रावी नदी
फोटो - नीतू सिंह
पंजाब में रावी सिर्फ एक नदी नहीं है यह इतिहास, ज़मीन और ज़िन्दगी के बीच बहती हुई एक रेखा है। सदियों से यह नदी खेतों को सींचती रही है, लोगों की आजीविका का आधार रही है और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी। रावी, पंजाब की पाँच नदियों में से एक है, जिससे “पंज-आब” यानी पांच नदियों की अवधारणा बनी।
इसका उद्गम हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र में रोहतांग दर्रे के पास लगभग 4300 मीटर की उंचाई पर होता है, जहां से यह चंबा घाटी से गुजरते हुए जम्मू-कश्मीर, पंजाब और फिर पाकिस्तान में प्रवेश करती है और अंततः चिनाब नदी में मिल जाती है।
करीब 720 किलोमीटर लंबी इस नदी का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में बहता है, जबकि पंजाब में इसकी लंबाई लगभग 162 किलोमीटर है।
रावी नदी बेसिन सिंधु नदी प्रणाली का एक महत्वपूर्ण उप बेसिन है। इसका विस्तार भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में है। यह बेसिन हिमालय के उंचे पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर पंजाब के मैदानी इलाकों तक फैला हुआ है और सिंचाई, पेयजल तथा जलविद्युत उत्पादन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
कुल बेसिन क्षेत्रफल: लगभग 14,442 वर्ग किमी (भारत में)।
कुल अंतरराष्ट्रीय बेसिन क्षेत्र: लगभग 26,000–27,000 वर्ग किमी (भारत और पाकिस्तान सहित)।
भारत में बेसिन का विस्तार: हिमाचल प्रदेश, पंजाब, जम्मू-कश्मीर
पाकिस्तान में विस्तार: पंजाब प्रांत
उद्गम: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में बड़ा भंगाल क्षेत्र के निकट हिमालय से।
संगम: पाकिस्तान में चिनाब नदी में मिलती है।
रावी नदी का ऊपरी बेसिन हिमालयी पर्वतीय क्षेत्र में स्थित है, जहां तेज ढाल, संकरी घाटियां और अधिक वर्षा देखने को मिलती है। मध्य भाग में नदी गहरी घाटियों से गुजरती है, जबकि निचले भाग में यह पंजाब के मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है। यहां नदी का जल सिंचाई और पेयजल के लिए व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है।
| गुण | विवरण |
|---|---|
| वैदिक नाम | पुरुषनी |
| संस्कृत नाम | इरावती |
| प्राचीन यूनानी नाम | हाइड्रॉट्स (Hydraotes) |
| कुल लंबाई | 720 किमी |
| भारत में लंबाई | 341 किमी |
| तीन राज्यों में लंबाई | हिमाचल प्रदेश – 168 किमी, जम्मू-कश्मीर – 63 किमी, पंजाब – 110 किमी |
| उद्गम (स्रोत) | बड़ा भंगाल (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश) |
| उद्गम स्थल की विशेषता | भादल ग्लेशियर से निकलने वाला भादल नाला, राई घर ग्लेशियर से निकलने वाला राई नाला तथा टंटगढ़ी एवं कारू ग्लेशियरों से निकलने वाले टंटगढ़ी नाले के संगम से रावी नदी का निर्माण होता है। |
| प्रमुख सहायक नदियाँ | बुधिल, बैरा, सियुल, टंटगिरि, सेवा, चिरचिंद नाला, भादल, उज्झ, बेन तथा बसंतर |
| नदी के मार्ग में स्थित जिले | कुल्लू, चंबा |
| जलग्रहण (कैचमेंट) क्षेत्र | 11,706.41 वर्ग किमी |
| नदी बेसिन का कुल क्षेत्रफल | 9,173.61 वर्ग किमी |
| तीन राज्यों में बेसिन क्षेत्रफल | हिमाचल प्रदेश – 5,041 वर्ग किमी, जम्मू-कश्मीर – 2,970.91 वर्ग किमी, पंजाब – 1,161.70 वर्ग किमी |
