असम राज्य का अधिकांश भूभाग दो प्रमुख नदी घाटियों - ब्रह्मपुत्र घाटी और बराक घाटी - में फैला हुआ है।
फ़ोटो: अजय मोहन
असम भारत का ऐसा राज्य है जहां नदियां केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि यहां के भूगोल, कृषि, जैव विविधता, परिवहन और सांस्कृतिक जीवन की आधारशिला भी हैं। राज्य का अधिकांश भूभाग दो प्रमुख नदी घाटियों - ब्रह्मपुत्र घाटी और बराक घाटी - में फैला हुआ है। उत्तर और मध्य असम का बड़ा हिस्सा ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली के अंतर्गत आता है, जबकि दक्षिणी असम के कछार, करीमगंज और हैलाकांडी जिले बराक नदी बेसिन का हिस्सा हैं।
असम की अधिकांश नदियां हिमालय, पूर्वी हिमालय की तलहटी तथा मेघालय, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों से निकलती हैं। असम की नदी प्रणाली में हिमालय से आने वाली हिमपोषित नदियों के साथ-साथ वर्षा पर निर्भर अनेक नदियां भी शामिल हैं। इसलिए मानसून के दौरान इनमें जल प्रवाह कई गुना बढ़ जाता है। यही कारण है कि असम हर वर्ष बाढ़ और नदी कटाव जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना करता है, लेकिन यही नदियां राज्य के विशाल मैदानी क्षेत्रों में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी भी लाती हैं, जो कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नदियों के बारे में विस्तार से जानने से पहले कुछ महत्वपूर्ण बातें जो आपको जरूर मालूम होनी चाहिए -
| असम नदी बेसिन- एक नज़र में | |
|---|---|
| तथ्य | जानकारी |
| मुख्य नदी प्रणालियां | 2 |
| प्रमुख नदियाँ | 20+ |
| प्रमुख राष्ट्रीय उद्यान | 4 |
| रामसर आर्द्रभूमियाँ | 7+ |
| सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप | माजुली |
| राष्ट्रीय जलीय जीव | गंगा नदी डॉल्फ़िन |
पहली सूची है असम की प्रमुख नदियों की। इसमें हम जानेंगे कि कौन सी नदी कहां से निकलती है और कितने किलोमीटर तक बहती है और किन-किन राज्यों से होकर गुज़रती है-
| एक नज़र में असम की प्रमुख नदियाँ | ||||
|---|---|---|---|---|
| नदी | नदी तंत्र | उद्गम | कुल लंबाई (लगभग) | किन राज्यों/देशों से होकर बहती है |
| ब्रह्मपुत्र | ब्रह्मपुत्र | तिब्बत | 2,900 किमी | चीन (तिब्बत) → भारत (अरुणाचल प्रदेश, असम) → बांग्लादेश |
| बराक | ब्रह्मपुत्र | मणिपुर | 900 किमी | मणिपुर → मिजोरम → असम → बांग्लादेश |
| सुबनसिरी | ब्रह्मपुत्र | तिब्बत | 442 किमी | चीन (तिब्बत) → अरुणाचल प्रदेश → असम |
| मानस | ब्रह्मपुत्र | भूटान | 376 किमी | भूटान → असम |
| जिया-भराली | ब्रह्मपुत्र | अरुणाचल प्रदेश | 264 किमी | अरुणाचल प्रदेश → असम |
| कोपिली | ब्रह्मपुत्र | मेघालय | 297 किमी | मेघालय → असम |
| धानसिरी | ब्रह्मपुत्र | नागालैंड | 352 किमी | नागालैंड → असम |
| बेकी | ब्रह्मपुत्र | भूटान | 190 किमी | भूटान → असम |
| कुलसी | ब्रह्मपुत्र | मेघालय | 220 किमी | मेघालय → असम |
| पगलाडिया | ब्रह्मपुत्र | भूटान | 197 किमी | भूटान → असम |
| बुढ़ी दिहिंग | ब्रह्मपुत्र | अरुणाचल प्रदेश | 380 किमी | अरुणाचल प्रदेश → असम |
| नोआ-दिहिंग | ब्रह्मपुत्र | अरुणाचल प्रदेश | 160 किमी | अरुणाचल प्रदेश → असम |
| दिसांग | ब्रह्मपुत्र | नागालैंड | 253 किमी | नागालैंड → असम |
| दिखो | ब्रह्मपुत्र | नागालैंड | 200 किमी | नागालैंड → असम |
| भोगदोई | ब्रह्मपुत्र | नागालैंड की पहाड़ियाँ | 160 किमी | नागालैंड → असम |
| जिंजीराम | ब्रह्मपुत्र | मेघालय | 90 किमी | मेघालय → असम |
| लोहित | ब्रह्मपुत्र | पूर्वी तिब्बत (कांगरी कार्पो पर्वतमाला), अरुणाचल प्रदेश से होकर | 560 किमी | चीन (तिब्बत) → अरुणाचल प्रदेश → असम |
| सियांग (दिहांग) | ब्रह्मपुत्र | तिब्बत (यारलुंग सांगपो), अरुणाचल प्रदेश में सियांग/दिहांग | 294 किमी (भारत में) | चीन (तिब्बत) → अरुणाचल प्रदेश → असम |
| दिबांग | ब्रह्मपुत्र | अरुणाचल प्रदेश (मिश्मी पहाड़ियाँ) | 324 किमी | अरुणाचल प्रदेश → असम |
| संकोश | ब्रह्मपुत्र | भूटान (हिमालय) | 265 किमी | भूटान → असम → पश्चिम बंगाल (सीमावर्ती क्षेत्र) |
असम की नदी प्रणाली मुख्य रूप से ब्रह्मपुत्र नदी और बराक नदी बेसिन पर आधारित है, जिनकी अनेक सहायक नदियाँ पूरे राज्य में फैली हुई हैं। ये नदियाँ असम में सिंचाई, पेयजल, मत्स्य पालन, परिवहन और समृद्ध जैव विविधता का आधार हैं, लेकिन हर साल यहां के लोगों के लिए इन नदियों में बाढ़ और कटाव की वजह से जीवन अस्तव्यस्त हो जाता है।
असम की नदी प्रणाली एक नज़र में
| असम की नदी प्रणाली एक नज़र में | ||
|---|---|---|
| नदी तंत्र | प्रमुख नदी | प्रमुख सहायक नदियाँ |
| ब्रह्मपुत्र बेसिन | ब्रह्मपुत्र | सुबनसिरी, मानस, जिया-भराली, बेकी, पगलाडिया, कोपिली, कुलसी, धानसिरी, बुढ़ी दिहिंग, नोआ-दिहिंग, दिसांग, दिखो, भोगदोई, जिंजीराम, लोहित, दिबांग |
| बराक बेसिन | बराक | जिरी, सोनाई, कटाखाल, लोंगाई, धलेश्वरी, सिंगला, मधुरा |
