गांवों में एक पारंपरिक जल स्रोत के रूप में तालाबों के महत्व को देखते हुए उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में ‘मेरा तालाब, मेरी जिम्मेदारी’ अभियान के तहत 150 ‘मॉडल तालाब’ बनाने का फैसला लिया गया है।
फोटो - बृजेंद्र दुबे
गंगापार व यमुनापार इलाकों के 23 ब्लॉकों के करीब 150 तालाबों का किया गया है चयन
राज्य वित्त आयोग की निधि के बजट से किया जाएगा तालाबों का कायाकल्प
गंगा-यमुना के संगम के रूप में सारी दुनिया में मशहूर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) की भूमि पारंपरिक जल स्रोतों को लेकर एक नई मिसाल पेश करने जा रही है। जिले के गंगापार व यमुनापार इलाकों के 23 ब्लॉकों में करीब 150 तालाब बनवाए जाएंगे। राज्य वित्त आयोग की निधि के बजट से बनाए जाने वाले यह तालाब आम तालाबों से कुछ हटकर होंगे। इनमें पानी को साफ रखने के लिए ‘बायो-फिल्टर' तकनीक यानी पानी को प्राकृतिक रूप से साफ करने का इंतज़ाम किया जाएगा। इसके लिए तालाब में पानी पहुंचाने वाली नालियों में और उनके किनारों पर 'केली' (Canna) के पौधे लगाए जाएंगे, जिनमें पानी मौजूद गंदगी और प्रदूषक तत्वों को सोखने की क्षमता होती है।
मॉडल तालाब ऐसे जलाशय होंगे जिन्हें वैज्ञानिक और पर्यावरण अनुकूल तरीकों से विकसित किया जाएगा। इनमें तालाब की सफाई, गहरीकरण, तटों का संरक्षण, जलभराव क्षमता बढ़ाने और आसपास हरियाली विकसित करने जैसे कार्य किए जाएंगे। सबसे खास बात यह होगी कि तालाबों में पहुंचने वाले नालों के पानी को पहले प्राकृतिक तरीके से साफ किया जाएगा ताकि प्रदूषित जल सीधे तालाब में न पहुंचे।
इस पूरी परियोजना में स्थानीय ग्राम पंचायतों और ग्रामीणों की भागीदारी भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया जा रहा है। अभियान के नाम में "मेरी जिम्मेदारी" शब्द इसी सोच को दर्शाता है कि तालाब केवल सरकारी संपत्ति नहीं बल्कि पूरे गांव की साझा धरोहर हैं।
तालाबों को पुनर्जीवित करने की यह योजना उत्तर प्रदेश सरकार की पहल है। इसे मुख्यमंत्री के निर्देश पर स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत पंचायती राज विभाग द्वारा लागू किया जा रहा है। राज्य स्तर से जिला पंचायत राज अधिकारियों, एडीओ पंचायत व ग्राम पंचायत सचिवों को इसके लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इन निर्देशों के आधार पर 150 मॉडल तालाबों का चयन कर लिया गया है। अब तालाबों के विकास का काम किया जा रहा है। इस परियोजना को सुचारु रूप से चलाने के लिए इसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी कई स्तरों पर बांटी गई है -
नोडल विभाग: उत्तर प्रदेश पंचायती राज विभाग
योजना का संचालन: स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण), उत्तर प्रदेश
जिले में क्रियान्वयन: जिला पंचायत राज अधिकारी (DPRO) और जिला प्रशासन
स्थानीय स्तर पर देखरेख : संबंधित ग्राम पंचायतें, ग्राम प्रधान और पंचायत सचिव
"मेरा तालाब, मेरी जिम्मेदारी" की मूल अवधारणा पर आधारित इस योजना की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें तालाबों के निर्माण के बाद उनकी देखरेख और रख-रखाव का भी पुख्ता इंतज़ाम किया गया है। क्योंकि ऐसी योजनाओं में अकसर देखा जाता है कि असल चुनौती निर्माण की नहीं, बल्कि रख-रखाव की होती है, जिसके पर्याप्त इतज़ाम न होने पर अकसर योजनाएं असफल हो जाती हैं। इसे देखते हुए इस योजना में व्यावहारिक रूप से रख रखाव की जिम्मेदारी इस प्रकार बांटी गई है -
संबंधित ग्राम पंचायत
ग्राम प्रधान एवं पंचायत सचिव
गांव के स्थानीय समुदाय और स्वयंसेवी समूह
आवश्यकता पड़ने पर पंचायत राज विभाग की निगरानी
