फोटो: ईशानज्योति बोरा | CC BY-SA 4.0 | विकिमीडिया कॉमन्स
अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख नदियों में सियांग, सुबनसिरी, लोहित, दिबांग, कामेंग, नोआ-दिहिंग और तिराप शामिल हैं। राज्य की अधिकांश नदियां ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ी हैं।
अरुणाचल प्रदेश में सियांग, सुबनसिरी, दिबांग, लोहित और कामेंग पांच प्रमुख नदी घाटियां हैं। इनके अलावा तवांग, दिक्रोंग और तिराप-दिहिंग जैसी अन्य नदी घाटियां भी हैं।
सियोम, सिमांग, यामने, कामला, कुरुंग, बिचोम, तेंगा, तिदिंग और कामलांग राज्य की महत्वपूर्ण सहायक नदियों और जलधाराओं में शामिल हैं।
भारी बारिश, बाढ़, भूस्खलन, मिट्टी का कटाव, गाद और जलविद्युत परियोजनाओं से नदी के बहाव में बदलाव राज्य की प्रमुख जल प्रबंधन चुनौतियां हैं।
अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों, घाटियों और जंगलों से अनेक छोटी-बड़ी नदियां बहती हैं। ये नदियां खेती, सिंचाई, पेयजल, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में कई गांव पानी की जरूरतों के लिए नदियों, झरनों और छोटी जलधाराओं पर निर्भर हैं।
अरुणाचल प्रदेश की अधिकांश नदियां ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ी हैं। सियांग, दिबांग और लोहित की धाराएं असम में मिलकर ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा बनाती हैं। सुबनसिरी और कामेंग जैसी नदियां भी असम में ब्रह्मपुत्र से मिलती हैं।
अरुणाचल प्रदेश का क्षेत्रफल लगभग 83,743 वर्ग किलोमीटर है। राज्य की नदियां ऊंची पहाड़ियों से तेज ढलानों के साथ नीचे उतरती हैं। मानसून में भारी बारिश होने पर इनका जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। इससे नदी किनारों पर कटाव और निचले इलाकों में बाढ़ का खतरा रहता है।
राज्य जल योजना के मसौदे के अनुसार राज्य में 19 प्रमुख नदी जलग्रहण क्षेत्र हैं, जिनमें 46 बड़ी और मध्यम नदियां शामिल हैं। योजना में दस प्रमुख नदी बेसिन भी दर्ज किए गए हैं।
| नदी प्रणाली | प्रमुख नदियां | बहाव की दिशा | आगे किस नदी प्रणाली से जुड़ती हैं |
|---|---|---|---|
| कामेंग नदी प्रणाली | कामेंग, बिचोम, तेंगा | मुख्य रूप से दक्षिण की ओर | जिया भराली–ब्रह्मपुत्र |
| सुबनसिरी नदी प्रणाली | सुबनसिरी, कामला, कुरुंग, रंगानदी, दिक्रोंग | मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम की ओर | ब्रह्मपुत्र |
| सियांग नदी प्रणाली | सियांग, सियोम, सिमांग, यामने, सिगोंग | मुख्य रूप से दक्षिण की ओर | ब्रह्मपुत्र |
| दिबांग नदी प्रणाली | दिबांग, माथुन, इथुन, एमरा, सिसिरी | मुख्य रूप से दक्षिण की ओर | लोहित–ब्रह्मपुत्र |
| लोहित नदी प्रणाली | लोहित, तिदिंग, कामलांग, दिगारू, नोआ-दिहिंग | मुख्य रूप से पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर | ब्रह्मपुत्र |
अरुणाचल प्रदेश की पांच प्रमुख नदी घाटियां कामेंग, सुबनसिरी, सियांग, दिबांग और लोहित हैं। राज्य जल योजना के मसौदे में तवांग, दिक्रोंग, सिसिरी, तिराप-दिहिंग और तिस्सा को शामिल करते हुए कुल दस बड़े नदी बेसिन दर्ज किए गए हैं। ये नदी बेसिन अलग-अलग पहाड़ी क्षेत्रों से पानी लेकर ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली तक पहुंचते हैं।
