हाल के वर्षों में कांवड़ यात्रा की लोकप्रियता तेजी बढ़ी है, जिसके अब बड़ी संख्या में महिलाएं भी इसमें भाग लेती नज़र आने लगी हैं।
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पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव को जल चढ़ाने की परंपरा उनके द्वारा समुद्र मंथन से निकले विष को पीने के बाद उनके शरीर को शीतलता प्रदान करने के लिए देवताओं द्वारा पानी डालने से हुई। इसी ने आगे चलकर कांवड़ ले जाकर जलार्पण का रूप ले लिया। पहला कांवड़ परशुराम जी ने उठाया था। फिर श्रवण कुमार से होती हुई कांवड़ परंपरा समाज में आमजन तक पहुंची। शिवालयों में जल चढ़ाने की इस परंपरा के मूल में कहीं न कहीं अपने गांव, कस्बों के तालाबों, बावड़ियों, कुओं और अन्य जलस्रोतों को गंगाजल के समान शुद्ध और साफ रखने का मकसद छुपा था, क्योंकि सदियों तक गंगाजल अपने आप में पवित्रता और शुद्धता का पर्याय रहा है। अपेक्षा थी कि इस परंपरा के बहाने वर्ष भर समाज अपने जीवनदायक जलस्रोतों की साफ-सफाई को ध्यान में रखेगा। लेकिन बीते दो दशकों में कांवड़ियों की संख्या तो कई गुना बढ़ गई है, पर इस परंपरा के पीछे जलस्रोतों की शुद्धता व स्वच्छता का जो मकसद था, उसे शायद भुला दिया गया दिखता है।
कांवड़ यात्रा के विस्तार को केवल धार्मिक उत्साह के बढ़ने के रूप में देखना अधूरा होगा। सड़कें बेहतर हुईं, परिवहन सुविधाएं बढ़ीं, धार्मिक पर्यटन का विस्तार हुआ और मीडिया तथा सोशल मीडिया ने इस प्रचलन को देशव्यापी स्तर पर विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसका परिणाम यह हुआ कि कभी सीमित क्षेत्र में दिखाई देने वाली यात्रा हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ते हुए विशाल जनसमागम में बदल गई है। इस साल यानी 2026 में हरिद्वार में करीब 4.8 करोड़ कांवड़ियों के पहुंचने का आकलन है। यह संख्या अपने आप में बताती है कि कांवड़ अब केवल धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारत के सबसे बड़े मौसमी जनसमागमों में शामिल हो चुकी है।
लेकिन इतनी बड़ी संख्या के साथ एक बड़ा पर्यावरणीय सवाल भी खड़ा होता है। हरिद्वार नगर निगम के अनुसार इस साल की यात्रा के दौरान करीब 8,000 मीट्रिक टन कचरा एकत्र हुआ। इसमें प्लास्टिक, कपड़े और दूसरे तरह का कचरा शामिल था।
यह विरोधाभास विचार करने लायक है। एक तरफ करोड़ों लोग गंगा का जल लेकर निकलते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यह जल पवित्र है। दूसरी तरफ उसी नदी के किनारे इतनी बड़ी मात्रा में कचरा जमा हो जाता है। आस्था और व्यवहार के बीच यही दूरी आज कांवड़ परंपरा के सामने सबसे बड़ा सवाल है।
कांवड़ यात्रा से पैदा होने वाला दबाव नदी के दूसरे प्रदूषण स्रोतों से अलग करके नहीं देखा जा सकता। गंगा को पहले से ही घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट और शहरों के ठोस कचरे जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में कुछ दिनों के लिए करोड़ों लोगों की आवाजाही नदी के किनारे एक अतिरिक्त मौसमी दबाव पैदा करती है। 2024 के कांवड़ मेले पर किए गए एक अध्ययन की “Impact of human activities on Ganga River water during Kanwar Mela 2024 in Rishikesh-Haridwar region, Uttarakhand, India” शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में भी बड़े पैमाने पर स्नान और धार्मिक गतिविधियों के दौरान गंगा के पानी की गुणवत्ता पर प्रभाव दर्ज किए जाने की बात सामने आई है।
