फ़ोटो - उमेश पाल
मध्य प्रदेश की नदियों की बात होती है तो नर्मदा, चंबल, बेतवा और ताप्ती जैसे नाम सहज ही सामने आते है। लेकिन दक्षिणी मध्य प्रदेश में बहने वाली जाम नदी की पहचान कुछ अलग है। यह नदी केवल पानी की एक धारा नहीं, बल्कि पांढुर्णा की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। यह वह नदी है जो पांढुर्णा और सावरगांव को अलग करती है और जिसके बीच हर साल एक ऐसी परंपरा जीवित होती है, जिसमें फूलों की जगह पत्थर बरसते है। और यह सब होता है हर साल नदी किनारे लगने वाले गोटमार मेले में।
भादो मास की पिठौरी अमावस्या के दूसरे दिन जाम नदी का किनारा हजारों लोगों की भीड़ से भर जाता है। नदी के बीच प्रतीक स्वरूप पेड़ और झंडा लगाया जाता है और गोटमार मेला शुरू होता है।
पिछले वर्ष आयोजित गोटमार मेला
एक ऐसी परंपरा जिसमें दो पक्ष एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते है। मराठी में गोट का अर्थ पत्थर और मार का अर्थ मारना है। यानी गोटमार का शाब्दिक अर्थ ही है - पत्थर मारना।
विश्व प्रसिद्ध स्पेनिश ला टोमाटीना में लोग एक-दूसरे पर टमाटर फेंकते है। लेकिन पांढुर्णा की सदियों पुरानी परंपरा में लोग पत्थर फेंकते है। कई बार यह खेल उत्सव की सीमा पार कर हिंसा और गंभीर चोटों तक पहुंच जाता है।
पांढुर्णा नगर को दो हिस्सों में बांटती जाम नदी के एक ओर पांढुर्णा और दूसरी ओर सावरगांव है। इसी नदी के किनारे और पुलिया के आसपास गोटमार मेले का आयोजन होता है।
स्थानीय लोगों के अनुसार हर साल आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग यहां पहुंचते है। मेले की शुरुआत मां चंडिका को आराध्य देवी मानकर की जाती है। नदी के बीच प्रतीक के रूप में एक पेड़ लगाया जाता है, जिस पर झंडा लगाया जाता है। इसके बाद पांढुर्णा और सावरगांव के लोग दो पक्षों में बंट जाते है।
पांढुर्णा पक्ष का लक्ष्य झंडे को हासिल करना होता है, जबकि सावरगांव के लोग उन्हें रोकने की कोशिश करते है। इस दौरान दोनों ओर से पत्थर बरसाए जाते है। शाम तक जिस पक्ष के पास झंडा रहता है, उसे विजेता माना जाता है। इसके बाद झंडे को तोड़कर मां चंडिका के मंदिर ले जाया जाता है, जहां पूजा-अर्चना के बाद मेले का समापन होता है।
यही परंपरा जाम नदी को देश की उन चुनिंदा नदियों में शामिल करती है, जिनकी पहचान किसी धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन से इतनी गहराई से जुड़ी हुई है।
गोटमार मेले की शुरुआत को लेकर कई किवदंतियां प्रचलित है। इनमें सबसे चर्चित कहानी एक प्रेमी जोड़े की है।
स्थानीय मान्यता के अनुसार पांढुर्णा का एक युवक सावरगांव की युवती से प्रेम करता था। दोनों विवाह करना चाहते थे, लेकिन परिवार इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे। इसके बाद दोनों घर से भागकर पांढुर्णा की ओर आने लगे।
जब लोगों को इसकी जानकारी मिली तो जाम नदी के पास युवक पर पत्थर बरसाए गए। जवाब में पांढुर्णा के लोगों ने भी पत्थर बरसाना शुरू कर दिया। इस घटना में प्रेमी युगल की मौत हो गई। दोनों के शव मां चंडिका के मंदिर ले जाए गए और अंतिम संस्कार किया गया।
स्थानीय मान्यता है कि इसी घटना की स्मृति में गोटमार की परंपरा शुरू हुई और मां चंडिका को आराध्य देवी मानकर हर वर्ष यह आयोजन होने लगा।
हालांकि इस कहानी का ऐतिहासिक प्रमाण अलग से स्थापित नहीं है, लेकिन स्थानीय समाज में यह कथा गोटमार की परंपरा को समझने का एक प्रमुख आधार बनी हुई है।
2026 के मेले की तैयारी के रूप में एकत्र किए गए पत्थर
स्थानीय लोगों के अनुसार गोटमार की परंपरा करीब 300 वर्ष पुरानी है। पांढुर्णा में वर्षों से इस मेले को करीब से देखने वाले शंकर बताते हैं कि पुराने समय में गोटमार का स्वरूप आज की तुलना में काफी अलग था।