इन नदी घाटियों में अनेक छोटी सहायक नदियां और पहाड़ी जलधाराएं शामिल हैं। ऊपरी हिस्सों में नदियां संकरी घाटियों से गुजरती हैं और इनका बहाव तेज होता है। पहाड़ों से नीचे उतरकर मैदानी इलाकों में पहुंचने पर इनकी चौड़ाई बढ़ती है और कई स्थानों पर पानी अलग-अलग धाराओं में बहने लगता है।
राज्य की अधिकांश नदियां अंततः ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ जाती हैं। इसलिए अरुणाचल प्रदेश के नदी प्रबंधन का असर असम सहित ब्रह्मपुत्र के निचले क्षेत्रों पर भी पड़ता है।
अरुणाचल प्रदेश में कई बड़ी नदियों के साथ छोटी सहायक नदियां और पहाड़ी जलधाराएं भी हैं। सरकारी दस्तावेजों में इनका वर्गीकरण अलग-अलग मिलता है। नीचे राज्य की प्रमुख नदियों और बड़ी नदी प्रणालियों से जुड़ी महत्वपूर्ण नदियों की सूची दी गई है।
| नदी | प्रमुख क्षेत्र | नदी प्रणाली/बहाव | आगे किस नदी से जुड़ती है |
| सियांग (Siang) | ऊपरी सियांग, सियांग, पूर्वी सियांग | मुख्य रूप से दक्षिण की ओर | ब्रह्मपुत्र |
| सुबनसिरी (Subansiri) | ऊपरी सुबनसिरी और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र | मुख्य रूप से दक्षिण की ओर | ब्रह्मपुत्र |
| लोहित (Lohit) | अंजॉ, लोहित और आसपास के क्षेत्र | पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की ओर | ब्रह्मपुत्र |
| दिबांग (Dibang) | दिबांग घाटी, निचली दिबांग घाटी | उत्तर से दक्षिण की ओर | लोहित–ब्रह्मपुत्र |
| कामेंग (Kameng) | पूर्वी कामेंग, पश्चिमी कामेंग | मुख्य रूप से दक्षिण की ओर | जिया भराली–ब्रह्मपुत्र |
| सियोम (Siyom) | शी-योमी, पश्चिमी सियांग | पूर्व और दक्षिण-पूर्व की ओर | सियांग |
| सिमांग (Simang) | सियांग का पहाड़ी क्षेत्र | सियांग नदी प्रणाली | सियांग |
| यामने (Yamne) | ऊपरी सियांग और आसपास का क्षेत्र | सियांग की ओर | सियांग |
| कामला (Kamla) | कामले, कुरुंग कुमे और आसपास के क्षेत्र | सुबनसिरी नदी प्रणाली | सुबनसिरी |
| कुरुंग (Kurung) | कुरुंग कुमे और आसपास के पहाड़ी क्षेत्र | सुबनसिरी नदी प्रणाली | कामला |
| रंगानदी/पन्योर (Ranganadi/Panyor) | निचला सुबनसिरी, असम का लखीमपुर क्षेत्र | असम के मैदानों की ओर | सुबनसिरी |
| दिक्रोंग (Dikrong) | पापुम पारे, इटानगर, लखीमपुर | अरुणाचल की पहाड़ियों से असम की ओर | सुबनसिरी |
| बिचोम (Bichom) | पश्चिमी कामेंग | कामेंग नदी प्रणाली | कामेंग |
| तेंगा (Tenga) | पश्चिमी कामेंग, तेंगा घाटी | बिचोम–कामेंग नदी प्रणाली | बिचोम |
| नोआ-दिहिंग (Noa-Dihing) | चांगलांग, नामसाई और आसपास के क्षेत्र | पटकाई पहाड़ियों से पश्चिम की ओर | बूढ़ी दिहिंग प्रणाली |
| तिराप (Tirap) | तिराप, चांगलांग | मुख्य रूप से उत्तर-पूर्व की ओर | बूढ़ी दिहिंग |
| नामफुक (Namphuk) | चांगलांग, पटकाई पहाड़ी क्षेत्र | मुख्य रूप से पश्चिम की ओर | नामचिक–बूढ़ी दिहिंग प्रणाली |
नोट: इस सूची में अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख नदियों के साथ उनकी महत्वपूर्ण सहायक और क्षेत्रीय नदियां भी शामिल हैं। कुछ नदियों की धाराएं और उनके नाम अलग-अलग क्षेत्रों में बदलते हैं।
सियांग अरुणाचल प्रदेश की सबसे बड़ी नदियों में है। तिब्बत में इसे यारलुंग त्सांगपो (Yarlung Tsangpo) कहा जाता है। यह नदी तिब्बत से भारत में प्रवेश करती है और अरुणाचल प्रदेश में सियांग के नाम से बहती है।
