जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण ग्रीन लैंड के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इस साल यूरोप में पड़ी प्रचंड गर्मी को इससे जोड़कर देखाजा रहा है। इन ग्लेशियरर्स का गहराई से अध्ययन करने 80 वैज्ञानिकों की टीम ग्रीनलैंड पहुंची है।
फोटो : विकी कॉमंस
उत्तरी ध्रुव के करीब स्थित ग्रीन लैंड के तेजी से पिघलते ग्लेशियर पर्यावरणीय दृष्टि से सारी दुनिया के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बने हुए हैं। क्योंकि यह पर्यावरणीय घटना सारी दुनिया के मौसम और जलवायु को प्रभावित कर सकती है। खासकर, पश्चिमी देश इसे लेकर काफी चिंतित हैं अटलांटिक महासागर की एक प्रमुख समुद्री धारा प्रणाली और उसके साथ यूरोप की जलवायु को बाधित कर सकते हैं। इसे देखते हुए हाल ही में दुनिया के लगभग 80 वैज्ञानिकों का एक दल ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों और उससे संबंधित पर्यावरणीय पहलुओं का अध्ययन कर रहा है। इन वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ग्रीनलैंड की बर्फ इतनी तेजी से पिघल रही है कि वह अटलांटिक महासागर की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री धारा प्रणाली को प्रभावित कर सकती है?
क्या इसका असर यूरोप की जलवायु, समुद्र के स्तर और दुनिया के मौसम पर पड़ेगा? जुलाई 2026 के मध्य में ध्रुवीय अनुसंधान पोत आरएसएस डेविड एटनबरो (RRS David Attenborough) पर सवार होकर ग्रीनलैंड के लिए रवाना हुए वैज्ञानिकों का दल फिलहाल इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने में जुटे हैं।
हालांकि इस बहुप्रतीक्षित वैज्ञानिक अभियान को लेकर अंतिम निष्कर्ष जानने के लिए अभी इंतजार करना होगा, क्योंकि अध्ययन अभी जारी है और इसकी अंतिम रिपोर्ट प्रकाशित नहीं हुई है। वैज्ञानिक दल फिलहाल ग्रीनलैंड के फियोर्ड, ग्लेशियरों और आसपास के समुद्री क्षेत्रों से नमूने और आंकड़े जुटाने में जुटा है। वैज्ञानिक दल अभी ग्रीनलैंड के ग्लेशियरों व उनके द्वारा निर्मित फियोर्ड और समुद्री जलधाराओं से डेटा एकत्र कर रहा है। फियोर्ड ग्लेशियरों द्वारा निर्मित गहरी समुद्री खाड़ी, जिसके दोनों ओर खड़ी पहाड़ियां होती हैं।
यह एक अंतरराष्ट्रीय बहु-संस्थागत अभियान है। इसमें मुख्य रूप से ब्रिटेन के ध्रुवीय अनुसंधान संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ कई यूरोपीय तथा उत्तर अमेरिकी शोध संगठनों के वैज्ञानिक शामिल हैं।
प्रमुख संस्थानों में शामिल हैं -
British Antarctic Survey (BAS)
UK National Oceanography Centre (NOC)
University of Southampton
Scottish Association for Marine Science (SAMS)
National Oceanography Centre से जुड़े समुद्र वैज्ञानिक
विभिन्न यूरोपीय और उत्तर अमेरिकी विश्वविद्यालयों के समुद्र विज्ञान, हिमनद विज्ञान तथा जलवायु विज्ञान विशेषज्ञ
अभियान में अत्याधुनिक ध्रुवीय अनुसंधान पोत RSS David Attenborough का उपयोग किया जा रहा है, जिसे वर्तमान समय के सबसे आधुनिक अनुसंधान जहाजों में गिना जाता है।
ग्रीनलैंड दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी हिमचादर का घर है। जलवायु परिवर्तन के कारण यहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है। यह पिघला हुआ मीठा पानी उत्तरी अटलांटिक महासागर में पहुंचता है।
वैज्ञानिकों की चिंता यह है कि यदि बहुत अधिक मात्रा में मीठा पानी समुद्र में मिलता रहा तो इससे समुद्री जल का घनत्व बदल सकता है। इसका असर Atlantic Meridional Overturning Circulation (AMOC) पर पड़ सकता है। यही वह विशाल समुद्री धारा प्रणाली है जो उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों से गर्म पानी को उत्तर की ओर और ठंडे पानी को दक्षिण की ओर ले जाकर पृथ्वी की जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यूरोप का अपेक्षाकृत गर्म मौसम, उत्तर अटलांटिक की समुद्री जैव विविधता तथा वैश्विक जलवायु प्रणाली काफी हद तक इसी महासागरीय परिसंचरण पर निर्भर मानी जाती है।
