फोटो: तक्षशिला | विकिमीडिया कॉमन्स
मैनपुरी की ईसन नदी में आठ प्रमुख नालों का गंदा पानी पहुंच रहा है।
शहर में 23 MLD क्षमता का STP मौजूद है, लेकिन सभी नाले सीवेज उपचार व्यवस्था से नहीं जुड़े हैं।
सीवेज रोकने के लिए STP, पंप हाउस और नालों के पानी को डायवर्ट करने के काम प्रस्तावित हैं।
ईसन को पुनर्जीवित करने के लिए सीवेज रोकने के साथ नदी का प्राकृतिक प्रवाह और जलस्रोत बचाना भी जरूरी है।
मैनपुरी की ईसन नदी में शहर के कई नालों का गंदा पानी पहुंच रहा है। मैनपुरी जिला प्रशासन ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में दाखिल जवाब में ईसन में गिरने वाले आठ प्रमुख नालों का विवरण दिया है। नदी में सीवेज रोकने के लिए STP और पंप हाउस से जुड़े काम प्रस्तावित हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी जमीन और पहुंच मार्ग की प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है।
ईसन की स्थिति केवल एक नदी में गिर रहे गंदे पानी की समस्या नहीं है। यह शहरी सीवेज प्रबंधन की उस कमी की ओर भी ध्यान खींचती है, जिसमें सीवर नेटवर्क से बाहर रह गया गंदा पानी नालों के रास्ते नदी तक पहुंच जाता है। ऐसे में सवाल केवल नदी की सफाई का नहीं, बल्कि सीवेज को नदी तक पहुंचने से पहले रोकने का भी है।
ईसन नदी और उसका प्राकृतिक प्रवाह
ईसन उत्तर प्रदेश की एक छोटी नदी है, जो एटा और मैनपुरी सहित कई जिलों से होकर गुजरती है। इसकी कुल लंबाई करीब 317 किलोमीटर बताई गई है। एटा से करीब 14 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में नगला सुजान गांव के पास इसका उद्गम माना जाता है।
मैनपुरी जिला प्रशासन के अनुसार वर्ष के अधिकांश हिस्से में ईसन में बहते पानी की मात्रा कम रहती है। असामान्य सूखे के वर्षों में नदी में स्पष्ट धारा भी नहीं रहती और बचे हुए जलकुंडों को प्राकृतिक स्रोतों से पानी मिलता है। ऐसे में ईसन में सीवेज पहुंचने का सवाल उसके प्राकृतिक प्रवाह से भी जुड़ जाता है। कम प्रवाह वाली नदी में गंदे पानी का दबाव ज्यादा हो सकता है।
NGT में मैनपुरी जिला प्रशासन की ओर से दाखिल जवाब में ईसन में गिरने वाले आठ प्रमुख नालों का विवरण दिया गया है। इनमें खर्जा ड्रेन, बी-बाजार ड्रेन, चांदेश्वर मंदिर रोड ड्रेन, श्मशान घाट ड्रेन, करबला नाला और कुसमरा नाला जैसे नाले शामिल हैं। रिपोर्ट में इन नालों की लंबाई, पानी की मात्रा और उनमें बहने वाले गंदे पानी की स्थिति का भी विवरण दिया गया है।
इसलिए ईसन के मामले में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि उसमें कितने नाले गिर रहे हैं। यह जानना भी जरूरी है कि नदी में अलग-अलग मौसम में अपना कितना पानी रहता है और उसके प्राकृतिक जलस्रोतों की स्थिति क्या है।
जिन इलाकों में सीवर नेटवर्क है, वहां घरों और दूसरी इमारतों से निकलने वाला गंदा पानी सीवर लाइन के जरिए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) तक पहुंचना चाहिए। वहां उपचार के बाद ही इसे तय मानकों के अनुसार बाहर छोड़ा जाना चाहिए। लेकिन पूरी आबादी सीवर नेटवर्क से जुड़ी न हो तो समस्या शुरू होती है।
ऐसे इलाकों का गंदा पानी स्थानीय नालियों में जाता है। छोटी नालियां बड़े नालों में मिलती हैं और आखिर में यह पानी किसी नदी तक पहुंच जाता है।
केवल STP बना देना नदी में सीवेज रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। शहर से निकलने वाला गंदा पानी सीवर नेटवर्क के जरिए प्लांट तक पहुंचे, तभी उसका उपचार हो सकेगा।
मैनपुरी में सीवेज और नालों की स्थिति सरकारी आंकड़ों में भी दिखाई देती है। NGT में उपलब्ध एक रिपोर्ट में मैनपुरी में करीब 19.36 MLD सीवेज और कुल 91 नाले दर्ज किए गए हैं। इनमें चार नालों को टैप और 87 को अनटैप बताया गया है। ये आंकड़े बताते हैं कि शहर में नालों को सीवेज उपचार व्यवस्था से जोड़ना एक बड़ी चुनौती रही है। ईसन में गिरने वाले आठ प्रमुख नाले इसी समस्या के एक हिस्से को सामने लाते हैं।
मैनपुरी में सीवेज उपचार के लिए 23 MLD क्षमता का UASB आधारित STP पहले से मौजूद है। उत्तर प्रदेश सरकार के जून 2026 के आंकड़ों में इस प्लांट को चालू और तय मानकों के अनुरूप बताया गया है। इसकी क्षमता 23 MLD है और दर्ज उपयोग भी 23 MLD है। प्लांट का संचालन और रखरखाव उत्तर प्रदेश जल निगम (अर्बन) के तहत है।