| प्रमुख वनस्पति प्रजातियाँ | बांज (Oak), चेस्टनट, देवदार, कैल (नीला चीड़), जूनिपर, हिमालयी यू (Himalayan Yew) तथा भोजपत्र (Birch) |
| वन्यजीव अभयारण्य | गमगुल, टुंडाह, कुगती, कालाटोप-खज्जियार, धौलाधार, जसरोता तथा कठलौर-कुशलियां वन्यजीव अभयारण्य |
| नदी तटीय क्षेत्रों के प्रमुख वन्यजीव | कस्तूरी मृग, हिम तेंदुआ, हिमालयी तहर, आइबेक्स, सेरो, गोरल, भौंकने वाला हिरण (बार्किंग डियर), प्राइमेट्स, सामान्य बंदर, लंगूर, गिलहरी, सियार, तेंदुआ, साही आदि |
| राष्ट्रीय महत्व की आर्द्रभूमियाँ (Wetlands) | खज्जियार आर्द्रभूमि एवं रंजीत सागर आर्द्रभूमि |
| अन्य प्रमुख आर्द्रभूमियाँ | मणिमहेश आर्द्रभूमि, लामा दल, जस्तारवाल आर्द्रभूमि |
| रावी नदी की मछलियाँ | रावी नदी में मछलियों की 31 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। |
| रावी नदी परिदृश्य की प्रमुख पर्वत चोटियाँ | पीर पंजाल (5,972 मी.), बराकंडा (5,860 मी.), मणिमहेश कैलाश (5,660 मी.) तथा थमसर (5,080 मी.) |
| जलविद्युत परियोजनाएँ | हिमाचल प्रदेश में रावी नदी पर 167 जलविद्युत परियोजनाए (संचालित, निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित) है। इनकी स्थापित क्षमता 2,835.12 मेगावाट है, जबकि कुल संभावित क्षमता 3,237 मेगावाट आंकी गई है। |
पंजाब और हिमाचल प्रदेश की लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई उपलब्ध कराता है।
रणजीत सागर (थीन) बांध और शाहपुर कंडी परियोजना जैसे प्रमुख जल संसाधन इसी बेसिन में स्थित हैं।
सिंधु जल संधि के तहत रावी का जल भारत के उपयोग के लिए निर्धारित है।
यह बेसिन हिमालयी पारिस्थितिकी, भूजल पुनर्भरण और नदी तटीय जैव विविधता के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
रावी नदी की सहायक नदियों को इस प्रकार समझा जा सकता है -
भादल नदी - भादल नदी का उद्गम मध्य हिमाचल प्रदेश के बारा बंगाल क्षेत्र में पीर पंजाल और धौलाधार पर्वतमालाओं के मध्य स्थित उंचे हिमालयी भागों से होता है। यह मुख्यतः पश्चिम दिशा में प्रवाहित होती है और आगे चलकर तांत गिरि नदी में मिलती है, जो अंततः रावी नदी की सहायक नदी है। इसके जलग्रहण क्षेत्र की विशेषता हिमनदों द्वारा निर्मित यू-आकार की घाटियां, उंचे जलप्रपात और दुर्गम पर्वतीय चोटियां है।
यू-आकार की घाटी हिमनदों के अपरदन से बनने वाली विशिष्ट भू-आकृति है। इसकी खड़ी ढलान वाली दीवारें तथा चौड़ा और अपेक्षाकृत समतल तल इसे सामान्य नदी घाटियों से अलग बनाते है। ऐसी घाटियां प्रायः हिमनदी क्षेत्रों में विकसित होती है।
सिउल नदी - सिउल नदी को मुख्य रूप से हिमनदों के पिघले जल तथा प्राकृतिक झरनों से जल प्राप्त होता है। इसका उद्गम जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश की सीमा के निकट, धौलाधार एवं पीर पंजाल पर्वतमालाओं के बीच स्थित क्षेत्र में होता है। प्रारंभ में यह पूर्व दिशा की ओर बहती है, लेकिन आगे चलकर तीव्र मोड़ लेते हुए दक्षिण-पश्चिम दिशा में प्रवाहित होती है और अंततः चंबा जिले के निचले भाग में रावी नदी से मिल जाती है।
