किसी इलाके में जल सुरक्षा को केवल बनाई गई संरचनाओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। इसके लिए यह देखना होता है कि वहां कितना पानी उपलब्ध है, उसकी मांग कितनी है और भूजल व सतही जल की स्थिति क्या है।

 

फ़ोटो: विकिमीडिया कॉमन्स

नदी और तालाब

डिंडोरी में जल संरक्षण का बड़ा अभियान: आंकड़ों से आगे कितनी बदली पानी की तस्वीर?

जल संरक्षण के बड़े अभियान के कारण चर्चा में आए मध्य प्रदेश के डिंडोरी में लाखों काम दर्ज हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन कामों से भूजल, खेती और पेयजल की स्थिति कितनी बदली है।

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

मध्य प्रदेश का आदिवासी बहुल डिंडोरी जल संरक्षण के बड़े अभियान के कारण चर्चा में है। जल संचय जनभागीदारी अभियान के तहत जिले में बड़े पैमाने पर जल संरक्षण और रीचार्ज के काम किए गए हैं। जिला प्रशासन के मुताबिक इनकी संख्या करीब तीन लाख है।

लेकिन इन आंकड़ों को समझते समय सावधानी जरूरी है। राष्ट्रीय जल मिशन के पोर्टल पर डिंडोरी के लिए 8,27,684 ‘Total Works’ दर्ज हैं, जबकि जिला प्रशासन ने 2,98,456 ‘structures’ की जानकारी  दी है। दोनों में एक ही तरह के काम शामिल नहीं हैं, इसलिए उनकी सीधे तुलना नहीं की जा सकती।

संख्या बड़ी है, लेकिन यहीं से डिंडोरी की कहानी का दूसरा पक्ष शुरू होता है। अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज आंकड़े एक जैसे नहीं हैं। इसका कारण आंकड़े जुटाने की तारीख, कामों की श्रेणी या गिनती का तरीका हो सकता है। इसलिए पहले यह साफ करना जरूरी है कि करीब तीन लाख का आंकड़ा किन कामों को गिनता है।

असली सवाल संख्या से आगे का है कि इन कामों से भूजल, सिंचाई और पेयजल उपलब्धता में कितना बदलाव आया? और क्या डिंडोरी का अनुभव दूसरे जल-संकटग्रस्त इलाकों के लिए उपयोगी मॉडल बन सकता है?

नीति आयोग की Water Budgeting in Aspirational Blocks रिपोर्ट भी कहती है कि किसी इलाके में जल सुरक्षा को केवल बनाई गई संरचनाओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। इसके लिए यह देखना होता है कि वहां कितना पानी उपलब्ध है, उसकी मांग कितनी है और भूजल व सतही जल की स्थिति क्या है।

आंकड़ों की बड़ी छलांग, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती

डिंडोरी में हुए कामों को समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि अलग-अलग सरकारी स्रोत क्या आंकड़े देते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इन स्रोतों में कामों की श्रेणियां, आंकड़े दर्ज करने की तारीख और गिनती का तरीका अलग-अलग है।

22 अप्रैल 2026 की जल संचय जनभागीदारी अभियान की राष्ट्रीय रैंकिंग में डिंडोरी में 1.23 लाख से अधिक जल संरक्षण संरचनाएं दर्ज होने की बात कही गई थी। उस समय डिंडोरी देश में पहले स्थान पर था और मध्य प्रदेश के खंडवा को दूसरे स्थान पर बताया गया था। 

इस रैंकिंग और अभियान की आधिकारिक जानकारी के लिए राष्ट्रीय जल मिशन का जल संचयन जनभागीदारी पोर्टल और जल शक्ति मंत्रालय का आधिकारिक अभियान पेज प्राथमिक स्रोत हैं। हालांकि, 22 अप्रैल की इस रैंकिंग में डिंडोरी की 1.23 लाख से अधिक संरचनाओं का पूरा जिला-वार रिकॉर्ड और कामों का ब्योरा सार्वजनिक है या नहीं, यह अलग से देखना होगा।