असम की अधिकांश प्रमुख नदियों का उद्गम हिमालय पर्वतमाला, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय और मणिपुर की पहाड़ियों में होता है। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम तिब्बत में स्थित अंगसी हिमनद के निकट होता है, जहां इसे यारलुंग त्सांगपो के नाम से जाना जाता है।
वहीं बराक नदी का उद्गम मणिपुर की पहाड़ियों में स्थित लियाई क्षेत्र के पास माना जाता है।
असम की अन्य प्रमुख सहायक नदियां, जैसे सुबनसिरी, मानस, धानसिरी और कोपिली, हिमालय तथा पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों से निकलकर ब्रह्मपुत्र या बराक नदी में मिल जाती हैं।
स्रोत के आधार पर असम की उपनदियां
| स्रोत के आधार पर असम की उपनदियाँ | |
|---|---|
| स्रोत क्षेत्र | प्रमुख नदियाँ |
| अरुणाचल प्रदेश | दिबांग, लोहित, सुबनसिरी, जिया-भराली, बुढ़ी दिहिंग, नोआ-दिहिंग, रंगानदी, डिक्रोंग |
| भूटान | मानस, बेकी, पगलाडिया, संकोश, ऐ, सरलभंगा, चंपामती, बर्नाडी |
| मेघालय | कोपिली, कुलसी, जिंजीराम, कृष्णाई, दिगारू |
| नागालैंड | धानसिरी, दिखो, दिसांग, नामदांग, भोगदोई |
| मणिपुर | बराक, जिरी |
| मिजोरम | कटाखाल, लोंगाई, धलेश्वरी, सिंगला |
राज्य की सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र है, जो विश्व की सर्वाधिक जल और तलछट वहन करने वाली नदी प्रणालियों में से एक मानी जाती है। इसके अलावा सुबनसिरी, मानस, जिया-भराली, धानसिरी, कोपिली, बेकी, कुलसी, बुढ़ी दिहिंग और दिसांग जैसी अनेक सहायक नदियां असम के जल तंत्र को समृद्ध बनाती हैं।
ब्रह्मपुत्र बेसिन की प्रमुख उपनदियां
| ब्रह्मपुत्र बेसिन की प्रमुख उपनदियाँ | ||
|---|---|---|
| नदी | उद्गम | विशेषता |
| सुबनसिरी | तिब्बत एवं अरुणाचल प्रदेश | ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में एक |
| लोहित | पूर्वी तिब्बत | सियांग और दिबांग के साथ मिलकर ब्रह्मपुत्र बनाती है |
| दिबांग | अरुणाचल प्रदेश | तीव्र प्रवाह वाली हिमालयी नदी |
| जिया-भराली (कामेंग) | अरुणाचल प्रदेश | नामेरी राष्ट्रीय उद्यान से होकर बहती है |
| मानस | भूटान | मानस राष्ट्रीय उद्यान की जीवनरेखा |
| बेकी | भूटान | बाढ़ और तलछट के लिए प्रसिद्ध |
| पगलाडिया | भूटान | बाढ़ नियंत्रण परियोजना के कारण चर्चित |
| संकोश | भूटान | पश्चिमी असम की प्रमुख नदी |
| सरलभंगा | भूटान | कोकराझार क्षेत्र में बहती है |
| चंपामती | भूटान | पश्चिमी असम की महत्वपूर्ण नदी |
| ऐ (Aie) | भूटान | चिरांग और बोंगाईगाँव क्षेत्र |
| बर्नाडी | भूटान | दरंग और उदलगुरी क्षेत्र |
| कुलसी | मेघालय | गंगा नदी डॉल्फ़िन का महत्वपूर्ण आवास |
| कोपिली | मेघालय | अम्लीय जल प्रदूषण के कारण चर्चा में |
| दिगारू | मेघालय | कामरूप क्षेत्र की नदी |
| कृष्णाई | मेघालय | गोलपाड़ा क्षेत्र |
| जिंजीराम | मेघालय | पश्चिमी असम की प्रमुख सहायक नदी |
| धानसिरी (दक्षिण) | नागालैंड | काज़ीरंगा के जलग्रहण क्षेत्र का हिस्सा |
| दिखो | नागालैंड | शिवसागर क्षेत्र |
| दिसांग | नागालैंड | कृषि के लिए महत्वपूर्ण |
| नामदांग | नागालैंड | शिवसागर क्षेत्र |
| भोगदोई | नागालैंड | जोरहाट की प्रमुख नदी |
| बुढ़ी दिहिंग | अरुणाचल प्रदेश | डिब्रू-सैखोवा से जुड़ी |
| नोआ-दिहिंग | अरुणाचल प्रदेश | जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण |
| तिपकाई | अरुणाचल प्रदेश | ऊपरी असम की सहायक नदी |
| डिक्रोंग | अरुणाचल प्रदेश | लखीमपुर क्षेत्र |
| रंगानदी | अरुणाचल प्रदेश | लखीमपुर के पास ब्रह्मपुत्र में मिलती है |
दक्षिणी असम में बराक नदी और इसकी सहायक नदियां इस क्षेत्र की जल आवश्यकताओं और कृषि का आधार हैं। बराक नदी बेसिन केवल असम का नहीं बल्कि संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण नदी बेसिन है, जो मुख्य रूप से असम, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड के कुछ हिस्सों में फैला हुआ है।
इस बेसिन की मुख्य नदी बराक नदी है, जिसका उद्गम मणिपुर की पहाड़ियों में होता है। असम के सिलचर क्षेत्र से बहने के बाद यह नदी बांग्लादेश में प्रवेश करती है, जहाँ यह सुरमा और कुशियारा नदियों में विभाजित हो जाती है।
बराक नदी बेसिन कृषि, मत्स्य पालन, पेयजल और जैव विविधता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह बेसिन पूर्वोत्तर भारत की जल सुरक्षा, आजीविका और क्षेत्रीय पारिस्थितिकी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
बराक बेसिन की प्रमुख उपनदियां
| बराक बेसिन की प्रमुख उपनदियां | ||
|---|---|---|
| नदी | उद्गम | विशेषता |
| जिरी | मणिपुर | असम-मणिपुर सीमा बनाती है |
| सोनाई | बरैल पहाड़ियां | कछार की प्रमुख नदी |
| कटाखाल | मिजोरम | बराक की सहायक नदी |
| लोंगाई | मिजोरम | करीमगंज क्षेत्र |
| धलेश्वरी | मिजोरम | बराक की प्रमुख सहायक नदी |
| सिंगला | मिजोरम | कछार क्षेत्र |
| मधुरा | बरैल पहाड़ियां | बराक बेसिन का हिस्सा |
| रुकनी | बरैल पहाड़ियां | स्थानीय सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण |
| घाघरा (बराक बेसिन) | मिजोरम | बराक में मिलती है |
| काटाखाल | बरैल क्षेत्र | दक्षिणी असम की नदी |
असम की नदियां केवल जल संसाधन तक सीमित नहीं हैं। ये काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान, मानस राष्ट्रीय उद्यान, नामेरी राष्ट्रीय उद्यान और डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान जैसे विश्व प्रसिद्ध संरक्षित क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को भी सहारा देती हैं। राज्य के अनेक आर्द्रभूमि क्षेत्र, नदी द्वीप, मछली संसाधन और गंगा नदी डॉल्फ़िन जैसे दुर्लभ जीव भी इन नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं।
हालांकि, हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन, अत्यधिक नदी कटाव, तलछट का बढ़ता जमाव, बाँध परियोजनाओं और अनियोजित विकास के कारण असम की कई नदियां नई चुनौतियों का सामना कर रही हैं। ऐसे में इन नदियों की भौगोलिक, पारिस्थितिक और सामाजिक भूमिका को समझना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है।
नीचे असम की प्रमुख नदियों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है। इन नदियों में ब्रह्मपुत्र और बराक के साथ उनकी प्रमुख सहायक नदियां भी शामिल हैं।
राज्य की सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र है, जो विश्व की सर्वाधिक जल और तलछट वहन करने वाली नदी प्रणालियों में से एक मानी जाती है।
ब्रह्मपुत्र असम ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की जीवनरेखा मानी जाती है। इसका उद्गम तिब्बत में यारलुंग सांगपो के रूप में होता है। अरुणाचल प्रदेश में यह सियांग कहलाती है और दिबांग तथा लोहित नदियों के संगम के बाद असम में प्रवेश करते ही ब्रह्मपुत्र नाम धारण करती है। लगभग 900 किलोमीटर तक असम से होकर बहने वाली यह नदी राज्य को दो हिस्सों, उत्तर और दक्षिण असम में विभाजित करती है।
इसकी चौड़ी धारा, विशाल जलग्रहण क्षेत्र और भारी जल प्रवाह इसे विश्व की सबसे बड़ी नदी प्रणालियों में शामिल करते हैं। विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप माजुली और अनेक चार (नदी द्वीप) इसी नदी की देन हैं। हालांकि ब्रह्मपुत्र असम की कृषि, मत्स्य पालन, जल परिवहन और जैव विविधता का आधार है, लेकिन हर वर्ष आने वाली बाढ़ और नदी तटों के कटाव के कारण लाखों लोग प्रभावित होते हैं।
ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियां
| ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियां | |||
|---|---|---|---|
| नदी | उद्गम | विशेषता | किस दिशा से ब्रह्मपुत्र में मिलती है |
| सियांग (दिहांग) | तिब्बत (यारलुंग सांगपो) | लोहित और दिबांग से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनती है | मुख्य धारा |
| लोहित | पूर्वी तिब्बत | तेज़ प्रवाह वाली हिमालयी नदी | बाएँ तट |
| दिबांग | अरुणाचल प्रदेश | जलविद्युत परियोजनाओं के कारण चर्चा में | बाएँ तट |
| सुबनसिरी | तिब्बत एवं अरुणाचल प्रदेश | ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में एक | बाएँ तट |
| कामेंग (जिया-भराली) | अरुणाचल प्रदेश | नामेरी राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ी | बाएँ तट |
| मानस | भूटान | यूनेस्को विश्व धरोहर मानस राष्ट्रीय उद्यान | दाएँ तट |
| बेकी | भूटान | बाढ़ और तलछट के लिए प्रसिद्ध | दाएँ तट |
| पगलाडिया | भूटान | बाढ़ नियंत्रण परियोजना के कारण चर्चा में | दाएँ तट |
| ऐ (Aie) | भूटान | चिरांग और बोंगाईगाँव क्षेत्र | दाएँ तट |
| चंपामती | भूटान | कोकराझार क्षेत्र की प्रमुख नदी | दाएँ तट |
| सरलभंगा | भूटान | पश्चिमी असम की नदी | दाएँ तट |
| संकोश | भूटान | असम और पश्चिम बंगाल की सीमा के निकट | दाएँ तट |
| कुलसी | मेघालय | गंगा नदी डॉल्फ़िन का महत्वपूर्ण आवास | दाएँ तट |
| दिगारू | मेघालय | कामरूप क्षेत्र | दाएँ तट |
| बर्नाडी | भूटान | उदलगुरी और दरंग क्षेत्र | बाएँ तट |
| कोपिली | मेघालय | अम्लीय जल प्रदूषण के लिए चर्चित | दाएँ तट |
| धानसिरी (दक्षिण) | नागालैंड | काज़ीरंगा के जलग्रहण क्षेत्र का हिस्सा | दाएँ तट |
| भोगदोई | नागालैंड | जोरहाट की प्रमुख नदी | दाएँ तट |
| दिखो | नागालैंड | शिवसागर क्षेत्र | दाएँ तट |
| दिसांग | नागालैंड | कृषि के लिए महत्वपूर्ण | दाएँ तट |
| नामदांग | नागालैंड | शिवसागर क्षेत्र | दाएँ तट |
| बुढ़ी दिहिंग | अरुणाचल प्रदेश | डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान से जुड़ी | बाएँ तट |
| नोआ-दिहिंग | अरुणाचल प्रदेश | पूर्वी असम की जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण | बाएँ तट |
| जिंजीराम | मेघालय | गोलपाड़ा क्षेत्र | दाएँ तट |
| कृष्णाई | मेघालय | पश्चिमी असम | दाएँ तट |
| जिनारी | अरुणाचल प्रदेश | ऊपरी असम की सहायक नदी | बाएँ तट |
किन राज्यों और देशों से आती हैं ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियां?