बैरा नदी - बैरा नदी पीर पंजाल पर्वतमाला की दक्षिणी ढलानों से निकलती है। इसकी अधिकांश सहायक धाराएं हिमनदों और बर्फ के पिघलने से पोषित होती है, जिसके कारण यह नदी पूरे वर्ष जल प्रवाह बनाए रखती है। इसके जलग्रहण क्षेत्र में तीव्र ढलान, गहरी नदी घाटियां और सीढ़ीनुमा भू-आकृतियां देखने को मिलती है, जिनका निर्माण नदी द्वारा लंबे समय तक किए गए अपरदन से हुआ है।
तांत गिरि नदी - तांत गिरि नदी का उद्गम चंबा जिले के भरमौर क्षेत्र में पीर पंजाल पर्वतमाला की पूर्वी ढलानों से होता है। इस नदी का तल बड़े-बड़े पत्थरों तथा हिमनदीय निक्षेप से निर्मित है। यह जिस घाटी से होकर बहती है, वह तांत गिरि घाटी के नाम से प्रसिद्ध है, जो हिमनदों द्वारा निर्मित एक सुंदर यू-आकार की घाटी का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
बुधिल और नै (धोना) नदी - रावी नदी अपने उद्गम से लगभग 64 किलोमीटर (40 मील) नीचे बहने के बाद अपनी दो महत्वपूर्ण सहायक नदियों - बुधिल और नै (धोना) को अपने साथ समाहित करती है।
बुधिल नदी - बुधिल नदी का उद्गम लाहौल पर्वत श्रृंखला में स्थित मणिमहेश कैलाश शिखर और मणिमहेश झील के हिमनदीय क्षेत्र से होता है, जो हिंदू धर्म के प्रमुख तीर्थस्थलों में गिने जाते है। लगभग 72 किलोमीटर (45 मील) लंबी यह नदी भरमौर (प्राचीन भरमवार) से होकर बहती है और अंततः रावी नदी में मिल जाती है। इसका औसत ढाल लगभग 59.5 मीटर प्रति किलोमीटर है, जो इसके तीव्र पर्वतीय प्रवाह को दर्शाता है।
ऐतिहासिक रूप से, 1858 से 1860 के बीच भरमौर के तत्कालीन शासकों ने बुधिल घाटी को ब्रिटिश शासन के लिए देवदार की लकड़ी का महत्वपूर्ण स्रोत माना था। लेकिन मणिमहेश मंदिर के आसपास स्थित वन क्षेत्र को धार्मिक महत्व के कारण पवित्र घोषित कर संरक्षित रखा गया, जिससे वहां के प्राकृतिक वन लंबे समय तक सुरक्षित बने रहे।
नै (धोना) नदी - नै, जिसे स्थानीय रूप से धोना भी कहा जाता है, का उद्गम काली देवी दर्रे से होता है। यह लगभग 30 मील (करीब 48 किलोमीटर) की यात्रा तय करने के बाद त्रिलोकनाथ (त्रिलोकिनाथ) के निकट रावी नदी में मिल जाती है। यह नदी भी हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण सहायक धारा है, जो रावी नदी के जल प्रवाह को समृद्ध करती है।
रावी नदी
भारतीय वैदिक साहित्य में रावी नदी का उल्लेख इरावती या ऐरावती के नाम से मिलता है। प्राचीन काल में यह उत्तर-पश्चिम भारत की प्रमुख नदियों में गिनी जाती थी। यूनानी इतिहासकारों ने सिकंदर के भारत अभियान के दौरान इस नदी को हाइड्राओट्स नाम से वर्णित किया है।
ऋग्वेद में वर्णित प्रसिद्ध दशराज्ञ युद्ध का संबंध भी इसी नदी से माना जाता है। इस युद्ध का वर्णन परुष्णी नदी के तट पर हुआ बताया गया है, जिसे कई इतिहासकारों, विशेषकर मैकडोनेल और कीथ ने वर्तमान रावी नदी के रूप में पहचाना है।
रावी नदी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की भी साक्षी रही है। वर्ष 1929 में लाहौर अधिवेशन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज को अपना राष्ट्रीय लक्ष्य घोषित किया। इसी ऐतिहासिक अवसर पर 31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि में कांग्रेस अध्यक्ष जवाहरलाल नेहरू ने रावी नदी के तट पर तिरंगा फहराया और भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का संकल्प लिया। इस ऐतिहासिक क्षण में इंकलाब जिंदाबाद और वंदे मातरम् के नारों से पूरा वातावरण गूंज उठा। यही कारण है इस नदी को “लाहौर की नदी” भी कहते हैं।