प्रयागराज के अलाव कुछ दूसरे जिलों जैसे पीलीभीत, सहारनपुर आदि में इसी अभियान के तहत जारी निर्देशों में भी तालाबों की नियमित सफाई, प्लास्टिक हटाने और संरक्षण की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों को दी गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि बायो-फिल्टर तभी प्रभावी रहेगा जब फिल्टर चैंबर की नियमित सफाई की जाए, केली के पौधों की समय-समय पर छंटाई और पुनःरोपण हो तथा नालियों में प्लास्टिक और ठोस कचरा जाने से रोका जाए। चूंकि इन कार्यों की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों और स्थानीय समुदाय पर होगी, इसलिए इस अभियान की दीर्घकालिक सफलता सामुदायिक भागीदारी पर काफी हद तक निर्भर करेगी।
इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता बायो-फिल्टर प्रणाली है। तालाब में मिलने वाली नालियों के अंतिम छोर पर एक फिल्टर चैंबर बनाया जाएगा। इस चैंबर में विभिन्न परतों में गिट्टी, बजरी और अन्य फिल्टर सामग्री के साथ ऐसे पौधे लगाए जाएंगे जो पानी में मौजूद जैविक प्रदूषकों और अतिरिक्त पोषक तत्वों को कम करने में मदद करते हैं।
इस प्रक्रिया में इसके तहत नालियों के अंतिम हिस्से में फिल्टर चैंबर बनाए जाएंगे, जहां केली (Canna) के पौधे लगाए जाएंगे। केली एक सजावटी फूलदार पौधा है, जो हमेशा नम या गीली मिट्टी में आसानी से उग जाता है और इसे बहुत अधिक देखभाल की आवश्यकता भी नहीं होती।
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार केली के पौधों की जड़ें पानी में मौजूद निलंबित कणों (Suspended Solids) को रोकने, अतिरिक्त पोषक तत्वों तथा कुछ जैविक प्रदूषकों को अवशोषित करने में मदद करती हैं। जब नालियों का पानी इन पौधों और फिल्टर माध्यम से होकर गुजरता है, तो उसमें मौजूद गंदगी काफी हद तक कम हो जाती है। इसके बाद अपेक्षाकृत साफ पानी तालाब में पहुंचता है। इस प्रकार बिना किसी रासायनिक प्रक्रिया या बिजली के, प्राकृतिक तरीके से जल की गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। जब नाली का पानी इस बायो-फिल्टर से होकर गुजरेगा, तो उसमें मौजूद गंदगी और कई प्रकार के प्रदूषक काफी हद तक कम हो जाएंगे। इसके बाद अपेक्षाकृत स्वच्छ पानी तालाब में पहुंचेगा। यह तकनीक कम लागत वाली, पर्यावरण अनुकूल और बिजली रहित प्राकृतिक जल शोधन प्रणाली मानी जाती है।
क्यों चुना गया केली का पौधा?केली (Canna) को निर्मित आर्द्रभूमि (Constructed Wetland) और फाइटोरिमेडिएशन (Phytoremediation) जैसी प्राकृतिक जल शोधन प्रणालियों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। इसकी मजबूत जड़ें सूक्ष्मजीवों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करती हैं, जो पानी में मौजूद कार्बनिक अपशिष्ट को तोड़ने में मदद करते हैं। यह पौधा लंबे समय तक जलभराव सहन कर सकता है, तेजी से बढ़ता है और ग्रामीण क्षेत्रों में इसके रखरखाव पर बहुत कम खर्च आता है। यही कारण है कि प्रयागराज की इस योजना में इसे बायो-फिल्टर के प्रमुख पौधे के रूप में चुना गया है।
प्रयागराज के गंगापार व यमुनापार इलाकों के 23 ब्लॉकों में करीब 150 'मॉडल तालाब' बनवाए जाएंगे, जिनमें प्राकृतिक ढंग से पानी को साफ रखने के लिए ‘बायो-फिल्टर' तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा।
ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश तालाबों में घरेलू नालियों का पानी सीधे पहुंचता है। इस पानी में साबुन, डिटर्जेंट, जैविक कचरा और अन्य अपशिष्ट मौजूद रहते हैं। इससे तालाबों में शैवाल (Algae) तेजी से बढ़ने लगते हैं, पानी में ऑक्सीजन की मात्रा घट जाती है और दुर्गंध पैदा होती है। कई बार मछलियां भी मरने लगती हैं तथा तालाब धीरे-धीरे अनुपयोगी बन जाते हैं। यदि प्रदूषित पानी को पहले प्राकृतिक रूप से साफ कर दिया जाए तो तालाब का जलीय जीवन और पारिस्थितिक तंत्र काफी हद तक सुरक्षित रह सकता है। इससे जल गुणवत्ता बेहतर रहती है और तालाब लंबे समय तक जीवित बने रहते हैं।