| किन राज्यों और देशों से आती हैं ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियाँ? | |
|---|---|
| स्रोत क्षेत्र | प्रमुख नदियाँ |
| तिब्बत | सियांग (मुख्य धारा), लोहित, सुबनसिरी |
| अरुणाचल प्रदेश | दिबांग, कामेंग (जिया-भराली), बुढ़ी दिहिंग, नोआ-दिहिंग, जिनारी |
| भूटान | मानस, बेकी, ऐ, संकोश, सरलभंगा, चंपामती, पगलाडिया |
| मेघालय | कुलसी, कोपिली, दिगारू, जिंजीराम, कृष्णाई |
| नागालैंड | धानसिरी, भोगदोई, दिखो, दिसांग, नामदांग |
असम की प्रमुख नदियों व उपनदियों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य
बराक से लेकर कपिली और धानसिरी तक - असम की प्रत्येक नदी अपने आप में महत्वपूर्ण है। ये वो नदियां हैं जो कृषि का आधार हैं, आर्द्रभूमियों का जीवन, वन्य जीवों के लिए जीवन धारा और कई नदियां ऐसी हैं, जो जैव विविधता को बनाए रखने में बेहद अहम हैं। इन नदियों के बारे में महत्वपूर्ण तथ्य इस प्रकार हैं -
बराक दक्षिणी असम की सबसे महत्वपूर्ण नदी है। इसका उद्गम मणिपुर की पहाड़ियों में होता है। यह कछार, हैलाकांडी और करीमगंज जिलों से होकर बहती है और आगे बांग्लादेश में प्रवेश करने के बाद सुरमा और कुशियारा नदियों में विभाजित हो जाती है। बराक घाटी की कृषि, सिंचाई और पेयजल का प्रमुख स्रोत यही नदी है। हाल के वर्षों में बाढ़, तटीय कटाव और जल प्रदूषण जैसी समस्याएं इस नदी के लिए भी चुनौती बन रही हैं।
सियांग नदी का उद्गम तिब्बत में यारलुंग सांगपो के रूप में होता है। हिमालय को काटते हुए यह अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां इसे सियांग या दिहांग के नाम से जाना जाता है। लगभग 294 किलोमीटर भारत में बहने के बाद यह असम के सादिया क्षेत्र के निकट लोहित और दिबांग नदियों से मिलती है। इन तीनों नदियों के संगम के बाद संयुक्त धारा ब्रह्मपुत्र कहलाती है।
सियांग पूर्वोत्तर भारत की सबसे महत्वपूर्ण हिमालयी नदियों में से एक है। यह अपने विशाल जल प्रवाह, तीव्र धारा और भारी मात्रा में तलछट (सिल्ट) लाने के लिए जानी जाती है, जो असम के बाढ़ मैदानों को उपजाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह नदी ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी की पारिस्थितिकी, मत्स्य संसाधनों और स्थानीय समुदायों की आजीविका का भी महत्वपूर्ण आधार है। हाल के वर्षों में तिब्बत और अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं तथा बदलते जल प्रवाह को लेकर इस नदी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
लोहित नदी का उद्गम पूर्वी तिब्बत की कांगरी कार्पो पर्वतमाला में होता है। यह अरुणाचल प्रदेश से होकर बहती हुई सादिया के निकट असम में प्रवेश करती है, जहां सियांग और दिबांग नदियों से मिलकर ब्रह्मपुत्र का निर्माण करती है। लगभग 560 किलोमीटर लंबी यह नदी अपने तेज़ प्रवाह और भारी तलछट (सिल्ट) वहन क्षमता के लिए जानी जाती है।
हिमालय से आने वाली तलछट ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी के बाढ़ मैदानों को उपजाऊ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हाल के वर्षों में लोहित नदी पर प्रस्तावित और निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर पर्यावरणीय प्रभाव, नदी के प्राकृतिक प्रवाह और स्थानीय समुदायों की आजीविका पर पड़ने वाले असर को लेकर चर्चा होती रही है।
दिबांग नदी का उद्गम अरुणाचल प्रदेश की मिश्मी पहाड़ियों में होता है। लगभग 324 किलोमीटर लंबी यह नदी दक्षिण की ओर बहते हुए सादिया के निकट सियांग और लोहित नदियों से मिलती है, जिसके बाद संयुक्त धारा ब्रह्मपुत्र कहलाती है। दिबांग अपने तीव्र प्रवाह, स्वच्छ जल और भारी तलछट परिवहन के लिए जानी जाती है तथा ऊपरी ब्रह्मपुत्र घाटी की जल-व्यवस्था और पारिस्थितिकी को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
इस नदी पर प्रस्तावित दिबांग बहुउद्देश्यीय जलविद्युत परियोजना भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक मानी जाती है। हालांकि इस परियोजना को लेकर जैव विविधता, नदी पारिस्थितिकी, वन क्षेत्र और स्थानीय समुदायों पर संभावित प्रभावों के कारण पर्यावरणविदों और विशेषज्ञों ने कई चिंताएं भी व्यक्त की हैं।
बराक नदी बेसिन
सुबनसिरी ब्रह्मपुत्र की सबसे बड़ी सहायक नदियों में से एक है। इसका उद्गम तिब्बत में होता है और यह अरुणाचल प्रदेश से होकर असम में प्रवेश करती है। यह नदी अपनी तीव्र धारा और जलविद्युत क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। इसी कारण इस पर विकसित की जा रही लोअर सुबनसिरी जलविद्युत परियोजना लंबे समय से पर्यावरणीय और सामाजिक बहस का विषय रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े बाँधों का प्रभाव नदी की प्राकृतिक प्रवाह प्रणाली, मत्स्य संसाधनों और निचले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी पर पड़ सकता है।
मानस नदी का उद्गम भूटान के हिमालयी क्षेत्र में होता है। यह भारत में प्रवेश करने के बाद प्रसिद्ध मानस राष्ट्रीय उद्यान से होकर बहती है, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल भी है। यह नदी समृद्ध जैव विविधता, हाथियों, गैंडों, बाघों और अनेक दुर्लभ प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराती है। मानस नदी का जल बाढ़ के समय बड़ी मात्रा में तलछट भी लाता है।