रावी नदी
रावी नदी की प्रमुख सहायक नदी बुधिल का उद्गम मणिमहेश पर्वत और मणिमहेश झील के हिमनदीय क्षेत्र से होता है। यह क्षेत्र हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माना जाता है और भगवान शिव से जुड़ी अनेक धार्मिक मान्यताओं का केंद्र है।
लोककथाओं के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती का निवास मणिमहेश कैलाश पर है। पर्वत की चोटी पर स्थित शिवलिंग जैसी प्राकृतिक चट्टान को शिव का प्रतीक माना जाता है, जबकि पर्वत का विस्तृत मैदान शिव चौगान के नाम से प्रसिद्ध है। हिमाचल प्रदेश का गद्दी समुदाय इस पूरे क्षेत्र को शिव भूमि के रूप में श्रद्धापूर्वक पूजता है।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह के उपरांत हिमाचल प्रदेश में कैलाश पर्वत को अपना निवास बनाया। मणिमहेश झील से निकलने वाली मणिमहेश गंगा आगे चलकर बुधिल नदी में मिल जाती है और रावी नदी के जल प्रवाह का हिस्सा बनती है।
चंबा जिले का प्रसिद्ध मिंजर मेला रावी नदी से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह पारंपरिक उत्सव 935 ईस्वी में चंबा के राजा की कांगड़ा के शासक पर विजय की स्मृति में प्रारंभ हुआ था। समय के साथ यह त्योहार धान और मक्का की नई फसल के स्वागत का भी प्रमुख पर्व बन गया।
मेले के अंतिम दिन अखंड चंडी महल से रावी नदी के तट तक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। यहां नदी की पूजा अर्चना कर उसे अर्घ्य अर्पित किया जाता है। यह परंपरा उस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में निभाई जाती है। जिसमें राजा साहिल वर्मन ने हरि राय मंदिर तक श्रद्धालुओं की आसान पहुंच सुनिश्चित करने के लिए रावी नदी के प्रवाह में परिवर्तन करवाया था। आज भी यह अनुष्ठान चंबा की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
रावी नदी और इसकी सहायक नदियां हिमाचल प्रदेश में जलविद्युत उत्पादन का महत्वपूर्ण आधार है। इस नदी तंत्र पर स्थापित कई परियोजनाएं राज्य और देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में अहम भूमिका निभाती हैं।
बैरा सिउल जलविद्युत परियोजना (Baira Siul Hydroelectric Project) - बैरा सिउल जलविद्युत परियोजना हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित है। यह परियोजना रावी, बैरा, सिउल और भालेध नदियों के जलग्रहण क्षेत्र का उपयोग करती है। इसकी स्थापित उत्पादन क्षमता 180 मेगावाट है।
यह परियोजना एनएचपीसी (NHPC) की पहली व्यावसायिक रूप से संचालित जलविद्युत परियोजना थी, जिसने भारत में सार्वजनिक क्षेत्र की जलविद्युत परियोजनाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
चमेरा जलविद्युत परियोजना (Chamera Hydroelectric Project) - रावी नदी पर विकसित चमेरा जलविद्युत परियोजना हिमाचल प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण बहु-चरणीय जलविद्युत योजनाओं में से एक है। इसका संचालन एनएचपीसी लिमिटेड द्वारा किया जाता है और इसे तीन चरणों में विकसित किया गया है।
चमेरा-I
यह वर्ष 1994 में चालू हुई।
इसकी स्थापित क्षमता 540 मेगावाट है ।
