तीस्ता नदी, रंगपो के पास, सिक्किम

 

फोटो: डॉ सतेंद्र | CC BY-SA 3.0 | विकिमीडिया कॉमन्स

नदी और तालाब

126 जलस्रोतों को पुनर्जीवित कर बढ़ाया गया हेवल नदी का जलप्रवाह

Author : डॉ. कुमारी रोहिणी

  • नीति आयोग के संकलन में दर्ज प्रस्तुति के अनुसार, 126 जलस्रोत पुनर्जीवित हुए और जलप्रवाह में करीब 60 प्रतिशत वृद्धि बताई गई।

  • नदी को पानी देने वाले क्षेत्रों में वर्षाजल रोकने, जमीन में पानी उतारने और पौधरोपण पर जोर दिया गया।

  • स्थानीय महिलाओं ने नर्सरियों, जंगल की निगरानी और चारा क्षेत्रों की देखभाल में भाग लिया।

उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल में हेवल नदी का घटता पानी पेयजल और सिंचाई के लिए चिंता बन रहा था। उसे पानी देने वाले प्राकृतिक स्रोत भी कमजोर पड़ रहे थे। इसके समाधान के लिए वन विभाग और ग्रामीणों ने नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में काम शुरू किया। बारिश का पानी रोकने के लिए खाइयां और छोटे अवरोध बनाए गए। जलस्रोतों के पुनर्भरण क्षेत्रों में पौधरोपण और भूमि संरक्षण के उपाय किए गए।

इस पहल का उल्लेख 25 अक्टूबर 2026 के मन की बात कार्यक्रम में भी हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्षाजल संग्रह, भूजल पुनर्भरण और पौधरोपण के साझा प्रयासों की चर्चा की।

जंगलों से निकलकर खेतों तक पहुंचती हेवल

टिहरी की जिला पर्यावरण योजना के अनुसार, हेवल का उद्गम खुरेत के जंगलों में करीब 2,690 मीटर की ऊंचाई पर है। कद्दूखाल क्षेत्र में खुरेत गाड़, पुजाल्डी गाड़ और सौर गाड़ का पानी मिलकर हेवल बनाता है। गाड़ पहाड़ में छोटी नदी या जलधारा को कहते हैं। योजना के अनुसार, हेवल को प्राकृतिक जलस्रोतों से पानी मिलता है।

इसी दस्तावेज में नदी के पानी घटने के पीछे अत्यधिक दोहन, जलवायु परिवर्तन और सड़क कटान जैसे कारण बताए गए हैं। सड़क कटान से भूजल के दोबारा भरने की प्रक्रिया प्रभावित होने की बात भी दर्ज है। नरेंद्रनगर वन प्रभाग के काम में जलस्रोतों का पुनर्जीवन, छोटी धाराओं का संरक्षण, पौधरोपण और नदी तल का प्रबंधन शामिल था।

इसलिए संरक्षण के काम में नदी के साथ उसके जलग्रहण क्षेत्र को भी शामिल किया गया। जलग्रहण क्षेत्र वह इलाका है, जहां गिरने वाली बारिश का पानी बहकर किसी नदी तक पहुंचता है। बारिश का कुछ पानी मिट्टी और चट्टानों की दरारों से जमीन में उतरता है। यही पानी प्राकृतिक जलस्रोतों को भी मिलता है।

पहले पहचाने स्रोत, फिर तय किए काम

जर्मन विकास सहयोग संस्था जीआईजेड के केस अध्ययन के अनुसार, वन विभाग ने 2016 में स्थानीय लोगों और ग्राम प्रतिनिधियों से परामर्श शुरू किया था। तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी धर्म सिंह मीणा ने पहल को आगे बढ़ाया। अध्ययन में शुरुआती चरण के दौरान करीब 16,000 हेक्टेयर क्षेत्र में काम का लक्ष्य बताया गया है। इसमें 66 जलस्रोतों के पुनर्भरण क्षेत्र और 17 जलधाराएं शामिल थीं।

काम से पहले स्रोतों की पहचान और मानचित्रण किया गया। जमीन और चट्टानों की बनावट, पानी के बहाव और स्थानीय जरूरतों की जानकारी जुटाई गई। इसके आधार पर तय किया गया कि कहां पानी रोकना है और किन जगहों पर उसे जमीन में उतारना उपयोगी होगा।

किसी जलस्रोत को जमीन के भीतर से पानी किस दिशा से मिलता है, यह केवल ऊपरी ढलान देखकर तय नहीं किया जा सकता। इसलिए उस क्षेत्र की पहचान जरूरी है, जहां बारिश का पानी जमीन में समाकर जलस्रोत तक पहुंचता है।