19 मई को जिला प्रशासन के आंकड़ों के हवाले से सामने आया कि डिंडोरी में अभियान के तहत 2,98,456 संरचनाएं बनाई गई थीं। इनमें 41,646 रीचार्ज पिट, 32,561 कंटूर ट्रेंच, 14,613 रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग संरचनाएं, 12,777 गली प्लग, 9,941 खेत तालाब और 6,146 चेक डैम शामिल थे। इसके अलावा डगवेल रीचार्ज, हैंडपंप रीचार्ज, गेबियन, परकोलेशन टैंक, बोरी बंधान और ड्रिप इरिगेशन जैसी गतिविधियां भी इस गिनती में शामिल थीं।

उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में यह आंकड़ा जिला प्रशासन के हवाले से दिया गया है। हालांकि, 2,98,456 का मूल समेकित दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है या नहीं, यह स्पष्ट करना अभी बाकी है। ऐसा दस्तावेज मिलने पर यह देखना संभव होगा कि इसमें किन विभागों और योजनाओं के काम शामिल हैं और आंकड़े किस तारीख तक के हैं।

जिला प्रशासन ने 2,98,456 कामों की श्रेणीवार संख्या बताई है, लेकिन इनकी गांववार पूरी सूची, काम कब और किस योजना के तहत हुआ तथा हर संरचना की क्षमता जैसी जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए इस आंकड़े की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना अभी संभव नहीं है। इतना जरूर कहा जा सकता है कि डिंडोरी में बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के काम दर्ज किए गए हैं, लेकिन इन कामों का असर समझने के लिए केवल संख्या काफी नहीं होगी।

यहीं से एक बुनियादी सवाल उठता है कि अगर करीब तीन लाख काम हुए हैं, तो उनका असर कैसे मापा जाएगा? केवल यह जानना काफी नहीं कि कितने ढांचे बने। यह भी देखना होगा कि उनसे भूजल और पानी की उपलब्धता में क्या बदलाव आया, वह बदलाव कितने समय तक रहा और लोगों को उसका कितना फायदा मिला।

राष्ट्रीय जल मिशन के JSJB पोर्टल पर डिंडोरी के लिए इससे अलग संख्या दिखाई देती है। मौजूदा डैशबोर्ड में कुल कार्य (Total Works) की संख्या 8,27,684 दर्ज है, जिसमें 8,03,979 पूर्ण और 23,705 काम चल रहे बताए गए हैं। लेकिन यह संख्या जिला प्रशासन के 2,98,456 structures के समान श्रेणी नहीं है। इसलिए दोनों की सीधे तुलना करना उचित नहीं होगा।

यहां केंद्र सरकार के दूसरे आधिकारिक स्रोतों की परिभाषाएं भी संदर्भ देती हैं। जल शक्ति मंत्रालय के नेशनल वाटर मिशन के तहत जल संरक्षण, वर्षाजल संचयन और भूजल रीचार्ज से जुड़े कार्यक्रमों में संरचनात्मक कामों के साथ जल प्रबंधन, जनभागीदारी और निगरानी गतिविधियां भी शामिल हो सकती हैं। इसी तरह अटल भूजल योजना के आधिकारिक पोर्टल पर जल बजट, जल सुरक्षा योजना और भूजल प्रबंधन को केवल निर्माण कार्यों से अलग व्यापक प्रक्रिया के रूप में देखा गया है। हालांकि, डिंडोरी के JSJB आंकड़े में इन सभी श्रेणियों का वास्तविक समावेश हुआ है या नहीं, यह पोर्टल के मेटाडेटा और जिला-वार मूल रिपोर्ट से ही स्पष्ट होगा।

इस अंतर से एक जरूरी सवाल निकलता है कि जल संरक्षण के आंकड़ों में संरचना, काम, पूर्ण और कार्य प्रगति पर है जैसे शब्दों की परिभाषाएं क्या हैं? 

