का रासायनिक उपचार किए बिना ही नाइट्रेट की सांद्रता कम करने का प्रयास किया जाता है। इसका पहला तरीका कम नाइट्रेट वाले जल को अधिक नाइट्रेट वाले जल के साथ मिलाना है। 

उदाहरण के लिए, यदि किसी कुएं के पानी में 15 मिलीग्राम प्रति लीटर नाइट्रेट है और दूसरे स्रोत के पानी में 5 मिलीग्राम प्रति लीटर नाइट्रेट है, तो दोनों को समान मात्रा में मिलाने पर लगभग 10 मिलीग्राम प्रति लीटर की सुरक्षित सांद्रता प्राप्त की जा सकती है।

दूसरा तरीका प्रदूषित जल स्रोत को बदलना है। इसमें अत्यधिक नाइट्रेट युक्त भूजल का उपयोग बंद कर उसकी जगह किसी स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल स्रोत से पानी उपलब्ध कराया जाता है। यह उपाय उन क्षेत्रों में अधिक प्रभावी माना जाता है जहाँ वैकल्पिक जल स्रोत उपलब्ध हों।

तीसरी रणनीति क्षेत्रीय जल आपूर्ति प्रणाली से जोड़ना (Regional Water Supply System) है। इस व्यवस्था में नाइट्रेट से प्रदूषित स्थानीय कुओं का उपयोग करने के बजाय पहले से स्थापित क्षेत्रीय जलापूर्ति प्रणाली से लोगों को पेयजल उपलब्ध कराया जाता है। इससे प्रदूषित जल के उपयोग से बचा जा सकता है।

यदि नाइट्रेट प्रदूषण केवल किसी सीमित क्षेत्र तक ही है, तो ये उपाय प्रभावी साबित हो सकते हैं। इससे जल गुणवत्ता की निगरानी की लागत भी कम होती है और अधिक लोगों तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाया जा सकता है। हालांकि यदि नाइट्रेट प्रदूषण व्यापक क्षेत्र में फैला हो, तो केवल पानी को उबालने या दूसरे घरेलू प्रयोगों से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि कई बार स्थिति और गंभीर हो सकती है।

नाइट्रेट युक्त पानी का क्या है उपचार?

जब भूजल में नाइट्रेट की मात्रा बहुत अधिक होती है और बिना उपचार के पानी पीना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। खास तौर से नवजात शिशुओं को तो नाइट्रेट पानी जरा भी नहीं देना चाहिए। घरों में आम तौर पर लोग पानी को उबाल लेते हैं, लेकिन पानी उबालने से नाइट्रेट खत्म नहीं होता। यहां तक यूवी प्‍यूरइफायर से भी नहीं। 

इसके मात्र तीन विकल्प हैं- 

डिस्टिलेशन 

यह बेहद महंगी तकनीक है, इसमें पानी को उबालते हैं और भाप को दूसरे बर्तन में एकत्र करके पानी में परिवर्तित कर लेते हैं। यह पानी का सबसे शुद्ध रूप होता है।  

रिवर्स ऑस्‍मोसिस (आर ओ) 

वर्तमान में उपलब्ध कोई भी तकनीक भूजल से नाइट्रेट को पूरी तरह हटाने में शत-प्रतिशत सक्षम नहीं है। इन तकनीकों की प्रभावशीलता जल की गुणवत्ता, संयंत्र के संचालन और अन्य प्रदूषकों की उपस्थिति पर निर्भर करती है। रिवर्स ऑस्मोसिस तकनीक का उपयोग आम तौर पर शहरों में किया जाता है। जिससे निकलने वाले पानी को हम आर ओ वॉटर कते हैं। 

आयन विनिमय (Ion Exchange)

आयन विनिमय तकनीक में विशेष प्रकार के रेजिन का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में पानी में मौजूद नाइट्रेट आयनों को क्लोराइड आयनों से बदल दिया जाता है। चूंकि पानी विद्युत रूप से तटस्थ रहता है, इसलिए एक ऋणात्मक आयन को हटाने के लिए उसकी जगह दूसरा ऋणात्मक आयन जोड़ा जाता है। इस प्रकार नाइट्रेट की मात्रा कम हो जाती है और पानी पीने योग्य बन सकता है।

हालांकि, इस प्रक्रिया की सफलता पानी में मौजूद अन्य ऋणात्मक आयनों, जैसे बाइकार्बोनेट, सल्फेट और क्लोराइड, की मात्रा पर भी निर्भर करती है। यदि इन आयनों की सांद्रता अधिक हो, तो आयन विनिमय की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसलिए इस तकनीक के प्रभावी संचालन के लिए नियमित निगरानी और रेजिन के पुनर्जीवन की आवश्यकता होती है।

चिंता का विषय नाइट्रेट 

केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार देश के कई राज्यों में भूजल की गुणवत्ता चिंता का विषय बनी हुई है। वैज्ञानिक अध्ययनों और भूजल गुणवत्ता निगरानी कार्यक्रम के तहत किए गए परीक्षणों में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल के विभिन्न क्षेत्रों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से अधिक पाई गई है। 

वहीं, केंद्रीय जल आयोग (CWC) की अगस्त 2018 से दिसंबर 2020 तक की निगरानी रिपोर्ट में देश की विभिन्न नदी घाटियों के 588 स्थलों में से 8 स्थानों पर नाइट्रेट की मात्रा निर्धारित सीमा से ऊपर दर्ज की गई।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

SCROLL FOR NEXT