मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में काकरी बरड़ी पहाड़ियों से निकलने वाली क्षिप्रा नदी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। इंदौर, उज्जैन, महिदपुर और रतलाम जैसे शहरों से गुजरने वाली यह नदी कभी बारहमासी बहती थी। इसकी निर्मल धारा से हजारों खेतों को पानी मिलता था। नदी के तटों पर पशु-पक्षियों का विशाल बसेरा हुआ करता था। लेकिन बीते दो-तीन दशकों में तेजी से हुए शहरीकरण ने इस नदी को अंतरालिक नदी बना दिया है। यानी जिस नदी में बारहमासी पानी रहता था, अब उसका प्रवाह निरंतर नहीं रहता। यानि अब यह नदी अविरल नहीं रही।
सितंबर 2026 में हुए एक अध्ययन में ताज़ा अध्ययन ने क्षिप्रा नदी की धारा को समझने के प्रयास किए और पाया कि क्षिप्रा नदी, जो कभी बारहमासी (perennial) नदी थी, 1990 के दशक के मध्य के आसपास intermittent river यानी ऐसी नदी बन गई जिसमें प्रवाह लगातार नहीं रहता और कई हिस्से मौसमी रूप से सूख जाते हैं। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कई दशकों के सेटेलाइट और हाइड्रो-क्लाइमेटिक डाटा को शामिल किया।
क्षिप्रा नदी का उद्गम विंध्य शृंख्ला में स्थित काकरी-टेकड़ी पहाड़ी से होता है, जो उत्तर की ओर मालवा के पठार पर बहती है और आगे जाकर चंबल नदी में मिल जाती है।
इसमें दो उपनदियां मिलती हैं - खान नदी जो उज्जैन के पास 90 किमी पर क्षिप्रा में मिलती है, और गंभीर नदी, जो माहिदपुर के पास 140 किमी पर मिलती है।
क्षिप्रा नदी के बेसिन का क्षेत्रफल करीब 5600 वर्ग किमी है। इसका गंभीर सब बेसिन 1580 वर्ग किमी और खान सब बेसिन 817 वर्ग किमी है।
क्षिप्रा नदी मालवा क्षेत्र घास के मैदानों से होकर आगे माहिदपुर में पथरीली चट्टानों के बीच से गुज़रती है।
इस क्षेत्र में औसत बारिश 931 मिलीमीटर होती है, जिस वजह से यहां सूखा पड़ने की आशंका हर साल रहती है। प्रत्येक 4-5 वर्षों में यहां सूखा पड़ना आम बात है।
क्षिप्रा नदी का बेसिन
अध्ययन के अनुसार 1965 में क्षिप्रा नदी नेटवर्क की लगभग 95% longitudinal connectivity थी। यानी कि क्षिप्रा नदी की मुख्य धारा और उससे जुड़ी छोटी धाराओं में लगभग 95% हिस्से में पानी का बहाव ऊपर से नीचे की ओर लगातार जुड़ा हुआ था, लेकिन 1990 के दशक के अंत और 2000 के शुरुआती वर्षों तक यह घटकर लगभग आधी रह गई। 1960 के दशक में जहां नदी का सूखा भाग केवल लगभग 6% था, वहीं शुरुआती 2000 के दशक में यह 60–70% से अधिक हो गया।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंस एजुकेशन एंड रिसर्च, भोपाल के पृथ्वी एवं पर्यावरण विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. कुमार गौरव और पीएचडी स्कॉलर आदिल खान द्वारा सितंबर 2026 में किए गए इस अध्ययन के अनुसार क्षिप्रा नदी अब अलग-अलग टुकड़ों में बंट गई है - कुछ हिस्सों में पानी है, कुछ हिस्सों में पानी नहीं है, लेकिन मिट्टी नम है तो कुछ पूरी तरह सूखे हैं।
क्षिप्रा नदी का सूखाभाग