इसलिए प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ‘structure’ और ‘work’ से क्या मतलब है, एक ही स्थान पर बने कई घटकों को कैसे गिना गया है और अलग-अलग विभागों के रिकॉर्ड में कहीं एक ही काम दो बार तो दर्ज नहीं है।

जब किसी जिले को बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा हो, तो इन श्रेणियों और उनकी रिपोर्टिंग अवधि को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना उतना ही जरूरी है जितना कुल संख्या बताना। जिला प्रशासन से यह जानना भी जरूरी होगा कि इन कामों की विभाग-वार सूची, स्थान और कटऑफ तारीख क्या है।

पहाड़ी से घाटी तक पानी रोकने की कोशिश

डिंडोरी में जल संरक्षण की जरूरत को उसके भूगोल और खेती की स्थिति से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जिला प्रशासन के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट में डिंडोरी की मिट्टी की कम जल-धारण क्षमता को खेती की एक बड़ी चुनौती बताया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक इस वजह से कई किसान साल में एक ही फसल पर निर्भर रहते हैं।

ऐसे भूभाग में बारिश का पानी केवल नीचे किसी तालाब में जमा कर देना पर्याप्त नहीं है। ऊपर की ढलानों पर पानी की रफ्तार कम करना, मिट्टी को बहने से रोकना और पानी को जमीन में उतरने का मौका देना भी जरूरी है। यह तरीका प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड विकास कार्यक्रम से भी मेल खाता है, जिसमें बारिश के पानी को रोकने, मिट्टी को बचाने और भूजल बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

डिंडोरी में अभियान के तहत कंटूर ट्रेंच, गली प्लग, गेबियन और बोरी बंधान जैसी संरचनाओं के साथ खेत तालाब, चेक डैम, रीचार्ज पिट और रूफटॉप वाटर हार्वेस्टिंग का इस्तेमाल किया गया है। इन संरचनाओं का काम एक जैसा नहीं है। कुछ बहाव को रोकती या धीमा करती हैं, कुछ पानी को जमीन में उतारने में मदद करती हैं और कुछ पानी को सीधे संग्रहित करती हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड की कृत्रिम भूजल पुनर्भरण संबंधी गाइडलाइन में भी रीचार्ज संरचनाओं का चयन वहां की जमीन, चट्टानों, पानी के बहाव और भूजल की स्थिति को देखकर करने की जरूरत बताई गई है।

इसलिए केवल यह गिनना काफी नहीं कि कितने ढांचे बने। यह भी देखना होगा कि वे पानी के बहाव वाले इलाके में कहां बनाए गए और एक-दूसरे से कैसे जुड़े हैं। ऊपरी ढलान पर बनाई गई संरचना का असर नीचे के खेत या कुएं तक पहुंचता है या नहीं, यह केवल निर्माण सूची से पता नहीं चलता। जल शक्ति मंत्रालय की वाटरशेड (बारिश के पानी के बहाव वाले पूरे इलाके) विकास संबंधी रूपरेखा भी उपचारों को वाटरशेड के ऊपरी हिस्सों से लेकर निचले हिस्सों तक क्रमबद्ध तरीके से लागू करने पर जोर देती है।

नीति आयोग की 2025 की Water Budgeting in Aspirational Blocks रिपोर्ट भी स्थानीय जल प्रबंधन को केवल संरचनाओं के निर्माण तक सीमित नहीं करती। इसमें जल की मांग, उपलब्धता, भूजल, सतही जल, वर्षाजल और स्थानीय जल घाटे या अधिशेष को साथ लेकर जल बजटिंग (water budgeting) की जरूरत पर जोर दिया गया है।

भूजल साझा संसाधन है और इसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जमीन के नीचे हो रहे बदलाव आसानी से दिखाई नहीं देते। डिंडोरी में यही फर्क महत्वपूर्ण है कि ऊपर रीचार्ज पिट दिखाई देता है, लेकिन उससे नीचे के भूजल भंडार में कितना पानी पहुंचा, यह बिना जलस्तर के आंकड़ों के नहीं जाना जा सकता।
डॉ. हिमांशु कुलकर्णी, भूजल विशेषज्ञ

इसलिए अब केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि कितने ढांचे बने। यह भी देखना होगा कि वे कहां बने, किस जलस्रोत से जुड़े हैं और उनके बनने के बाद पानी की उपलब्धता में क्या बदलाव आया।

जनभागीदारी: नारे से आगे कितनी भागीदारी?

