गोगा‍बील झील

 

फोटो - नीतू सिंह 

नदी और तालाब

रामसर साइट 'गोगाबील झील' में कम हुई मछलियां, प्रवासी पक्षी भी नाराज़

बिहार के रामसर स्थलों में शामिल गोगा‍बील झील, जिसे गोगाबिल झील भी कहते हैं आज अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान खोती जा रही है। अब इस झील के आस-पास पक्षियों की चहचहाहट कम हो गई है, क्योंकि मछलियों की संख्‍या में गिरावट हुई है। यह झील अब साइबेरिया और मध्य एशिया से आने वाले प्रवासी पक्षियों को भी निराश कर रही है।

Author : नीतू सिंह

कटिहार (बिहार)। गोगाबील झील इन दिनों एक गहरे विरोधाभास की कहानी बनकर उभर रही है एक तरफ अंतरराष्ट्रीय पहचान, दूसरी तरफ जमीनी स्तर पर लगातार बने खतरे। बदहाल अवस्था के कारण यहां मछलियों का स्वास्थ्‍य बिगड़ रहा है, जिसके कारण उनके मरने की घटनाएं आम होती जा रही हैं और इसी कारण प्रवासी पक्षी भी अब इस झील से निराश हैं। ये साइबेरिया व मध्‍य एशिया से आने वाले वो पक्षी हैं, जो कभी यहां आकर अपना बसेरा बनाते थे। 

2025 में मिला था रामसर साइट का दर्जा 

नवंबर 2025 में इस झील को रामसर साइट का दर्जा मिला, जिससे यह भारत की 94वीं और बिहार की छठी अंतरराष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमि बन गई। यह मान्यता किसी साधारण उपलब्धि का परिणाम नहीं है, बल्कि वर्षों की सामुदायिक भागीदारी, वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण प्रयासों का नतीजा है। फिर भी इस पहचान के साथ जो जिम्मेदारी आती है, उसकी परीक्षा अब जमीनी स्तर पर हो रही है। 

गोगाबील झील 

नीमा पंचायत के पूर्व मुखिया जाकिर अंसारी बताते हैं, “गोगाबील का संरक्षण पूरी तरह से समुदाय की भागीदारी से संभव हुआ है। 2015 से ही सभी समुदाय के लोगों ने बिना किसी मुआवज़े के अपनी जमीन इस झील के लिए दी। करीब 144 एकड़ सामुदायिक और 73 एकड़ सरकारी जमीन मिलाकर इसे विकसित किया गया। 2019 में इसे मत्स्य विभाग से हटाकर संरक्षण के तहत लाया गया और 2020 में दो कमेटियों का गठन हुआ। तब से हम लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं। यह एक दूरदराज इलाका है, जहां रात में असामाजिक तत्व घुसने की कोशिश करते हैं, लेकिन आसपास के गांवों के लोग मिलकर इसे बचाने में लगे हुए हैं।”

250 से अधिक ग्रामीणों ने झील के लिए दी थी अपनी ज़मीनें 

करीब 217 एकड़ में फैली यह प्राकृतिक झील सिर्फ एक जलाशय नहीं, बल्कि सामुदायिक इच्छाशक्ति का जीवंत उदाहरण है। इस क्षेत्र के 250 से अधिक ग्रामीणों ने स्वेच्छा से अपनी जमीन संरक्षण के लिए दी, जिनमें 39 किसानों ने औपचारिक रूप से अपनी भूमि सरकार को सौंपी। सरकारी और निजी जमीन 73.78 एकड़ और 143.84 एकड़ को मिलाकर इसे सामुदायिक आरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया। यही कारण है कि गोगाबील को बिहार की पहली सामुदायिक-प्रबंधित आर्द्रभूमि और पहला कम्युनिटी रिजर्व माना जाता है। यहाँ दो समितियाँ सामुदायिक प्रबंधन और संरक्षण समिति मिलकर झील की देखरेख करती हैं, जो इस मॉडल को “लोगों के साथ संरक्षण” की दिशा में एक मजबूत उदाहरण बनाती हैं।