ऑनलाइन लाब्रेरी विले में दक्षिण पूर्वी एशिया की नदियों पर फोकस एस्पेशल एडिशन में प्रकाशित इस अध्ययन में पाया गया कि क्षिप्रा नदी के सूखने की वजह केवल कम बारिश नहीं है। शोधकर्ताओं ने नदी के प्रवाह, तापमान, वाष्पीकरण की संभावित दर और भूजल स्तर जैसे कई कारकों का अध्ययन किया। अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय में बारिश की मात्रा में कोई महतृवपूर्ण बदलाव नहीं आया है। यानी बीच के वर्षों में कम बारिश होना क्षिप्रा नदी के सूखने की अकेली वजह नहीं है।
नदी के पानी के वाष्पीकरण की संभावित दर में बढ़ोत्तरी पायी गई। इसे जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान से जोड़ कर देखें तो यह एक वजह है। लेकिन यह भी अकेली वजह नहीं हो सकती। दरअसल नदी के सूखने का सबसे बड़ा कारण इंसानी गतिविधियां हैं, जो क्षिप्रा के दोनों ओर तेज़ी से बढ़ी हैं। निरंतर हो रहे कॉन्क्रीट के निर्माण की वजह से आस-पास के क्षेत्रों में भूजल का दोहन तेज़ी से किया जा रहा है, जिस वजह से क्षिप्रा ड्रेनिंग रिवर बन गई है। यानी क्षिप्रा नदी जिसमें भूमिगत जल भंडार से पानी की सप्लाई होती थी, अब वो जल भंडार कमजोर हो गए हैं, जिसकी वजह से नदी को मिलने वाले भूजल में कमी आयी है।
डाउनस्ट्रीम में क्षिप्रा नदी
इस अध्ययन में सबसे महत्वपूर्ण खोज नदी की कनेक्टीविटी से जुड़ी है। नदी के भीतर आगे-पीछे पानी का जुड़ाव होता है, जिसे Longitudinal connectivity कहते हैं। दरअसल क्षिप्रा नदी के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पानी का लगातार प्रवाह टूट रहा है। 1965 में connectivity करीब 95% थी, जबिक शुरुआती 2000s में लगभग 60% रह गई। मॉनसून के पहले कई हिस्सों में नदी बहुत अधिक सूख जाती है जिससे नदी से लगे जलाशयों व बांधों में पानी का स्तर कम हो जाता है।
नदी सिर्फ उस जगह को नहीं कहते, जहां से पानी बहता है। नदी के किनारे की जमीन, बाढ़ का मैदान और आसपास का इलाका भी नदी के कामकाज का हिस्सा होते हैं। नदी और इन इलाकों के बीच पानी का आना-जाना बना रहना जरूरी है। इसे वैज्ञानिक भाषा में Lateral connectivity कहते हैं।
अध्ययन के मुताबिक:
क्षिप्रा नदी के जलग्रहण क्षेत्र का 80% से ज्यादा हिस्सा कृषि भूमि है।
खेती के बढ़ते दबाव, तटबंध और जमीन के दूसरे इस्तेमाल से नदी और आसपास की जमीन के बीच पानी का प्राकृतिक आवागमन प्रभावित हो रहा है।
नदी और उसके बाढ़ क्षेत्र के कई हिस्सों में connectivity index कम पाया गया। यानी इन जगहों पर नदी और आसपास के इलाके का जुड़ाव कमजोर है।
इसका मतलब यह कि नदी को सिर्फ उसके पानी और मुख्य धारा से नहीं समझा जा सकता। यह भी देखना होगा कि नदी अपने आसपास की जमीन, बाढ़ के मैदान और भूजल के साथ कैसे जुड़ी है। आसान भाषा में समझें तो अगर नदी के किनारे तटबंध या दूसरी रुकावटें खड़ी कर दी जाएं, तो बाढ़ का पानी आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाता। इससे नदी और उसके floodplain के बीच का प्राकृतिक संबंध टूट सकता है। और ऐसा ही कुछ क्षिप्रा नदी के साथ हो रहा है।
छोटे बांध के पास क्षिप्रा नदी