सरकारी और मीडिया रिपोर्टों में डिंडोरी के जल संरक्षण अभियान को लोगों की भागीदारी से जुड़ा बताया गया है। जिला प्रशासन के अनुसार लोगों को जोड़ने के लिए जल चौपाल, जागरूकता अभियान, कलश रैली और नुक्कड़ नाटक जैसे कार्यक्रम आयोजित किए गए। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों से यह साफ नहीं होता कि इन कार्यक्रमों में कितने लोग शामिल हुए, गांव में फैसले कैसे लिए गए और बाद में इन ढांचों की देखभाल कौन करेगा।

किसी एक गांव में सोकपिट या दूसरी संरचना का उपयोग यह दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर पहल हुई है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जिले की सभी जल संरक्षण संरचनाएं समुदाय की सक्रिय भागीदारी से बनीं या उनका नियमित रखरखाव भी हो रहा है।

सिंगपुर: जब जल संरक्षण घर के आंगन से शुरू हुआ

डिंडोरी के बजाग क्षेत्र का सिंगपुर गांव जल संरक्षण में स्थानीय भागीदारी के एक उदाहरण के रूप में सामने आता है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक गांव के करीब 350 घरों में सोकपिट और रूफटॉप वर्षाजल संचयन की व्यवस्था की गई। बारिश के पानी को पाइप के जरिए जमीन में उतारने और घरों से निकलने वाले पानी को सोकपिट में पहुंचाने की व्यवस्था की गई।

गांव की निवासी मेकिंग बाई ने बताया कि पहले उन्हें जल संरक्षण के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। सरपंच और अधिकारियों से जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अपने खर्च से पाइप खरीदे और घर के पास सोकपिट बनाया। एक अन्य ग्रामीण जमुना खैरवार ने अपने घर में दो सोकपिट बनाए और दूसरे ग्रामीणों को भी पानी बचाने के लिए प्रेरित करने की बात कही।

सिंगपुर की खास बात यह है कि यहां लोग केवल सरकारी योजना के लाभार्थी नहीं रहे। कुछ परिवारों ने अपने घरों में खुद सोकपिट बनाए और उनका इस्तेमाल भी शुरू किया। मध्य प्रदेश लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अनुसार जल जीवन मिशन में गांवों की भूमिका केवल नल कनेक्शन तक सीमित नहीं है। विभाग के अनुसार ग्रामीण समुदायों को स्थानीय जलापूर्ति व्यवस्था की योजना बनाने, उसे चलाने और उसकी देखभाल करने में भूमिका दी जानी चाहिए। 

मिशन का जोर नियमित और पर्याप्त मात्रा में सुरक्षित पानी की आपूर्ति के साथ जल स्रोत और जलापूर्ति ढांचे के रखरखाव पर भी है। सिंगपुर में घर-घर सोकपिट और वर्षाजल संचयन की पहल को इसी व्यापक सामुदायिक भागीदारी के संदर्भ में देखा जा सकता है। 

हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि गांव में भूजल स्तर या पेयजल उपलब्धता में कितना सुधार हुआ। इसलिए सिंगपुर को अभी जनभागीदारी का उदाहरण कहना सही है, लेकिन भूजल पुनर्भरण की सफल मिसाल कहना उपलब्ध प्रमाण से आगे जाना होगा।

किसी एक गांव में सोकपिट या दूसरी संरचना का उपयोग यह दिखाता है कि स्थानीय स्तर पर पहल हुई है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि जिले की सभी जल संरक्षण संरचनाएं समुदाय की सक्रिय भागीदारी से बनीं या उनका नियमित रखरखाव भी हो रहा है।

डिंडोरी की जमीनी तस्वीर में इसके उलट उदाहरण भी मिलते हैं। मई 2026 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिला मुख्यालय से करीब तीन किलोमीटर दूर आवास टोला की महिलाएं रोजाना लगभग 1.5 किलोमीटर नीचे जाकर गंदे कुएं से पानी लाती थीं। इसी रिपोर्ट में बजाग जनपद के करौंदा गांव में पानी की कमी को लेकर ग्रामीणों द्वारा सड़क जाम करने की घटना भी दर्ज है। दूसरी ओर, सिंगपुर में घर-घर सोकपिट और रूफटॉप वर्षाजल संचयन की व्यवस्था का उदाहरण सामने आया है।

इन दोनों स्थितियों को सीधे एक-दूसरे से जोड़ना ठीक नहीं होगा, क्योंकि उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड यह नहीं बताता कि आवास टोला या करौंदा में 2,98,456 संरचनाओं में से कौन-सी संरचनाएं बनीं और उनका जलस्तर या पेयजल आपूर्ति पर क्या असर पड़ा। लेकिन ये उदाहरण एक जरूरी सवाल जरूर उठाते हैं कि एक ही जिले में जल संरक्षण की बड़ी संख्या और कुछ बस्तियों में पानी तक कठिन पहुंच, दोनों को एक साथ कैसे समझा जाए?