उनके अनुसार उस समय न तो नदी पर पुलिया थी और न ही आज जैसी व्यवस्थाएं। गोटमार में केवल कुछ ही खिलाड़ी हिस्सा लेते थे, जबकि बाकी लोग सुरक्षित दूरी से इसे देखते थे।
स्थानीय निवासी शंकर के मुताबिक, पुराने समय में यह आयोजन अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण तरीके से होता था। लेकिन समय के साथ गोटमार का स्वरूप बदलता गया और दर्शकों तथा खिलाड़ियों के बीच की सीमा भी कमजोर होती गई। आज बड़ी संख्या में लोग सीधे पत्थरबाजी में शामिल हो जाते है।
गोटमार को स्थानीय लोग परंपरा और खेल दोनों के रूप में देखते हैं। लेकिन वर्तमान स्वरूप में यह आयोजन कई सवाल भी खड़े करता है। स्थानीय निवासी भोजराज बताते हैं कि उन्होंने अपने बुजुर्गों से सुना है कि पहले गोटमार शांतिपूर्ण तरीके से मनाया जाता था। लोग इसे सुरक्षित दूरी से देखते थे और इसमें निर्धारित खिलाड़ी ही भाग लेते थे।
उनका कहना है कि समय के साथ नई पीढ़ी ने इसके स्वरूप को बदल दिया। अब कई युवा नशे की हालत में पत्थरबाजी में शामिल होते हैं और कभी-कभी खेल की भावना की जगह आपसी दुश्मनी जैसी स्थिति दिखाई देती है। यही बदलाव इस परंपरा के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन गया है।
गोटमार के बदलते स्वरूप का असर महिलाओं की भागीदारी पर भी दिखाई देता है। शंकर बताते हैं कि पहले महिलाएं भी दर्शक के रूप में मेला स्थल पर जाकर गोटमार देखा करती थीं। लेकिन अब स्थिति अलग है। पत्थर कहीं भी लग सकता है और खिलाड़ियों के नशे में होने की वजह से जोखिम और बढ़ जाता है।
यही वजह है कि कई महिलाएं अब मेला स्थल पर जाने के बजाय अपने घरों की छतों से गोटमार देखना पसंद करती है।
गोफन पर प्रतिबंध के बावजूद इसके इस्तेमाल की शिकायतें भी सामने आती रही है। गोफन से फेंका गया पत्थर अधिक दूरी और तेजी से जा सकता है, जिससे चोट का खतरा और बढ़ जाता है।
2026 के मेले की तैयारी के रूप में एकत्र किए गए पत्थर
गोटमार मेले का सबसे गंभीर पहलू इसमें होने वाली चोटें और मौतें हैं। 2025 में The Indian Express ने रिपोर्ट किया कि उस वर्ष मेले के दौरान 900 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह घटना बताती है कि नदी से जुड़ी लोकपरंपरा का सामाजिक प्रभाव कितना व्यापक है।
स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार 1955 के बाद से गोटमार के दौरान पत्थरबाजी में करीब 13 लोगों की मौत होने की बात कही जाती है। 2011 में देवानंद वघाले की मौत भी इसी क्रम में बताई जाती है। परिजनों के अनुसार देवानंद गोटमार खेलने गए थे और घायल होने के बाद उन्हें इलाज के लिए नागपुर रेफर किया गया। बाद में उनकी मौत हो गई।
उनके परिवार के लिए यह सिर्फ एक दिन की घटना नहीं थी। देवानंद परिवार के मुख्य कमाने वाले व्यक्ति थे। पीछे उनकी पत्नी और तीन छोटे बच्चे रह गए। उनकी मृत्यु के बाद परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। गोटमार की सबसे बड़ी त्रासदी यही है, एक दिन का उत्सव कई परिवारों के लिए पूरी जिंदगी का दुख बन सकता है।
2026 के मेले की तैयारी के रूप में एकत्र किए गए पत्थर
इस वर्ष 11 सितंबर को जाम नदी के किनारे एक बार फिर गोटमार मेला आयोजित होगा। गोटमार मेले में प्रशासन की भूमिका बेहद चुनौतीपूर्ण रहती है। इसमें हजारों लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाएं जुड़ी है।
गोटमार पर चर्चा अक्सर चोटों, मौतों, पुलिस व्यवस्था और परंपरा तक सीमित रहती है। लेकिन इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण पात्र है, जाम नदी।प्रशासन पूर्व से ही मेले ही तैयारी में जुट जाता है और शांति व्यवस्थाएं बनाये रखने के लिए पहले ससे ही शांति समिति की बैठक का आयोजन किया जाता है।