नदी का मौसमी बहाव केवल बारिश पर निर्भर नहीं होता इसमें बेसफ्लो भी महत्वपूर्ण होता है। भूजल से मिलने वाला baseflow भी नदी में पानी बनाए रखने में मदद करता है।
अध्ययन में पाया गया कि:
इंदौर जैसे शहरी क्षेत्रों में भूजल और वर्षाजल के बीच संबंध कमजोर हो गया है।
भूजल का अत्याधिक दोहन और प्राकृतिक रिचार्ज प्रणाली में बदलाव देखने को मिले हैं।
इससे नदी को मिलने वाला baseflow प्रभावित होता है।
अध्ययन में नदी के हाइड्रॉलिक स्ट्रक्चर पर खास फोकस किया गया है। शोधकर्ताओं ने बताया कि 1965 में क्षिप्रा बेसिन में नदी के फ्लो को नियंत्रित करने वाले संयंत्रों की संख्या 10 से भी कम थी। 2024 तक इनकी संख्या 290 से अधिक हो गई। इनमें बांध, तटबंध, छोअे बांध और छोटे फ्लो-कंट्रोल स्ट्रक्चर शामिल हैं।
नदी के कुछ हिस्सों में तो प्रति किलोमीटर दो संयंत्र लगे हैं। इसके अलावा मॉनसून के पहले जलाशयों में पानी 60–80% तक कम हो जाता है।
विज्ञान कहता है कि हर एक hydraulic structure अपने आप में नदी के सूखने का कारण है। ऐसे में 195 किलोमीटर लंबी नदी में 290 से अधिक ढांचे लगाये जाना नदी के लिए अपने आप में एक मुसीबत जैसा है।
मालवा क्षेत्र में बहने वाली क्षिप्रा नदी
इसी अध्ययन में क्षिप्रा नदी की ग्रिड-लेवल एनालिसिस में पाया गया कि:
मॉनसून से पहले नदी के अधिकांश हिस्से में सूखा 60% से ज्यादा था।
जलाशयों के आगे के क्षेत्र (डाउनस्ट्रीम) सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।
जलाशयों के आगे के कुछ भागों में तो नदी 60–80% तक सूख चुकी थी।
मॉनसून के बाद भी कुछ जलाशयों के डाउनस्ट्रीम के हिस्सों में 20–60% सूखा पाया गया।
इसके उलट कुछ अपस्ट्रीम जलाशयों और उज्जैन के कुछ हिस्सों में नदी 20% से कम थी।
कुल मिलाकर बारिश हुई तो नदी भर गई अन्यथा खाली रही वाली बात सामने आयी।
अध्ययन के अनुसार 2014 में मध्य प्रदेश की मुख्य नदी नर्मदा से क्षिप्रा को पानी पहुंचाने वाला नर्मदा-क्षिप्रा-सिंहस्थ नदी लिंक शुरू हुआ। इस लिंक के प्रभाव को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने 1991–2013 और 2014–2024 में नदी में पड़ने वाले प्रभावों की तुलना की। जिसमें निम्न बातें सामने आयीं-
| संकेतक | Link से पहले | Link के बाद |
| मॉनसून के पहले सूखापन | 85% | 66% |
| मॉनसून के बाद सूखापन | 62% | 52% |
| मॉनसून के पहले सतही जल का अनुपात | 16% | 28% |
तो कुल मिलाकर 2014 के बाद कुछ जल-उपलब्धता संकेतकों में सुधार दिखा जिनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि नर्मदा लिंक ने क्षिप्रा को पुनर्जीवित कर दिया है, लेकिन नदी की मूल समस्या अभी खत्म नहीं हुई है। मॉनसून के पहले की कनेक्टीविटी में 2014 के बाद सुधार दिखा लेकिन 2020 के बाद फिर कम हो गई। वहीं बारिश के बाद की कनेक्टीविटी में कोई व्यापक बदलाव नहीं देखा गया। इससे यह भी साफ है कि किसी बाहरी नदी से पानी लाना और नदी की प्राकृतिक हाइड्रोलॉजिकल कनेक्टीविटी को बहाल करना एक समान नहीं हैं।