पांच से छह सप्ताह का यह मिशन ऐसे समय में ब्रिटेन से ग्रीनलैंड पहुंचा है जब देश और पश्चिमी यूरोप ने हाल ही में रिकॉर्ड पर सबसे गर्म जून महीने का अनुभव किया है, जिससे बिजली आपूर्ति बाधित हुई है, स्कूल बंद हुए हैं और अतिरिक्त मौतें हुई हैं। मिशन का नेतृत्व कर रही ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे की समुद्री भूभौतिक विज्ञानी केली होगन ने ग्रीनलैंड की ओर सफर के दौरान जहाज में मीडिया से बात करते हुए मई, जून, जुलाई में ब्रिटेन और यूरोप में चली भीषण हीटवेव ने यह बात स्पष्ट कर दी है कि हमारे लिए अब खुद को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप ढालना जरूरी हो गया है।
ग्रीन लैंड में बर्फ और ग्लेशियर के बीच दौड़ती है एस्किमों व अन्य स्थानीय समुदायों की जिंदगी। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण इनका जीवन भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है।
यह अभियान 20 मिलियन पाउंड की एक परियोजना का हिस्सा है जिसे GIANT - Greenland Ice sheet to Atlantic Tipping points का नाम दिया गया है। इसका उद्देश्य यह समझना है कि ग्लेशियर कैसे पिघलते हैं और किस तरह समुद्र में टूट कर गिरते हैं? इसका सागरों, उनके पारिस्थितिक तंत्र, पर्यावरण और जलवायु पर क्या प्रभाव पड़ता है? वैज्ञानिकों का फोकस खासतौर पर यह जानने पर है कि किस तरह पिघलता हुआ मीठा पानी घूमने वाली समुद्री धाराओं की उस प्रणाली को बाधित कर सकता है, जो यूरोप की जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करती है। क्योंकि इसके कारण यूरोप में अधिक चरम मौसम की स्थितियां (Extreme weather conditions) पैदा होती हैं और समुद्र के स्तर में भी वृद्धि हो सकती है।
हम दुनिया की बदलती जलवायु के प्रभाव को प्रत्यक्ष रूप से देख रहे हैं। कई ग्लेशियर बहुत तेजी से पीछे हट रहे हैं। जितना आप सोचते हैं उससे कहीं ज्यादा तेजी से। इसलिए जलवायु परिवर्तन के इस बेहद गतिशील दौर में यह पहले से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम वहां जाकर डेटा इकट्ठा करें और मॉडलों में सुधार करें।मैट नील, एटनबरो जहाज के कप्तान
इस जहाज पर मौजूद "बोटी मैकबोटफेस" नाम की एक उच्च तकनीक वाली पनडुब्बी ग्लेशियर मेलेंज के नीचे 1500 मीटर की गहराई तक गोता लगा कर महत्वपूर्ण डेटा एकत्र करेगी। ग्लेशियर मेलेंज समुद्री बर्फ और बर्फ का मिश्रण है जो उस स्थान पर बनता है जहां ग्लेशियर समुद्र से मिलता है।
इस डेटा की मदद से ग्रीनलैंड के कुछ प्रमुख ग्लेशियर्स का ज्यामिति का मानचित्र तैयार किया जाएगा। साथ ही यह समझने की कोशिश की जाएगी कि ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन ग्लेशियर को किस तरह और कितना प्रभावित कर रहे हैं। इस दौरान नेशनल ओशनोग्राफी सेंटर के ऑपरेशंस इंजीनियर्स बहुत सारा ऐसा डेटा इकट्ठा करेंगे जो पहले कभी इकट्ठा नहीं किया गया है। इस मिशन से एकत्रित डेटा का इस्तेमाल अगली पीढ़ी के जलवायु मॉडल और ग्लेशियरों के ढहने की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को विकसित करने में किया जाएगा।