वर्तिका पटेल और अजित प्रज्ञा 

बीएनएचएस में सीनियर प्रोजेक्ट फेलो वर्तिका पटेल कहती हैं, “गोगाबील एक महत्वपूर्ण कम्युनिटी रिजर्व है, जहां हम प्रवासी पक्षियों पर रिसर्च करते हैं। हर साल रूस, कजाकिस्तान और उत्तरी क्षेत्रों से पक्षी अक्टूबर से मार्च के बीच यहां आते हैं। अब तक यहां करीब 200 प्रजातियां रिकॉर्ड की गई हैं और सर्दियों में 8 से 10 हजार पक्षियों की उपस्थिति देखी गई है। यह झील अकेली नहीं है, बल्कि आसपास के छोटे वेटलैंड्स के साथ मिलकर पूरा इकोसिस्टम बनाती है। हालांकि, मानवीय गतिविधियां जैसे खेती और अतिक्रमण की वजह से पक्षियों की संख्या और उनके व्यवहार प्रभावित हो रहा है। इसलिए इस पूरे क्षेत्र को एक साथ समझना और संरक्षित करना जरूरी है।”

पारिस्थितिक दृष्टि से गोगाबील का महत्व असाधारण है। यह सेंट्रल एशियन फ्लाईवे का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहाँ हर साल सर्दियों में साइबेरिया और मध्य एशिया से हजारों प्रवासी पक्षी आते हैं। यहाँ 150 से अधिक प्रजातियाँ दर्ज की गई हैं, जबकि हाल के सर्वेक्षणों में लगभग 8000-10,000  पक्षियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। 

यह झील अकेले नहीं, बल्कि आसपास के छोटे वेटलैंड्स के साथ मिलकर एक विस्तृत पारिस्थितिकी तंत्र बनाती है, जो पक्षियों के लिए भोजन, विश्राम और प्रजनन का सुरक्षित वातावरण प्रदान करता है।

इस पहल की जड़ें नई नहीं हैं। 1990 में इसे पक्षी विहार के रूप में पहचान मिली, लेकिन वास्तविक बदलाव 2015 के बाद शुरू हुआ जब स्थानीय समुदायों ने इसे बचाने का सामूहिक निर्णय लिया। 2019 में इसे आधिकारिक रूप से सामुदायिक और संरक्षण रिजर्व घोषित किया गया और 2020 में समितियों का गठन हुआ। इन प्रयासों ने 2025 में इसे वैश्विक मंच तक पहुँचा दिया। यह यात्रा इस बात को रेखांकित करती है कि संरक्षण तब ही सफल होता है जब स्थानीय समाज उसकी जिम्मेदारी अपने स्तर पर स्वीकार करता है।

गोगाबील झील में लगे जाल 

अध्यक्ष गोगा बिल कम्युनिटी रिजर्व के अध्यक्ष अजीत प्रज्ञा कुमार बताते हैं, “हमने 10 एकड़ जमीन इस झील एक लिए दी है। इस झील में साइबेरियन बर्ड्स आती हैं, जो हिमालय पार करके लगभग 14 दिन लगातार उड़ते हुए बिना रुके डायरेक्ट यहां आती हैं और नवंबर से मार्च तक प्रवास करती हैं। यहां का वातावरण प्रवासी पक्षियों के लिए अनुकूल है भोजन अच्छा है। लेकिन अभी एक ही चिंता है कि हम किसानों ने अपनी जमीन देकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान तो दिला दी पर कुछ असामाजिक तत्व रात में शिकार करने आते हैं. अभी पुलिस पोस्ट चाहिए यहाँ ताकि शिकारियों में भय हो सके। ये लोग जाल मछली के लिए लगाते हैं लेकिन उसमें पक्षी फंस जाते हैं, डेड बॉडी मिलती हैं। कल ही डीएफओ से मिले, जाल हटवाने को कहा। बोले हैं कि जल्द ही कमेटी बैठक होगी।”

गोगाबील एक सक्रिय फ्लडप्लेन वेटलैंड है, जो गंगा और महानंदा नदी प्रणाली से जुड़कर बाढ़ नियंत्रण, जल संतुलन और भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह झील आसपास के गांवों के लिए जल सुरक्षा का आधार भी है। इसलिए इसका संरक्षण केवल जैव विविधता तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय पर्यावरणीय स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।

