प्रदूषण और जलगुणवत्ता

मुजफ्फरपुर में डेयरी से निकलने वाला अपशिष्ट बना दूषित पानी का तालाब, खतरे में लीची

मुजफ्फरपुर की सुधा डेयरी के आस-पास के इलाके दूषित पानी का शिकार हो रहे हैं। दुग्ध उत्पादों के अपशिष्ट, कूड़ा और दूषित पानी के कारण कीटों की समस्‍या बढ़ रही है, जिससे स्थानीय किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, क्योंकि अब इस प्रदूषण का प्रभाव लीची की खेती पर दिखने लगा है।

Author : सौम्या ज्योत्स्ना

मुजफ्फरपुर की पहचान देश-दुनिया में लीची की खेती के लिए है। लेकिन शहर के एक हिस्से में खेतों और जलाशयों के आसपास रहने वाले किसान इन दिनों एक अलग तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं। दरअसल बिहार की प्रमुख दुग्ध सहकारी संस्था सुधा डेयरी से निकलने वाले अपशिष्ट और दूषित पानी के कारण आसपास के जलस्रोतों और खेतों के प्रभावित होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। दूषित पानी और कचरे से बढ़ती गंदगी के बीच कीटों का प्रकोप भी किसानों की चिंता बढ़ा रहा है, जिसके चलते फसलों और फलों को बचाने के लिए कीटनाशकों के इस्तेमाल का दबाव बढ़ रहा है। इसका असर खासतौर पर लीची के बागानों पर पड़ने की आशंका है। 

यह कहानी सिर्फ दूध और दुग्ध उत्पादकों की प्रोसेसिंग से निकलने वाले प्रदूषण की नहीं, बल्कि पानी, खेती, आजीविका और खाद्य सुरक्षा के आपस में जुड़े संकट की भी है। यह संकट पैदा हुआ है, सुधा डेरी से जहां रोज़ाना एक लाख लीटर दूध की प्रोसेसिंग होती है और दूध के अलावा पनीर, खोवा, दही, आदि बनाकर उनकी पैकिंग होती है। 

सुधा डेयरी से निकलने वाला अपशिष्ट 

शहर भर में दूग्ध उत्पादोें की जरूरतों को पूरा करने के लिए जब लाखों लीटर दूध हर दिन प्रोसेसिंग और बाकी प्रक्रियाओं से गुजरता है, तो इसके पीछे रसायनों और कचरे से भरा दूषित पानी भी निकलता है। अगर यह पानी बिना पर्याप्त उपचार (सीवेज ट्रीटमेंट) के बहया जाए तो ना केवल भूजल पर नकारात्मक प्रभाव डालता है, बल्कि खेती और स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बन सकता है। इन्हीं वजहों से तिरहुट दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लमिटेड (TIMUL) द्वारा संचालित डेरी पैगमबरपुर और कांटी क्षेत्र में किसानों के लिए परेशानी का सबब बन रही है।  

कितना खतरनाक होता है डेयरी से निकलने वाला अपशिष्ट  

तमिलनाडु के वेटरिनरी एंड एनिमल साइंस यूनिवर्सिटी के प्रो. राजाराजन जी और त्रिशूर केरल के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. इरशाद ए द्वारा 2016 में किए गए एक अध्ययन की मानें तो डेयरी उद्योग सबसे ज्यादा पानी इस्तेमाल करने और प्रदूषण फैलाने वाली उद्योगों में से एक है। इससे निकलने वाले गंदे पानी की मात्रा काफी अधिक होती है। हर लीटर प्रोसेस्ड दूध से लगभग 0.2 से 10 लीटर तक गंदा पानी निकल सकता है, जबकि औसतन करीब 2.5 लीटर गंदा पानी होता है। डेयरी उद्योगों से निकलने वाले पानी की मात्रा और उसमें मौजूद प्रदूषकों का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार का उत्पाद बनाया जा रहा है, उत्पादन कितना हो रहा है, प्लांट का डिजाइन कैसा है और पानी के प्रबंधन की व्यवस्था कैसी है।