पानी के क्षेत्र में जनभागीदारी की कोई एक तय परिभाषा नहीं हो सकती। गांव में अलग-अलग समूहों के हित अलग हो सकते हैं। ऐसे में पानी को लेकर साझा फैसला करना आसान नहीं होता और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका साफ होना जरूरी है।
प्रहार्श एम. पटेल, शोधकर्ता, भूजल प्रबंधन

इन दोनों उदाहरणों से यह साबित नहीं होता कि अभियान विफल है। लेकिन ये यह जरूर बताते हैं कि पूरे जिले में हुए कामों की संख्या और हर बस्ती तक पानी की पहुंच एक ही बात नहीं है।

इसका उत्तर पाने के लिए गांव-वार संरचनाओं की सूची को पेयजल स्रोत, कुओं के जलस्तर और गर्मियों की जल उपलब्धता के आंकड़ों से जोड़ना होगा। तभी यह पता चलेगा कि जिन बस्तियों में जल संकट बना हुआ है, वहां संरचनाओं की कमी है, रखरखाव की समस्या है, स्रोत की क्षमता कम है या पानी की मांग और उपलब्धता में कोई दूसरा अंतर है।

जल प्रबंधन में जनभागीदारी का अर्थ केवल किसी अभियान में लोगों की मौजूदगी या निर्माण कार्य में सहयोग तक सीमित नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि संरचना की जगह किसने तय की, उसकी निगरानी और देखभाल कौन करता है और पानी के इस्तेमाल से जुड़े फैसलों में गांव के लोगों की कितनी भूमिका है।

भूजल प्रबंधन पर काम करने वाले शोधकर्ता प्रहार्श एम. पटेल के अनुसार, पानी के क्षेत्र में जनभागीदारी की कोई एक तय परिभाषा नहीं हो सकती। उनका कहना है कि गांव में अलग-अलग समूहों के हित अलग हो सकते हैं। ऐसे में पानी को लेकर साझा फैसला करना आसान नहीं होता और स्थानीय संस्थाओं की भूमिका साफ होना जरूरी है। उनके शोध और हालिया संवाद में प्रभावी भागीदारी के लिए गांव-स्तरीय समिति में अलग-अलग सामाजिक समूहों और महिलाओं की भागीदारी, स्थानीय जल-संकट की सामूहिक समझ और उसके आधार पर समाधान तय करने की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण बताया गया है।

महिलाओं की भागीदारी का उल्लेख डिंडोरी से जुड़ी रिपोर्टों में मिलता है, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि उनकी भूमिका जागरूकता और श्रम तक सीमित रही या जल संरचनाओं के चयन, उपयोग और रखरखाव से जुड़े फैसलों में भी रही। यही जानकारी ‘जनभागीदारी’ के दावे को बेहतर ढंग से परखने में मदद करेगी।

संरचना बनी, लेकिन क्या पानी भी बढ़ा?

जल संरक्षण की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना यह नहीं है कि कितनी संरचनाएं बनाई गईं, बल्कि यह है कि उनसे पानी की उपलब्धता में कितना और कितने समय तक बदलाव आया।

केंद्रीय भूजल संसाधन आकलन के अनुसार डिंडोरी में भूजल दोहन का स्तर 2023 में 12.52 प्रतिशत था और जिला सुरक्षित श्रेणी में था। 2025 में भूजल दोहन बढ़कर 14.40 प्रतिशत हुआ, लेकिन डिंडोरी अब भी सुरक्षित श्रेणी में रहा। हालांकि, ये आंकड़े अपने आप में जल संचय जनभागीदारी अभियान की सफलता या विफलता साबित नहीं करते। वे पूरे जिले में भूजल इस्तेमाल की स्थिति बताते हैं।