अरुणाचल प्रदेश में यह नदी कामेंग के नाम से जानी जाती है, जबकि असम में प्रवेश करने के बाद इसका नाम जिया-भराली हो जाता है। यह नदी नामेरी राष्ट्रीय उद्यान के पारिस्थितिक तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। रिवर राफ्टिंग, महाशीर मछली और नदी आधारित पर्यटन के लिए भी यह प्रसिद्ध है।
कोपिली नदी मेघालय की पहाड़ियों से निकलकर असम में प्रवेश करती है। यह नगांव और होजाई जिलों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है। हाल के वर्षों में मेघालय के कोयला खनन क्षेत्रों से आने वाले अम्लीय अपशिष्ट (Acid Mine Drainage) के कारण इस नदी की जल गुणवत्ता प्रभावित हुई है। वैज्ञानिकों ने कई स्थानों पर पानी के अत्यधिक अम्लीय होने की पुष्टि की है, जिससे जलीय जीवन पर असर पड़ा है।
धानसिरी नदी नागालैंड की लिसांग पहाड़ियों से निकलती है और गोलाघाट जिले से होकर ब्रह्मपुत्र में मिलती है। यह नदी काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान के जलग्रहण क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी बाढ़ आसपास के आर्द्रभूमि क्षेत्रों को पुनर्जीवित करती है और वन्यजीवों के लिए आवश्यक जल उपलब्ध कराती है।
बेकी नदी भूटान से निकलकर असम के बक्सा और बारपेटा जिलों में बहती है। यह ब्रह्मपुत्र की महत्वपूर्ण सहायक नदी है। मानसून के दौरान इसमें अचानक जलस्तर बढ़ने से बाढ़ की स्थिति बन जाती है। दूसरी ओर, यह नदी कृषि भूमि में उपजाऊ मिट्टी भी जमा करती है।
कुलसी नदी मेघालय की पहाड़ियों से निकलती है और ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। यह नदी विशेष रूप से गंगा नदी डॉल्फ़िन के लिए प्रसिद्ध है। यहां स्थानीय समुदायों की भागीदारी से डॉल्फ़िन संरक्षण के कई प्रयास किए गए हैं। इसलिए कुलसी को सामुदायिक संरक्षण का एक सफल उदाहरण भी माना जाता है।
पगलाडिया नदी भूटान से निकलकर बक्सा और नलबाड़ी क्षेत्रों से गुजरती है। नलबाड़ी जिले के अधिकांश गॉंवों में भूजल में आयरन (लौह) की मात्रा बहुत अधिक है। इसलिए इन गॉंवों के लोग पगलाडिया नदी से ही पीने का पानी लेते हैं। वहीं बाढ़ नियंत्रण के उद्देश्य से इस नदी पर प्रस्तावित पगलाडिया बहुउद्देश्यीय परियोजना वर्षों से चर्चा में रही है। विस्थापन, भूमि अधिग्रहण और पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर इस परियोजना पर लंबे समय से बहस होती रही है।
दिसांग नदी नागालैंड से निकलकर शिवसागर जिले से गुजरती है और आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। यह नदी कृषि और मत्स्य पालन के लिए महत्वपूर्ण है तथा आसपास के ग्रामीण इलाकों की सिंचाई में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।
दिखो नदी भी नागालैंड की पहाड़ियों से निकलती है। यह शिवसागर और जोरहाट क्षेत्रों से होकर बहती है। यह ब्रह्मपुत्र की दक्षिणी सहायक नदियों में शामिल है और मानसून के दौरान जल स्तर में तेज़ वृद्धि देखी जाती है।
बुढ़ी दिहिंग का उद्गम अरुणाचल प्रदेश में है। यह डिब्रूगढ़ और तिनसुकिया जिलों से होकर बहती है। यह नदी डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान और आसपास की आर्द्रभूमियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी बाढ़ क्षेत्र की जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करती है।
नोआ-दिहिंग भी अरुणाचल प्रदेश से निकलती है और पूर्वी असम में बहती है। इसके किनारे स्थित वर्षावन, आर्द्रभूमियां और जैव विविधता पूर्वोत्तर भारत के सबसे समृद्ध पारिस्थितिक क्षेत्रों में गिने जाते हैं।
भोगदोई नदी जोरहाट जिले की प्रमुख नदियों में से एक है। तेज़ी से हो रहे शहरीकरण के कारण इस नदी में घरेलू अपशिष्ट और अतिक्रमण की समस्या बढ़ी है। स्थानीय संगठनों द्वारा इसके पुनर्जीवन की दिशा में समय-समय पर अभियान चलाए जाते रहे हैं। यह नदी जोरहाट शहर की जल निकासी प्रणाली का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
माजुली दुनिया के सबसे बड़े आबाद नदी द्वीपों में से एक है।
जिंजीराम नदी मेघालय से निकलकर पश्चिमी असम में बहती है और आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। यह नदी घड़ियाल और मगरमच्छ जैसे सरीसृपों के लिए भी जानी जाती रही है, हालांकि अब उनकी संख्या काफी कम हो चुकी है।
कटाखाल नदी बराक नदी प्रणाली की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी है। इसका उद्गम मिजोरम की पहाड़ियों में होता है और यह मुख्य रूप से कछार जिले से होकर बहती है, जहां आगे चलकर बराक नदी में मिल जाती है। यह नदी स्थानीय कृषि, सिंचाई और जल निकासी व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है तथा मानसून के दौरान आसपास के क्षेत्रों की जल व्यवस्था को भी प्रभावित करती है।
लोंगाई नदी मिजोरम की पहाड़ियों से निकलकर करीमगंज जिले से होकर बहती है और आगे बांग्लादेश में हाकालुकी हौर क्षेत्र से होकर सुरमा-कुशियारा नदी प्रणाली का हिस्सा बन जाती है। यह सीमा क्षेत्र के कृषि क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है और मानसून के दौरान बाढ़ तथा जलभराव की स्थिति भी उत्पन्न कर सकती है।