इस तरह फैल रहा है डेयरी का अपशिष्ट 

मीठा मट्ठा डेयरी से निकलने वाले सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वाले अपशिष्टों में से एक माना जाता है। इसमें लैक्टोज, प्रोटीन, फॉस्फोरस, नाइट्रेट और नाइट्रोजन जैसे ऑर्गेनिक पदार्थ अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। इसकी प्रदूषण क्षमता घरेलू सीवेज की तुलना में लगभग 60 से 80 गुना अधिक हो सकती है।

डेयरी के गंदे पानी में दूध के बचे हुए तत्व जैसे केसीन, इनऑर्गेनिक साल्ट, सफाई में इस्तेमाल होने वाले डिटर्जेंट और सैनिटाइजर भी शामिल होते हैं। इन पदार्थों के कारण पानी का बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड (BOD) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (COD) काफी बढ़ जाता है, जो तय मानकों से अधिक हो सकता है। जब इस पानी को बिना उपचार के नदियों, तालाबों या खाली जमीन में छोड़ दिया जाता है, तो इससे गंभीर प्रदूषण की स्थिति पैदा हो सकती है।

खाली जमीन बनी गंदे पानी का तालाब 

विज्ञान कहता है कि डेयरी का पानी बिना उपचारित छोड़ना पर्यावरण के लिए खतरा बन सकता है। अब मुजफ्फरपुर में इसका कितना पालन हो रहा है, यह बताने के लिए तस्वीरें ही काफी हैं। डेयरी संयंत्र के पास खाली जमीन पर रोज़ाना हजारों लीटर गंदा पानी छोड़े जाने से यह जगह गंदे पानी के तालाब में तब्दील हो गई है। 

हाल में आई खबरें बताती हैं कि डेयरी से निकलने वाला प्रदूषित पानी आसपास के क्षेत्रों में फैल रहा है, जिससे खेतों की मिट्टी की उर्वरता पर नकारात्मक असर हो रहा है। इसकी वजह से कांटी के आसपास के क्षेत्रों में स्थित लीची की बगानों को नुकसान हो रहा है। 

आस-पास की जमीन को दूषित कर रहा अपशिष्ट 

डेरी के पानी से बढ़े कीड़े, घटी लीची की पैदावार 

मुजफ्फरपुर में कांटी इंडस्ट्रियल एरिया में स्थित सुधा डेरी के प्लांट से कांटी की तरफ जाने वाले रास्ते पर निजी और व्यावसायिकों के लीची के बड़े-बड़े बगीचे हैं। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (NRCL) मुषहरी रोड (जो सुधा डेयरी/बेला क्षेत्र से ज्यादा दूर नहीं है) पर भारत का प्रसिद्ध राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र भी स्थित है, जहां लीची के विशाल फार्म और अनुसंधान केंद्र हैं। 

इस क्षेत्र में सबसे बड़ी समस्या है सुधा डेयरी से निकलने वाले अपशिष्ट की वजह से बढ़ने वाली कीटों की तादाद। गंदगी के कारण आस-पास के लीची के खेतों में कीट लगने से कई बार फसलें खराब होने की शिकायतें आ चुकी हैं। स्थानीय किसान अनिल पंडित सदातपुर बैरिया चौबे टोला बताते हैं, “इस वर्ष (2026) लीची की खेती को बहुत नुकसान हुआ है। यहां डेयरी से छोड़े जाने वाले पानी के कारण मिट्टी में कीड़ों की समस्या काफी ज्यादा बढ़ गई है। इस साल लीची के पेड़ पर इतने कीड़े थे कि कीटनाशक के छिड़काव के कुछ दिनों बाद ही वापस आ जाते थे। कीड़ों के भारी प्रकोप के कारण पत्ते एकदम बेजान हो गए थे। जिसका असर लीची की पैदावार में गिरावट और लीचियों के सड़ जाने के रूप में देखने को मिला।” 

किसान अनिल पंडित 

डेयरी का अपशिष्ट सड़ने से कीट पैदा होते हैं, इस बात का समर्थन विज्ञान भी करता है। प्रो. राजाराजन और डॉ. इरशाद के अध्ययन के अनुसार डेयरी का गंदा पानी तेजी से सड़ता है और जल स्रोतों में घुली हुई ऑक्सीजन की मात्रा को कम कर देता है। इससे पानी में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और तेज दुर्गंध आती है। ऐसा पानी मक्खियों, मच्छरों व अन्य कीटों के पनपने की जगह भी बन सकता है, जिससे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।

