गुजरात की नदियां राज्य की पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, उद्योग, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी का आधार हैं।
फ़ोटो: शारदा प्रसाद CS, विकिमीडिया कॉमन्स
प्रमुख नदी बेसिन: 6
सबसे लंबी पश्चिमवाहिनी नदी: नर्मदा
सौराष्ट्र की सबसे लंबी नदी: भादर
प्रमुख नदी परियोजना: सरदार सरोवर
प्रमुख तटीय क्षेत्र: खंभात और कच्छ की खाड़ी
सबसे बड़ी चुनौतियां: प्रदूषण, रेत खनन, खारा पानी, जलवायु परिवर्तन
गुजरात भारत का एक ऐसा राज्य है जिसकी पहचान केवल उसकी लगभग 1,600 किलोमीटर लंबी समुद्री तटरेखा से ही नहीं, बल्कि विविध नदी प्रणालियों से भी होती है। राज्य की अधिकांश नदियां पश्चिम की ओर बहते हुए अरब सागर, खंभात की खाड़ी (Gulf of Khambhat) या कच्छ की खाड़ी (Gulf of Kachchh) में मिलती हैं।
हालांकि गुजरात का बड़ा हिस्सा अर्ध-शुष्क और शुष्क जलवायु वाला है, फिर भी यहां नर्मदा, तापी, माही और साबरमती जैसी बड़ी नदियों के साथ-साथ सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात की अनेक छोटी लेकिन स्थानीय स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण नदियां बहती हैं।
गुजरात की नदियां राज्य की पेयजल आपूर्ति, सिंचाई, उद्योग, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी का आधार हैं। सरदार सरोवर परियोजना, उकाई बांध, कडाणा बांध और धरोई बांध जैसी परियोजनाएं इन्हीं नदी प्रणालियों पर आधारित हैं। दूसरी ओर, औद्योगिक प्रदूषण, शहरी सीवेज, अनियंत्रित रेत खनन, खारे पानी का प्रवेश और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां इन नदियों के अस्तित्व को प्रभावित कर रही हैं।
भारत सरकार के India-WRIS (Water Resources Information System) द्वारा किए गए नदी बेसिन वर्गीकरण के अनुसार, गुजरात का अधिकांश भाग पांच प्रमुख नदी बेसिनों - नर्मदा, तापी (ताप्ती), माही, साबरमती तथा कच्छ एवं सौराष्ट्र की पश्चिमवाहिनी नदियों - में आता है। इसके अलावा दक्षिण गुजरात के कुछ क्षेत्र तापी के दक्षिण की पश्चिमवाहिनी नदियों (West Flowing Rivers from Tapi to Tadri) के बेसिन का हिस्सा हैं।
| क्र. सं. | नदी बेसिन | प्रमुख नदियां | गुजरात में प्रमुख क्षेत्र | प्रमुख विशेषता | समुद्र/अंतिम प्रवाह |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | नर्मदा नदी बेसिन | नर्मदा, करजन, ओरसंग, हिरण | नर्मदा, भरूच, छोटा उदयपुर, वडोदरा तथा आसपास के मध्य गुजरात के क्षेत्र | गुजरात का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण नदी बेसिन। सरदार सरोवर परियोजना इसी बेसिन में स्थित है और राज्य की पेयजल व सिंचाई व्यवस्था का प्रमुख आधार है। | खंभात की खाड़ी |
| 2 | तापी (ताप्ती) नदी बेसिन | तापी, पूर्णा, गिरना, पांजरा, वाघुर | तापी, सूरत, नवसारी का कुछ भाग | दक्षिण गुजरात की कृषि, उद्योग और शहरी जलापूर्ति के लिए महत्वपूर्ण। उकाई बाँध इसी बेसिन में है। | अरब सागर |
| 3 | माही नदी बेसिन | माही, सोम, अनास, पनाम | दाहोद, महिसागर, पंचमहल, खेड़ा और वडोदरा का कुछ भाग | मध्य प्रदेश और राजस्थान से होकर गुजरात में प्रवेश करने वाला अंतर्राज्यीय नदी बेसिन, जो सिंचाई और पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत है। | खंभात की खाड़ी |
| 4 | साबरमती नदी बेसिन | साबरमती, वात्रक, मेश्वो, हाथमती, हर्नाव, सेई | साबरकांठा, अरावली, गांधीनगर, अहमदाबाद, खेड़ा तथा मेहसाणा का कुछ भाग | उत्तर और मध्य गुजरात का प्रमुख नदी बेसिन। अहमदाबाद और गांधीनगर जैसे बड़े शहर इसी बेसिन में स्थित हैं। | खंभात की खाड़ी |
| 5 | कच्छ एवं सौराष्ट्र की पश्चिमवाहिनी नदी प्रणाली | भादर, शेत्रुंजी, मच्छू, आजी, कालूभार, ओझत, हेरण, भोगावो | राजकोट, जामनगर, देवभूमि द्वारका, पोरबंदर, जूनागढ़, गिर सोमनाथ, अमरेली, भावनगर, मोरबी, कच्छ | अधिकांश नदियां छोटी और वर्षा-आधारित हैं। स्थानीय जलापूर्ति, सिंचाई और तटीय पारिस्थितिकी के लिए इनका विशेष महत्व है। | अरब सागर, कच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ी |