भारत में प्रवेश करने के बाद यह ऊपरी सियांग की पहाड़ियों से गुजरती हुई दक्षिण की ओर बहती है। आगे पांगिन और पासीघाट के आसपास से होकर असम के मैदानों में पहुंचती है।
सियोम, सिमांग, यामने, सिगोंग और यांग सांग चू इसकी प्रमुख सहायक नदियों में शामिल हैं। सियोम मेचुका क्षेत्र की पहाड़ियों से निकलकर पांगिन के पास सियांग में मिलती है।
अरुणाचल प्रदेश के राज्य गजेटियर में सियांग के लगभग 250 किलोमीटर लंबे स्थानीय नदी खंड का उल्लेख मिलता है। यह नदी की पूरी अंतरराष्ट्रीय लंबाई नहीं है।
असम में सियांग, दिबांग और लोहित की धाराएं मिलकर ब्रह्मपुत्र की मुख्य धारा बनाती हैं।
सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में शामिल है। इसका उद्गम तिब्बत के पर्वतीय क्षेत्र में होता है। वहाँ से यह अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है और पहाड़ी घाटियों से होकर असम की ओर बहती है।
अरुणाचल प्रदेश में सुबनसिरी ऊपरी सुबनसिरी, कुरुंग कुमे और कामले के पहाड़ी क्षेत्रों से होकर बहती है। कामला इसकी प्रमुख सहायक नदियों में शामिल है।
इस नदी पर जलविद्युत उत्पादन के लिए बड़ी परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं। इनमें सुबनसिरी लोअर जलविद्युत परियोजना प्रमुख है। इसकी कुल नियोजित क्षमता 2,000 मेगावाट है।
एनएचपीसी के अनुसार 8 मई 2026 तक इस परियोजना की चार इकाइयां चालू हो चुकी थीं। इनकी कुल परिचालन क्षमता 1,000 मेगावाट थी।
दिबांग अरुणाचल प्रदेश की प्रमुख हिमालयी नदियों में है। इसका उद्गम भारत-तिब्बत सीमा के पास ऊंचे पर्वतीय क्षेत्र में होता है।
दिबांग नदी दिबांग घाटी और निचली दिबांग घाटी से गुजरते हुए असम की ओर बहती है। ऊपरी हिस्सों में यह संकरी और गहरी पहाड़ी घाटियों से होकर निकलती है।
दिबांग नदी प्रणाली में माथुन, इथुन, एमरा, सिसिरी और दूसरी पहाड़ी जलधाराएं शामिल हैं। आगे यह नदी असम में लोहित और ब्रह्मपुत्र की मुख्य नदी प्रणाली से जुड़ती है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के दिबांग नदी बेसिन अध्ययन में नदी के उद्गम से लोहित संगम तक की लंबाई लगभग 223 किलोमीटर बताई गई है।
दिबांग पर 2,880 मेगावाट क्षमता वाली बहुउद्देशीय जलविद्युत परियोजना भी विकसित की जा रही है। इसका उद्देश्य बिजली उत्पादन के साथ नीचे के इलाकों में बाढ़ के प्रभाव को कम करने में मदद करना है।
लोहित अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी हिस्से की महत्वपूर्ण नदी है। इसका उद्गम तिब्बत के पर्वतीय क्षेत्र में होता है। यह अंजॉ क्षेत्र के पास भारत में प्रवेश करती है।
भारत में प्रवेश करने के बाद लोहित पहाड़ी घाटियों से होकर तेजू और परशुराम कुंड के आसपास बहती है। आगे यह असम के मैदानों में पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली से जुड़ जाती है। तिदिंग, कामलांग, दिगारू, दिचू और नोआ-दिहिंग जैसी नदियां इस नदी प्रणाली से जुड़ी हैं।
लोहित नदी के किनारे परशुराम कुंड प्रमुख धार्मिक स्थल है, जहाँ विशेष रूप से मकर संक्रांति के अवसर पर श्रद्धालु आते हैं। यह क्षेत्र धार्मिक पर्यटन के लिए महत्वपूर्ण है।