डेयरी अपशिष्ट में मौजूद केसीन और अन्य ऑर्गेनिक पदार्थ सड़कर काले और बदबूदार कीचड़ में बदल सकते हैं, जो मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए हानिकारक होते हैं। इसके अलावा, इस पानी में घुलनशील ऑर्गेनिक पदार्थ, सस्पेंडेड सॉलिड्स और अन्य तत्व मौजूद होते हैं, जो पानी का रंग, गंध और गुणवत्ता खराब करते हैं तथा यूट्रोफिकेशन की प्रक्रिया को बढ़ावा देते हैं। इससे पूरे इलाके में बदबू फैलने की आंशका रहती है। 

लीची का पेड़ 

लीची की पैदावार घटी कीमतें बढ़ीं 

अनिल पांडे आगे बताते हैं कि इन्हीं वजहों से लीची की पैदावार घट गई और देखते ही देखते इस साल इसकी कीमत भी पिछले साल के मुकाबले डेढ़ गुना बढ़ गई। जैसे- साल 2025 में 200 रुपये प्रति सैंकड़ा लीची बिकी थी, तो इस साल 2026 में 250-300 रुपये प्रति सैंकड़ा लीची की कीमत रही। कीमतों में हुई बढ़ोतरी का प्रतिकूल असर लीची की बिक्री और किसानों की आय में कमी के रूप में देखने को मिला”। 

इसी प्रकार स्थानीय किसान शंभुनाथ चौबे बताते हैं कि डेयरी के प्रदूषित जल के कारण बीते कुछ वर्षो से लीची की पैदावार भंयकर रूप से प्रभावित है। इस वर्ष भी मेरे सैंकड़ों लीची के पेड़ों में कीड़े लगने के कारण कोई फलन नहीं हुआ। हालांकि पेड़ों पर मंजर अच्‍छे आए थे और कीड़ों को मारने के लिए कीटनाशक दवा का छिड़काव भी किया। फिर भी फल नही आए। इसलिए लीची के पेड़ कटवा दिए और वहां अब मकई जैसी अन्य सीजनल फसलों की खेती कर रहे हैं।

किसान शंभुनाथ चौबे 

कीटनाशकों के ज्‍़यादा इस्‍तेमाल का असर किसानों की कमाई पर

एक अनुमान के अनुसार डेयरी के प्रदूषण का प्रभाव 50 से 100 एकड़ तक के खतों पर पड़ रहा है। मुख्य रूप से खेतों पर कीटों का प्रकोप देखा गया है। इससे बचने के लिए किसानों को ज्‍यादा कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ रहा है। कीटनाशकों का यह अतिशय प्रयोग उनकी लीचियों को यूरोप और अमेरिका जैसे अमीर देशों को निर्यात करने की राह में बाधा बन रहा है। क्‍योंकि, इन देशों में फसलों और आयातित कृषि उत्‍पादों पर कीटनाशकों के इस्‍तेमाल को लेकर काफी सख्‍त नियम लागू हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में यह बात सामने आ चुकी है कि अपने इन नियमों के कारण यह देश मुजफ्फरपुर की लीची को अपने यहां अपने यहां आयात करने की इजाज़त नहीं देते हैं।   

किसानों को इस समस्‍या से बचाने के लिए डेयरी उद्योग के प्रदूषण पर सख्‍ती से लगाम लगाने की जरूरत है, जो मिट्टी में कीटों की समस्‍या पैदा कर किसानों को ज्‍यादा कीटनाशकों का उपयोग करने को मजबूर कर रहा है। इसके साथ ही किसानों को विदेशों में कीटनाशकों के उपयोग को लेकर विदेशों में लागू सीमाओं और नियमों के बारे में जानकारी देकर उन्‍हें जागरूक किए जाने की भी जरूरत है। 

जलवायु से पहले ही जूझ रहे मुजफ्फरपुर के किसान 

डाउनटूअर्थ मैगज़ीन में प्रकाशित एक लेख के अनुसार यहां के किसान पहले ही जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे हैं। यहां 2026 में लीची किसानों को 70 प्रतिशत तक का नुकसान झेलना पड़ा है। जो किसान 40 से 50 एकड़ के बगीचे में 25,000 बॉक्स लीची का उत्पादन कर पा रहे थे, उनके खेतों में इस साल मात्र 7,000 से 8,000 बॉक्स की पैदावर हुई। मौसम के इस बर्ताव के चलते बड़ा नुकसान झेल रहे लीची किसानों में कांटी क्षेत्र के किसान भी आते हैं। फर्क इतना है कि इन किसानों को वैश्विक खतरों के साथ-साथ स्थानीय खतरे से भी जूझना पड़ रहा है। उनके खेतोें में डेयरी का अपशिष्ट एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। 