खाइयां, छोटे अवरोध और स्थानीय वनस्पति

हेवल में पुनर्भरण गड्ढे, छोटे चेकडैम और खाइयां बनाए गए। स्थानीय पेड़ और घास भी लगाई गईं। उद्देश्य पानी की गति घटाना, मिट्टी का कटाव रोकना और जमीन में नमी बनाए रखना था।

ढलान पर बारिश का पानी तेजी से बह जाए तो उसे भीतर समाने का कम समय मिलता है। छोटे अवरोध इस बहाव को धीमा करते हैं। लेकिन इनका आकार और स्थान स्थानीय जमीन के अनुसार होना चाहिए। हर ढलान पर एक ही तरीका अपनाना कारगर नहीं होगा।

नीति आयोग की जलस्रोत प्रबंधन संबंधी संसाधन पुस्तिका बताती है कि प्राकृतिक जलस्रोत वे स्थान हैं, जहां भूजल जमीन की सतह पर निकलता है। चट्टानों की दरारों और पानी जमा करने वाली परतों से उनका संबंध होता है। इसलिए स्रोत के संरक्षण के लिए उस क्षेत्र की पहचान जरूरी है, जहां से उसे जमीन के भीतर पानी मिलता है।

इसका सीधा अर्थ है कि पाइप और टंकी के साथ स्रोत की देखभाल भी जरूरी है। पाइप पानी घर तक पहुंचाता है। स्रोत में पानी बना रहे, इसके लिए उसे पानी देने वाली भूमिगत परतों का पुनर्भरण जरूरी है। हेवल के काम में इसी जरूरत पर ध्यान दिया गया।

क्या बदलाव दर्ज हुआ?

जीआईजेड के केस अध्ययन में 66 में से 34 जलस्रोतों के प्रवाह में सुधार दर्ज है। उपलब्ध विवरण से बाकी स्रोतों की स्थिति स्पष्ट नहीं होती।

नीति आयोग के कार्यशाला संकलन के पृष्ठ 94 में भी हेवल परियोजना के परिणाम दर्ज हैं। 17 फरवरी 2025 की कार्यशाला में उत्तराखंड वन विभाग के अधिकारी धर्म सिंह मीणा की प्रस्तुति के अनुसार, परियोजना से 126 जलस्रोत पुनर्जीवित हुए और जलप्रवाह में 60 प्रतिशत वृद्धि हुई।

हालांकि, इस संक्षिप्त विवरण में मापन की अवधि और स्रोतवार आंकड़े नहीं दिए गए हैं। इसलिए इसे पूरी हेवल नदी के सालाना प्रवाह में 60 प्रतिशत वृद्धि नहीं माना जा सकता। दोनों दस्तावेजों में शामिल स्रोतों और मूल्यांकन अवधि का पूरा मिलान भी उपलब्ध नहीं है। इसलिए इन आंकड़ों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।

स्रोतवार माप और वर्षा के आंकड़े उपलब्ध होने पर यह समझना आसान होगा कि किन उपायों से कितना सुधार हुआ और वह कितने समय तक बना रहा।

महिलाओं की भागीदारी से आजीविका तक

हेवल घाटी में काम का सामाजिक पक्ष भी दर्ज हुआ है। शोधकर्ता आशिम कुमार मन्ना के क्षेत्र-अध्ययन पर आधारित लेख के अनुसार, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों ने स्थानीय नर्सरियां संभालीं। वे जंगल की निगरानी, सामुदायिक चारा क्षेत्रों की देखभाल और पौधरोपण से भी जुड़ीं।

लेख में अगरखाल की महिलाओं द्वारा संचालित सहकारी दूध दुकान और कैफे का उदाहरण भी है। इससे संरक्षण के प्रयासों के साथ स्थानीय आजीविका की गतिविधियों की जानकारी मिलती है। इन उदाहरणों में पानी, चारे, पशुपालन और रोजगार की जरूरतें एक-दूसरे से जुड़ी दिखाई देती हैं।

आगे की कसौटी: गर्मियों में कितना पानी टिकेगा?

हेवल में दर्ज सुधार कितना टिकाऊ है, इसका आकलन कई वर्षों के मौसमी प्रवाह से होगा। खास तौर पर गर्मियों में पानी की उपलब्धता देखनी होगी। इसके लिए स्रोतवार पानी की मात्रा और वर्षा का नियमित रिकॉर्ड जरूरी है। साथ ही यह देखना होगा कि पेयजल आपूर्ति और सिंचाई में कितनी मदद मिली। संरक्षण संरचनाओं की मरम्मत और पानी की गुणवत्ता की जांच भी इसी निगरानी का हिस्सा होनी चाहिए।

हेवल का अनुभव जलस्रोतों, जंगलों और गांवों को एक साथ लेकर काम करने की जरूरत सामने लाता है। आगे की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि पुनर्भरण क्षेत्रों की देखभाल जारी रहे और बढ़े हुए पानी का लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचे।

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