सोनाई बराक बेसिन की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। यह कछार जिले से होकर बहती है और आगे बराक नदी में मिल जाती है। यह नदी सिंचाई, मत्स्य पालन और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है तथा बराक घाटी के जल निकासी तंत्र का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।
जिरी नदी मणिपुर और असम की सीमा के निकट स्थित पहाड़ी क्षेत्रों से निकलती है तथा दीमा हसाओ और कछार क्षेत्र से होकर बराक नदी में मिल जाती है। यह कुछ हिस्सों में असम और मणिपुर के बीच प्राकृतिक सीमा भी बनाती है। स्थानीय समुदायों के लिए यह नदी पेयजल, कृषि और मत्स्य पालन का महत्वपूर्ण स्रोत होने के साथ-साथ बराक बेसिन की जल व्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
ब्रह्मपुत्र विश्व की सर्वाधिक जल और तलछट वहन करने वाली नदी प्रणालियों में से एक है। यह तिब्बत, भारत और बांग्लादेश, तीन देशों से होकर बहती है। असम में इसका विस्तृत जलग्रहण क्षेत्र राज्य की कृषि, मत्स्य पालन और पारिस्थितिकी का आधार है। मानसून के दौरान इसका जल प्रवाह कई गुना बढ़ जाता है, जिसके कारण हर वर्ष बाढ़ और नदी तटों के कटाव की स्थिति पैदा होती है।
ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित माजुली अपनी सांस्कृतिक विरासत, सत्र परंपरा और समृद्ध जैव विविधता के लिए प्रसिद्ध है। इसे विश्व का सबसे बड़ा आबाद नदी द्वीप माना जाता है। हालांकि लगातार हो रहे नदी कटाव के कारण पिछले कुछ दशकों में इसका क्षेत्रफल काफी कम हुआ है।
असम के कई प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य सीधे तौर पर नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं। काज़ीरंगा राष्ट्रीय उद्यान ब्रह्मपुत्र की बाढ़ से बनने वाले घास के मैदानों के कारण विश्व प्रसिद्ध है। वहीं मानस राष्ट्रीय उद्यान मानस नदी के किनारे स्थित है और डिब्रू-सैखोवा राष्ट्रीय उद्यान ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक नदियों के संगम क्षेत्र में विकसित हुआ है। इन नदियों के बिना इन संरक्षित क्षेत्रों की पारिस्थितिकी की कल्पना करना कठिन है।
मेघालय से निकलने वाली कुलसी नदी गंगा नदी डॉल्फ़िन के प्रमुख आवासों में से एक मानी जाती है। स्थानीय समुदायों ने कई वर्षों से डॉल्फ़िन संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाए हैं। सामुदायिक भागीदारी के कारण कुलसी नदी को नदी संरक्षण के एक सफल उदाहरण के रूप में भी देखा जाता है।
दक्षिणी असम की प्रमुख बराक नदी बांग्लादेश में प्रवेश करने के बाद दो धाराओं, सुरमा और कुशियारा में विभाजित हो जाती है। आगे चलकर ये दोनों नदियां फिर मिलकर मेघना नदी प्रणाली का हिस्सा बनती हैं, जो अंततः बंगाल की खाड़ी में गिरती है।
ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां हर साल बड़ी मात्रा में तलछट (सिल्ट) लाती हैं। इससे कहीं नई ज़मीन (चार) बनती है तो कहीं नदी तट कटकर गाँवों और खेती की भूमि को नुकसान पहुंचता है। इसलिए असम में नदियां केवल बहती ही नहीं हैं, बल्कि हर वर्ष राज्य के भूगोल को भी बदलती रहती हैं।
असम की नदी प्रणाली की एक खास विशेषता यह है कि इसकी सहायक नदियां केवल राज्य के भीतर से नहीं निकलतीं। सुबनसिरी, सियांग, लोहित और दिबांग अरुणाचल प्रदेश तथा तिब्बत से आती हैं, जबकि मानस और बेकी भूटान से तथा कोपिली और कुलसी मेघालय से निकलती हैं। यही कारण है कि असम की जल व्यवस्था पड़ोसी राज्यों और देशों के साथ भी गहराई से जुड़ी हुई है।
असम की नदी प्रणालियां केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि अनेक दुर्लभ जीव-जंतुओं के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। गंगा नदी डॉल्फ़िन, ऊदबिलाव, महाशीर जैसी मछलियां, अनेक प्रवासी पक्षी और आर्द्रभूमियों पर निर्भर सैकड़ों प्रजातियां इन नदियों से जुड़ी हुई हैं। यही कारण है कि इन नदियों का संरक्षण जैव विविधता संरक्षण के लिए भी बेहद आवश्यक माना जाता है।
ब्रह्मपुत्र विश्व की सबसे गतिशील (Dynamic) नदी प्रणालियों में से एक है। हिमालय से आने वाली भारी मात्रा में तलछट और तेज़ जल प्रवाह के कारण इसकी धारा समय-समय पर अपना मार्ग बदलती रहती है। इससे कहीं नए 'चार' (नदी द्वीप) बनते हैं, तो कहीं नदी तटों का कटाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि असम का भू-दृश्य लगातार बदलता रहता है।
असम में 3,500 से अधिक आर्द्रभूमियां हैं। इनमें बील (Beels), दलदली क्षेत्र और बाढ़ के मैदान शामिल हैं। ये आर्द्रभूमियां बाढ़ के पानी को समाहित करने और भूजल के रिचार्ज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। साथ ही, ये मत्स्य संसाधनों और प्रवासी पक्षियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास हैं। दीपोर बील राज्य की सबसे प्रसिद्ध रामसर आर्द्रभूमियों में से एक है।
असम की नदियां राज्य की अर्थव्यवस्था, जैव विविधता और आजीविका की आधारशिला हैं, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इनके सामने कई गंभीर चुनौतियां उभरकर आई हैं। जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास, नदी तटों पर बढ़ता दबाव और बदलते भू-आकृतिक स्वरूप ने इन नदी प्रणालियों को पहले की तुलना में अधिक संवेदनशील बना दिया है।