यह रावी नदी पर विकसित पहली बड़ी परियोजनाओं में शामिलहै।
चमेरा-II
इसकी कुल उत्पादन क्षमता 300 मेगावाट है।
इसका विद्युतगृह (Power House) भूमिगत बनाया गया है, जिससे पर्यावरणीय प्रभाव अपेक्षाकृत कम होता है।
चमेरा-III
इसकी स्थापित क्षमता 231 मेगावाट है।
यह परियोजना चंबा जिले में स्थित है।
इसमें लगभग 64 मीटर उंचा और 73 मीटर लंबा कंक्रीट का गुरुत्वीय (Gravity) बांध बनाया गया है।
इसका विद्युतगृह भी भूमिगत है।
चमेरा परियोजना के तीनों चरण सामूहिक रूप से हिमाचल प्रदेश की जलविद्युत क्षमता को बढ़ाने और उत्तरी भारत में बिजली आपूर्ति को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान देते है।
बुधिल जलविद्युत परियोजना (Budhil Hydroelectric Project) - बुधिल जलविद्युत परियोजना (BHEP) चंबा जिले में रावी नदी की प्रमुख सहायक बुधिल नदी पर स्थापित 70 मेगावाट क्षमता की रन ऑफ द रिवर परियोजना है।
इस परियोजना का व्यावसायिक संचालन 30 मई 2012 से शुरू हुआ। चूंकि यह रन ऑफ द रिवर मॉडल पर आधारित है, इसलिए इसमें बड़े जलाशय की आवश्यकता नहीं होती और नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग कर बिजली का उत्पादन किया जाता है।
बाजोली-होली जलविद्युत परियोजना (Bajoli Holi Hydroelectric Project) - बाजोली होली जलविद्युत परियोजना हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में रावी नदी पर स्थापित 180 मेगावाट क्षमता की जलविद्युत परियोजना है।
यह भी रन ऑफ द रिवर तकनीक पर आधारित है, जिसमें नदी के प्राकृतिक प्रवाह का उपयोग कर बिजली उत्पन्न की जाती है। इस प्रकार की परियोजनाएं बड़े जलाशयों की तुलना में अपेक्षाकृत कम पर्यावरणीय प्रभाव डालती है और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देती है।
सिंचाई
पेयजल
जलविद्युत
नदी बेसिन प्रबंधन
रावी नदी
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रावी का महत्व बना हुआ है। 1960 की इंडस वॉटर ट्रीटी के तहत इसका पानी भारत के हिस्से में आता है, लेकिन यह एक ट्रांस-बाउंड्री नदी होने के कारण भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। ऐसे में बाढ़ जैसी घटनाएं सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असर भी डालती है।
रावी नदी का जलग्रहण क्षेत्र पश्चिमी हिमालय की समृद्ध जैव विविधता का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसकी ऊपरी घाटियों में देवदार, कैल, फर, स्प्रूस, ओक और बुरांश जैसे शंकुधारी एवं चौड़ी पत्ती वाले वन पाए जाते है, जबकि नदी का स्वच्छ और ठंडा जल हिमालयी स्नो ट्राउट जैसी देशी मछलियों के लिए महत्वपूर्ण आवास प्रदान करता है।
रावी बेसिन के आसपास स्थित धौलाधार और पीर पंजाल पर्वतीय क्षेत्र हिमालयी काला भालू, तेंदुआ, घोरल, कस्तूरी मृग उंचाई वाले क्षेत्रों में तथा हिमालयी मोनाल और कालीज तीतर जैसे पक्षियों के आवास है। रावी नदी के पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन, वनीकरण और सतत नदी प्रबंधन को अत्यंत आवश्यक माना जाता है।
सदियों से रावी पंजाब के किसानों के लिए जीवनरेखा रही है। इसके पानी से गेहूँ, धान, गन्ना और कपास जैसी फसलें उगाई जाती रही हैं।