| 6 | तापी के दक्षिण की पश्चिमवाहिनी नदी प्रणाली | दमनगंगा, पार, अंबिका, पूर्णा, औरंगा, किम | डांग, नवसारी, वलसाड तथा दादरा एवं नगर हवेली से लगे क्षेत्र | पश्चिमी घाट से निकलने वाली अपेक्षाकृत अधिक जलप्रवाह वाली नदियां। दक्षिण गुजरात की कृषि, वनों और जैव विविधता का महत्वपूर्ण आधार हैं। | अरब सागर |
नर्मदा नदी बेसिन गुजरात का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण नदी बेसिन है। इसका अधिकांश भाग मध्य प्रदेश और गुजरात में फैला है। यह राज्य की सिंचाई, पेयजल और जलविद्युत परियोजनाओं का प्रमुख आधार है। सरदार सरोवर परियोजना इसी बेसिन में स्थित है।
तापी नदी बेसिन दक्षिण गुजरात की कृषि, शहरी जलापूर्ति और औद्योगिक गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण है। उकाई बांध इसी बेसिन की प्रमुख परियोजना है। यह बेसिन दक्षिण गुजरात की जल सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
माही नदी बेसिन उत्तर और मध्य गुजरात के लिए सिंचाई तथा पेयजल का महत्वपूर्ण स्रोत है। कडाणा और वणाकबोरी जैसी परियोजनाएं इसी बेसिन में विकसित की गई हैं।
साबरमती नदी बेसिन का जलग्रहण क्षेत्र अपेक्षाकृत छोटा है। अहमदाबाद और गांधीनगर जैसे बड़े शहर इसी बेसिन में स्थित हैं। शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण इसका सामाजिक और आर्थिक महत्व काफी बढ़ गया है।
कच्छ और सौराष्ट्र की पश्चिमवाहिनी नदी प्रणाली
India-WRIS इस पूरे क्षेत्र को “West Flowing Rivers of Kutch and Saurashtra including Luni Basin” के रूप में वर्गीकृत करता है। इसमें भादर, शेत्रुंजी, मच्छू, आजी, कालूभार, ओझत, हेरण और अनेक छोटी मौसमी नदियां शामिल हैं।
इन नदियों का अधिकांश प्रवाह मानसूनी वर्षा पर निर्भर है। ये अरब सागर, कच्छ की खाड़ी और खंभात की खाड़ी में मिलती हैं। सौराष्ट्र और कच्छ के जल संसाधनों में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
दक्षिण गुजरात की कुछ छोटी नदियां, जैसे दमनगंगा, पार, अंबिका, पूर्णा और औरंगा, India-WRIS के “West Flowing Rivers from Tapi to Tadri” बेसिन में शामिल हैं। इन नदियों का उद्गम पश्चिमी घाट (सह्याद्रि) की पहाड़ियों में होता है।
अपेक्षाकृत अधिक वर्षा वाले इस क्षेत्र में ये नदियां वर्ष भर जल उपलब्ध कराती हैं और वलसाड, नवसारी तथा आसपास के जिलों की कृषि, पेयजल और जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अंतरराज्यीय जल साझाकरण और विवाद
गुजरात की लगभग सभी बड़ी नदियां (नर्मदा, तापी, माही और साबरमती) पड़ोसी राज्यों - मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र - से होकर आती हैं। इस कारण इन नदियों का जल प्रबंधन अंतरराज्यीय जल विवादों से भी जुड़ा रहा है।
नर्मदा जल विवाद: नर्मदा के जल बंटवारे को लेकर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के बीच कई दशकों तक विवाद चला। इसके समाधान के लिए नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण (NWDT) का गठन किया गया। न्यायाधिकरण ने जल बंटवारे के साथ-साथ सरदार सरोवर परियोजना की रूपरेखा भी तय की।
माही और साबरमती जल साझाकरण: माही और साबरमती नदी प्रणालियों के प्रबंधन के लिए राजस्थान और गुजरात के बीच समय-समय पर समन्वय की जरूरत पड़ती है। ऊपरी हिस्सों में बनने वाले बांधों और दूसरी जल परियोजनाओं का असर नीचे गुजरात में पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है।
गुजरात की प्रमुख नदियों की सूची
गुजरात में बड़ी अंतर्राज्यीय नदियों से लेकर छोटी पश्चिमवाहिनी नदियों तक, अनेक नदी प्रणालियां हैं। ये नदियां राज्य की जल सुरक्षा, सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण हैं। मत्स्य पालन और तटीय पारिस्थितिकी में भी इनकी अहम भूमिका है।
| क्र. सं. | नदी | उद्गम | अनुमानित लंबाई | कहां मिलती है |
|---|---|---|---|---|
| 1 | नर्मदा | अमरकंटक पठार, मध्य प्रदेश | 1,312 किमी | खंभात की खाड़ी |
| 2 | तापी (ताप्ती) | मुलताई, मध्य प्रदेश | 724 किमी | अरब सागर |
| 3 | माही | विंध्य क्षेत्र, मध्य प्रदेश | 583 किमी | खंभात की खाड़ी |