हालांकि, दो आकलन वर्षों के बीच दोहन प्रतिशत में बदलाव को जल संरक्षण संरचनाओं के प्रभाव के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि इस अनुपात पर सिंचाई की मांग, फसल पैटर्न, भूजल उपलब्धता और आकलन की पद्धति जैसे कई कारकों का असर पड़ सकता है।

केंद्रीय भूजल बोर्ड इलाकों को भूजल की स्थिति के आधार पर सुरक्षित, अर्ध-संकटग्रस्त, संकटग्रस्त और अति-दोहित श्रेणियों में रखता है। यह वर्गीकरण मुख्य रूप से भूजल की उपलब्धता और उसके दोहन के अनुपात पर आधारित होता है। इसलिए किसी जिले का “सुरक्षित” श्रेणी में होना यह साबित नहीं करता कि हर गांव में गर्मियों के दौरान पानी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

सुन्हा दादर: संरचना का रिकॉर्ड है, असर की निगरानी कहां है?

डिंडोरी के बजंग क्षेत्र के सुन्हा दादर में 2025-26 के मनरेगा रिकॉर्ड में सार्वजनिक कुओं के पास दो रीचार्ज पिट दर्ज हैं। सरकारी रिकॉर्ड में दोनों कामों के लिए 165 घनमीटर जल क्षमता दर्ज है और ग्राम पंचायत को कार्यान्वयन एजेंसी बताया गया है। दोनों को सामुदायिक रीचार्ज पिट के निर्माण के रूप में दर्ज किया गया है।

यह रिकॉर्ड बताता है कि ढांचा कहां और किस काम के लिए बनाया गया। लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि उसके बाद संबंधित कुएं के जलस्तर में कितना बदलाव आया। क्या गर्मियों में कुएं में पानी पहले से ज्यादा समय तक रहा? क्या रीचार्ज पिट में गाद भरने या उसकी क्षमता घटने की समस्या आई? क्या 2026 की गर्मियों में इसका उपयोग हुआ?

इन सवालों का जवाब देने के लिए निर्माण रिकॉर्ड को कुएं के जलस्तर के पहले और बाद के आंकड़ों से जोड़ना होगा। यही जानकारी बताएगी कि यह काम केवल रिकॉर्ड में दर्ज हुआ या सच में पानी बढ़ाने में भी काम आया।

डिंडोरी में जल संरक्षण और जलागम विकास से जुड़े कामों के परिणामों को देखने के लिए सिंचाई का आंकड़ा एक उपयोगी संकेतक हो सकता है। केंद्र के भूमि संसाधन विभाग के WDC-PMKSY 2.0 के जिला-वार रिकॉर्ड के मुताबिक डिंडोरी की चार जलागम परियोजनाओं में 2022-23 में 245 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र सिंचाई के दायरे में आया।

यह आंकड़ा जल संचय जनभागीदारी अभियान का प्रत्यक्ष परिणाम नहीं माना जा सकता, क्योंकि WDC-PMKSY और JSJB अलग कार्यक्रम हैं। फिर भी इससे पता चलता है कि डिंडोरी में जल संरक्षण के कामों को सिंचाई और खेती पर पड़े असर से जोड़कर मापने का तरीका मौजूद है।

यह भी देखना होगा कि जिन इलाकों में ऐसी संरचनाएं बनीं, वहां खेती के लिए पानी की उपलब्धता कितनी बदली। लेकिन किसी संरचना की दर्ज क्षमता और ज़मीन पर पानी के असर के बीच अंतर बना रहता है। रिकॉर्ड यह नहीं बताता कि उससे जुड़े कुएं में वास्तविक जलस्तर कितना बढ़ा, गर्मियों में पानी कितने समय तक उपलब्ध रहा या आसपास की खेती को कितना लाभ मिला।

भूजल जमीन के नीचे होता है, इसलिए उसमें होने वाले बदलाव सीधे दिखाई नहीं देते। भूजल विशेषज्ञ डॉ. हिमांशु कुलकर्णी के अनुसार, भूजल साझा संसाधन है और इसकी सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जमीन के नीचे हो रहे बदलाव आसानी से दिखाई नहीं देते। डिंडोरी में यही फर्क महत्वपूर्ण है कि ऊपर रीचार्ज पिट दिखाई देता है, लेकिन उससे नीचे के भूजल भंडार में कितना पानी पहुंचा, यह बिना जलस्तर के आंकड़ों के नहीं जाना जा सकता।