समाधान की कोशिशों के बावजूद बनी हुई है समस्‍या

कांटी विधायक अजीत कुमार बताते हैं, “हमने बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से इस विषय पर चर्चा की है कि सुधा डेयरी से निकलने वाले दूषित पानी से स्थानीय लोगों को समस्याएं हो रही हैं। इससे कृषि भूमि को नुकसान हो रहा है, जिससे आम और लीची बगान वाले किसानों को ज्यादा समस्या हो रही है। डेयरी प्रबंधन को उचित ड्रेनेज सिस्टम और दूषित जल निकासी का मास्टर प्लान तैयार करने का कड़ा निर्देश दिया गया है। साथ ही प्रभावित किसानों को मुआवजा देने के लिए भी कहा गया है।”

अजित कुमार 

इस विषय पर स्थानीय विधायक की शिकायत और विधानसभा अध्यक्ष के आदेश के बाद के बाद मुजफ्फरपुर के पूर्व जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन ने मामले में कड़ा प्रशासनिक संज्ञान लिया था। 2026 की शुरुआत में उन्होंने दूषित जल की सैंपलिंग और ड्रेनेज के लिए दो अलग-अलग कमेटियां बनाने का निर्देश दिया था। वहीं, वर्तमान जिलाधिकारी कुमार गौरव ने तिमुल   (तिरहुत दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड) का निरीक्षण किया है। वे बताते हैं, “मैंने निरीक्षण के दौरान पूर्व की समस्याओं को देखते हुए प्रबंधन को स्पष्ट निर्देष दिए हैं कि ETP पर जल्द काम शुरू किया जाए और उसकी क्षमता को विकसित किया जाए ताकि बिना उपचार के अपशिष्ट पानी बाहर ना बहे और स्थानीय लोगों को किसी तरह की समस्या ना झेलनी पड़े।”

तिरहुत के प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह बताते हैं, "सुधा डेयरी प्लांट के अपशिष्ट जल से कृषि और पर्यावरण को हो रहे नुकसान को रोकने के लिए दो उच्च-स्तरीय कमेटियों का गठन किया गया है। DDC के नेतृत्व वाली टीम ETP की कार्यक्षमता और पानी की केमिकल सैंपलिंग की जांच करेगी, जबकि ADM की टीम ड्रेनेज मास्टर प्लान के लिए जमीन का सर्वे करेगी। डेयरी प्रबंधन परिसर के भीतर ही ट्रीटेड पानी के लिए तालाब विकसित करे। बिना पूर्ण उपचार के एक बूंद दूषित पानी भी बाहर नहीं बहाया जाना चाहिए।" 

तिरहुत के प्रमंडलीय आयुक्त गिरिवर दयाल सिंह

हमने तिमुल स्थित सुधा डेयरी के एमडी से बात करके कंपनी के ETP लगाने और वर्तमान में अपशिष्ट के निस्तारण के बारे में फोन पर और कंपनी के कार्यालय जाकर जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल सका। 

नियमों के तहत डेयरी प्रबंधन को ETP (Effluents Treatment Plant) की क्षमता सुधारने और परिसर के भीतर ही ट्रीटेड जल के निस्तारण का मास्टर प्लान लागू करने का सख्त निर्देश है ताकि किसानों की उपजाऊ भूमि और बागानों को आगे नुकसान न पहुंचे।

साल दर साल बढ़ रही डेयरी की क्षमता

राज्य में बिहार राज्य सहकारी दुग्ध उत्पादक महासंघ (COMFED) और इसके क्षेत्रीय संघ व्यापक स्तर पर हैं, जिसमें सदातपुर रोड, कांटी, मुजफ्फरपुर स्थित सुधा डेयरी फैकट्री (तिरहुत दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ लिमिटेड - TIMUL) उत्तर बिहार की प्रमुख इकाई है, जहां प्रित दिन एक लाख लीटर दूध का संग्रहण, पाश्चरीकरण और प्रसंस्करण किया जाता है। 1982 में जब डेयरी की स्थापना हुई तब इसकी क्षमता 25 हजार लीटर प्रतिदिन थी। साल 1995 में सुधा डेयरी की क्षमता को बढ़ाकर 60,000 लीटर/दिन कर दिया गया था और अब इसकी क्षमता 1 लाख लीटर प्रति दिन है। 

यह प्लांट ना केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था और पशुपालकों की आजीविका में मददगार है, बल्कि शहर और आसपास के इलाकों की दूध आपूर्ति में भी अहम भूमिका निभाता है। लेकिन, संयंत्र की उत्पादन क्षमता के विस्तार के साथ ही पर्यावरणीय समस्याएं भी बढ़ी हैं, जिनसे निपटना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। 

तिरहुत कार्यालय 

उद्योगों को विभिन्न पहलुओं पर काम करनी की जरूरत

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के पूर्व अधिकारी राजेंद्र मोहन भारद्वाज बताते हैं कि पारंपरिक कैटल शैड कच्चे होते थे, जहां केवल झाड़ू लगाकर सूखा कचरा हटाया जाता है। लेकिन, आधुनिक पक्के (कंक्रीट) शेड में पानी से धोने की प्रक्रिया के कारण गोबर लिक्विफाई होकर नालों में बह जाता है। ETP को प्रभावी बनाने के लिए सबसे पहले ‘Source Segregation’ यानी सूखे कचरे को अलग करना और पानी के इस्तेमाल को न्यूनतम करना होगा। 

उन्होंने कम बजट वाले प्लांट्स को लेकर प्राथमिक उपचार के विषय में बताया कि अगर किसी प्लांट के पास अत्याधुनिक ज़ीरो लिक्विड डिस्चार्ज या भारी ETP संसाधन नहीं हैं, तो उन्हें प्राथमिक स्तर पर क्रमबद्ध सेटलिंग टैंक (Series of Settling Tanks) देने चाहिए। डेयरी वेस्ट में ज्यादातर हिस्सा सस्पेंडेड सॉलिड्स का होता है, जो टैंको में नीचे बैठ जाता है। इसके बाद बचे हुए बायोडिग्रेडेबल पानी का शोधन आसान और कम खर्चीला हो जाता है।

उन्होंने पशु आहार और रसायन के पर्यावरणीय प्रभाव के बारे में कहा, “समय के साथ पशुओं के आहार में प्रोसेस्ड और प्रोटीन आधारित खाद्य का इस्तेमाल बढ़ है। जब पशुओं को खाने में रसायन वाली चीज़ें दी जाएंगी, तो उनके वेस्ट में नाइट्रोजन और फास्फोरस का संतुलन प्रभावित होगा, जिसका सीधा असर उनसे निकलने वाले दूध पर होगा और उस दूध का जहां प्रसंस्करण होगा उस क्षेत्र में भी होगा क्योंकि अपशिष्ट का निस्तारण कहीं तो किया जाएगा।”

उन्होंने आगे कहा, “पशुओं में इस्तेमाल होने वाली कुछ दवाइयों, खासकर एंटीबायोटिक के अवशेष, उनके मल-मूत्र और डेयरी से निकलने वाले अपशिष्ट के जरिए मिट्टी तक पहुंच सकते हैं। कुछ परिस्थितियों में इनके अवशेष पानी के स्रोतों और भूजल को भी प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, कांटी में इसका वास्तविक असर जानने के लिए मिट्टी और भूजल की वैज्ञानिक जांच जरूरी है।”  

वहीं, इस विषय पर हमने आईसीएआर-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर के निदेशक डॉ. बिकास दास से बात की तब उन्होंने बताया, “डेयरी से निकलने वाले दूषित पानी का लीची की फसल पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस विषय पर संस्थान द्वारा तत्काल कोई शोध नहीं किया गया है।”

हालांकि शोध के विषय के साथ-साथ किसानों की समस्याओं का सामने आना भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खराब होती फसल, बढ़ती कीमती और फसलों के रख-रखाव करते-करते किसान आर्थिक तौर पर दोहरी मार झेलते हैं, जिस विषय पर ध्यान देना और संज्ञान लेना जरूरी है।

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