| 4 | साबरमती | अरावली पर्वतमाला, राजस्थान | 371 किमी | खंभात की खाड़ी |
| 5 | पश्चिम बनास | अरावली पर्वतमाला, राजस्थान | 266 किमी | कच्छ का रण |
| 6 | वात्रक | अरावली क्षेत्र, राजस्थान | 248 किमी | साबरमती नदी |
| 7 | शेत्रुंजी | गिर क्षेत्र, अमरेली | 227 किमी | खंभात की खाड़ी |
| 8 | मेश्वो | अरावली पहाड़ियाँ | 203 किमी | साबरमती नदी |
| 9 | भादर | जसदान क्षेत्र, राजकोट | लगभग 200 किमी | अरब सागर |
| 10 | पूर्णा | पश्चिमी घाट, डांग | लगभग 180 किमी | अरब सागर |
| 11 | पार | पश्चिमी घाट, डांग | लगभग 148 किमी | अरब सागर |
| 12 | धाधर | पावागढ़ पहाड़ियाँ | लगभग 142 किमी | खंभात की खाड़ी |
| 13 | अंबिका | पश्चिमी घाट, डांग | लगभग 136 किमी | अरब सागर |
| 14 | दमनगंगा | सह्याद्रि, महाराष्ट्र | लगभग 131 किमी | अरब सागर |
| 15 | मच्छू | जसदान क्षेत्र, सौराष्ट्र | लगभग 130 किमी | कच्छ की खाड़ी |
| 16 | औरंगा | डांग की पहाड़ियाँ | लगभग 97 किमी | अरब सागर |
| 17 | आजी | सरधार पहाड़ियाँ, राजकोट | लगभग 96 किमी | कच्छ की खाड़ी |
| 18 | कालूभार | सौराष्ट्र की पहाड़ियाँ | लगभग 95 किमी | खंभात की खाड़ी |
| 19 | ओरसंग | मध्य प्रदेश की पहाड़ियाँ | लगभग 154 किमी | नर्मदा नदी |
| 20 | पनाम | पंचमहल क्षेत्र | लगभग 127 किमी | माही नदी |
| 21 | करजन | विंध्य क्षेत्र, मध्य प्रदेश | लगभग 100 किमी | नर्मदा नदी |
| 22 | हातमती | अरावली क्षेत्र | लगभग 110 किमी | साबरमती नदी |
| 23 | हर्नाव | अरावली क्षेत्र | लगभग 90 किमी | साबरमती नदी |
| 24 | सरस्वती | अरावली क्षेत्र | लगभग 80 किमी | कच्छ के रण/ अंतर्देशीय क्षेत्र* |
| 25 | रूपेन (पश्चिम) | बनासकांठा क्षेत्र | लगभग 150 किमी | कच्छ का रण |
| 26 | रूपेन (पूर्व) | अरावली क्षेत्र | लगभग 100 किमी | साबरमती बेसिन |
| 27 | अनास | मध्य प्रदेश | लगभग 175 किमी | माही नदी |
| 28 | सोम | राजस्थान | लगभग 155 किमी | माही नदी |
| 29 | किम | सह्याद्रि, महाराष्ट्र | लगभग 112 किमी | अरब सागर |
| 30 | कोलक | डांग क्षेत्र | लगभग 65 किमी | अरब सागर |
| 31 | मिंदोला | डांग क्षेत्र | लगभग 70 किमी | अरब सागर |
| 32 | गोमती (सौराष्ट्र) | गिर क्षेत्र | लगभग 50 किमी | अरब सागर |
| 33 | ओझत | गिर क्षेत्र | लगभग 125 किमी | अरब सागर |
| 34 | हेरण | गिर क्षेत्र | लगभग 80 किमी | अरब सागर |
| 35 | भोगावो | सुरेन्द्रनगर क्षेत्र | लगभग 155 किमी | खंभात की खाड़ी |
नर्मदा नदी : भारत की सबसे लंबी पश्चिमवाहिनी नदी
नर्मदा भारत की सबसे लंबी पश्चिमवाहिनी नदी है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के अमरकंटक पठार में होता है। यह भरूच के पास खंभात की खाड़ी में मिलती है। सरदार सरोवर परियोजना और नर्मदा परिक्रमा के कारण इसका विशेष महत्व है।
तापी (ताप्ती) नदी: सतपुड़ा से अरब सागर तक बहने वाली दक्षिण गुजरात की प्रमुख नदी
तापी नदी मध्य प्रदेश के मुलताई से निकलकर महाराष्ट्र और गुजरात से होती हुई सूरत के निकट अरब सागर में मिलती है। उकाई बांध इसी नदी पर बना है और यह दक्षिण गुजरात की कृषि, उद्योग तथा शहरी जलापूर्ति के लिए महत्वपूर्ण है।
माही नदी: कर्क रेखा को दो बार पार करती है
माही नदी मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात से होकर बहती है तथा खंभात की खाड़ी में मिलती है। कडाणा बांध और माही सिंचाई परियोजना के कारण यह उत्तर-मध्य गुजरात के लिए एक महत्वपूर्ण जल स्रोत है।
साबरमती नदी: अहमदाबाद की पहचान
साबरमती नदी राजस्थान की अरावली पर्वतमाला से निकलती है और अहमदाबाद सहित कई शहरों से होकर खंभात की खाड़ी में गिरती है। शहरी विकास और नदी पुनर्जीवन परियोजनाओं के कारण यह देश की चर्चित नदियों में शामिल है।
पश्चिम बनास नदी: उत्तर गुजरात और कच्छ क्षेत्र की महत्वपूर्ण वर्षा-आधारित नदी
पश्चिम बनास का उद्गम अरावली पर्वतमाला में होता है। यह उत्तर गुजरात से होकर कच्छ के रण की ओर बहती है और शुष्क क्षेत्रों में जल उपलब्धता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
वात्रक नदी: साबरमती की प्रमुख सहायक नदी