कामेंग नदी अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी हिस्से की महत्वपूर्ण नदी है। यह हिमालयी पहाड़ियों से निकलकर पश्चिमी कामेंग और पूर्वी कामेंग क्षेत्रों से बहती हुई असम की ओर जाती है।
असम में प्रवेश करने के बाद इसे जिया भराली कहा जाता है। आगे यह ब्रह्मपुत्र से मिल जाती है।
बिचोम और तेंगा कामेंग नदी प्रणाली की प्रमुख नदियां हैं। इनके अलावा अनेक छोटी पहाड़ी जलधाराएं भी इसमें मिलती हैं।
कामेंग नदी प्रणाली की बिचोम और तेंगा नदियों पर बनी संरचनाएं 600 मेगावाट की कामेंग जलविद्युत परियोजना का हिस्सा हैं। वहीं भालुकपोंग क्षेत्र में कामेंग पर्यटन गतिविधियों से जुड़ी है।
सियोम सियांग की बड़ी सहायक नदियों में शामिल है। इसका उद्गम मेचुका क्षेत्र की पहाड़ियों में होता है। यह शी-योमी और पश्चिमी सियांग के पहाड़ी इलाकों से होकर बहती है।
आगे सियोम पांगिन के पास सियांग में मिल जाती है। अरुणाचल प्रदेश के राज्य गजेटियर में भी इसे सियांग की महत्वपूर्ण सहायक नदी बताया गया है। सियोम घाटी में बसे समुदाय खेती और पानी की स्थानीय जरूरतों के लिए नदी तथा छोटी जलधाराओं का उपयोग करते हैं।
अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी हिस्से में नोआ-दिहिंग और तिराप जैसी नदियां बहती हैं। ये मुख्य रूप से पटकाई पहाड़ी क्षेत्र की नदी व्यवस्था से जुड़ी हैं।
नोआ-दिहिंग पटकाई पहाड़ियों से निकलकर चांगलांग और नामसाई क्षेत्रों की ओर बहती है। राज्य गजेटियर में इसका लोहित से संबंध बताया गया है, जबकि चांगलांग जिला प्रशासन इसे बूढ़ी दिहिंग से जुड़ी नदी व्यवस्था के अंतर्गत रखता है। दाफा इस क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है।
तिराप नदी राज्य के दक्षिण-पूर्वी हिस्से में बहती है। यह आगे असम की बूढ़ी दिहिंग नदी प्रणाली से जुड़ती है। नामफुक और नामचिक जैसी नदियां भी इसी क्षेत्र की नदी व्यवस्था का हिस्सा हैं।
मानसून के दौरान इन नदियों का बहाव बढ़ जाता है। पहाड़ी ढलानों से आने वाली मिट्टी और मलबे के कारण नदी के किनारों पर कटाव तथा गाद जमा होने की समस्या भी हो सकती है।
अरुणाचल प्रदेश की सियांग, सुबनसिरी, दिबांग, लोहित और कामेंग जैसी बड़ी नदियों में कई छोटी नदियां और पहाड़ी जलधाराएं मिलती हैं। इनमें कुछ नदियां सीधे मुख्य नदी से जुड़ती हैं, जबकि दूसरी किसी सहायक नदी में मिलती हैं। नीचे प्रमुख सहायक नदियों और उनके संगम की जानकारी दी गई है।
| मुख्य नदी | प्रमुख सहायक नदी/जलधारा | उद्गम/प्रमुख क्षेत्र | मुख्य नदी से संबंध |
|---|---|---|---|
| सियांग | सियोम (Siyom) | शी-योमी, पश्चिमी सियांग | सियांग |
| सियांग | यामने (Yamne) | पूर्वी सियांग की उत्तरी पहाड़ियाँ | सियांग |
| सियांग | यांग सांग चू (Yang Sang Chu) | सियांग की उत्तर-पूर्वी पहाड़ियाँ | सियांग |
| सियोम | यारग्याप चू (Yargyap Chu) | मेचुका, शी-योमी | सियोम |
| सुबनसिरी | कामला (Kamla) | मध्य अरुणाचल का हिमालयी क्षेत्र | सुबनसिरी |
| सुबनसिरी | त्सारी चू (Tsari Chu) | तिब्बत का पर्वतीय क्षेत्र | ऊपरी सुबनसिरी |
| कामला | कुरुंग (Kurung) | कुरुंग कुमे का पहाड़ी क्षेत्र | कामला |
| कामेंग | बिचोम (Bichom) | पश्चिमी कामेंग | कामेंग |
| बिचोम | तेंगा (Tenga) | पश्चिमी कामेंग, तेंगा घाटी | बिचोम |
