कुंभ मेले में स्‍नान करने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पर नदियों में बढ़ता प्रदूषण आस्‍था की इस डुबकी को स्‍वास्‍थ्‍य के लिए जोखिम भरा बना रहा है। 

 

फोटो : विकी कॉमंस

प्रदूषण और जलगुणवत्ता

कुंभ से पहले नासिक के पानी में जहरीला क्रोमियम मिलने पर हरकत में आया प्रशासन,15 कारखानों को भेजा नोटिस

कार्रवाई : MPCB और MIDC ने अनट्रीटेड सीवेज से पानी को प्रदूषित कर रही औद्योगिक इकाइयों पर नकेल कसना शुरू किया

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

1 अक्टूबर 2026 को ध्वजारोहण के साथ नासिक-त्र्यंबकेश्वर में सिंहस्थ कुंभ के औपचारिक शुभारंभ से पहले मेला स्‍थल के आसपास के इलाकों के भूजल व गोदावरी नदी के जल में ज़हरीले क्रोमियम का भयंकर प्रदूषण पाए जाने के मामले में अब प्रशासन हरकत में आता दिखाई दे रहा है। पानी में कैंसरकारी रसायन हेक्सावेलेंट क्रोमियम की मात्रा सुरक्षित सीमा से 1,000 गुना अधिक मिलने से मेले में आने वाले श्रद्धालुओं को स्‍वास्‍थ्‍य संबंधी जोखिमों को देखते हुए मेले के आसपास के इलाके में चली रही 15 औद्योगिक इकाइयों (फैक्‍ट्रियों) को बंद करने या सील करने के नोटिस जारी किए गए हैं। 

इंडिया वाटर पोर्टल ने इन औद्योगिक इकाइयों के रासायनिक अपशिष्‍ट से पानी दूषित होने को लेकर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसे आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं - नासिक के भूजल और गोदावरी में मिला जहरीला क्रोमियम, कुंभ में लाखों श्रद्धालुओं के स्‍वास्‍थ्‍य को हो सकता है खतरा

इससे पहले दक्षिण एशिया में पर्यावरण और पानी से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाली संस्‍था संदर्प (SANDRP) ने भी अपनी ग्राउंड रिपोर्ट में नमूनों की प्रयोगशाला जांच के नतीजों के आधार पर पानी में एक हज़ार गुना अधिक हेक्सावेलेंट क्रोमियम मिलने की बात कही थी। ज़हरीले क्रोमियम प्रदूषण के इस मामले ने इस इलाके में रह रहे लोगों के साथ ही कुंभ मेले में लाखों की संख्‍या में स्‍नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं की सेहत को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी थी। जिसे, लेकर नासिक प्रशासन अब हरकत में आया दिखा है।

महाराष्ट्र के नासिक में लगने वाले सिंहस्थ कुंभ मेला स्‍थल के पास अंबड इलाके के लोगों ने बोरवेल के पानी का रंग पीला होने की शिकायत की थी। इसके बाद अंबड इंडस्ट्रियल एरिया के पास के रिहायशी इलाके दत्ता नगर से भूजल के लिए गए। इन नमूनों की प्रयोगशाला में जांच कराई गई। पानी के जांचे गए नमूनों में  हेक्सावैलेंट क्रोमियम की मात्रा 50.3 मिलीग्राम प्रति लीटर पाई गई, जबकि सुरक्षित सीमा 0.05 मिलीग्राम प्रति लीटर की है। इस तरह सैंपल में क्रोमियम की मात्रा सुरक्षित सीमा से 1,000 गुना से भी ज्यादा पाई गई। इसे देखते हुए प्रशासन की ओर से अब पानी को प्रदूषित करने वाले उद्योगों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी गई है। जांच अभियान के दौरान अधिकारियों को एमआईडीसी क्षेत्र के बाहर एक इकाई ऐसी भी मिली, जो एमआईडीसी या एमपीसीबी से मंजूरी लिए बिना चल रही थी। 