वात्रक नदी राजस्थान के अरावली क्षेत्र से निकलकर गुजरात में बहती है और अंततः साबरमती नदी में मिल जाती है। यह मध्य गुजरात के कई क्षेत्रों में सिंचाई और स्थानीय जलापूर्ति का महत्वपूर्ण स्रोत है।
शेत्रुंजी नदी: सौराष्ट्र की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक
शेत्रुंजी नदी अमरेली जिले के गिर क्षेत्र से निकलती है और भावनगर के निकट खंभात की खाड़ी में मिलती है। इस नदी पर बना शेत्रुंजी बांध क्षेत्र की सिंचाई और पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करता है।
भादर नदी: सौराष्ट्र की सबसे लंबी नदी
भादर सौराष्ट्र की सबसे लंबी नदी है। यह राजकोट जिले के जसदान क्षेत्र से निकलकर अरब सागर में मिलती है।
मेश्वो नदी: अरावली से निकलकर साबरमती को समृद्ध करने वाली नदी
मेश्वो नदी अरावली क्षेत्र से निकलती है और साबरमती की एक प्रमुख सहायक नदी है। इस पर बने जलाशय स्थानीय सिंचाई और पेयजल आपूर्ति में योगदान देते हैं।
धाधर नदी: मध्य गुजरात की प्रमुख पश्चिमवाहिनी नदी
धाधर नदी पावागढ़ की पहाड़ियों से निकलती है और वडोदरा क्षेत्र से बहते हुए खंभात की खाड़ी में मिलती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र मध्य गुजरात के कृषि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है।
दमनगंगा नदी: दादरा एवं नगर हवेली की जीवनदायिनी
दमनगंगा नदी पश्चिमी घाट से निकलकर दादरा एवं नगर हवेली और गुजरात से बहते हुए अरब सागर में मिलती है। यह क्षेत्र की सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक जलापूर्ति का प्रमुख स्रोत है।
अंबिका नदी: बारहमासी नदी
अंबिका नदी का उद्गम डांग जिले की पहाड़ियों में होता है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्र से निकलने के कारण इसमें साल भर अपेक्षाकृत अच्छा प्रवाह बना रहता है। यह नवसारी के पास अरब सागर में मिलती है।
पूर्णा नदी: दक्षिण गुजरात को सींचने वाली नदी
पूर्णा नदी पश्चिमी घाट के घने वन क्षेत्रों से निकलती है। यह दक्षिण गुजरात की कृषि, जैव विविधता और स्थानीय जल संसाधनों के लिए महत्वपूर्ण नदी मानी जाती है।
पार नदी: महत्वपूर्ण पश्चिमवाहिनी नदी
पार नदी डांग की पहाड़ियों से निकलती है और वलसाड जिले से होकर अरब सागर में मिलती है। यह स्थानीय सिंचाई और तटीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
मच्छू नदी: 1979 की मोरबी त्रासदी
मच्छू नदी 1979 की मोरबी बांध त्रासदी के कारण पूरे देश में चर्चित हुई।
औरंगा नदी: दक्षिण गुजरात की तटीय नदी
औरंगा नदी डांग की पहाड़ियों से निकलती है और वलसाड के निकट अरब सागर में मिलती है। अपेक्षाकृत छोटे जलग्रहण क्षेत्र वाली यह नदी स्थानीय कृषि और भूजल पुनर्भरण में योगदान देती है।
नदियों से जुड़ा लोक-सांस्कृतिक और ऐतिहासिक ताना-बाना
गुजरात में नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर भी हैं। नर्मदा नदी के किनारे सदियों से चली आ रही 'नर्मदा परिक्रमा' का अत्यंत धार्मिक और सामाजिक महत्व है। यह नदी तट पर रहने वाले समुदायों को पारिस्थितिक संवेदनशीलता से जोड़ती है।
वहीं साबरमती नदी का तट भारत के स्वतंत्रता संग्राम का गवाह रहा है, जहां महात्मा गांधी ने सत्याग्रह आश्रम (साबरमती आश्रम) की स्थापना की थी। तापी नदी का तट ऐतिहासिक रूप से भारत के सबसे समृद्ध समुद्री व्यापारिक बंदरगाहों में से एक रहा है।
सौराष्ट्र और कच्छ का जल संकट: जब साड़ियों के रंग और सिरामिक के मलबे ने ली नदियां
सौराष्ट्र और कच्छ का क्षेत्र भौगोलिक रूप से अर्ध-शुष्क है, जहां का जीवन चक्र इन छोटी और मौसमी नदियों पर टिका हुआ है। लेकिन आज ये नदियां केवल पानी की कमी से ही नहीं, बल्कि अनियंत्रित औद्योगिकीकरण की मार से भी जूझ रही हैं।
भादर नदी: रासायनिक कचरे में ढलते खेत
सौराष्ट्र की सबसे लंबी नदी भादर का नाम सुनते ही जेतपुर के किसानों की चिंता बढ़ जाती है। किसी ज़माने में यह नदी राजकोट से लेकर पोरबंदर तक खेती और पेयजल का मुख्य आधार थी। लेकिन आज यह जेतपुर की कपड़ा छपाई (Saree Dyeing & Printing) और टेक्सटाइल इकाइयों से निकलने वाले ज़हरीले पानी को ढोने वाला नाला बन चुकी है।