| दिबांग | इथुन (Ithun) | पूर्वी दिबांग घाटी | दिबांग |
| दिबांग | एमरा (Emra) | दिबांग घाटी | दिबांग |
| दिबांग | सिसिरी (Sissiri) | निचली दिबांग घाटी | दिबांग नदी प्रणाली |
| लोहित | तिदिंग (Tidding) | अंजॉ–तेजू क्षेत्र | लोहित |
| लोहित | कामलांग (Kamlang) | कामलांग वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्र | लोहित |
| लोहित | दिगारू (Digaru) | लोहितपुर, डांगलात | लोहित |
| नोआ-दिहिंग | दाफा (Dapha) | चांगलांग, पटकाई क्षेत्र | नोआ-दिहिंग प्रणाली |
अरुणाचल प्रदेश की नदियां खेती, सिंचाई, मत्स्य पालन और बिजली उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहाड़ी क्षेत्रों के कई गांव पानी की जरूरतों के लिए नदियों और छोटी जलधाराओं पर निर्भर हैं।
सियांग, लोहित और कामेंग जैसी नदियां पर्यटन के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर सुबनसिरी, दिबांग और रंगानदी जैसी नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं विकसित की गई हैं। पहाड़ी इलाकों में छोटी सिंचाई योजनाओं के लिए स्थानीय नदियों और जलधाराओं का उपयोग किया जाता है।
| नदी/नदी प्रणाली | प्रमुख उपयोग | सामाजिक और आर्थिक महत्व |
|---|---|---|
| सियांग | मत्स्य पालन, पर्यटन, स्थानीय जल उपयोग | स्थानीय आजीविका और नदी आधारित पर्यटन |
| सुबनसिरी | जलविद्युत उत्पादन, स्थानीय जल उपयोग | बिजली उत्पादन और जल संसाधन |
| लोहित | पर्यटन, धार्मिक गतिविधियाँ, मत्स्य पालन | परशुराम कुंड में धार्मिक पर्यटन और स्थानीय आजीविका |
| दिबांग | स्थानीय जल उपयोग, प्रस्तावित जलविद्युत उत्पादन | स्थानीय जल संसाधन और भविष्य में बिजली उत्पादन |
| कामेंग | जलविद्युत उत्पादन, पर्यटन | बिजली उत्पादन और भालुकपोंग क्षेत्र में पर्यटन |
| सियोम | स्थानीय जल उपयोग, पर्यटन | पहाड़ी समुदायों की जल जरूरतें और पर्यटन |
| कामला | स्थानीय जल उपयोग, प्रस्तावित जलविद्युत उत्पादन | जल संसाधन और भविष्य में बिजली उत्पादन |
| रंगानदी/पन्योर | जलविद्युत उत्पादन, स्थानीय जल उपयोग | बिजली उत्पादन और स्थानीय जल संसाधन |
| नोआ-दिहिंग | खेती, स्थानीय मत्स्य संसाधन | कृषि और स्थानीय आजीविका |
| तिराप और संबंधित नदियां | खेती, मत्स्य पालन | कृषि, मत्स्य पालन और स्थानीय आजीविका |
अरुणाचल प्रदेश की रंगानदी, बिचोम, तेंगा और पारे नदियों पर जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े बांध बने हैं। सुबनसिरी और दिबांग जैसी बड़ी नदियों पर भी बांध परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं।
केंद्रीय जल आयोग के राष्ट्रीय बड़े बांध रजिस्टर 2019 में अरुणाचल प्रदेश के चार बांध दर्ज हैं। इनमें रंगानदी, बिचोम, तेंगा और पारे शामिल हैं।
इन बांधों के जलाशयों में पानी को रोककर या नियंत्रित करके बिजली उत्पादन किया जाता है। कुछ परियोजनाएं नदी के बहाव पर अधिक निर्भर हैं, जबकि अन्य में पानी के भंडारण की भी व्यवस्था है।
राज्य की पहाड़ी भौगोलिक स्थिति और भूकंपीय संवेदनशीलता को देखते हुए बांधों की सुरक्षा महत्वपूर्ण है। इनके निर्माण और संचालन में भूस्खलन, गाद, बाढ़ तथा नीचे के इलाकों में रहने वाले समुदायों पर पड़ने वाले प्रभावों की निगरानी जरूरी है।