वनस्पतियों के नाम - देवदार (Cedrus deodara), कैल (Blue Pine), चीड़ (Chir Pine), फर (Fir), स्प्रूस (Spruce), ओक (Oak), बुरांश (Rhododendron), भोजपत्र (Birch), विलो (Willow), पॉपलर।
मुख्य फसल
गेहूं - पंजाब और हिमाचल प्रदेश की प्रमुख रबी फसल, जिसकी सिंचाई रावी बेसिन की नहरों और परियोजनाओं से होती है।
धान (चावल) - खरीफ मौसम में पंजाब के सिंचित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है।
मक्का - हिमाचल प्रदेश के चंबा और कांगड़ा क्षेत्रों में रावी घाटी में महत्वपूर्ण फसल।
सरसों - रबी मौसम की प्रमुख तिलहनी फसल।
गन्ना - पंजाब के कुछ सिंचित क्षेत्रों में।
सब्जियां - टमाटर, आलू, मटर, गोभी, शिमला मिर्च, प्याज आदि।
फल - चंबा और कांगड़ा क्षेत्र में सेब, अखरोट, नाशपाती, प्लम, आड़ू तथा खुमानी जैसे समशीतोष्ण फल।
चारा फसलें - बरसीम, जई और मक्का आधारित चारा, जो डेयरी क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं।
खनिज
चूना पत्थर - सीमेंट उद्योग और निर्माण कार्य में उपयोग; चंबा जिले में इसके भंडार मिलते हैं।
स्लेट - भवनों की छत और फर्श बनाने में प्रयुक्त; हिमाचल प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों में उपलब्ध।
बालू - रावी नदी के तल से प्राप्त, निर्माण कार्य में उपयोग।
बजरी - सड़क और भवन निर्माण के लिए महत्वपूर्ण।
पत्थर - ग्रेनाइट, क्वार्टजाइट तथा अन्य स्थानीय चट्टानें निर्माण कार्य में प्रयुक्त होती हैं।
क्वार्ट्ज - सीमित मात्रा में, कांच और औद्योगिक उपयोग के लिए।
फेल्सपार - सिरेमिक और कांच उद्योग में उपयोग।
मिट्टी - ईंट, टाइल और मिट्टी के बर्तनों के निर्माण में उपयोग।
रावी नदी
पिछले कुछ वर्षों में रावी का स्वभाव बदलता दिख रहा है कहीं यह “गायब होती नदी” कही जा रही है, तो कहीं अचानक बेकाबू होकर तबाही मचा रही है। अमृतसर जिलामुख्यल से करीब 50 किलोमीटर दूर जटा गाँव में रहने वाले गुरप्रीत सिंह कहते हैं, “रावी हमारे खेतों की माँ है। लेकिन इस बार इस नदी ने बहुत बर्बादी की. हमारे गाँव के 240 घरों की 1200 एकड़ जमीन में केवल 25 प्रतिशत ही बच पायी बाकी रावी बहा ले गयी. हमारे घर से पांच किलोमीटर दूर है यह नदी। इस बार की तबाही तो पूरी जिन्दगी याद रहेगी।”
सीमावर्ती इलाके के लिए यह नदी अब अनिश्चितता और डर का कारण भी बनती जा रही है। कभी पानी की कमी, तो कभी अचानक आई बाढ़ इसने किसानों के रिश्ते को भरोसे से जोखिम में बदल दिया है।
अगस्त 2025 में रावी ने अपना सबसे खतरनाक रूप दिखाया। 26-27 अगस्त की रात नदी में रिकॉर्ड 14 लाख क्यूसेक से ज्यादा पानी बहा, जो पिछले कई दशकों में सबसे ज्यादा था। यह सिर्फ एक सामान्य बाढ़ नहीं थी, बल्कि एक बड़े संकट में बदल गई। इस बाढ़ का असर पंजाब के 1400 से ज्यादा गांवों पर पड़ा, करीब 3.5 लाख लोग प्रभावित हुए और 3.7 लाख एकड़ से ज्यादा खेती बर्बाद हो गई। गुरदासपुर, अमृतसर और पठानकोट जैसे जिलों में धान और गन्ने की तैयार फसलें पानी में डूब गईं। कई किसानों के लिए यह सिर्फ एक सीजन का नुकसान नहीं, बल्कि पूरे साल की कमाई का खत्म हो जाना था।
गांवों में हालात इतने खराब थे कि कई जगह खेत महीनों तक पानी में डूबे रहे, पशुधन बह गया और किसान कर्ज़ के बोझ तले दब गए। एक अनुमान के मुताबिक, यह पिछले तीन दशकों की सबसे बड़ी कृषि आपदाओं में से एक थी।
रावी नदी