जिस तरह के बदलाव क्षिप्रा नदी में देखे गए हैं, उन्हें देखते हुए यह साफ है कि मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में आने वाले शहरों पर पेयजल संकट गहरा रहा है और आने वाले समय में भी बढ़ेगा। शोधकर्ताओं ने इंदौर के भूजल का विस्तृत अध्ययन किया, जिसमें निम्न बातें सामने आयीं-
वर्ष 1996–2002 के बीच groundwater depth में लगभग 166 cm/year की दर से वृद्धि हुई—अर्थात groundwater table नीचे गया।
इसके बाद:
2002–2013: लगभग 95 cm/year की दर से depth में कमी
2013–2018: लगभग 44 cm/year की दर से depth फिर बढ़ी
2018 के बाद: लगभग 80 cm/year की दर से depth में कमी, जिसे लेखकों ने recharge conditions से जोड़ा।
वर्ष 1996 से 2002 के बीच इंदौर के भूजल स्तर में लगभग 166 सेमी प्रति वर्ष की दर से गिरावट दर्ज हुई।
2002–2013: लगभग 95 सेमी/वर्ष की दर से भूजल स्तर में सुधार देखा गया।
2013–2018: लगभग 44 सेमी/वर्ष की दर से भूजल स्तर फिर से नीचे गया।
2018 के बाद: लगभग 80 सेमी/वर्ष की दर से भूजल में बढ़ोत्तरी दर्ज हुई, जिसे शोधकर्ता रिचार्ज कंडीशन से जोड़ कर देख रहे हैं।
अध्ययन में 32 कुओं की समीक्षा की गइ केवल 2 कुओं में बारिश और भूजल के बीच गहरा कनेक्शन दिखा।
14 कुएं ऐसे थे जहां कनेक्शन दिखा लेकिन मध्यम दर्जे का। जबिक बाकी में बहुत कमजोर पाया गया।
इंदौर, उज्जैन, माहिदपुर और देवास जैसे शहरी क्षेत्रों के कुओं में यह कनेक्शन नकारात्मक पाया गया।
क्षिप्रा बेसिन में 80% से अधिक भूमि का प्रयोग कृषि में किया जाता है।
1965 में जलग्रहण क्षेत्र का लगभग 1% हिस्सा मानवीय गतिविधियों में इस्तेमाल हुआ जो 2024 में बढ़ कर लगभग 10% हो गया।
उज्जैन के पास क्षिप्रा नदी
इस अध्ययन में उज्जैन के लिए खास चेतावनी दी गई है कि आने वाले समय में यहां जल संकट गहरा सकता है। इसके पीछे निम्न कारण बताये गए हैं-
उज्जैन में नदी के बहाव को नियंत्रित करने वाले ढांचों और तटबंधों का नेटवर्क बहुत घना है।
शहरी क्षेत्र से गुजरने वाले नदी के भाग में प्राकृतिक बहाव और भूजल से कनेक्टीविटी प्रभावित हुई है।
उज्जैन के डाउनस्ट्रीम यानी नदी के निचले हिस्से में सूखा बढ़ा है।
कई छोटी धाराएं जो नदी को निरंतर पानी सप्लाई करती थीं, उज्जैन के शहरीकरण के कारण 1965 के बाद कॉन्क्रीट में दफ्न हो गईं या विलुप्त हो गईं।
इस अध्ययन से अलग जाकर देखें तो उज्जैन में 2028 में आयोजित होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले में 12 करोड़ से अधिक लोगों के आने की संभावना है। ऐसे में शहर पर पानी का भारी दबाव पड़ सकता है।
मध्य प्रदेश की क्षिप्रा नदी
Riparian vegetation का नुकसान एक बहुत अच्छा ecological indicator है। नदी के किनारे की वनस्पति यानी riparian cover जिसे तटीच वनस्पति भी कहते हैं किसी भी नदी के स्वास्थ्य का संकेतक होता है। क्षिप्रा नदी की बात करें तो इस नदी में जहां सूखापन ज्यादा है वहां तटीय वनस्पति का नुकसान ज्यादा है। जलाशयों और अपस्ट्रीम के कुछ हिस्सों में riparian cover बढ़ा है। जकि जलाशयों के डाउनस्ट्रीम में और शहरी क्षेत्रों में वनस्पति को बहुत अधिक नुकसान हुआ है।
क्षिप्रा नदी के सूखने का सबसे बड़ा कारण क्या है?