इस अध्ययन में शोधकर्ता नीतीश कुमार और हफीज़ुर्रहमान ने ऋषिकेश और हरिद्वार क्षेत्र के 15 स्थानों से गंगा के पानी के नमूने लिए। इनमें ऋषिकेश के छह, हरिद्वार के सात और नदी तथा गंगा नहर के दो आउटलेट शामिल थे। अध्ययन में भौतिक-रासायनिक और माइक्रोबायोलॉजिकल दोनों मानकों की जांच की गई। इसमें वहां औसत बीओडी 2.41 mg/L और सीओडी 7.41 mg/L पाया गया। इसी स्थान पर औसत कुल कोलीफॉर्म 2,008.81 MPN/100 ml और ई. कोलाई 884.8 MPN/100 ml पाया गया। कोलीफॉर्म का मिलना पानी में मल की मौजूदगी को दर्शाता है, जो कई प्रकार की संक्रामक बीमारियों का कारण बनता है। सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष हर की पौड़ी से संबंधित था। शोधकर्ताओं ने किए गए स्थानों में हर की पौड़ी को अध्ययन सबसे अधिक प्रदूषित स्थान बताया। शोध-पत्र के निष्कर्ष में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कांवड़ मेले के दौरान बड़े पैमाने पर स्नान और धार्मिक गतिविधियों ने गंगा की जल गुणवत्ता को प्रभावित किया, खासकर उन तीर्थ क्षेत्रों में जहां श्रद्धालुओं की सघनता अधिक थी।
कांवड़ यात्रा में प्लास्टिक की बोतलें, पैकेजिंग सामग्री, पॉलीथिन, डिस्पोजेबल सामान और भोजन के पैकेट बड़ी मात्रा में इस्तेमाल होने लगे हैं। 2026 की सफाई में भी प्लास्टिक शीट और दूसरे प्लास्टिक कचरे के बड़ी मात्रा में मिलने की बात सामने आई है। समस्या यह है कि घाट या सड़क किनारे पड़ा प्लास्टिक केवल दृश्य प्रदूषण नहीं है। बारिश या सफाई के दौरान इसका एक हिस्सा नालियों और जलधाराओं के रास्ते नदी तंत्र तक पहुंच सकता है। इसलिए गंगा से जल उठाने वाले धार्मिक आयोजन में प्लास्टिक-मुक्त यात्रा का संकल्प पर्यावरणीय रूप से सबसे सार्थक संदेशों में से एक हो सकता है।
गंगा का किनारा केवल श्रद्धालुओं के स्नान और जल भरने की जगह नहीं है। नदी का तटीय क्षेत्र अनेक वनस्पतियों, सूक्ष्म जीवों, जलीय जीवों और पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण है। बड़े पैमाने पर अस्थायी शिविर, पैदल आवाजाही, वाहन, रोशनी और कचरा इन तटीय क्षेत्रों पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। इसलिए कांवड़ यात्रा के पर्यावरणीय आकलन में नदी किनारे की भूमि, जलधारा और जैव विविधता पर पड़े दबाव को भी शामिल किया जाना चाहिए।
साइंस जर्नल स्प्रिंग नेचर में '’Assessment of Ganga river ecosystem at Haridwar, Uttarakhand, India with reference to water quality indices'’ शीर्षक से प्रकाशित एक शोध अध्ययन के मुताबिक नदी के किनारे अस्थायी ढांचों और बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही से तटीय वनस्पतियों और मिट्टी की ऊपरी परत को नुकसान पहुंच सकता है। भोजन और पूजा सामग्री का कचरा छोटे जीवों और पक्षियों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है, जबकि प्लास्टिक और दूसरी गैर-जैव अपघटनीय सामग्री नदी में पहुंचने पर जलीय जीवों के लिए खतरा बन सकती है। रात में अत्यधिक रोशनी और लगातार शोर भी नदी तट के जीव-जंतुओं के प्राकृतिक व्यवहार में व्यवधान पैदा कर सकते हैं। यही कारण है कि इतने बड़े धार्मिक आयोजन के पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन केवल यह देखकर नहीं होना चाहिए कि कितना कचरा साफ किया गया, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि नदी के तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर कितना दबाव पड़ा और उसे पहले जैसी स्थिति में लौटने में कितना समय लगा।
हरिद्वार स्थित हर की पैड़ी देश में सबसे प्रसिद्ध कांवड़ स्थल है, जहां हर साल करोड़ों श्रद्धालु गंगा जल लेकर कांवड़ यात्रा की शुरुआत करने पहुंचते हैं।
कांवड़ यात्रा के दौरान हरिद्वार में कुछ दिनों के लिए आबादी और गतिविधियों का दबाव सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना बढ़ जाता है। लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं के ठहरने, स्नान करने, भोजन करने और यात्रा करने से पानी, सीवेज और ठोस कचरा प्रबंधन पर अचानक दबाव आता है। इसका असर केवल शहर की सफाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नदी और उसके किनारे के पूरे पर्यावरण पर पड़ सकता है। 2022 में Why Mass Gatherings, Like The Kanwar Yatra, Could Cause Episodic Pollution शीर्षक से प्रकाशित पर्यावरण विशेषज्ञ जिज्ञासा मिश्रा की रिसर्च रिपोर्ट भी कांवड़ मेले के दौरान हरिद्वार में होने वाले इस तरह के अचानक बढ़ने वाले प्रदूषण यानी episodic pollution को लेकर चिंता जताई थी।
पर्यावरणीय प्रभाव केवल हरिद्वार या हर की पौड़ी तक सीमित नहीं है। हरिद्वार से पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और दूसरे क्षेत्रों की ओर जाने वाले लंबे कांवड़ मार्गों पर अस्थायी शिविर, भोजनालय, प्लास्टिक पैकेजिंग, शौचालय और बड़ी संख्या में वाहन भी पर्यावरणीय दबाव पैदा करते हैं। '’Haridwar’s waste management saga a microcosm of urban India’s struggle to balance tradition with modernity'’ शीर्षक से प्रकाशित एक रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि सबसे ज़्यादा व्सस्त कांवड़ मार्गों पर समस्या इसलिए और गंभीर हो सकती है क्योंकि यात्रा के दौरान हजारों अस्थायी पड़ाव ऐसे स्थानों पर बनते हैं जो सामान्य दिनों में इतने बड़े जनसमूह का दबाव नहीं झेलते। भोजन से निकलने वाला जैविक कचरा, प्लास्टिक और पैकेजिंग, इस्तेमाल किया हुआ पानी तथा शौचालयों से निकलने वाला अपशिष्ट स्थानीय नालों, तालाबों, खेतों और भूजल तक पहुंच सकता है। दूसरी ओर डीजे, जनरेटर और वाहनों से ध्वनि तथा वायु प्रदूषण का दबाव बढ़ता है। इसलिए कांवड़ यात्रा का पर्यावरणीय प्रबंधन स्रोत से गंतव्य तक पूरे कॉरिडोर के स्तर पर होना चाहिए। यानी गंगा घाट की सफाई के साथ उस रास्ते के गांवों, कस्बों और स्थानीय जलस्रोतों की सुरक्षा भी योजना का हिस्सा बने। हर पड़ाव पर कचरा अलग करने, अपशिष्ट जल के निस्तारण, पर्याप्त शौचालय और प्लास्टिक नियंत्रण की व्यवस्था नहीं हो तो कुछ दिनों की यात्रा का प्रभाव स्थानीय पर्यावरण पर लंबे समय तक रह सकता है। इसलिए कांवड़ कॉरिडोर के लिए जीरो-लिटरिंग जोन, अस्थायी लेकिन वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन, मोबाइल सीवेज ट्रीटमेंट और स्थानीय जलस्रोतों की निगरानी जैसी व्यवस्थाओं को स्थायी प्रोटोकॉल का हिस्सा बनाया जा सकता है।
इतने बड़े जनसमूह के लिए पर्याप्त सार्वजनिक शौचालय, सीवेज संग्रह और उसके वैज्ञानिक निस्तारण की व्यवस्था न हो तो नदी प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता है। धार्मिक आयोजनों के दौरान खुले में शौच, अस्थायी शिविरों से निकलने वाला अपशिष्ट जल और भोजन की गतिविधियों से पैदा होने वाला गंदा पानी स्थानीय जल निकासी व्यवस्था पर दबाव डाल सकता है। 2023 की कांवड़ यात्रा के दौरान हरिद्वार में करीब 27,810 मीट्रिक टन कचरा पैदा होने का अनुमान लगाया गया था और खुले में शौच को भी समस्या बताया गया था।
कांवड़ यात्रा के दौरान डीजे, लाउडस्पीकर, जनरेटर और बड़ी संख्या में वाहनों का इस्तेमाल भी पर्यावरणीय प्रभाव का हिस्सा है। खासकर डाक कांवड़ में मोटरसाइकिलों, ट्रकों और दूसरे वाहनों की बड़ी संख्या यात्रा के अंतिम चरण में यातायात और उत्सर्जन का दबाव बढ़ाती है। 2025 में कांवड़ यात्रा के अंतिम चरण में हरिद्वार में करीब 5 लाख वाहन आने की सूचना दी गई थी। यह आंकड़ा बताता है कि कांवड़ का पर्यावरणीय प्रभाव केवल पैदल यात्रियों से पैदा होने वाले कचरे तक सीमित नहीं है।
भारतीय जल संस्कृति में नदी, तालाब, कुआं, बावड़ी और झील केवल पानी जमा करने की संरचनाएं नहीं रहे। इनके साथ स्थानीय समाज की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक स्मृतियां जुड़ी रही हैं। गांवों के तालाबों की पूजा, कुओं के प्रति सम्मान और जलस्रोतों के आसपास सामाजिक नियम इसी व्यापक जल संस्कृति का हिस्सा रहे हैं।
कांवड़ इसी जल संस्कृति की एक जीवित परंपरा है। लेकिन, आज ज्यादातर लोगों का उद्देश्य केवल इतना रह गया है कि कांवड़ लेकर हरिद्वार या सुल्तानगंज से जल लेकर शिवलिंग तक पहुंचाना है। इसके साथ यह विचार कमजोर पड़ गया है कि जल स्वयं संरक्षण योग्य है।
कल्पना कीजिए कि हर कांवड़िया यात्रा के दौरान एक संकल्प भी ले कि वह अपने गांव या मोहल्ले के किसी एक जलस्रोत को साफ रखने में योगदान देगा। करोड़ों कांवड़ियों की संख्या को देखते हुए यह संकल्प किसी बड़े सरकारी अभियान से कम प्रभावशाली नहीं होगा। कांवड़ तब केवल जल लेकर चलने की परंपरा नहीं रहेगी, बल्कि जल बचाने और जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का जनअभियान बन सकती है।
कांवड़ यात्रा से जुड़ी पर्यावरणीय समस्याओं की चर्चा करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि समस्या आस्था नहीं, बल्कि बड़े आयोजनों के साथ पैदा होने वाला पर्यावरणीय दबाव है। करोड़ों लोगों की यात्रा के लिए ठोस कचरा प्रबंधन, प्लास्टिक नियंत्रण, स्वच्छ शौचालय, सीवेज प्रबंधन, सुरक्षित पेयजल और नदी घाटों की निगरानी जैसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं।
दरअसल धार्मिक आयोजन पर्यावरण संरक्षण के सबसे प्रभावी सामाजिक माध्यमों में बदल सकते हैं। क्योंकि जिस संदेश को सरकारी आदेश से हर व्यक्ति तक पहुंचाना कठिन होता है, उसे धार्मिक विश्वास और सामुदायिक परंपरा बहुत आसानी से जनमानस तक पहुंचा सकती है।
बिहार में सुल्तानगंज से देवघर जाने वाले कांवड़ियों के लिए प्रशासन की ओर से पेयजल, विश्राम स्थल, चिकित्सा और स्वच्छता जैसी सुविधाओं की व्यवस्था की जाती है। यह दिखाता है कि धार्मिक आयोजन और सार्वजनिक स्वच्छता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। जरूरत इस बात की है कि स्वच्छता को आयोजन की अनिवार्य धार्मिक-सामाजिक जिम्मेदारी की तरह देखा जाए।
कांवड़ के कंधे पर लटकते दो पात्रों को अगर प्रतीक की तरह देखें तो उनमें केवल गंगाजल नहीं, बल्कि भारतीय समाज की जल-स्मृति भी टंगी हुई है। एक ओर वह परंपरा है जिसमें जल को देवता के चरणों में चढ़ाया जाता है, दूसरी ओर वह आधुनिक समाज है जो उसी जल को प्रदूषित कर रहा है।
इस विरोधाभास को खत्म करने का रास्ता आस्था को कम करना नहीं, बल्कि आस्था के अर्थ को व्यापक करना है।
जिस तरह कांवड़िया सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके शिव तक जल पहुंचाता है, उसी तरह समाज को अपने आसपास के जलस्रोतों तक भी लौटना होगा। तालाब की सफाई, कुएं का पुनर्जीवन, बावड़ी का संरक्षण, झील में कचरा न डालना, नदी में सीवेज रोकना और वर्षाजल को जमीन में उतारना भी जलाभिषेक की उसी भावना का आधुनिक रूप हो सकता है।
कांवड़ की परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि पानी केवल उपयोग की वस्तु नहीं है। वह श्रद्धा, संस्कृति और जीवन का आधार है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि इस साल कितने करोड़ लोगों ने कांवड़ उठाई। बड़ा सवाल यह है कि उनमें से कितने लोग अपने गांव, शहर या मोहल्ले के किसी जलस्रोत को साफ रखने की जिम्मेदारी भी उठाएंगे।
अगर कांवड़ के साथ यह संकल्प जुड़ जाए तो गंगाजल शिवलिंग पर चढ़ाने की परंपरा अपने मूल सांस्कृतिक अर्थ में और भी समृद्ध हो सकती है। तब कांवड़ यात्रा केवल सावन में होने वाली एक धार्मिक यात्रा नहीं होगी, बल्कि पूरे साल चलने वाली जल-संरक्षण की सामाजिक यात्रा बन सकती है।
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