यह अभियान जुलाई 2026 के मध्य में शुरू हुआ था और इसकी अवधि लगभग 5 से 6 सप्ताह निर्धारित की गई है। ऐसे में 5 अगस्त 2026 तक अभियान अपने फील्ड रिसर्च चरण में है। वैज्ञानिक अभी भी समुद्र के तापमान, लवणता, जल प्रवाह, ग्लेशियरों से निकलने वाले मीठे पानी की मात्रा, तलछट तथा समुद्री पारिस्थितिकी से जुड़े आंकड़े एकत्र कर रहे हैं। अभी तक न तो कोई अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष जारी किया गया है और न ही यह कहा गया है कि ग्रीनलैंड का पिघलना निश्चित रूप से अटलांटिक महासागर की प्रमुख धारा प्रणाली को कमजोर कर रहा है। शोध पूरा होने के बाद ही आंकड़ों का विश्लेषण होगा और फिर विस्तृत वैज्ञानिक रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी।
अभी तक किसी भी वैज्ञानिक संस्था ने इस अभियान के आधार पर कोई अंतिम निष्कर्ष जारी नहीं किया है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी के अनुसार शोधकर्ता केवल फील्ड डेटा एकत्र कर रहे हैं।
इस दौरान वे कई अत्याधुनिक उपकरणों की सहायता से समुद्र की विभिन्न गहराइयों का तापमान, लवणता, जल प्रवाह की गति, ग्लेशियरों से निकलने वाले मीठे पानी का फैलाव, समुद्री रसायन विज्ञान तथा जैविक गतिविधियों का अध्ययन कर रहे हैं।
अभियान का उद्देश्य पहले से मौजूद जलवायु मॉडलों को अधिक सटीक बनाना है ताकि भविष्य में यह बेहतर ढंग से समझा जा सके कि ग्रीनलैंड की बर्फ के तेजी से पिघलने का महासागरीय परिसंचरण पर वास्तविक प्रभाव कितना होगा।
ग्रीनलैंड के पिघलते ग्लेशियर्स का पूरी दुनिया के सागरों और पर्यावरण पड़ सकता है।
ग्रीनलैंड पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का एक अत्यंत संवेदनशील हिस्सा है। यदि यहां की बर्फ इतनी ही तेजी से पिघलती रही, तो उसका असर केवल समुद्र के स्तर तक सीमित नहीं रहेगा। इसके कारण महासागरीय धाराओं में बदलाव आने पर यूरोप की सर्दियां अधिक कठोर हो सकती हैं, कुछ क्षेत्रों में वर्षा के पैटर्न (Rainfall patterns) बदल सकते हैं। साथ ही इससे समूची समुद्री पारिस्थितिकी (Marine ecology) प्रभावित हो सकती है और वैश्विक जलवायु मॉडल की भविष्यवाणियों में भी बदलाव करना पड़ सकता है। यही कारण है कि वैज्ञानिक केवल बर्फ के पिघलने की दर नहीं, बल्कि यह भी समझना चाहते हैं कि वह महासागर के भीतर जाकर किस प्रकार समुद्री परिसंचरण (Ocean circulation) को प्रभावित करती है।
यदि अध्ययन यह दिखाता है कि ग्रीनलैंड से निकलने वाला मीठा पानी AMOC को पहले के अनुमान से अधिक प्रभावित कर रहा है, तो इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं।
सबसे पहले वैश्विक जलवायु मॉडल को अपडेट करना पड़ सकता है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र, विश्व मौसम विज्ञान संगठन तथा विभिन्न देशों की जलवायु नीतियों में संशोधन किए जा सकते हैं। समुद्र स्तर वृद्धि के पूर्वानुमानों को भी अधिक सटीक बनाया जा सकेगा।
इसके अलावा यूरोप और उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र के लिए मौसम पूर्वानुमान, समुद्री मत्स्य प्रबंधन, तटीय अवसंरचना योजना और जलवायु अनुकूलन रणनीतियों में भी इस अध्ययन के निष्कर्ष महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके अंतिम निष्कर्ष होंगे, जिनका वैज्ञानिक समुदाय लंबे समय से इंतजार कर रहा है। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि फील्ड अध्ययन से प्राप्त आंकड़े जलवायु परिवर्तन और महासागरीय धाराओं के बीच संबंध को लेकर मौजूदा वैज्ञानिक समझ को कितना मजबूत या चुनौतीपूर्ण बनाते हैं।
जब यह रिपोर्ट प्रकाशित होगी, तब वह केवल ग्रीनलैंड या यूरोप के लिए नहीं बल्कि पूरी दुनिया की जलवायु नीति, समुद्री विज्ञान और जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीतियों के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित हो सकती है।
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