इंडिया वाटर पोर्टल से बातचीत में डॉ. कुमार गौरव ने बताया कि क्षिप्रा नदी के सूखने का सबसे बड़ा कारण इस पर बहुत अधिक संख्या में बने हाइड्रॉलिक इंफ्रास्ट्रक्चर हैं, यानी बांध, छोटे बांध, आदि हैं। इन ढांचों के कारण अपस्ट्रीम में पानी रहता है, तो डाउनस्ट्रीम में पानी का बहाव या तो कम हो जाता है या सूख जाता है। पानी सूखने के कारण नदी के सिस्टम में ईकोलॉजिकल इम्पैक्ट पड़ता है। नदी के आस-पास की हरियाली धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। क्षिप्रा नदी की अपस्ट्रीम में जहां पानी रोका गया है, वहां रैपेरियन वेजीटेशन भले बढ़ा है, लेकिन पानी का बहाव जगह-जगह रुक रहा है और इसकी वजह से नदी सूखती जा रही है।
क्या क्षिप्रा नदी के सूखने से मालवा क्षेत्र के शहरों में भूजल स्तर नीचे जा रहा है?
डॉ. कुमार गौरव ने इस बारे में बताया कि भूजल स्तर के नीचे जाने की वजह केवल क्षिप्रा नदी का सूखना नहीं है। इसके कई और कारण भी हैं। हमने इस अध्ययन में यह जरूर पाया है कि उज्जैन जैसे बड़े शहरों के पास जहां-जहां नदी सूखी है, वहां आस-पास के क्षेत्रों में भूजल स्तर नीचे गया है। यह केवल नदी की वजह से हुआ है, यह जरूरी नहीं है, इसके कई अन्य कारण भी हो सकते हैं।
क्षिप्रा नदी पर अध्ययन करते शोधकर्ता
क्या मालवा क्षेत्र के भूजल में सुधार लाकर क्षिप्रा नदी को पुनर्जीवित किया जा सकता है?
डॉ. गौरव ने कहा, “ अधिकांश नदियां ग्राउंडवाटर फेड होती हैं, क्षिप्रा नदी भी उनमें से एक है। लेकिन आस-पास के क्षेत्रों में भूजल का स्तर ऊपर लाने से नदी पुनर्जीवित हो जाएगी, ऐसा बिलकुल भी नहीं है। इसके लिए नदी को एक संपूर्ण ढांचे के रूप में देखना होगा और इसके अलग-अलग भागों में काम करना होगा।
क्षिप्रा नदी को पुनर्जीवित कैसे किया जा सकता है?
डॉ. गौरव के ने कहा कि नदी को पुनर्जीवित करना है तो सबसे पहले जो रिपेरियन वेजीटेशन की जो हानि हुई है, उसे वपस उगाने की जरूरत है। उसके साथ-साथ इसकी सभी सहायक नदियों को पुनर्जीवित करने, जितने भी ड्रेनेज हैं उनमें पानी के बहाव को फ्री करके, कैचमेंट एरिया में निरंतर पानी सुनिश्चित करके, चिन्हित क्षेत्रों में भूजल के स्तर में सुधार लाकर नदी को पुनर्जीवित करने में मदद की जा सकती है। कई अन्य फैक्टर भी हैं, जिन्हें देखना होगा।
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