इस गाँव के अमरजीत सिंह, “इस बार पानी ने सब कुछ ले लिया। 40 एकड़ फसल बोई थी। 10 एकड़ हमारी जमीन थी बाकी की ठेके पर ली थी। पूरी फसल बर्बाद हो गयी। कर्ज लेकर फसल की बुआई की थी सोचा था वापस कर देंगे पर नहीं हो पाया।” यह सिर्फ एक किसान की आपबीती नहीं थी बल्कि पूरे इलाके की साझा आवाज़ थी यह।
प्रदूषण
रेत खनन
पर्यावरणीय प्रवाह
रावी का संकट सिर्फ बाढ़ तक सीमित नहीं है। कई हिस्सों में इसका प्राकृतिक प्रवाह कम हो गया है, और शहरी इलाकों में यह प्रदूषण से जूझ रही है। बिना शोधन के सीवेज, औद्योगिक कचरा और अतिक्रमण ने इसकी पारिस्थितिकी को प्रभावित किया है। बांधों और बैराजों जैसे रणजीत सागर और शाहपुर कंडी ने जहां सिंचाई और बिजली उत्पादन में योगदान दिया है, वहीं नदी के प्राकृतिक प्रवाह को भी बदल दिया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि इस बाढ़ के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे थे। पहाड़ी इलाकों में असामान्य मानसूनी बारिश, सहायक नदियों और नालों से अचानक बढ़ा पानी, और जल प्रबंधन की चुनौतियाँ. इन सबने मिलकर रावी को एक शांत नदी से बेकाबू धारा में बदल दिया। आंकड़ों के मुताबिक, बाढ़ का लगभग 85 प्रतिशत पानी अनियंत्रित सहायक स्रोतों से आया, जबकि बांधों का योगदान अपेक्षाकृत कम था। इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन ने भी मौसम के पैटर्न को अस्थिर बना दिया है कभी अत्यधिक बारिश, तो कभी लंबे सूखे।
हिमनदों का पिघलना
बदलता मानसून
बाढ़ और सूखे का जोखिम
आज रावी के किनारे रहने वाले लोग दो भावनाओं के बीच जी रहे हैं एक तरफ वही नदी है जो उनकी जमीन को उपजाऊ बनाती है, और दूसरी तरफ वही नदी है जो एक रात में सब कुछ छीन सकती है। यह रिश्ता अब सिर्फ निर्भरता का नहीं, बल्कि डर और अनिश्चितता का भी हो गया है।
रावी की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि नदियाँ सिर्फ पानी की धारा नहीं होतीं वे समाज, इतिहास और पर्यावरण के बीच संतुलन की कहानी होती हैं। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो असर सिर्फ नदी पर नहीं, बल्कि उससे जुड़े हर जीवन पर पड़ता है।
रावी नदी
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने मार्च 2022 में भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE), देहरादून द्वारा तैयार 13 प्रमुख नदियों सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब, झेलम, लूणी, यमुना, महानदी, ब्रह्मपुत्र, नर्मदा, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी के पुनर्जीवन हेतु विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) जारी की।
इस योजना के तहत जलग्रहण क्षेत्रों में वृक्षारोपण, मृदा एवं नमी संरक्षण, नदी तट विकास, हरित आवरण और कार्बन सिंक बढ़ाने, गाद एवं बाढ़ के जोखिम को कम करने तथा भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा देने जैसे कार्य किए जाएंगे।
इन परियोजनाओं पर पांच वर्षों में 19,342.62 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रस्ताव है। इनके क्रियान्वयन में राज्य वन विभागों के साथ कृषि, उद्यानिकी, नगरीय निकाय और ग्रामीण विकास विभाग भी भागीदारी शामिल है।
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