जाम नदी मध्य भारत के दक्षिणी मध्य प्रदेश की नदी है। इसका उद्गम बैतूल जिले के चिल्हाटी क्षेत्र के आसपास पहाड़ी ढलानों से निकलने वाली छोटी-छोटी धाराओं के मिलन से माना जाता है। उपलब्ध भौगोलिक विवरणों के अनुसार इसका उद्गम लगभग 762 मीटर की ऊँचाई पर बताया गया है। इसके बाद नदी पूर्व तथा दक्षिण-पूर्व दिशा की ओर बढ़ती हुई छिंदवाड़ा क्षेत्र में प्रवेश करती है।
नदी का प्रवाह मुख्यतः वर्षा पर निर्भर है। इसलिए बरसात के मौसम में इसमें पर्याप्त जल दिखाई देता है, जबकि शुष्क मौसम में इसका प्रवाह काफी कम हो जाता है अथवा कई हिस्सों में नदी का प्रवाह रुक जाता है। यही कारण है कि इसे एक मौसमी या intermittent river के रूप में वर्णित किया जाता है।
जाम नदी की सबसे महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताओं में से एक इसका कन्हान नदी में विलय है। यह संगम मध्य प्रदेश के दक्षिणी हिस्से में स्थित है और महाराष्ट्र की सीमा के निकट का क्षेत्र इससे जुड़ा हुआ है। कन्हान स्वयं एक महत्वपूर्ण नदी है, जो आगे चलकर वैनगंगा नदी की सहायक नदी के रूप में कार्य करती है। इस प्रकार जाम नदी का जल अंततः कन्हान और फिर वैनगंगा नदी तंत्र का हिस्सा बन जाता है।
इसे नदी तंत्र के दृष्टिकोण से देखें तो जाम नदी केवल स्थानीय नदी नहीं है, बल्कि मध्य भारत के एक बड़े जल-निकासी तंत्र से जुड़ी हुई नदी है।
जाम नदी का सबसे विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध पांढुर्णा क्षेत्र से है। पांढुर्णा जिले के गठन के बाद जाम नदी इस जिले की प्रमुख भौगोलिक पहचान का हिस्सा बन गई है। जिला प्रशासन के अनुसार जाम नदी के किनारे आयोजित होने वाला प्रसिद्ध गोटमार मेला इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक परंपरा है।
पांढुर्णा और समीपवर्ती सावारगांव के बीच जाम नदी का प्रवाह स्थानीय लोकपरंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। नदी के दोनों किनारों पर बसे समुदायों के बीच लंबे समय से चली आ रही गोटमार मेले की परंपरा ने जाम नदी को केवल भौगोलिक इकाई न रहकर सांस्कृतिक पहचान प्रदान की है।
जाम नदी के इतिहास में 1999 की एक गंभीर दुर्घटना का उल्लेख मिलता है। उपलब्ध स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार सौंसर क्षेत्र में एक बस जाम नदी को पार करते समय बह गई थी और इस हादसे में लगभग 49 लोगों की मृत्यु हुई थी। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि मानसून के दौरान नदी के जलस्तर और प्रवाह में अचानक वृद्धि कितनी गंभीर परिस्थितियां उत्पन्न कर सकती है। नदी पार करने के लिए सुरक्षित पुल और बेहतर परिवहन ढांचा ऐसे क्षेत्रों में अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
छोटी नदी होने के बावजूद जाम नदी स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए महत्वपूर्ण है। वर्षा के समय इसका प्रवाह आसपास के भू-दृश्य में जल की उपलब्धता बढ़ाता है। नदी के किनारे की वनस्पतियां, छोटे जलीय जीव, मछलियां और अन्य जीव-जंतु स्थानीय नदी पारिस्थितिकी का हिस्सा है।
लेकिन मौसमी नदियां कई प्रकार के दबावों का सामना करती है। नदी के प्राकृतिक मार्ग में परिवर्तन, जलप्रदूषण, अतिक्रमण, अत्यधिक जल दोहन और जलग्रहण क्षेत्र में वनों की कमी नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर सकती है।
जाम नदी आकार में भले ही मध्य प्रदेश की नर्मदा या चंबल जैसी विशाल नदी नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसका महत्व अत्यंत व्यापक है। बैतूल के पहाड़ी क्षेत्र से निकलकर छिंदवाड़ा और पांढुर्णा क्षेत्र से गुजरते हुए कन्हान नदी में मिलने वाली यह नदी दक्षिणी मध्य प्रदेश के नदी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
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