अरुणाचल प्रदेश में कई नदियों पर जलविद्युत परियोजनाएं विकसित की गई हैं। इनमें कुछ परियोजनाएं चालू हैं, जबकि कुछ निर्माण और विकास के अलग-अलग चरणों में हैं।
नीपको की आधिकारिक सूची के अनुसार रंगानदी, पारे और कामेंग जलविद्युत परियोजनाएं संचालित हैं। वहीं एनएचपीसी सुबनसिरी लोअर तथा दिबांग जैसी बड़ी परियोजनाओं से जुड़ी है।
| बांध/परियोजना | संबंधित नदी | प्रमुख क्षेत्र | मुख्य उद्देश्य/स्थिति |
|---|---|---|---|
| रंगानदी बांध (Ranganadi Dam) | रंगानदी/पन्योर | निचला सुबनसिरी | जलविद्युत उत्पादन; चालू |
| बिचोम बांध (Bichom Dam) | बिचोम | पश्चिमी कामेंग | कामेंग परियोजना; चालू |
| तेंगा बांध (Tenga Dam) | तेंगा | पश्चिमी कामेंग | कामेंग परियोजना; चालू |
| पारे बांध (Pare Dam) | पारे | पापुम पारे | जलविद्युत उत्पादन; चालू |
| सुबनसिरी लोअर बांध | सुबनसिरी | अरुणाचल प्रदेश–असम सीमा | जलविद्युत उत्पादन; चरणबद्ध संचालन |
| दिबांग बहुउद्देशीय बांध परियोजना | दिबांग | निचली दिबांग घाटी | जलविद्युत एवं बाढ़ नियंत्रण; निर्माणाधीन |
जलविद्युत परियोजनाओं से बिजली उत्पादन होता है, लेकिन बांध और दूसरी संरचनाएं नदी के प्राकृतिक बहाव को भी प्रभावित कर सकती हैं। पानी को रोकने या नियंत्रित करने से नीचे की ओर बहने वाले पानी की मात्रा, गाद के प्रवाह और मछलियों के आवास में बदलाव आ सकता है।
इसलिए जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण और संचालन के दौरान पर्यावरणीय प्रभावों की नियमित निगरानी जरूरी है। एक ही नदी पर कई परियोजनाएं प्रस्तावित होने की स्थिति में उनके कुल प्रभाव का अध्ययन भी महत्वपूर्ण है।
अरुणाचल प्रदेश में मानसून के दौरान भारी बारिश होती है। पहाड़ों की तेज ढलानों के कारण बारिश का पानी तेजी से नदियों तक पहुंचता है। इससे कम समय में नदियों का जलस्तर बढ़ सकता है।
सियांग, सुबनसिरी, दिबांग, लोहित और कामेंग जैसी बड़ी नदियां आगे असम के मैदानी इलाकों में पहुंचती हैं। इसलिए अरुणाचल प्रदेश में भारी बारिश और नदियों के बढ़ते जलस्तर का असर असम के निचले क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है।
पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन से कभी-कभी नदियों का रास्ता अस्थायी रूप से रुक सकता है। ऐसी रुकावट टूटने पर नीचे के इलाकों में अचानक पानी बढ़ने का खतरा रहता है। इसलिए ऊपरी नदी घाटियों में निगरानी और समय पर चेतावनी महत्वपूर्ण है।
मानसून के दौरान पहाड़ी ढलानों से मिट्टी, पत्थर और मलबा बहकर नदियों में पहुंचता है। इससे नदियों में गाद बढ़ती है और नीचे के हिस्सों में जमा हो सकती है। गाद जमा होने से नदी के बहाव और किनारों के कटाव पर भी असर पड़ सकता है। सड़क निर्माण और पहाड़ियों की कटाई से निकलने वाला मलबा यदि नदियों में पहुंचता है, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है।
मानसून के दौरान तेज बहाव के कारण नदियों के किनारों पर कटाव बढ़ सकता है। खासकर पहाड़ों से नीचे उतरकर मैदानी इलाकों में पहुंचने वाली नदियों में यह समस्या महत्वपूर्ण है।
सियांग, लोहित, दिबांग और सुबनसिरी जैसी नदियों के बहाव में बदलाव से किनारे की जमीन प्रभावित हो सकती है। कई बार नदी का रास्ता बदलने से खेती की जमीन और आसपास की बस्तियों को नुकसान पहुंचता है।