बुढ़ी दिहिंग और दिसांग जैसी अनेक सहायक नदियां असम के जल तंत्र को समृद्ध बनाती हैं।
असम भारत के सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्यों में शामिल है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में मानसून के दौरान जलस्तर तेजी से बढ़ता है, जिससे राज्य के अनेक जिले हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं। बाढ़ से खेती, सड़कें, घर और सार्वजनिक ढाँचे प्रभावित होते हैं, वहीं लाखों लोगों को अस्थायी रूप से विस्थापित होना पड़ता है। दूसरी ओर, यही बाढ़ खेतों में उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी भी जमा करती है, जिससे कृषि को लाभ मिलता है। इसलिए असम में बाढ़ को पूरी तरह आपदा नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक प्रक्रिया के रूप में भी देखा जाता है, जिसके बेहतर प्रबंधन की आवश्यकता है।
असम की सबसे गंभीर समस्याओं में से एक नदी तटों का कटाव (Riverbank Erosion) है। ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां हर वर्ष अपने किनारों को काटती हैं, जिससे हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि और अनेक गाँव नदी में समा जाते हैं। माजुली सहित कई नदी द्वीपों का क्षेत्रफल भी लगातार घटा है। कटाव के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगह बसना पड़ता है, जिससे आजीविका और सामाजिक जीवन पर गहरा असर पड़ता है।
हिमालयी क्षेत्रों से आने वाली नदियां अपने साथ बड़ी मात्रा में तलछट लाती हैं। यह तलछट नदी के तल में जमा होकर कई स्थानों पर जलधारा का मार्ग बदल देती है। इससे कहीं नए 'चार' (रेतीले नदी द्वीप) बनते हैं तो कहीं जल निकासी बाधित होने से बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। बदलती नदी धाराएं स्थानीय आबादी, कृषि और बुनियादी ढाँचे के लिए नई चुनौतियां पैदा करती हैं।
ब्रह्मपुत्र की कई सहायक नदियों, विशेषकर सुबनसिरी, दिबांग और लोहित, पर बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित या निर्माणाधीन हैं। इन परियोजनाओं को ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, लेकिन इनके संभावित पर्यावरणीय प्रभावों को लेकर भी चिंता जताई जाती रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े बाँध नदी के प्राकृतिक प्रवाह, तलछट के परिवहन, मछलियों के प्रवास और निचले क्षेत्रों की पारिस्थितिकी को प्रभावित कर सकते हैं। स्थानीय समुदायों ने भी विस्थापन और आजीविका से जुड़े मुद्दे उठाए हैं।
असम की अनेक बील (Beels), दलदली क्षेत्र और अन्य आर्द्रभूमियां नदियों से जुड़ी हुई हैं। शहरी विस्तार, अतिक्रमण, प्रदूषण और प्राकृतिक जल प्रवाह में बदलाव के कारण इनमें से कई आर्द्रभूमियां धीरे-धीरे सिकुड़ रही हैं। इससे प्रवासी पक्षियों, मछलियों और अन्य जलीय जीवों के आवास प्रभावित हो रहे हैं तथा स्थानीय मत्स्य पालन पर भी असर पड़ रहा है।
गुवाहाटी, डिब्रूगढ़, जोरहाट, सिलचर और अन्य शहरों के विस्तार के साथ कई छोटी-बड़ी नदियों पर प्रदूषण का दबाव बढ़ा है। घरेलू सीवेज, ठोस कचरे और बिना उपचारित अपशिष्ट के नदी में मिलने से जल गुणवत्ता प्रभावित होती है। भोगदोई, बहिनी और कुछ अन्य शहरी नदियों में प्रदूषण की समस्या समय-समय पर सामने आती रही है। इससे जलीय पारिस्थितिकी और स्थानीय जल उपयोग दोनों प्रभावित होते हैं।
जलवायु परिवर्तन के कारण पूर्वोत्तर भारत में वर्षा के स्वरूप और तीव्रता में बदलाव देखा जा रहा है। अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ने से अचानक बाढ़ और भूस्खलन की आशंका बढ़ जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में लंबे शुष्क दौर भी देखने को मिलते हैं। बदलते मौसम का असर नदी प्रवाह, कृषि, मत्स्य पालन और जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में नदी प्रबंधन की रणनीतियों में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को शामिल करना आवश्यक होगा।
असम की नदियां हर वर्ष बाढ़, कटाव, प्रदूषण और बदलते जलवायु पैटर्न जैसी चुनौतियों का सामना करती हैं। इन समस्याओं से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ-साथ स्थानीय समुदाय, शोध संस्थान और संरक्षण संगठन विभिन्न स्तरों पर काम कर रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि नदियों के संरक्षण के लिए केवल इंजीनियरिंग आधारित उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए नदी को एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में समझने और उसी अनुरूप प्रबंधन की आवश्यकता है।
असम के कई प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य सीधे तौर पर नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं।
असम सरकार का जल संसाधन विभाग (Water Resources Department) और केंद्र सरकार की विभिन्न एजेंसियां ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों में बाढ़ प्रबंधन के लिए तटबंधों के निर्माण एवं मरम्मत, नदी प्रशिक्षण (River Training), कटाव रोधी संरचनाओं और बाढ़ पूर्व चेतावनी प्रणाली पर काम करती हैं।