इसलिए डिंडोरी के मामले में अगला कदम संरचना के रिकॉर्ड को उसके परिणाम के रिकॉर्ड से जोड़ना होगा। किसी संरचना की क्षमता के साथ उससे जुड़े कुएं के जलस्तर का पहले और बाद का रिकॉर्ड भी जरूरी है। तभी यह पता चलेगा कि संरचना कागज पर कितनी बड़ी थी और जमीन पर उसका असर कितना हुआ।

यह जांच संभव है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के नियमित जलस्तर बुलेटिन में डिंडोरी समेत मध्य प्रदेश के विभिन्न जिलों के कुओं के जलस्तर में मौसमी और वार्षिक बदलाव दर्ज किए जाते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के 2025 के जलस्तर आंकड़ों में डिंडोरी के कुछ निगरानी बिंदुओं पर जलस्तर में गिरावट भी दर्ज हुई थी। हालांकि, इन आंकड़ों को जल संचय जनभागीदारी अभियान के परिणाम से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा, क्योंकि जलस्तर पर वर्षा, भूजल दोहन और स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों का भी असर पड़ता है।

इसका जवाब तीन चीजों को साथ देखने से मिलेगा कि ढांचा कहां और किस तरह का है, कब बनाया गया और उससे जुड़े कुएं में पहले और बाद में कितना पानी था। केवल बारिश के बाद जलस्तर बढ़ना पर्याप्त प्रमाण नहीं होगा, क्योंकि उस बदलाव पर वर्षा की मात्रा, फसल चक्र, भूजल दोहन और स्थानीय भूगर्भीय संरचना का भी असर पड़ता है।

पेयजल के मामले में भी यही सावधानी जरूरी है। किसी क्षेत्र में भूजल की समग्र स्थिति सुरक्षित होने का अर्थ यह नहीं कि हर गांव या हर बस्ती में गर्मियों के दौरान पानी आसानी से उपलब्ध है। स्रोत, पाइपलाइन, पंप, बिजली और उनकी नियमित देखभाल, इन सभी की जरूरत होती है। जल जीवन मिशन के तहत ग्रामीण घरों तक नल से पानी पहुंचाने की स्थिति भी अलग से देखनी होगी, क्योंकि जल स्रोत का उपलब्ध होना और घर तक नियमित आपूर्ति होना दो अलग बातें हैं।

डिंडोरी के मॉडल को परखने के लिए चार बातें देखनी होंगी। भूजल कितना बदला, सिंचाई के लिए पानी कितना मिला, पेयजल स्रोत कितने समय तक चले और बनाए गए ढांचे कितने टिके। इसके लिए केवल निर्माण पूरा होने की रिपोर्ट काफी नहीं होगी, कम-से-कम दो मानसून के बाद उनकी स्थिति देखना अधिक उपयोगी होगा।

अभी उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों से यह कहना संभव है कि डिंडोरी में बड़े पैमाने पर जल संरक्षण के काम किए गए हैं। लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि इन कामों ने जिले की जल सुरक्षा में कितना स्थायी बदलाव किया है। इसके लिए ढांचों की संख्या के साथ यह भी देखना होगा कि भूजल, सिंचाई, पेयजल और रखरखाव की स्थिति में क्या बदलाव आया। यह जानकारी सार्वजनिक और स्वतंत्र जांच से ही ज्यादा साफ हो सकेगी।

रखरखाव भी दर्ज है, लेकिन क्या वह पर्याप्त है?

18 अप्रैल 2026 के JGSA स्कोरकार्ड में डिंडोरी के लिए जल संरचनाओं की मरम्मत और रखरखाव से जुड़े 85 काम शुरू, 23 पूर्ण और 30 भौतिक रूप से पूर्ण दर्ज थे। इस श्रेणी में 62.4 प्रतिशत काम पूरे होने की दर दर्ज की गई। लेकिन इससे यह पता नहीं चलता कि जिले में बनी कुल संरचनाओं में से कितनी को नियमित रखरखाव की जरूरत थी और कितनी अभी अपनी क्षमता के मुताबिक काम कर रही हैं।