भादर नदी के किनारे बसे गाँवों में भूजल इस कदर प्रदूषित हो चुका है कि किसानों को फसलों को बचाने के लिए टैंकरों से पानी खरीदना पड़ रहा है।
आजी नदी: शहर का सीवेज ढोता आंचल
राजकोट शहर की प्यास बुझाने वाली आजी नदी का हाल भी अलग नहीं है। आजी-1 जलाशय तक तो इसका पानी उपयोग योग्य रहता है, लेकिन जैसे ही यह राजकोट शहर की सीमा में प्रवेश करती है, इसमें घरेलू सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट उड़ेल दिया जाता है। शहर पार करते ही नदी का प्राकृतिक अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
मच्छू नदी: सिरामिक के मलबे में दबती ऐतिहासिक स्मृति
वर्ष 1979 की विनाशकारी बांध त्रासदी की गवाह रही मोरबी की मच्छू नदी आज एक नए संकट से जूझ रही है। मोरबी के विशाल सिरामिक उद्योग (Ceramic Tile Industry) से निकलने वाले कचरे और मलबे ने नदी के तल को उथला कर दिया है। प्राकृतिक प्रवाह बाधित होने से मानसून के दौरान हल्की बारिश में भी मोरबी शहर पर जलभराव का खतरा मंडराने लगता है।
कच्छ का अंतरदेशीय (Inland) जल तंत्र और मालधारियों का संकट
कच्छ की मौसमी नदियां समुद्र में जाने के बजाय 'कच्छ के महान रण' (Salt Flats) में विलीन हो जाती हैं। ये नदियां साल के 10-11 महीने सूखी रहती हैं, लेकिन मानसून के दिनों में पूरे क्षेत्र के भूजल को रिचार्ज करती हैं।
हाल के वर्षों में बंदरगाहों के विस्तार, खनन और औद्योगिक गलियारों के निर्माण के कारण इन मौसमी नदियों के प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों (Catchment Areas) को बांध दिया गया है।
जब नदियों का मीठा पानी रण तक नहीं पहुंच पाता, तो तटीय इलाकों में समुद्री खारे पानी का प्रवेश (Saline Intrusion) तेजी से बढ़ जाता है।
इसका सीधा असर कच्छ के पारंपरिक 'मालधारी' (पशुपालक) और किसान समुदायों पर पड़ा है, जिनके मीठे पानी के कुएं और पारंपरिक चरागाह (बन्नी घास के मैदान) नष्ट हो रहे हैं।
सौराष्ट्र का चेक-डैम आंदोलन: जब समुदायों ने संवारी अपनी नदियां
समस्याओं के बीच सौराष्ट्र के जल इतिहास में एक सकारात्मक अध्याय भी दर्ज है। 1990 और 2000 के दशकों में जब सौराष्ट्र भीषण सूखे से जूझ रहा था, तब स्थानीय समुदायों, किसानों और गैर-सरकारी संगठनों ने मिलकर 'चेक-डैम क्रांति' की शुरुआत की।
राजकोट, अमरेली और जूनागढ़ जिलों में बहने वाली छोटी नदियों और बरसाती नालों पर हजारों की संख्या में छोटे चेक-डैम बनाए गए। इस सामुदायिक पहल ने न केवल सूखती नदियों को मानसून के बाद कुछ अतिरिक्त महीनों तक बहने का जीवन दिया, बल्कि आसपास के कुओं के भूजल स्तर को ऊपर उठाने में भी ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
गुजरात की नदियां और राज्य की अर्थव्यवस्था
गुजरात की नदियां राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। सिंचाई और पेयजल आपूर्ति के अलावा राज्य का विशाल औद्योगिक नेटवर्क इन्हीं पर टिका है। नर्मदा और माही जैसी नदियों के विशाल कैनाल नेटवर्क ने उत्तर गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ के सूखे क्षेत्रों तक पानी पहुंचाकर कृषि परिदृश्य को बदल दिया है।
साबरमती रिवरफ्रंट: शहरी सौंदर्य बनाम पारिस्थितिक सवाल: अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे विकसित 'साबरमती रिवरफ्रंट' को देश में शहरी नदी विकास के एक प्रमुख उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
इससे शहर में पर्यटन, मनोरंजन और सार्वजनिक स्थानों का विस्तार हुआ है। साथ ही, नदी के किनारे नए शहरी विकास को भी बढ़ावा मिला है।
हालांकि, कुछ पर्यावरणविदों का कहना है कि साबरमती में साल भर पानी बनाए रखने के लिए नर्मदा नहर का पानी छोड़ा जाता है।
उनका यह भी मानना है कि नदी के किनारों को कंक्रीट से विकसित करने से इसका प्राकृतिक स्वरूप बदला है। इससे नदी की पारिस्थितिकी प्रभावित हुई है। जलीय जीवों के आवास पर भी इसका असर पड़ा है।
अंतर्देशीय जलमार्ग (Inland Waterways) और जल पर्यटन:
राष्ट्रीय जलमार्ग अधिनियम के तहत गुजरात में नर्मदा (NW-73) और तापी (NW-100) जैसी नदियों को अंतर्देशीय जलमार्ग के रूप में विकसित किया जा रहा है।