नदी तट की सुरक्षा के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपाय करने और नदी किनारे की प्राकृतिक वनस्पति को बचाने की जरूरत है।
अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी सियांग जिले में नदी कटाव रोकने के लिए कई परियोजनाओं पर काम किया गया है। केंद्र सरकार के अनुसार, मिरेम, मिगलुंग और रेमी गांवों की सुरक्षा से जुड़ी परियोजना मार्च 2025 में पूरी हुई। इस पर 18.90 करोड़ रुपये खर्च हुए। परियोजना के तहत लगभग 260 हेक्टेयर क्षेत्र और 2,705 लोगों को बाढ़ तथा कटाव से सुरक्षा देने की व्यवस्था की गई।
अरुणाचल प्रदेश में जलविद्युत उत्पादन की बड़ी संभावनाएं हैं। राज्य की कई नदी घाटियों में बांध और दूसरी जलविद्युत परियोजनाएं विकसित की जा रही हैं।
बांध बनने से नदी के प्राकृतिक बहाव और गाद के आगे पहुंचने की मात्रा में बदलाव आ सकता है। इससे मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के आवास प्रभावित हो सकते हैं। एक ही नदी पर कई परियोजनाएं होने की स्थिति में उनके कुल प्रभाव का अध्ययन भी जरूरी है।
सियांग और सुबनसिरी जैसी नदी घाटियों में जलविद्युत विकास के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन भी किया गया है। इन अध्ययनों में नदी प्रवाह, वनस्पति, जीव-जंतुओं और जलग्रहण क्षेत्र की स्थिति को शामिल किया गया है।
अरुणाचल प्रदेश की नदियों में पानी पहाड़ियों, जंगलों और छोटी जलधाराओं से होकर पहुंचता है। इसलिए नदी की स्थिति उसके पूरे जलग्रहण क्षेत्र पर निर्भर करती है।
जंगलों की कटाई, सड़क निर्माण, पहाड़ी ढलानों में बदलाव और निर्माण कार्यों के कारण मिट्टी और मलबे का बहाव बढ़ सकता है। इसका असर नीचे की नदियों पर पड़ता है।
नदी प्रबंधन के लिए केवल मुख्य नदी की सफाई या किनारों की सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। उन ऊपरी क्षेत्रों को भी बचाना जरूरी है जहाँ से नदी में पानी आता है।
अरुणाचल प्रदेश की नदियों में विभिन्न प्रकार की मछलियां और दूसरे जलीय जीव पाए जाते हैं। इनका जीवन नदी के प्राकृतिक बहाव, पानी की गुणवत्ता और नदी तल की स्थिति से जुड़ा है।
जलविद्युत परियोजनाओं, बढ़ती गाद और पानी के बहाव में बदलाव से इनके प्राकृतिक आवास प्रभावित हो सकते हैं।
इसलिए नदी प्रबंधन में पानी की उपलब्धता के साथ उसकी गुणवत्ता और जलीय जैव विविधता की निगरानी भी जरूरी है।
अरुणाचल प्रदेश में जल संसाधन विभाग सिंचाई और जल संरक्षण से जुड़ी योजनाएं संचालित करता है। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत छोटी सिंचाई परियोजनाओं और खेतों तक पानी पहुंचने की व्यवस्था पर काम किया जाता है। इसके अलावा केंद्रीय जल आयोग बाढ़ पूर्वानुमान और नदी जलस्तर की निगरानी से जुड़ा है।
राज्य की प्रमुख नदियों पर जलविद्युत विकास और पर्यावरणीय प्रभावों का अध्ययन किया गया है। इनमें सुबनसिरी, सियांग और दिबांग जैसी नदी घाटियां शामिल हैं।
इन अध्ययनों में नदी के बहाव, जलग्रहण क्षेत्र, वनस्पति, मछलियों और दूसरी जलीय प्रजातियों की स्थिति को देखा जाता है।
इनका उद्देश्य यह समझना भी है कि एक ही नदी पर बनने वाली कई परियोजनाओं का कुल प्रभाव क्या हो सकता है।
केंद्रीय जल आयोग नदी जलस्तर और बाढ़ पूर्वानुमान से जुड़ी निगरानी करता है। अरुणाचल प्रदेश की नदियों में भारी बारिश के दौरान जलस्तर तेजी से बढ़ सकता है। इसलिए समय पर जानकारी उपलब्ध होना महत्वपूर्ण है।
चूंकि राज्य की अधिकांश बड़ी नदियां आगे असम में बहती हैं, इसलिए दोनों राज्यों के बीच वर्षा, नदी प्रवाह और बढ़ते जलस्तर की जानकारी साझा करना भी जरूरी है।
रंगानदी, जिसे पन्योर भी कहा जाता है, पर बनी लोअर पन्योर जलविद्युत परियोजना में पानी छोड़ने के बाद निचले इलाकों पर पड़ने वाले असर का अनुमान लगाने के लिए एक प्रणाली विकसित की गई है। नीपको ने आईआईटी गुवाहाटी के सहयोग से इस पर काम किया है। इसमें सेंसर से मिलने वाले आंकड़ों की मदद से यह अनुमान लगाया जाता है कि बांध से छोड़ा गया पानी कितने समय में नीचे के इलाकों तक पहुंचेगा और नदी का जलस्तर कितना बढ़ सकता है। इसका उद्देश्य समय रहते चेतावनी देने में मदद करना है।
अरुणाचल प्रदेश में छोटी सिंचाई योजनाओं के जरिए खेती के लिए पानी उपलब्ध कराया जाता है। केंद्र सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना की सतही लघु सिंचाई योजनाओं के तहत राज्य में 2024-25 के दौरान लगभग 3,960 हेक्टेयर की सिंचाई क्षमता विकसित की गई।
राज्य की सिंचाई योजना में जल संसाधनों के विकास के साथ पानी के संरक्षण और प्रभावी उपयोग को भी महत्वपूर्ण माना गया है।
नदी के ऊपरी क्षेत्रों में जंगलों और मिट्टी की सुरक्षा करना नदी प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पहाड़ी ढलानों पर मिट्टी का कटाव कम करना, निर्माण कार्यों के मलबे का सही निपटान और नदी किनारे की प्राकृतिक वनस्पति को बचाना जरूरी है। इससे मिट्टी और मलबे के नदियों तक पहुंचने की मात्रा कम करने में मदद मिल सकती है।
अरुणाचल प्रदेश की नदियों को सुरक्षित रखने के लिए उनके पूरे जलग्रहण क्षेत्र पर ध्यान देना जरूरी है। पहाड़ी इलाकों में जंगलों और छोटी जलधाराओं की सुरक्षा, मिट्टी का कटाव रोकना और निर्माण कार्यों के मलबे का सही निपटान महत्वपूर्ण है।
राज्य की बड़ी नदियां आगे असम में बहती हैं। इसलिए बाढ़ की चेतावनी, नदी जलस्तर और गाद से जुड़ी जानकारी दोनों राज्यों के बीच साझा करना जरूरी है। साथ ही जलविद्युत परियोजनाओं की योजना में नदी के प्राकृतिक बहाव और स्थानीय समुदायों की जरूरतों का ध्यान रखना होगा।
अरुणाचल प्रदेश सरकार – राज्य गजेटियर - प्रमुख नदियां, उद्गम, सहायक नदियां और भौगोलिक विवरण।
राष्ट्रीय जल मिशन – अरुणाचल प्रदेश राज्य जल योजना (मसौदा) - नदी बेसिन, जल संसाधन और जल प्रबंधन की चुनौतियां।
अरुणाचल प्रदेश जल संसाधन विभाग – राज्य सिंचाई योजना - सिंचाई और सतही जल संसाधनों का विकास।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय – सुबनसिरी नदी बेसिन अध्ययन - सुबनसिरी नदी प्रणाली और पर्यावरणीय प्रभाव।
केंद्रीय जल आयोग – राष्ट्रीय बड़े बांध रजिस्टर 2019 - अरुणाचल प्रदेश के प्रमुख बांधों का विवरण।
नीपको – जलविद्युत उत्पादन केंद्र - रंगानदी, पारे और कामेंग परियोजनाओं की क्षमता।
एनएचपीसी – सुबनसिरी लोअर परियोजना की प्रगति, मई 2026 - परियोजना की परिचालन क्षमता।
एनएचपीसी – परियोजनाओं की सूची - सुबनसिरी और दिबांग सहित प्रमुख परियोजनाओं की जानकारी।
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