अगर जिले में करीब तीन लाख जल संरक्षण संरचनाएं दर्ज हैं, तो अगला सवाल केवल यह नहीं है कि कितने ढांचे बनाए गए, बल्कि यह भी है कि उनकी देखभाल कौन करेगा और कितने समय तक करेगा। चेक डैम में गाद भरने, कंटूर ट्रेंच के मिट्टी से भर जाने या रीचार्ज पिट की क्षमता घटने से इन ढांचों का असर समय के साथ कम हो सकता है। इसलिए निर्माण के साथ उनकी देखभाल की जिम्मेदारी और बजट तय होना भी जरूरी है।

यहां दो सवाल अहम हैं। क्या इन ढांचों की नियमित देखभाल के लिए कोई तय व्यवस्था है? और गांव के लोगों की उनकी देखभाल में क्या भूमिका है या हर मरम्मत के लिए अलग सरकारी योजना और बजट की जरूरत पड़ती है?

इन सवालों का जवाब केवल सरकारी स्कोरकार्ड से नहीं मिलेगा। इसके लिए ग्राम पंचायत स्तर पर यह देखना होगा कि कौन-सी संरचनाओं की मरम्मत हुई, किसने कराई, पैसा कहां से आया और कौन उनकी नियमित देखभाल कर रहा है। साथ ही यह भी देखना होगा कि रखरखाव के बाद ढांचे की क्षमता वास्तव में बनी रही या नहीं।

क्या डिंडोरी का अनुभव दूसरे इलाकों के लिए मॉडल बन सकता है?

डिंडोरी से मिलने वाली सबसे उपयोगी सीख वहां बनी संरचनाओं की संख्या नहीं, बल्कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग जल-संरक्षण उपायों को एक साथ योजना में शामिल करने का अनुभव हो सकता है।

डिंडोरी से तीन बातें सीखी जा सकती हैं:

पहली, योजना। बारिश के पानी के पूरे बहाव क्षेत्र को देखकर तय किया जाए कि पानी कहां से आता है, किधर बहता है और कहां उसे रोका या जमीन में उतारा जा सकता है। हर जगह एक जैसी संरचना बनाना इसका विकल्प नहीं हो सकता।

दूसरी, भागीदारी। गांव के लोगों को केवल काम में सहयोग करने तक सीमित न रखा जाए। उन्हें यह तय करने में भी शामिल किया जाए कि ढांचा कहां बने, उसका इस्तेमाल कैसे होगा और उसकी देखभाल कौन करेगा। महिलाओं, किसानों और स्थानीय समूहों की भूमिका भी इसी आधार पर देखी जानी चाहिए।

तीसरी, परिणाम। हर ढांचे की सफलता को केवल उसके बनने से नहीं, बल्कि पानी पर उसके असर से जोड़ा जाए। गांव में कितना पानी उपलब्ध है और उसकी जरूरत कितनी है, इसका स्थानीय हिसाब यानी जल बजट बनाया जाए। इसके साथ भूजल, कुओं, सिंचाई और पेयजल की स्थिति को समय के साथ दर्ज किया जाए। 

लेकिन इसे दूसरे क्षेत्रों में हूबहू दोहराना उचित नहीं होगा। वर्षा, मिट्टी, चट्टानी संरचना, भूजल प्रवाह, खेती और पानी की मांग हर क्षेत्र में अलग होती है। यानी डिंडोरी से सीख संरचनाओं की सूची की नहीं, उन्हें चुनने और संभालने की प्रक्रिया की होनी चाहिए। दूसरे इलाकों में वही तरीका तभी काम करेगा, जब उसे वहां की जमीन, बारिश और पानी की जरूरत के हिसाब से बदला जाए।

डिंडोरी का अनुभव तब दूसरे क्षेत्रों के लिए मजबूत मॉडल बन सकेगा, जब ‘कितने काम हुए’ का आंकड़ा ‘कितना पानी बचा और किसे मिला’ के आंकड़े से जुड़ सके। आखिर जल संरक्षण की असली गिनती गड्ढों, तालाबों या चेक डैम की संख्या में नहीं होती। उसकी गिनती इस बात में होती है कि अगली गर्मी में कितने कुएं चलते हैं, कितने खेतों में पानी रहता है और कितने घरों तक पानी पहुंचता है।

लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें

SCROLL FOR NEXT