इसके अलावा खंभात की खाड़ी में घोघा-हजीरा रो-रो फेरी और कुछ नदियों में रिवर क्रूज़ पर्यटन ने जल परिवहन के नए विकल्प खोले हैं। हालांकि, ऐसी परियोजनाओं के लिए कई जगह नदी में ड्रेजिंग (नदी तल की खुदाई) करनी पड़ती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पहले इसके पर्यावरणीय प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन जरूरी है। खासकर यह देखना महत्वपूर्ण है कि इसका जलीय जीवों और नदी मुहानों के पारिस्थितिकी तंत्र पर क्या असर पड़ सकता है।
गुजरात की प्रमुख सहायक नदियां
गुजरात की बड़ी नदियां कई सहायक नदियों से मिलकर बनती हैं। ये सहायक नदियां मुख्य नदी के प्रवाह को बनाए रखने में मदद करती हैं। ये वर्षा का पानी भी मुख्य नदी तक पहुंचाती हैं।
सिंचाई और भूजल पुनर्भरण में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नर्मदा, तापी, माही और साबरमती की कई सहायक नदियां दूसरे राज्यों से निकलकर गुजरात में आती हैं। इससे इन नदी प्रणालियों का जलग्रहण क्षेत्र बड़ा हो जाता है।
| क्र. सं. | मुख्य नदी | प्रमुख सहायक नदियां |
|---|---|---|
| 1 | नर्मदा | तवा, शेर, शक्कर, दुधी, गोई, गंजाल, करजन, ओरसंग, हिरन, बनजार, कोलार, कुंडी, करम, चोरल, हथनी आदि |
| 2 | तापी (ताप्ती) | पूर्णा, गिरना, पांजरा, वाघुर, बोरी, अनेर, अरुणावती, गोमई, वाकी, अम्बा, कैसरी, सिपना आदि |
| 3 | माही | सोम, अनास, पनाम, जाखम, मोरेन, चाप, एराव, चापी, हडाफ आदि |
| 4 | साबरमती | सेई, वाकल, हर्नाव, हाथमती, मेश्वो, वात्रक, माजम, खारी, वकील, हथमती की स्थानीय उपधाराएं आदि |
| 5 | पश्चिम बनास | सीपु, बालाराम, सरस्वती, बनास की स्थानीय मौसमी धाराएँ |
| 6 | धाधर | विश्वामित्री, जांबुवा, देव, स्थानीय मौसमी नाले |
| 7 | भादर | गोमती, मोज, फोफल, उतावली, गोंडल क्षेत्र की कई छोटी मौसमी धाराएं |
| 8 | शेत्रुंजी | राजस्थली, पालिताना और गिर क्षेत्र की छोटी मौसमी धाराएं (स्थायी सहायक नदियां सीमित) |
| 9 | मच्छू | लीलापर तथा वांकानेर क्षेत्र की छोटी मौसमी धाराएं (स्थायी सहायक नदियां बहुत कम) |
| 10 | दमनगंगा | धोड़द, शाकर्तोंड, नान्दी, स्थानीय पहाड़ी जलधाराएं |
| 11 | अंबिका | कावेरी (स्थानीय), खरैरा, खापरी तथा डांग की छोटी वन धाराएं |
| 12 | पूर्णा | गिरा, झांखरी, खेपरी तथा पश्चिमी घाट की छोटी धाराएँ |
| 13 | पार | नार, राइपुर तथा डांग क्षेत्र की छोटी पहाड़ी धाराएं |
| 14 | औरंगा | डांग क्षेत्र की छोटी वन जलधाराएँ और मौसमी सहायक नदियां |
गुजरात की नदियों पर बने प्रमुख बांध
गुजरात की प्रमुख नदियों पर बने बांध राज्य की जल सुरक्षा, सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और ऊर्जा उत्पादन के महत्वपूर्ण आधार हैं। नीचे राज्य की प्रमुख नदी घाटी परियोजनाओं और बांधों की सूची दी गई है।
| क्र. सं. | बांध | नदी | जिला | प्रमुख उद्देश्य |
|---|---|---|---|---|
| 1 | सरदार सरोवर | नर्मदा | नर्मदा | सिंचाई, पेयजल एवं जलविद्युत |
| 2 | उकाई | तापी | तापी | सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण एवं जलविद्युत |
| 3 | कडाणा | माही | महिसागर | सिंचाई एवं पेयजल |
| 4 | धरोई | साबरमती | मेहसाणा | सिंचाई एवं पेयजल |
| 5 | शेत्रुंजी बांध | शेत्रुंजी | भावनगर | सिंचाई एवं पेयजल |
| 6 | करजन बांध | करजन | वडोदरा | सिंचाई एवं पेयजल |
| 7 | मेश्वो बांध | मेश्वो | अरावली | सिंचाई एवं पेयजल |
| 8 | दांतीवाड़ा बांध | पश्चिम बनास | बनासकांठा | सिंचाई एवं पेयजल |
| 9 | पनाम बांध | पनाम | पंचमहल | सिंचाई एवं पेयजल |
| 10 | मच्छू–II बांध | मच्छू | मोरबी | सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण |
| 11 | आजी–I बांध | आजी | राजकोट | सिंचाई एवं पेयजल |
| 12 | भादर बांध (भादर-I/II) | भादर | राजकोट/जूनागढ़ क्षेत्र | सिंचाई एवं पेयजल |
सरदार सरोवर, उकाई, कडाणा, धरोई, करजन और दांतीवाड़ा जैसी परियोजनाओं ने गुजरात की सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और ऊर्जा उत्पादन को मजबूत किया है। हालांकि, कई अध्ययनों के अनुसार बड़े बांध नदी के प्राकृतिक प्रवाह और नदी मुहानों की पारिस्थितिकी को भी प्रभावित कर सकते हैं।