तालाबों को विकसित और पुनर्जीवित करने का यह प्रोजेक्ट इसलिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि देश के ग्रामीणी इलाकों में आज भी तालाब वर्षा जल संग्रहण, भूजल पुनर्भरण करने का सबसे महत्वपूर्ण ज़रिया बने हुए हैं। साथ ही यह किसानों के लिए सिंचाई और पशुपालकों के लिए पशुओं की प्यास बुझाने का भी सबसे प्रमुख जल स्रोत हैं। हालांकि हाल के दशकों में तालाबों पर अतिक्रमण, गाद भरने और नालियों का गंदा पानी आने जैसी समस्याएं काफी तेजी से बढ़ी हैं। इसे देखते हुए अब प्रयागराज में इन पारंपरिक जल स्रोतों को फिर से जीवंत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। 'मेरा तालाब, मेरी जिम्मेदारी' अभियान के तहत जिले के गंगापार और यमुनापार क्षेत्र के 23 विकास खंडों में लगभग 150 तालाबों को मॉडल तालाब के रूप में विकसित किया जाएगा। इनका उद्देश्य केवल तालाबों का सुंदरीकरण नहीं, बल्कि उन्हें स्थायी जल संरक्षण, भूजल संवर्धन और सामुदायिक भागीदारी का केंद्र बनाना है।
विशेषज्ञों के अनुसार यदि तालाबों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण किया जाए तो इनके लाभ केवल जल संग्रहण तक सीमित नहीं रहते। वर्षा के दौरान तालाब बड़ी मात्रा में पानी रोकते हैं, जिससे भूजल का पुनर्भरण बढ़ता है और आसपास के हैंडपंप तथा कुओं में पानी का स्तर सुधर सकता है।
इसके अलावा तालाब पक्षियों, मछलियों, मेंढकों, कछुओं और अनेक जलीय जीवों का महत्वपूर्ण आवास भी होते हैं। यदि पानी स्वच्छ रहेगा तो जैव विविधता में भी सुधार होगा। गांवों में स्थानीय तापमान नियंत्रित रखने और सूखे के दौरान जल उपलब्ध कराने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
देश में तालाबों के संरक्षण की कई योजनाएं केवल इसलिए सफल नहीं हो सकीं क्योंकि स्थानीय लोगों की भागीदारी सीमित रही। तालाबों की नियमित सफाई, अतिक्रमण रोकना, कूड़ा न डालना और पौधों की देखभाल जैसे कार्य सरकारी एजेंसियां अकेले लंबे समय तक नहीं कर सकतीं।
इसीलिए इस अभियान में ग्राम पंचायतों, स्वयं सहायता समूहों, स्कूलों और ग्रामीण समुदाय को भी जोड़ने की कोशिश की जा रही है। यदि गांव के लोग स्वयं तालाब की निगरानी करेंगे तो उसका संरक्षण लंबे समय तक संभव हो सकेगा।
हाल के वर्षों में भारत के कई राज्यों में पारंपरिक जल स्रोतों के पुनर्जीवन पर विशेष जोर दिया गया है। शहरों और गांवों में निर्मित वेटलैंड, रीड-बेड सिस्टम, बायो-फिल्टर और प्राकृतिक जल शोधन जैसी तकनीकों का उपयोग बढ़ रहा है। इन तकनीकों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनमें ऊर्जा की आवश्यकता बहुत कम होती है और संचालन लागत भी अपेक्षाकृत कम रहती है।
प्रयागराज की यह पहल भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा सकती है, क्योंकि इसमें तालाब संरक्षण को केवल निर्माण कार्य नहीं बल्कि प्राकृतिक जल प्रबंधन और सामुदायिक सहभागिता से जोड़ा गया है।
प्रयागराज का 'मेरा तालाब, मेरी जिम्मेदारी' अभियान पारंपरिक जल स्रोतों को आधुनिक पर्यावरणीय तकनीकों के साथ जोड़ने का प्रयास है। यदि बायो-फिल्टर, पौधारोपण और सामुदायिक भागीदारी जैसे उपाय प्रभावी ढंग से लागू होते हैं, तो इस परियोजना के 150 मॉडल तालाब न केवल स्थानीय जल संकट कम करने में मदद करेंगे, बल्कि प्रदेश के जिलों और देशभर के लिए भी एक अनुकरणीय मॉडल बनकर उभर सकते हैं। ऐसे समय में जब भूजल स्तर लगातार गिर रहा है और जल प्रदूषण बढ़ रहा है, तालाबों का पुनर्जीवन केवल विकास कार्य नहीं बल्कि भविष्य की जल सुरक्षा में निवेश है।
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