नासिक के जिला कलेक्टर (डीसी) आयुष प्रसाद ने ने कहा है कि हम प्रदूषण के स्रोत का पता लगाने और उसे रोकने के लिए सभी जरूरी कदम उठा रहे हैं। प्रशासन ने इसे लेकर एक सघन अभियान शुरू कर दिया है। इसके तहत जिला प्रशासन, महाराष्ट्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (MPCB) और महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) की टीमों ने अबतक कुल 15 औद्योगिक इकाइयों को या तो बंद करने का नोटिस दिया है या उन्हें सील कर दिया है। 

महाराष्‍ट्र के सीएम को सौंपी गई रिपोर्ट

एक मीडिया रिपोर्ट में प्रशासनिक अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि रविवार को नासिक दौरे के दौरान नासिक के डीसी आयुष प्रसाद ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के सामने ये नतीजे पेश किए। मुख्यमंत्री को सौंपी गई रिपोर्ट में कई तात्‍कालिक कदमों और उपायों को शुरू करने की सिफारिश की गई है। इनमें अवैध औद्योगिक कनेक्शनों को काटना, प्रदूषण के मार्गों का पता लगाना और सीवेज व प्रदूषित जल से वर्षा जल नेटवर्क को बचाने के उपाय करना शामिल हैं। साथ ही रिपोर्ट में भूजल और जल प्रदूषण से जुड़े विशेषज्ञों से परामार्श लेकर प्रभावित जलभंडार को साफ करने के प्रयास करने की बात भी कही गई है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि जलभंडार के उपचार के लिए भूजल सर्वेक्षण और विकास एजेंसी के विशेषज्ञों से इसके नतीजों की समीक्षा भी करवानी होगी। पर, इन सारी कवायदों से पहले, सर्वोच्‍च प्राथमिकता के साथ इस खतरनाक जल प्रदूषण के लिए दोषी पाई जाने वाली औद्योगिक इकाइयों का संचालन बंद करवाना होगा, जबतक कि यह फैक्ट्रियां अपने यहां आवश्‍यकता के अनुरूप सही सीवेज ट्रीटमेंट सिस्‍टम नहीं लगा लेतीं। 

गोदावरी में गिरता है प्रदूषित नंदिनी नदी का पानी

क्रोमियम से प्रभावित भूजल के इलाके में करीब 25 हजार लोगों के रहने का अनुमान है। इसे देखते हुए पानी के नमूने लेने के साथ ही इलाके में एक स्क्रीनिंग सर्वे भी किया गया। इस सर्वे में त्वचा संबंधी बीमारियों वाले 19 लोगों की पहचान की गई है। इसे देखते हुए अधिकारियों को आशंका है कि पानी के प्रदूषण के कारण होने वाली यह समस्या सिर्फ़ अंबड इलाके तक सीमित नहीं है। क्‍योंकि, इस औद्योगिक क्षेत्र से निकलने वाला अनट्रीटेड इंडस्ट्रियल सीवेज सीधे नंदिनी नदी में गिरता है, जो गोदावरी नदी में मिलती है। जिससे इस बात की गंभीर आशंका है कि सिंहस्थ कुंभ मेले के दौरान गोदावरी में स्‍‍नान करने वाले लाखों श्रद्धालुओं को इस खतरनाक जल प्रदूषण के चलते गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं का सामना करना पड़ सकता है।

भूजल से भी गोदावरी तक पहुंच सकता है प्रदूषण

नासिक के अंबड औद्योगिक क्षेत्र के पास दत्तनगर में भूजल के नमूनों में क्रोमियम की मात्रा निर्धारित सीमा से करीब 1,000 गुना अधिक पाई गई है। इसे देखते हुए पर्यावरण विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि औद्योगिक इकाइयों से निकल रहे ज़हरीले क्रोमियम युक्‍त अपशिष्ट से दूषित पानी मिट्टी में रिसकर या भूजल भंडार (एक्‍वीफर) के जरिये अथवा स्थानीय नाले के जरिए गोदावरी तक भी पहुंच सकता है। 