गुजरात की नदी मुहाने और तटीय पारिस्थितिकी
जहां नदी का मीठा पानी समुद्र के खारे पानी से मिलता है, उसे नदी मुहाना (Estuary) कहा जाता है। खंभात की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी में मिलने वाली नदियां दुनिया के सबसे समृद्ध खारामिश्रित (Brackish Water) पारिस्थितिकी तंत्रों का निर्माण करती हैं।
खंभात और कच्छ की खाड़ी का महत्व
गुजरात की दो बड़ी खाड़ियां - खंभात की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी - राज्य की नदी प्रणालियों के लिए विशेष महत्व रखती हैं।
खंभात की खाड़ी में नर्मदा, माही, साबरमती और धाधर जैसी प्रमुख नदियां मिलती हैं। यहां भारत में सबसे अधिक ज्वारीय उतार-चढ़ाव (Tidal Range) देखने को मिलता है। तेज़ ज्वार और नदी के प्रवाह के कारण इस क्षेत्र में लगातार तलछट (Sediment) का जमाव और कटाव होता रहता है।
दूसरी ओर, कच्छ की खाड़ी में सौराष्ट्र और कच्छ की कई छोटी नदियां और मौसमी जलधाराएं मिलती हैं। यह क्षेत्र मैंग्रोव वनों, प्रवाल भित्तियों और समुद्री घास के विशाल क्षेत्रों के लिए प्रसिद्ध है। यहां अनेक प्रकार की मछलियां, समुद्री जीव और पक्षी पाए जाते हैं। भारत का पहला समुद्री राष्ट्रीय उद्यान भी इसी क्षेत्र में स्थित है।
मैंग्रोव, मत्स्य संसाधन और आजीविका
नदी मुहानों के आसपास बड़ी मात्रा में मैंग्रोव वन विकसित होते हैं। ये वन समुद्री कटाव को कम करने में मदद करते हैं और मछलियों, केकड़ों, झींगों सहित अनेक जलीय जीवों के लिए प्रजनन और पालन-पोषण का सुरक्षित स्थान बनाते हैं।
इसलिए गुजरात का समुद्री मत्स्य उद्योग और तटीय मछुआरा समुदाय काफी हद तक स्वस्थ नदी मुहानों पर निर्भर हैं। साथ ही, कई तटीय आर्द्रभूमियां प्रवासी पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराती हैं।
बढ़ती चुनौतियां
हाल के वर्षों में कई नदी मुहानों पर औद्योगिक प्रदूषण, शहरी अपशिष्ट, बंदरगाहों का विस्तार, ड्रेजिंग (समुद्री तल की खुदाई), खारे पानी का बढ़ता प्रवेश और नदियों में मीठे पानी के कम होते प्रवाह जैसी चुनौतियां सामने आई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि नदी और समुद्र के बीच प्राकृतिक जल प्रवाह बना रहना बहुत जरूरी है। यदि यह प्रवाह प्रभावित होता है, तो मैंग्रोव, मत्स्य संसाधनों और पूरे तटीय पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ सकता है। इसलिए नदी मुहानों का संरक्षण केवल पर्यावरण की दृष्टि से ही नहीं, बल्कि जल सुरक्षा और लाखों लोगों की आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण है।
गुजरात की नदियों के सामने प्रमुख चुनौतियां
हाल के वर्षों में प्रदूषण, रेत खनन, खारे पानी का प्रवेश और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने इन नदियों पर दबाव बढ़ाया है।
औद्योगिक प्रदूषण
गुजरात देश के सबसे बड़े औद्योगिक राज्यों में से एक है। राज्य के कई बड़े औद्योगिक क्षेत्र नदियों के किनारे बसे हैं। इन क्षेत्रों से निकलने वाले अपशिष्ट का सही तरीके से उपचार जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर नदी का पानी प्रदूषित हो सकता है। इसका असर जलीय जीवों, खेती और पेयजल स्रोतों पर पड़ता है।
शहरी सीवेज
राज्य के बड़े शहरों से निकलने वाला घरेलू सीवेज भी कई नदियों के लिए चुनौती बना हुआ है। विशेष रूप से साबरमती, विश्वामित्री और अन्य शहरी नदियों में अनुपचारित या आंशिक रूप से उपचारित सीवेज के प्रवाह की समस्या समय-समय पर सामने आती रही है। इससे नदी में घुलित ऑक्सीजन का स्तर घट सकता है और जलीय जैव विविधता प्रभावित होती है।
रेत खनन
निर्माण कार्यों के लिए नदी की रेत की मांग लगातार बढ़ रही है। इसके कारण कई नदियों में अत्यधिक या अवैध रेत खनन की शिकायतें सामने आती रही हैं।
अनियंत्रित रेत खनन से नदी का प्राकृतिक तल बदल सकता है। इससे नदी किनारों का कटाव बढ़ने का खतरा रहता है। इसका असर जलीय जीवों और उनके आवास पर भी पड़ सकता है।