लेकिन किसी शहर में STP का होना अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करता कि नदी में सीवेज नहीं जाएगा। इसके लिए शहर के नालों और सीवर नेटवर्क का STP से जुड़ा होना भी जरूरी है। अगर किसी नाले का गंदा पानी उपचार संयंत्र तक पहुंचने के बजाय सीधे नदी में जा रहा है तो STP मौजूद होने के बावजूद नदी पर सीवेज का दबाव बना रह सकता है।
केवल STP बना देना नदी में सीवेज रोकने के लिए पर्याप्त नहीं है। शहर से निकलने वाला गंदा पानी सीवर नेटवर्क के जरिए प्लांट तक पहुंचे, तभी उसका उपचार हो सकेगा। अगर कोई नाला सीवर नेटवर्क से जुड़ा नहीं है और उसका पानी सीधे नदी में जा रहा है, तो STP मौजूद होने के बावजूद नदी में सीवेज पहुंचता रहेगा।
इसके लिए नालों के पानी को नदी तक पहुंचने से पहले रोककर दूसरी ओर भेजने की व्यवस्था (Interception and Diversion) की जाती है। इसमें नाले के गंदे पानी को पाइप या पंपिंग स्टेशन के जरिए STP तक पहुंचाया जाता है, ताकि उपचार के बाद ही उसे बाहर छोड़ा जाए।
ईसन के मामले में भी इसी दिशा में काम प्रस्तावित है। NGT में मैनपुरी जिला प्रशासन की ओर से दाखिल जवाब के अनुसार STP और पंप हाउस के लिए जगह चुनी जा चुकी है। उत्तर प्रदेश जल निगम (नमामि गंगे), आगरा और स्थानीय प्रशासन के बीच इसके लिए समन्वय किया जा रहा है। परियोजना के लिए कुछ जमीन आवंटित हो चुकी है, जबकि बाकी जमीन और पहुंच मार्ग के आवंटन की प्रक्रिया चल रही है।
स्थायी व्यवस्था तैयार होने तक कुछ जगह अस्थायी उपाय भी किए जा रहे हैं। जिला प्रशासन के जवाब में सेंट मैरी स्कूल के पास मुख्य नाले के सीवेज के उपचार के लिए जनवरी 2026 में बायोरेमेडिएशन किए जाने का उल्लेख है। इसमें जैविक प्रक्रियाओं की मदद से गंदे पानी में मौजूद प्रदूषकों को कम किया जाता है।
यह बताता है कि STP बनाना ही पर्याप्त नहीं है। नालों का पानी वहां तक पहुंचाने के लिए पाइपलाइन, पंपिंग स्टेशन और पहुंच मार्ग जैसी सुविधाओं की भी जरूरत होती है। इनके लिए समय पर जमीन उपलब्ध न हो तो पूरी सीवेज उपचार व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
ऐसे काम में नगर पालिका, जल निगम, राजस्व विभाग और जिला प्रशासन जैसे कई विभागों के बीच तालमेल जरूरी होता है। किसी एक स्तर पर देरी का असर नदी तक पहुंचने वाले सीवेज को रोकने की पूरी योजना पर पड़ सकता है।
नदी में सीवेज जाने से रोकना जरूरी है, लेकिन केवल इतना करने से नदी अपने आप पुनर्जीवित नहीं हो जाती। उसके लिए नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी बना रहना चाहिए।
नदी में सीवेज जाने से रोकना जरूरी है, लेकिन केवल इतना करने से नदी अपने आप पुनर्जीवित नहीं हो जाती। उसके लिए नदी का प्राकृतिक प्रवाह भी बना रहना चाहिए।
मैनपुरी जिला प्रशासन के अनुसार ईसन में वर्ष के अधिकांश हिस्से में बहते पानी की मात्रा कम रहती है। असामान्य सूखे के वर्षों में स्पष्ट धारा भी नहीं रहती और बचे हुए जलकुंड प्राकृतिक स्रोतों से पानी पाते हैं। इससे पता चलता है कि ईसन के मामले में प्राकृतिक प्रवाह का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
इसलिए ईसन को पुनर्जीवित करने की योजना में सीवेज रोकने के साथ नदी के जलग्रहण क्षेत्र, मौसमी प्रवाह और उससे जुड़े प्राकृतिक जलस्रोतों को भी समझना होगा। नदी की सफाई और नदी को लंबे समय तक जीवित रखना एक ही बात नहीं है।
ईसन जैसी छोटी नदियां बड़ी नदियों जितनी चर्चा में नहीं आतीं। लेकिन शहर के जल प्रबंधन में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। ये स्थानीय जलनिकासी और बड़े नदी तंत्र का हिस्सा होती हैं। इसलिए इनमें पहुंचने वाला सीवेज केवल एक स्थानीय नदी की समस्या नहीं है।
ईसन का मामला बताता है कि किसी शहरी नदी की सफाई केवल नदी के भीतर से शुरू नहीं होती। यह देखना जरूरी है कि शहर के नाले कहां जा रहे हैं, उनका कितना गंदा पानी उपचार संयंत्र तक पहुंच रहा है और कितना बिना उपचार नदी में गिर रहा है।
मैनपुरी में 23 MLD क्षमता का STP काम कर रहा है, जबकि सरकारी दस्तावेज ईसन में आठ प्रमुख नालों के गिरने की भी पुष्टि करते हैं। इससे साफ है कि किसी शहर में सीवेज उपचार की क्षमता होना और सभी नालों का उस उपचार व्यवस्था से जुड़ा होना दो अलग बातें हैं।
इसके साथ ईसन के प्राकृतिक प्रवाह और जलस्रोतों को भी समझना होगा। छोटी शहरी नदियों को गंदा पानी बाहर निकालने का रास्ता नहीं, बल्कि शहर और आसपास के जल तंत्र का हिस्सा मानना होगा।
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