इस तरह यह स्थिति इसलिए और भी गंभीर हो जाती है कि भूजल प्रदूषण केवल बोरवेल इस्तेमाल करने वाले लोगों तक सीमित नहीं रहता। यदि दूषित पानी नालों और नदी में पहुंचता है, तो उसका प्रभाव नदी के जल की गुणवत्ता पर भी पड़ सकता है। हालांकि, प्रदूषण के स्रोत और उसके फैलाव की पुष्टि के लिए औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट, नालों, नदी और अलग-अलग गहराई के भूजल के नमूनों की वैज्ञानिक जांच जरूरी है।

कार्रवाई को लेकर भी उठ रहे कई अहम सवाल

नासिक के कुंभ मेला स्‍थल के आसपास क्रोमियम के जल प्रदूषण को लेकर जिला प्रशासन, MPCB और MIDC द्वारा कदम उठाया जाना यकीनन एक राहत भरा कदम है। हालांकि इसे लेकर कुछ अहम सवाल भी उठ रहे हैं। 

पहला सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई केवल औद्योगिक इकाइयों को नोटिस देने तक सीमित रहेगी? नासिक में जिन 15 औद्योगिक इकाइयों को नोटिस दिए गए हैं, उनके खिलाफ आगे क्या कार्रवाई हो सकती है? क्या प्रदूषण वाली इन इकाइयों के सीवेज ट्रीटमेंट प्‍लांट (एसटीपी) यानी अपशिष्ट शोधन संयंत्रों की स्वतंत्र जांच कराई गई है? क्‍या बिना एसटीपी के चल रही या ट्रीटमेंट के क्रोमियम युक्‍त सीवेज भूजल या नदी में डालने वाली फैक्ट्रियों को स्‍थायी रूप से बंद किया जाएगा या इनका लाइसेंस रद्द किया जाएगा?

दूसरा अहम सवाल यह है कि क्या प्रशासन और MPCB व MIDC द्वारा कराई गई पानी के नमूनों की जांच के आंकड़े सार्वजनिक होंगे? जिससे लोगों को पता चल सके कि गोदावरी के पानी और आसपास के भूजल में क्रोमियम की मात्रा कितनी है? साथ ही यह नमूने कहां से और कब लिए गए, तथा पानी में क्रोमियम का कौन-सा रूप पाया गया, इसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक करने का भी सवाल है। खासकर, हेक्सावेलेंट क्रोमियम (Cr VI) की पुष्टि और उसकी मात्रा को सामान्य क्रोमियम के आंकड़ों से अलग समझना जरूरी है।

तीसरा बड़ा सवाल है कि क्या कुंभ के बाद भी पानी के इस गंभीर प्रदूषण की निगरानी जारी रहेगी? क्‍योंकि, प्रयागराज में हुए पिछले कुंभ मेले के अनुभव से यह चिंता उभरती है कि प्रदूषण की खबरें आने के बाद जिस तरह से आनन फानन में प्रशासन की निगरानी शुरू होती है, वह अकसर मेले के आयोजन तक ही सीमित रह जाती है। कुंभ मेला खत्‍म होने के साथ ही मामाला फिर से ढीला पड़ जाता है। इसलिए नासिक के पानी में क्रोमियम प्रदूषण के स्थायी नियंत्रण का सवाल भी अहम हो जाता है। 

नासिक में जांच और नोटिस के बाद कुंभ मेले के समाप्‍त होने पर भी दीर्घकालीन भूजल निगरानी, औद्योगिक अपशिष्ट की नियमित जांच और उल्लंघन करने वाली इकाइयों पर नकेल कसने की स्‍थायी व्यवस्था का सवाल काफी महत्वपूर्ण है।