बांधों और बैराजों का प्रभाव
नर्मदा, तापी, माही और साबरमती जैसी नदियों पर बड़े बांध बने हैं। इनसे सिंचाई, पेयजल और बिजली उत्पादन को बड़ा सहारा मिला है। लेकिन कई अध्ययनों के अनुसार, बड़े बांध नदी के प्राकृतिक प्रवाह को बदल सकते हैं।
इससे नदी के साथ बहने वाली मिट्टी और रेत (तलछट) की मात्रा भी प्रभावित होती है। इसका असर कुछ जगहों पर नदी के मुहानों, आर्द्रभूमियों और मत्स्य संसाधनों पर पड़ सकता है।
खारे पानी का प्रवेश
गुजरात की लंबी समुद्री तटरेखा के कारण कई तटीय नदी मुहानों और भूजल भंडारों में खारे पानी के प्रवेश (Saline Intrusion) की समस्या देखी जाती है। जब नदियों में मीठे पानी का प्रवाह कम हो जाता है, तो समुद्र का खारा पानी भीतर तक प्रवेश कर सकता है।
इसका असर खेती, पेयजल और तटीय पारिस्थितिकी पर पड़ता है। यह समस्या विशेष रूप से खंभात और कच्छ की खाड़ी से जुड़े क्षेत्रों में अधिक दिखाई देती है।
जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन का असर नदी के प्रवाह, बाढ़ और सूखे, तीनों पर पड़ सकता है। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में इससे जल संसाधनों का प्रबंधन और चुनौतीपूर्ण हो जाता है। दूसरी ओर, तटीय इलाकों में समुद्र-स्तर बढ़ने और खारे पानी के प्रवेश का खतरा भी बढ़ सकता है।
आगे का रास्ता: संरक्षण के लिए क्या जरूरी है?
गुजरात की नदियों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए केवल कंक्रीट के ढांचे बनाना काफी नहीं है। पूरे नदी बेसिन को ध्यान में रखकर नीतियां बनानी होंगी।
नदियों के न्यूनतम पर्यावरण प्रवाह (Ecological Flow) को हर मौसम में बनाए रखा जाए।
औद्योगिक कचरे और सीवेज के शत-प्रतिशत उपचार (Zero Liquid Discharge) को सख्ती से लागू किया जाए।
नदी के कैचमेंट क्षेत्रों और प्राकृतिक आर्द्रभूमियों (Wetlands) में अतिक्रमण और अनियंत्रित रेत खनन पर स्थायी रोक लगे।
सौराष्ट्र के चेक-डैम आंदोलन की तर्ज पर स्थानीय समुदायों और मालधारियों की पारंपरिक जल समझ को नीति निर्माण का हिस्सा बनाया जाए।
नर्मदा गुजरात की सबसे महत्वपूर्ण और भारत की सबसे लंबी पश्चिमवाहिनी नदी है। इसकी कुल लंबाई लगभग 1,312 किलोमीटर है। यह मध्य प्रदेश के अमरकंटक पठार से निकलकर गुजरात में भरूच के पास खंभात की खाड़ी में मिलती है।
नर्मदा को गुजरात की सबसे महत्वपूर्ण नदी माना जाता है। सरदार सरोवर परियोजना के माध्यम से यह राज्य के अनेक जिलों को पेयजल और सिंचाई का पानी उपलब्ध कराती है।
तापी, दमनगंगा, अंबिका, पूर्णा, पार और औरंगा जैसी नदियां सीधे अरब सागर में मिलती हैं। वहीं नर्मदा, माही, साबरमती और धाधर खंभात की खाड़ी में तथा मच्छू जैसी नदियां कच्छ की खाड़ी में मिलती हैं।
सरदार सरोवर बांध नर्मदा नदी पर बना है। यह गुजरात की सबसे बड़ी बहुउद्देशीय नदी परियोजनाओं में से एक है।
India-WRIS के वर्गीकरण के अनुसार गुजरात छह प्रमुख नदी बेसिन या नदी प्रणाली क्षेत्रों में आता है। इनमें नर्मदा, तापी, माही, साबरमती, कच्छ एवं सौराष्ट्र की पश्चिमवाहिनी नदियां तथा तापी के दक्षिण की पश्चिमवाहिनी नदियां शामिल हैं।
भादर सौराष्ट्र क्षेत्र की सबसे लंबी नदी मानी जाती है। यह राजकोट जिले के जसदान क्षेत्र से निकलती है और अरब सागर में मिलती है।
औद्योगिक प्रदूषण, शहरी सीवेज, रेत खनन, बड़े बांधों से नदी के प्रवाह में बदलाव, खारे पानी का प्रवेश और जलवायु परिवर्तन गुजरात की नदियों के सामने प्रमुख चुनौतियां हैं।
गुजरात की अधिकांश नदियां पश्चिम दिशा की ओर बहती हैं। इनमें से अधिकांश अरब सागर, खंभात की खाड़ी या कच्छ की खाड़ी में जाकर मिलती हैं।
सरदार सरोवर, उकाई, कडाणा, धरोई, करजन और दांतीवाड़ा जैसी परियोजनाएं गुजरात की प्रमुख नदी घाटी परियोजनाओं में शामिल हैं।
गुजरात की नदियां पेयजल, सिंचाई, उद्योग, मत्स्य पालन, भूजल पुनर्भरण और तटीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण हैं। राज्य की जल सुरक्षा और आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा इन्हीं नदी प्रणालियों पर निर्भर करता है।
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