स्रोत : विकी कॉमंस

प्रदूषण और जलगुणवत्ता

बाढ़ के बाद गोमती नदी की प्राकृतिक सफाई के लिए छोड़ी गईं एक लाख मछलियां

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय
  • जौनपुर के सुतौली घाट पर नदी में छोड़ी गई रोहू, नैन और कतला प्रजाति की मछलियां बाढ़ में बहकर आई गंदगी का करेंगी सफाया

  • शाकाहारी मछलियों के आने से नदी की जैव विविधता और पारिस्थितिक तंत्र में भी संतुलन को मिलेगा बढ़ावा 

  • ‘रिवर रैंचिंग' कार्यक्रम के तहत नदी में मछलियों के बीज या छोटी मछलियां छोड़कर उनके प्राकृतिक मत्स्य भंडार को बढ़ाने की योजना

करीब साढे़ चार दशक बाद गोमती नदी में आई बाढ़ के बाद अब नदी का जल स्‍तर घट रहा है। पर, नदी बाढ़ मैदानों के दायरे में बसे रिहायशी इलाकों से वापस जाता यह पानी अपने साथ ढेर सारी गंदगी को भी अपने साथ बहा कर नदी में ले जा रहा है। इससे नदी में गंदगी बढ़ रही है। गोमती को प्राकृतिक तरीके से इस गंदगी से निजात दिलाने की कोशिश सरकार की ओर से की जा रही है। ऐसी ही एक पहल के तहत उत्तर प्रदेश सरकार के राज्य पोषित 'रिवर रैंचिंग' कार्यक्रम के तहत गोमती नदी की सफाई के लिए इसमें देसी प्रजातियों की करीब एक लाख मछलियां छोड़ी गई हैं। 

इस पहल के तहत रोहू, नैन और कतला प्रजाति की मछलियों को नदी में डाला गया है, जो बाढ़ में बहकर आई गंदगी का प्राकृतिक ढंग से सफाया करेंगी। साथ ही इससे नदी में मछलियों की संख्‍या बढ़ाने और जलीय जैव विविधता को बढ़ावा देने में भी मदद मिलेगी।  इसी उद्देश्‍य से जौनपुर जिले क तहसील शाहगंज स्थित शेखपुर सुतौली घाट पर गोमती में एक लाख रोहू, नैन व कतला प्रजाति की मत्स्य अंगुलिकाएं (मत्स्य बीज) छोड़ी गईं। यह मत्स्य बीज उत्तर प्रदेश मत्स्य विकास निगम द्वारा उपलब्ध कराए गए थे। गोमती में मछलियों को छोड़ने से न केवल नदी में मछलियों की उपलब्धता बढ़ेगी, बल्कि पर्यावरण व जैव विविधता के संरक्षण को भी प्रोत्साहन मिलेगा। 

बाढ़ किस तरह अपने साथ गंदगी बहाकर ले जाती है?

बाढ़ के दौरान नदी का जलस्तर बढ़ने पर पानी अपने सामान्य प्रवाह क्षेत्र से बाहर निकलकर बाढ़ मैदानों, निचले रिहायशी इलाकों, खेतों, सड़कों और नालों तक फैल जाता है। जब पानी वापस नदी की ओर लौटता है, तो वह अपने साथ इन जगहों पर जसड़ा हुआ जैविक पदार्थ, घरेलू कचरा, पत्तियां,  और नदी के किनारे मा मिट्टी, गाद व अन्य प्रदूषक भी बहाकर ले जाता है। शहर की नालियों, नालों और सीवर का पानी लौटती बाढ़ के साथ जब नदी में जाता है, तो  उसके साथ मल-मूत्र, कार्बनिक पदार्थ, रोगजनक सूक्ष्मजीव और पोषक तत्व भी नदी में पहुंचते हैं। इसके अलावा खेतों से बहकर आने वाले उर्वरक और कीटनाशक भी नदी में पहुंच कर उसे प्रदूषित करते हैं। हालांकि, नदी में पहुंचने वाली प्राकृतिक मिट्टी और जैविक पदार्थ नदी की सामान्य पारिस्थितिकी का हिस्सा हैं, लेकिन अत्यधिक गाद, सीवेज, प्लास्टिक और जहरीले रसायनों का प्रवेश नदी और उस

के पारिस्थितिक तंत्र के लिए समस्या पैदा करता है। कार्बनिक कचरे को विघटित करने में सूक्ष्मजीव पानी में घुली ऑक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं। यदि ऐसा पदार्थ बड़ी मात्रा में पहुंच जाए, तो घुलित ऑक्सीजन का स्तर घट सकता है और मछलियों तथा अन्य जलीय जीवों पर दबाव बढ़ता है। गोमती के संदर्भ में यह भी देखना जरूरी है कि बाढ़ के दौरान किन नालों, सीवर लाइनों और शहरी इलाकों से पानी नदी में लौटा। हालांकि, यह केवल नदी में गंदगी दिखाई देने से यह तय नहीं किया जा सकता कि उसका कितना हिस्सा बाढ़ से आया और कितना पहले से मौजूद प्रदूषण था।

मछलियां कैसे गंदगी कम करने में मदद करती हैं?

नदी में छोड़ी गई मछलियां अपने भोजन और प्रजाति के अनुसार पारिस्थितिकी तंत्र की अलग-अलग प्रक्रियाओं में योगदान देती हैं। इसका मुख्य वैज्ञानिक आधार मछलियों द्वारा जैविक पदार्थों का उपभोग, खाद्य शृंखला और पोषक तत्वों का चक्रण किया जाना है। कुछ मछलियां जल में उपलब्ध प्लवक और छोटे जलीय जीवों को खाती हैं, कुछ वनस्पति या जैविक पदार्थों का सेवन करती हैं, जबकि कुछ का भोजन दूसरे जीव होते हैं। इस तरह वे खाद्य शृंखला को सक्रिय रखती हैं और जलीय जीव समुदायों के संतुलन में भूमिका निभाती हैं।

रोहू, कतला और नैन जैसी भारतीय मीठे पानी की कार्प प्रजातियों की भोजन संबंधी आदतें एक-दूसरे से पूरी तरह समान नहीं हैं। कतला मुख्यतः जल की ऊपरी परतों में उपलब्ध प्लवक पर निर्भर करती है, रोहू मध्य जलस्तर में वनस्पति और अन्य खाद्य पदार्थों का सेवन करती है, जबकि नैन यानी मृगल मुख्यतः तल के पास उपलब्ध जैविक पदार्थों और डिट्रिटस से भोजन प्राप्त करती है। इस वजह से इन प्रजातियों को एक साथ पालने या जलाशय में छोड़ने से अलग-अलग खाद्य संसाधनों का उपयोग संभव हो सकता है। 

मछलियां जैविक पदार्थों को खाकर उन्हें अपने शरीर के ऊतकों और अपशिष्ट में बदलती हैं; वे प्रदूषकों को जादुई ढंग से गायब नहीं करतीं। उदाहरण के लिए, प्लास्टिक, भारी धातुओं, कीटनाशकों या अनुपचारित सीवेज को इन मछलियों द्वारा प्रभावी ढंग से साफ कर देने का दावा बिना विशिष्ट अध्ययन के नहीं किया जा सकता। अधिक मछलियां छोड़ना भी हमेशा बेहतर नहीं होता, क्योंकि इससे उपलब्ध ऑक्सीजन और भोजन पर प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

इसलिए गोमती में एक लाख मछलियां छोड़ने की पहल को प्राकृतिक जैविक संसाधनों के इस्तेमाल की कोशिश के रूप में प्रस्तुत करना उचित होगा। इसे नदी की समग्र सफाई का विकल्प मानने के बजाय सीवेज शोधन, नालों के नियंत्रण, ठोस कचरा प्रबंधन और जल गुणवत्ता की निगरानी के साथ जोड़कर देखना चाहिए।

रोहू, नैन और कतला को ही क्यों चुना गया?

गोमती की सफाई के लिए इसमें मुख्‍य रूप से रोहू, नैन और कतला को ही चुने जाने की वजह इन मछलियों का अपना खास व्‍यवहार है। तीनों प्रजातियों की भोजन संबंधी आदतों में अंतर नदी के खाद्य तंत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण है। तीनों प्रजातियों के बारे में इस प्रकार समझा जा सकता है- 

कतला (Catla catla) : यह मुख्यतः जल की ऊपरी और मध्य परतों में उपलब्ध जूप्लैंकटन यानी सूक्ष्म जलीय जीवों को खाती है। इसके भोजन में कुछ अन्य जलीय जीव और वनस्पति पदार्थ भी शामिल हो सकते हैं।

रोहू (Labeo rohita) :  यह मध्य जलस्तर में भोजन करने वाली प्रमुख भारतीय कार्प है। इसके भोजन में वनस्पति पदार्थ और दूसरे प्राकृतिक खाद्य संसाधन शामिल होते हैं। इसकी भोजन संबंधी आदतें कतला और मृगल से कुछ अलग हैं।

नैन या मृगल (Cirrhinus mrigala) : यह मुख्यतः नदी की निचली परत में भोजन करती है। इसके खाद्य स्रोतों में सड़ी हुई वनस्पति और डिट्रिटस यानी विघटित जैविक पदार्थ शामिल हैं।

हालांकि, इनकी अलग-अलग भोजन संबंधी आदतों का अर्थ यह नहीं है कि तीनों मिलकर नदी के हर हिस्से की गंदगी साफ कर देंगी। खासकर, यदि बाढ़ के बाद नदी में सीवेज, प्लास्टिक, तेल, कीटनाशक या भारी धातुएं पहुंची हों, तो मछलियों को छोड़ने के अलावा इन प्रदूषकों को हटाने के लिए अन्‍य भौतिक व रसायनिक उपाय भी करने होंगे। 

नदी में एक लाख मछलियां छोड़ने से क्या बदलाव आएगा?

गोमती नदी के एक खास क्षेत्र में एक लाख मछलियां छोड़ने से इसके पारिस्थितिक तंत्र में संतुलन आएगा। हालां‍कि अकेले इस कदम से नदी की पूरी सफाई हो जाएगी, ऐसा नहीं कहा जा सकता, न ही इसका वास्तविक परिणाम मापा जा सकता है। इसके लिए यह जानना जरूरी है कि छोड़ी गई मछलियों का आकार क्या था, उनमें से कितनी जीवित रहीं, नदी में भोजन की उपलब्धता कैसी थी और पानी की गुणवत्ता उनके अनुकूल थी या नहीं। तेज बहाव, कम घुलित ऑक्सीजन, तापमान में बदलाव और प्रदूषण के कारण मछलियों की मृत्यु भी हो सकती है।

इस पहल के परिणामों को समझने के लिए मत्स्य विभाग को नदी में छोड़ी गई मछलियों की संख्या के साथ उनके जीवित रहने की दर, प्रजातिवार वृद्धि और स्थानीय मत्स्य भंडार पर प्रभाव की निगरानी करनी चाहिए। इसके साथ ही, नदी के अलग-अलग स्थानों पर जल गुणवत्ता के आंकड़े भी जुटाने होंगे। यदि लक्ष्य प्रदूषण में कमी का दावा करना है, तो मछलियां छोड़ने से पहले और बाद के आंकड़ों की तुलना जरूरी होगी।

इस तरह यह पहल नदी की जैव विविधता और मत्स्य संसाधनों के संरक्षण में उपयोगी हो सकती है, लेकिन इसकी सफलता को केवल छोड़ी गई मछलियों की संख्या या नदी के साफ दिखाई देने से नहीं आंका जाना चाहिए।

मछलियां डालने से पहले पानी की गुणवत्ता जांचना जरूरी 

बाढ़ के बाद नदी का पानी देखने में साफ हो सकता है, जबकि उसमें घुलित ऑक्सीजन की कमी, सीवेज से आया जैविक प्रदूषण या रासायनिक प्रदूषक मौजूद हों। इसलिए मछलियों को छोड़ने से पहले पानी की गुणवत्ता की जांच जरूरी है। खासकर शहरी नदी में प्रदूषण का दबाव अलग-अलग स्थानों पर अलग हो सकता है। किसी नाले के संगम के पास पानी की स्थिति नदी के दूसरे हिस्से से काफी अलग हो सकती है।

इस जांच में घुलित ऑक्सीजन (DO), जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD), रासायनिक ऑक्सीजन मांग (COD), अमोनिया, फीकल कोलीफॉर्म और जरूरत के अनुसार भारी धातुओं की जांच शामिल की जा सकती है। DO पानी में जलीय जीवों के लिए उपलब्ध ऑक्सीजन बताता है, जबकि BOD से यह समझने में मदद मिलती है कि पानी में मौजूद जैविक पदार्थों को विघटित करने के लिए सूक्ष्मजीव कितनी ऑक्सीजन इस्तेमाल करेंगे। सीवेज के संदूषण का आकलन करने के लिए सूक्ष्मजीव संबंधी जांच भी जरूरी है।

गोमती में मछलियां छोड़ने की पहल के साथ यदि जल गुणवत्ता के पहले और बाद के आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, तो यह समझने में मदद मिलेगी कि नदी की पारिस्थितिकी में क्या बदलाव आया। इससे सरकारी पहल का मूल्यांकन भी केवल दावे के बजाय मापने योग्य परिणामों के आधार पर किया जा सकेगा।

उत्तर प्रदेश सरकार का 'रिवर रैंचिंग' कार्यक्रम क्या है?

रिवर रैंचिंग का सामान्य अर्थ है नदी में मछलियों के बीज या छोटी मछलियां छोड़कर उनके प्राकृतिक भंडार को बढ़ाने और मत्स्य संसाधनों के संरक्षण में मदद करना। यह नदी में मछली पालन के लिए तालाब बनाने से अलग प्रक्रिया है। इसका उद्देश्य नदी में मछलियों की उपलब्धता बढ़ाना, देशी प्रजातियों के संरक्षण को प्रोत्साहित करना और मछलियों पर निर्भर मछुआरा समुदायों की आजीविका को सहारा देना है।

केंद्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, रिवर रैंचिंग को प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत भी शामिल किया गया है। इसके अंतर्गत नदियों में मत्स्य अंगुलिकाएं यानी फिंगरलिंग छोड़ी जाती हैं, ताकि घटते मछली भंडार की बहाली और मत्स्य संसाधनों के सतत प्रबंधन में मदद मिल सके। विभाग की वार्षिक रिपोर्ट में गंगा और उसकी सहायक नदियों सहित देश की कई नदी प्रणालियों में इस कार्यक्रम का उल्लेख है। केंद्र की PMMSY के तहत रिवर रैंचिंग का होना और उत्तर प्रदेश की राज्य पोषित योजना के तहत गोमती में मछलियां छोड़ना संबंधित गतिविधियां हैं। 

रिवर रैंचिंग की शुरुआत कब हुई?

भारत में नदियों में मछलियों के बीज छोड़ने की गतिविधियां पहले से होती रही हैं, लेकिन इसे मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और संवर्धन के लिए एक व्यवस्थित सरकारी कार्यक्रम के रूप में PMMSY के तहत बढ़ावा दिया गया। केंद्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग के एक न्यूज़लेटर में रिवर रैंचिंग कार्यक्रम को नदियों की मत्स्य जैव विविधता बहाल करने की पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर स्थित बृजघाट पर कार्यक्रम के शुभारंभ का भी उल्लेख है। 

केंद्र सरकार मत्स्यपालन विभाग की वार्षिक रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, वित्त वर्ष 2022-23 में इस कार्यक्रम का विस्तार पूर्वोत्तर के राज्यों तक किया गया। रिपोर्ट में 17 राज्यों में कुल 30.43 करोड़ रुपये की स्वीकृत लागत से 1,080.94 लाख मत्स्य अंगुलिकाएं छोड़ने का विवरण दिया गया है। यह आंकड़ा 31 दिसंबर 2024 तक की स्थिति से संबंधित है। उत्तर प्रदेश भी इन राज्यों में शामिल था। हालांकि रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों में बताई गई मछलियों की संख्या और उन पर खर्च कार्यक्रम के क्रियान्वयन को को दर्शाते हैं। इन आंकड़ों से इस बात की जानकारी नहीं मिलती कि संबंधित नदियों का प्रदूषण कितना कम हुआ है। इसकी सटीक जानकारी के लिए नदीवार पारिस्थितिक और जल गुणवत्ता संबंधी अध्ययन आवश्यक हैं।

गोमती सफाई के लिए और क्या करना होगा?

गोमती में मछलियां छोड़ने की पहल के साथ नदी में प्रदूषण पहुंचने के स्रोतों पर नियंत्रण सबसे जरूरी है। यदि शहरी नालों और सीवर का अनुपचारित पानी नदी में पहुंचता रहता है, तो मछलियों की संख्या बढ़ाने से प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। नदी में जैविक पदार्थों का लगातार प्रवेश पानी में ऑक्सीजन की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, ठोस कचरा, प्लास्टिक और औद्योगिक अपशिष्ट अलग-अलग तरह की समस्याएं पैदा करते हैं, जिनके समाधान के लिए अलग उपाय चाहिए।

इसके लिए सीवेज शोधन संयंत्रों की वास्तविक क्षमता और उनके संचालन की जांच, नालों के पानी की निगरानी, औद्योगिक अपशिष्ट के नियमन और नदी किनारे ठोस कचरे के प्रबंधन पर ध्यान देना होगा। बाढ़ के बाद जिन स्थानों पर कचरा और गाद जमा हुई है, वहां सफाई के साथ यह भी देखना चाहिए कि प्रदूषक नदी में दोबारा न पहुंचें। गाद निकालने जैसे उपाय भी वैज्ञानिक आकलन के आधार पर होने चाहिए, क्योंकि नदी तल की सामग्री में प्रदूषक मौजूद होने पर उसे बिना जांच हटाना या दूसरी जगह डालना नई समस्या पैदा कर सकता है।

इस तरह रिवर रैंचिंग को नदी की पारिस्थितिकी सुधारने की एक पूरक पहल माना जा सकता है। नदी को साफ और स्वस्थ बनाए रखने के लिए प्रदूषण के स्रोतों को रोकना, जलीय आवासों की रक्षा करना और नियमित निगरानी करना उतना ही जरूरी है।

गंगा में भी छोड़ी गई हैं देसी मछलियां

गोमती की सफाई के लिए जौनपुर में मछलियां छोड़ने से पहले ऐसा ही कदम बिजनौर जिले में गंगा में देसी  प्रजातियों की मछलियों के एक लाख बच्चे छोड़ कर उठाया जा चुका है। ये शाकाहारी मछलियां गंगा की सफाई करने के साथ ही और बाकी प्रजातियों की खुराक का भी काम करेंगी। इस तरह शाकाहारी मछलियां मांसाहारी मछलियों के साथ मिलकर गंगा में जलीय जीवन के संतुलन को बनाकर रखेंगी। 

मछली, मगरमच्छ, घड़ियाल और कछुए गंगा के प्राकृतिक सफाईकर्मी माने जाते हैं। इसलिए गंगा की धारा को निर्मल बनाने के लिए इसमें मछलियां छोड़ने का कदम उठाया गया है। गंगा में पिछले काफी समय से सिंघाड़ा, सोल, लाची जैसी मांसाहारी मछलियों का दबदबा बढ़ता जा रहा था, जिससे गंगा की जैव विविधिता प्रभावित हो रही थी। क्‍योंकि इससे बाकी सभी जलीय जीवों के लिए भोजन की भी कमी होती जा रही थी। इसे देखते हुए रीवर रेंचिंग कार्यक्रम के अंतर्गत गंगा की धारा में शाकाहारी प्रवृत्ति कीं रोहू, कतला और नैन प्रजाति की मछलियों के एक लाख बच्‍चों को छोड़ा गया है। यह गंगा की धारा को निर्मल रखने में मदद के साथ ही नदी में जैव विविधता को भी संतुलित करेंगे।

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