नासिक में 31 अक्‍टूबर 2026 से आयोजित होने वाले कुंभ से पहले मेला क्षेत्र के पास के इलाकों से SANDRP की टीम द्वारा लिए गए नमूनों में कैंसर कारक क्रोमियम का भारी मात्रा में प्रदूषण पाया गया। । 

गोदावरी में स्नान के दौरान श्रद्धालु बरतें ये सावधानियां

नासिक कुंभी में स्‍नान के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह बात समझना जरूरी है कि केवल गोदावरी नदी पानी आंखों से साफ दिखना सेहत के लिए उसके सुरक्षित होने का प्रमाण नहीं है। हेक्सावेलेंट क्रोमियम जैसे जहरीले रसायनों की मौजूदगी की आशंका को देखते हुए  गोदावरी के पानी और मेला स्‍थल आसपास के भूजल में क्रोमियम प्रदूषण को लेकर श्रद्धालुओं को स्नान के दौरान निम्‍नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए- 

  • पानी निगलने से बचें : स्नान के दौरान नदी का पानी मुंह में न जाने दें। इससे दूषित पानी के जरिए हानिकारक सूक्ष्मजीव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं।

  • आंख, नाक और मुंह को बचाएं : पानी के छींटों से बचें। आंखों या मुंह में पानी जाने पर साफ, सुरक्षित पानी से अच्छी तरह धोएं।

  • घाव होने पर स्नान न करें : शरीर पर कट, खरोंच या खुले घाव हों तो नदी में उतरने से बचें। दूषित पानी के संपर्क से संक्रमण का जोखिम बढ़ सकता है।

  • बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखें : बच्चों को पानी में डुबकी लगाने या पानी पीने से रोकें। कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।

  • स्नान के बाद शरीर की सफाई करें : साबुन और सुरक्षित पानी से हाथ-पैर तथा शरीर धोएं। गीले कपड़े बदलें और दूषित पानी से आंखें या घाव साफ न करें।

  • प्रशासन की चेतावनी को मानें : यदि किसी घाट पर स्नान प्रतिबंधित हो या पानी की गुणवत्ता को लेकर चेतावनी जारी की गई हो, तो वहां स्नान न करें। त्वचा में जलन या अन्य परेशानी होने पर चिकित्सकीय सलाह लें।

  • सुरक्षित घाट की जानकारी : सबसे अहम बात यह है कि यदि किसी स्थान पर हेक्सावेलेंट क्रोमियम की मौजूदगी की पुष्टि हुई है, तो केवल सावधानियां बरतना पर्याप्त नहीं है। ऐसे पानी में स्नान से बचना और प्रशासन से सुरक्षित घाट की जानकारी लेना सबसे बेहतर उपाय है।

प्रयाग महाकुंभ में भी NGT ने लगाई थी फटकार

नासिक में सिंहस्थ कुंभ से पहले भूजल और गोदावरी के पानी में क्रोमियम प्रदूषण का मामला सामने आने से पहले प्रयागराज के महाकुंभ में भी संगम के पानी की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठे थे। जनवरी 2025 में महाकुंभ के दौरान गंगा और यमुना के पानी की निगरानी के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) को नियमित जांच करने और रिपोर्ट सार्वजनिक करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद 17 फरवरी 2025 को NGT को यह  कहना पड़ा कि UPPCB ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए उठाए गए कदमों की विस्तृत रिपोर्ट पेश नहीं की। बोर्ड ने अपने पत्र के साथ पानी की जांच से जुड़ी कुछ रिपोर्टें तो दी थीं, लेकिन विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट नहीं दी थी। NGT ने इसे अपने निर्देशों का अनुपालन नहीं किया जाना माना था। इस मामले ने धार्मिक आयोजन के दौरान पानी की गुणवत्ता की निगरानी और प्रदूषण रोकने के सरकारी दावों की जवाबदेही पर सवाल खड़े किए थे।

संगम में मानक से कई गुना ज्यादा मिला था बीमार करने वालावाला फीकल कोलीफॉर्म

3 फरवरी 2025 को NGT में पेश की गई CPCB की रिपोर्ट में बताया गया कि महाकुंभ के दौरान प्रयागराज में गंगा और यमुना के पानी में कई मौकों पर फीकल कोलीफॉर्म का स्तर स्नान के निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं था। फीकल कोलीफॉर्म ऐसे बैक्टीरिया का समूह है, जिसकी मौजूदगी पानी में मल-मूत्र से होने वाले प्रदूषण का संकेत देती है। CPCB के अनुसार स्नान के पानी में इसकी निर्धारित सीमा 2,500 MPN प्रति 100 मिलीलीटर है। लेकिन 20 जनवरी 2025 को संगम पर गंगा के पानी में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 49,000 MPN प्रति 100 मिलीलीटर दर्ज किया गया था। इसी दिन यमुना के पुराने नैनी पुल के पास यह स्तर 23,000 और संगम से पहले यमुना के पानी में 33,000 MPN प्रति 100 मिलीलीटर था। यानी इन नमूनों में फीकल कोलीफॉर्म निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया। इसके अलावा CPCB की रिपोर्ट में 12 और 13 जनवरी को कई स्थानों पर पानी की जैव-रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) भी स्नान के मानक के अनुरूप नहीं होने की बात भी सामने आई थी। ये आंकड़े बताते हैं कि विशाल धार्मिक आयोजनों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के साथ-साथ सीवेज प्रबंधन और नदी में प्रदूषित पानी के प्रवाह को नियंत्रित करना कितना महत्वपूर्ण है।

UPPCB ने की थी भारी लीपापोती

कुंभ से पहले प्रयागराज में पानी की गुणवत्ता को लेकर NGT की गंभीर चिंताओं और CPCB की रिपोर्ट में भारी प्रदूषण के आंकड़े सामने आने के बावजूद 

उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) ने इस अत्‍यंत गंभीर मामले में भारी लीपापोती करते हुए संगम के पानी को ‘स्नान योग्य’ बताया था। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राज्य बोर्ड ने अपने नमूने में फीकल कोलीफॉर्म का स्तर 2,400 MPN प्रति 100 मिलीलीटर बताया, जो निर्धारित 2,500 की सीमा के भीतर था। बोर्ड के अधिकारियों ने यह भी कहा कि नमूने लेने की पद्धति में अंतर होने से नतीजे अलग हो सकते हैं। उनका तर्क था कि वे नदी की मुख्य धारा से नमूने लेते हैं, जबकि किनारे या नाले के पास ठहरे पानी से लिए गए नमूनों में प्रदूषण का स्तर अलग हो सकता है। 

दूसरी ओर, CPCB की रिपोर्ट में अलग-अलग स्थानों और तारीखों पर निर्धारित मानक से अधिक फीकल कोलीफॉर्म मिलने का उल्लेख था। इसे देखते हुए 19 फरवरी को NGT ने राज्य से पानी की गुणवत्ता के विभिन्न मानकों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी। इसके बाद यूपी सरकार ने सार्वजनिक रूप से संगम के पानी को स्नान और आचमन के योग्य बताया। इस पूरे घटनाक्रम में महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब अलग-अलग सरकारी एजेंसियों के नतीजे अलग हों, तो आम श्रद्धालु को पानी की वास्तविक गुणवत्ता की जानकारी किस आधार पर मिलेगी। इसलिए ऐसे मामलों में केवल पानी को सुरक्षित बताने के बजाय जांच की तारीख, स्थान, नमूने लेने की पद्धति और पूरी प्रयोगशाला रिपोर्ट सार्वजनिक करना जरूरी है।

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