दिन में पर्यटकों की चहलकदमी रात को शिकार 

गोगाबील की कहानी का दूसरा पहलू कहीं अधिक चिंताजनक है। स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों के अनुसार, रात के समय झील में अवैध शिकार और मछली पकड़ने की घटनाएँ लगातार सामने आ रही हैं। प्रवासी पक्षियों के लिए जो स्थान दिन में सुरक्षित दिखाई देता है, वही अंधेरे में असुरक्षित हो जाता है। जाल बिछाकर मछली पकड़ने की गतिविधियाँ कई बार पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो रही हैं। 

इसके अलावा झील के आसपास बढ़ते ईंट-भट्ठे, औद्योगिक दबाव और अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप भी इसके पारिस्थितिकी तंत्र पर असर डाल रहे हैं।

गोगाबील झील के आस-पास अतिक्रमण 

एक और गंभीर चुनौती पर्यटन के रूप में उभर रही है। रामसर साइट बनने के बाद यहाँ पर्यटकों की संख्या बढ़ने लगी है, जो एक ओर स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए अवसर है, लेकिन दूसरी ओर अनियंत्रित पर्यटन झील की संवेदनशीलता को नुकसान पहुँचा सकता है। विशेषज्ञ “कंट्रोल्ड इको-टूरिज्म” की आवश्यकता पर जोर देते हैं, ताकि संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बना रहे।

इन परिस्थितियों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका फिर से समुदाय की ही बनती है। स्थानीय लोग न केवल जमीन दान कर चुके हैं, बल्कि अब निगरानी और संरक्षण में भी सक्रिय हैं। अवैध गतिविधियों की सूचना देना, प्रशासन पर दबाव बनाना और झील की सुरक्षा को अपनी जिम्मेदारी मानना ये सभी पहल इस मॉडल को मजबूत बनाते हैं।

88 हेक्टेयर के क्षेत्र में एक साथ 10 हजार पक्षियों का जमावड़ा 

इस झील पर लम्बे समय से काम कर रहे भागलपुर के पर्यावरणविद अरविन्द मिश्रा कहते हैं,  “गोगाबील एक छोटी लेकिन बेहद संभावनाओं वाली झील है जहां सैकड़ों प्रजातियों के पक्षी आते हैं। 88 हेक्टेयर के इस क्षेत्र में एक साथ 10 हजार पक्षियों का दिखना असाधारण है। यह स्थानीय समुदाय के योगदान का परिणाम है, जिन्होंने अपनी जमीन दान देकर इसे कम्युनिटी रिजर्व बनाया। रामसर साइट का दर्जा मिलने के बाद यहां के लोगों में नया उत्साह आया है। मैं हमेशा कहता हूं ‘विन कम्युनिटी, विन कंजर्वेशन’। बिना समुदाय के सहयोग के कोई भी संरक्षण सफल नहीं हो सकता।”

गोगाबील झील 

वो आगे कहते हैं, “हालांकि, कुछ चुनौतियां भी हैं। झील के आसपास बढ़ते ईंट-भट्ठे, बड़े पेड़ों की कमी और अवैध मछली पकड़ने की गतिविधियां पक्षियों के लिए खतरा बन रही हैं। इसके लिए सख्त नियंत्रण और योजनाबद्ध संरक्षण की जरूरत है। पर्यटन भी एक अवसर है, लेकिन इसे नियंत्रित रखना होगा, वरना यही खतरा बन सकता है।”

गोगाबील की कहानी इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि संरक्षण केवल सरकारी घोषणा से संभव नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय दर्जा एक शुरुआत हो सकता है, लेकिन असली परीक्षा जमीन पर होती है जहाँ निगरानी, सामुदायिक भागीदारी और सतत प्रबंधन की आवश्यकता होती है। 

यह झील हमें यह याद दिलाती है कि प्राकृतिक धरोहरों को बचाने के लिए केवल पहचान नहीं, बल्कि निरंतर जिम्मेदारी और सतर्कता जरूरी है क्योंकि संरक्षण एक घटना नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है।

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