इसके अलावा ब्रह्मपुत्र बोर्ड और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) भी बाढ़ जोखिम कम करने, नदी अध्ययन और आपदा प्रबंधन से जुड़े कार्यक्रमों में सहयोग करते हैं। हाल के वर्षों में उपग्रह चित्रों, ड्रोन सर्वेक्षण और वास्तविक समय (Real-time) जलस्तर निगरानी जैसी तकनीकों का उपयोग भी बढ़ा है, जिससे बाढ़ की पूर्व सूचना देने में मदद मिल रही है।
असम में बाढ़ से अधिक गंभीर समस्या कई बार नदी तटों का कटाव होता है। इसे रोकने के लिए ब्रह्मपुत्र, सुबनसिरी, मानस और अन्य नदियों के किनारे जियोबैग, बोल्डर पिचिंग, स्पर (Spurs) और अन्य कटावरोधी संरचनाएं बनाई जाती हैं।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि केवल तटबंध और कंक्रीट आधारित उपाय पर्याप्त नहीं हैं। नदी के प्राकृतिक प्रवाह, बाढ़ के मैदानों और तलछट के परिवहन को ध्यान में रखकर नदी तट प्रबंधन की दीर्घकालिक रणनीति अपनाना आवश्यक है। इसी कारण अब प्रकृति-आधारित समाधान (Nature-based Solutions) और नदी तटीय हरित पट्टियों (Riparian Vegetation) को भी संरक्षण रणनीति का हिस्सा बनाया जा रहा है।
ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां भारत के राष्ट्रीय जलीय जीव गंगा नदी डॉल्फ़िन का महत्वपूर्ण आवास हैं। विशेष रूप से कुलसी, ब्रह्मपुत्र, सुबनसिरी और मानस नदी क्षेत्रों में डॉल्फ़िन की उपस्थिति दर्ज की गई है।
वन विभाग, स्थानीय समुदायों और विभिन्न संरक्षण संगठनों की साझेदारी से डॉल्फ़िन संरक्षण के लिए जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। कई क्षेत्रों में मछुआरों को डॉल्फ़िन-अनुकूल मत्स्य पालन के लिए भी प्रोत्साहित किया जा रहा है ताकि जाल में फँसने या मानवीय गतिविधियों से इनका नुकसान कम हो।
असम की नदियां केवल मुख्य धारा तक सीमित नहीं हैं। इनके साथ जुड़े बील (Beels), दलदली क्षेत्र और बाढ़ के मैदान राज्य की पारिस्थितिकी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये आर्द्रभूमियां बाढ़ के पानी को समाहित करने, भूजल पुनर्भरण, मत्स्य संसाधनों को बनाए रखने और प्रवासी पक्षियों के आवास के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
इसी उद्देश्य से राज्य में कई आर्द्रभूमियों के संरक्षण, पुनर्जीवन और वैज्ञानिक प्रबंधन की दिशा में कार्य किए जा रहे हैं। दीपोर बील, जो रामसर आर्द्रभूमि है, इसके संरक्षण के प्रयासों का प्रमुख उदाहरण है। हालांकि शहरी विस्तार और अतिक्रमण जैसी चुनौतियां अभी भी बनी हुई हैं।
असम के कई हिस्सों में स्थानीय समुदाय नदी संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। कुलसी नदी में गंगा नदी डॉल्फ़िन संरक्षण हो या बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर जल संसाधनों का प्रबंधन, ऐसे कई उदाहरण हैं जहां समुदायों ने सरकार और गैर-सरकारी संगठनों के साथ मिलकर काम किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि नदी संरक्षण तभी सफल हो सकता है जब स्थानीय लोगों, मछुआरा समुदायों, किसानों और पंचायतों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाए। क्योंकि नदी से सबसे अधिक जुड़ा जीवन इन्हीं समुदायों का है।
विशेषज्ञों का मानना है कि असम की नदियों को केवल बाढ़ नियंत्रण या जल संसाधन के रूप में नहीं देखा जा सकता। इनके संरक्षण के लिए समग्र नदी बेसिन प्रबंधन (Integrated River Basin Management) की आवश्यकता है, जिसमें नदी का प्राकृतिक प्रवाह, सहायक नदियां, आर्द्रभूमियां, बाढ़ के मैदान, जैव विविधता और स्थानीय समुदाय, सभी को एक साथ ध्यान में रखा जाए।
जलवायु परिवर्तन के दौर में यह दृष्टिकोण पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। यदि नदी के पूरे परिदृश्य (River Landscape) को केंद्र में रखकर योजनाएं बनाई जाएं, तो असम की नदियों को भविष्य की चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम बनाया जा सकता है।
असम की नदियां केवल जल स्रोत नहीं हैं, बल्कि राज्य की कृषि, जैव विविधता, संस्कृति और अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं। ब्रह्मपुत्र और बराक के साथ उनकी सहायक नदियां मिलकर पूर्वोत्तर भारत के सबसे समृद्ध नदी तंत्रों में से एक का निर्माण करती हैं। हालांकि बाढ़, नदी कटाव, प्रदूषण, आर्द्रभूमियों के क्षरण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में इन नदियों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और क्षेत्र के सतत विकास से जुड़ा प्रश्न है। नदी को उसके पूरे परिदृश्य, सहायक नदियों, बाढ़ के मैदानों, आर्द्रभूमियों और स्थानीय समुदायों के साथ समझने और उसी आधार पर प्रबंधन करने से ही असम की नदी प्रणालियों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।
इस लेख में दी गई सूचियां निम्नलिखित स्रोतों के आधार पर तैयार की गई हैं।
Assam Water Resources Department
India-WRIS
Central Water Commission (CWC)
Brahmaputra Board
National Disaster Management Authority (NDMA)
Ramsar Sites Information Service
UNESCO World Heritage Centre
Survey of India
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें