तमिलनाडु की ताम्रपर्णी नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए मद्रास उच्च न्यायालय ने अपने एक अहम फैसले में ‘कानूनी व्यक्ति’ का दर्जा दिया है।
फोटो : विकी कॉमंस
मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु की ताम्रपर्णी (थामिरबरानी) नदी को उसके सांस्कृतिक और धार्मिक महत्त्व को देखते हुए कानूनी व्यक्ति (Juristic person) के रूप में मान्यता दी है। न्यायालय ने नदी में सामग्री विसर्जित करने, कूड़ा-कचरा और अनट्रीटेड सीवेज डालने पर भी प्रतिबंध लगाया है। हालांकि लोक आस्था को देखते हुए नदी में अस्थि विसर्जन की परंपरा को इसके अपवाद के रूप में अनुमति दी गई है। कोर्ट का फैसला केवल नदी में कूड़ा डालने पर रोक लगाने वाला सामान्य पर्यावरणीय आदेश नहीं है। अदालत ने ताम्रपर्णी को ‘ज्यूरिस्टिक पर्सन’ मानते हुए कहा है कि नदी का भी अपना एक अधिकार है, खासकर प्रदूषण से मुक्त रहने का अधिकार। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अदालत ने नदी की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को उसके कानूनी व्यक्तित्व का आधार बनाया, लेकिन उसके अधिकार की सीमा साफ रखी: ताम्रपर्णी को व्यक्ति का दर्जा इसलिए नहीं मिला कि हर नदी स्वतः कानूनी व्यक्ति है, बल्कि इसलिए कि उसे देवी के रूप में पूजा जाता है।
मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै पीठ के न्यायमूर्ति जीआर स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति बी. पुगलेन्धी की पीठ ने सिवानुपांडियन बनाम जिला कलेक्टर (Sivanupandian vs. The District Collector) मामले में 23 जुलाई 2026 को यह फैसला दिया। अदालत ने नदी में कपड़े और अन्य पूजा-सामग्री डालने पर रोक लगाई और प्रशासन को निर्देश दिया कि नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए लगातार अभियान चलाया जाए। उल्लंघन को अदालत की अवमानना की कार्रवाई तक ले जाने की बात भी कही गई है।
ताम्रपर्णी की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस नदी को दक्षिणी तमिलनाडु की जीवनरेखा माना जाता है, उसी में लंबे समय से घरेलू सीवेज, ठोस कचरा, औद्योगिक अपशिष्ट और धार्मिक गतिविधियों से पैदा होने वाला कचरा पहुंचता रहा है।
केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय ने दिसंबर 2025 में लोकसभा में दी जानकारी में बताया था कि 2022-23 के जल गुणवत्ता आकलन में तिरुनेलवेली के कुछ हिस्सों में ताम्रपर्णी का BOD 4.0 से 6.2 mg/L तक था और संबंधित नदी खंड को प्रदूषित नदी खंड की Priority-IV श्रेणी में रखा गया था। हालांकि 2024 में नौ स्थानों से लिए गए नमूनों में BOD 2.0 से 3.1 mg/L तक दर्ज हुआ, यानी गुणवत्ता में कुछ सुधार के संकेत मिले।
तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नवंबर 2023 के आंकड़ों में पापनासम से लेकर अरुमुगनेरी तक करीब 80 किलोमीटर के नदी खंड को Priority-IV बताया गया था। अलग-अलग निगरानी केंद्रों पर BOD 2 से 4 mg/L के बीच दर्ज हुआ, जबकि सीवेज प्रदूषण का संकेत देने वाले फीकल और टोटल कोलीफॉर्म भी दर्ज किए गए।
यानी तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है, लेकिन समस्या खत्म भी नहीं हुई है। सरकारी रिकॉर्ड यह भी दिखाते हैं कि नदी की सफाई और प्रदूषण रोकने के लिए 2026 में जिला प्रशासन को लगातार अभियान चलाने पड़े।
ताजा मामले की शुरुआत सीधे तौर पर नदी प्रदूषण की जनहित याचिका से नहीं हुई थी। मामला पापनासम के एक पुराने मंडप और उसके अतिक्रमण से जुड़ा था। याचिकाकर्ता नदी के घाट पर स्थित करीब 400 साल पुराने मंडप का उपयोग कर रहा था और प्रशासन ने उसे हटाने का आदेश दिया था।
सुनवाई के दौरान अदालत का ध्यान इस ओर गया कि पापनासम से आगे नदी के घाटों पर मृतकों के संस्कार और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कपड़े, तौलिये, चप्पल और दूसरी वस्तुएं नदी में फेंकी जा रही हैं। अदालत ने मामले को व्यापक पर्यावरणीय संदर्भ में देखा और संबंधित लोगों से स्थिति की जानकारी ली।
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने रखे गए आंकड़े चौंकाने वाले थे। 7 मई से 28 मई 2026 के बीच नदी से निकाले गए कचरे में करीब 86-90 टन कपड़े, 2.20 टन राख, 1,385 किलो प्लास्टिक, 220 किलो कांच की बोतलें, 374 किलो सैनिटरी नैपकिन/डायपर, 302 किलो तेल की बोतलें और शैंपू कवर तथा अन्य कचरा शामिल था। अदालत के अनुसार कई जगह रोजाना करीब एक टन तक इस्तेमाल किए गए कपड़े नदी में डाले जाने की जानकारी दी गई थी।
ताम्रपर्णी का उद्गम पश्चिमी घाट के जैव-विविधता वाले क्षेत्र में होता है। इसके ऊपरी हिस्से में नदी और उसके आसपास के वन, निचले हिस्से में कृषि क्षेत्र तथा समुद्र के पास इसका मुहाना मिलकर विविध पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं।
नदी की मछली जैव-विविधता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। साइंस जर्नल रिसर्च गेट में Fishes from Tamiraparani river system, Tamil Nadu शीर्षक से प्रकाशित एक ICAR अध्ययन में ताम्रपर्णी नदी तंत्र में 125 मछली प्रजातियां दर्ज की गई थीं। इनमें छह प्रजातियों को संकटग्रस्त और चार को संवेदनशील श्रेणी में बताया गया था। इसी तरह An Annotated Checklist of Ichthyofaunal Diversity of the Potamon Zone of Thamirabarani River, South India शीर्षक से Indian Journal of Animal Research में प्रकाशित एक अन्य रिसर्च पेपर में में ताम्रपर्णी नदी के निचले हिस्से में 57 मछली प्रजातियों के रहने की बात बताई गई है। इनमें कुछ प्रजातियां IUCN की संकटग्रस्त श्रेणियों में शामिल थीं।
मद्रास हाई कोर्ट के ताजा फैसले में भी नदी की जैव-विविधता को लेकर चिंता सामने आई। अदालत ने कहा कि ताम्रपर्णी में इंडियन ब्लैक टर्टल और इंडियन फ्लैपशेल टर्टल पाए जाते हैं। नदी में फेंके गए कपड़ों में इनके फंसने से इनके दम घुटने का खतरा पैदा होता है। साबुन, शैंपू और डिटर्जेंट में मौजूद रसायन मछलियों के लिए भी नुकसानदेह हो सकते हैं। यानी नदी में फेंका गया एक कपड़ा या प्लास्टिक केवल नदी के सौंदर्य को खराब नहीं करता। वह जलीय जीवों के आवास, खाद्य शृंखला और नदी के पूरे पारिस्थितिक संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
ताम्रपर्णी दक्षिणी तमिलनाडु की सबसे महत्वपूर्ण नदियों में से एक है और राज्य की प्रमुख बारहमासी नदियों में गिनी जाती है। यह पश्चिमी घाट की पोथिगई पहाड़ियों से निकलती है और पूर्व की ओर बहते हुए तिरुनेलवेली और तूतीकोरिन जिलों से गुजरती है। तिरुनेलवेली जिला प्रशासन के अनुसार इसकी कुल लंबाई करीब 128 किलोमीटर है, जिसमें 84 किलोमीटर तिरुनेलवेली और 44 किलोमीटर तूतीकोरिन जिले में है। अंत में यह पुन्नक्कायल के पास समुद्र में मिल जाती है।
कुछ वैज्ञानिक और जल संसाधन अध्ययनों में नदी की लंबाई करीब 120 से 125 किलोमीटर भी दी गई है। भारतीय अंतर्देशीय जलमार्ग प्राधिकरण की रिपोर्ट में इसकी लंबाई 125 किलोमीटर दर्ज है। इसलिए अलग-अलग सरकारी और वैज्ञानिक स्रोतों में मामूली अंतर दिखाई देता है।
नदी का प्रवाह मुख्य रूप से अंबासमुद्रम, कल्लिडैकुरिची, चेरनमहादेवी, तिरुनेलवेली, श्रीवैकुंठम और आगे पुन्नक्कायल क्षेत्र से जुड़ा है। नदी का पूरा मार्ग केवल शहरों की शृंखला नहीं है, बल्कि इसमें पहाड़ी वन, ग्रामीण कृषि क्षेत्र, कस्बे, सिंचाई तंत्र, नदी तट और अंत में मुहाना तथा तटीय पारिस्थितिकी शामिल हैं।
ताम्रपर्णी नदी लाखों लोगों को पानी उपलब्ध कराती है और 86 हजार एकड़ से ज्यादा खेती के लिए सिंचाई का सहारा है।
ताम्रपर्णी का महत्व केवल धार्मिक नहीं है। दक्षिणी तमिलनाडु में यह पीने के पानी, सिंचाई, कृषि और उद्योग के लिए महत्वपूर्ण जलस्रोत है। इसके पानी से तिरुनेलवेली और तूतीकोरिन के अलावा कुछ पेयजल योजनाओं के माध्यम से आसपास के अन्य जिलों को भी लाभ मिलता है। पुराने न्यायिक रिकॉर्ड में नदी से जुड़े करीब 20 एकीकृत पेयजल परियोजनाओं और बड़े पैमाने पर घरेलू तथा औद्योगिक जल उपयोग का उल्लेख मिलता है।
नदी पर विकसित सिंचाई व्यवस्था भी ऐतिहासिक है। वर्तमान सरकारी आंकड़ों के अनुसार ताम्रपर्णी सिंचाई प्रणाली में 8 एनीकट, 11 नहरें और 186 सिंचाई टैंक हैं। इससे कुल 86,107 एकड़ क्षेत्र को सिंचाई का लाभ मिलता है। धान इसकी प्रमुख फसल है, जबकि केला भी महत्वपूर्ण फसल है। इसका अर्थ है कि ताम्रपर्णी के प्रदूषण का असर केवल नदी के पानी पर नहीं पड़ता। नदी की गुणवत्ता खराब होने का मतलब कृषि, पेयजल, मत्स्य संसाधन, नदी किनारे रहने वाले समुदायों और अंततः समुद्री पारिस्थितिकी पर भी असर पड़ना है।
| जानकारी | विवरण | स्रोत |
|---|---|---|
| नदी का नाम | ताम्रपर्णी / तामिरापरनी (Thamirabarani / Tamiraparani) | तमिलनाडु सरकार/पर्यावरण स्रोत |
| अन्य प्रचलित नाम | ताम्रपर्णी, तामिरापरनी, तामिरावरुणी, ताम्प्रपर्णी; प्राचीन तमिल साहित्य में पोरुनई (Porunai) | तमिलनाडु ENVIS/IISc |
| उद्गम | अगस्त्यारकूडम/पेरिया पोथिगई क्षेत्र, पोथिगई पहाड़ियां, पश्चिमी घाट | TNPCB |
| उद्गम की ऊंचाई | लगभग 1,725 मीटर (5,659 फीट) | TNPCB/IWAI |
| उद्गम स्थान | तिरुनेलवेली जिले के अंबासमुद्रम क्षेत्र में, पापनासम के ऊपर | TNPCB |
| कुल लंबाई | लगभग 128 किमी; कुछ सरकारी/तकनीकी स्रोतों में 125 किमी | TNPCB/IWAI |
| तिरुनेलवेली में लंबाई | लगभग 84 किमी | TNPCB |
| तूतीकोरिन (थूथुकुडी) में लंबाई | लगभग 44 किमी | TNPCB |
| प्रवाह वाले जिले | तिरुनेलवेली और थूथुकुडी | TNPCB |
| प्रमुख कस्बे/शहर | पापनासम, अंबासमुद्रम, कल्लिडैकुरिची, मुक्कुडल, चेरनमहादेवी, तिरुनेलवेली, श्रीवैकुंठम, एराल, पुन्नक्कायल | TNPCB |
| मुहाना | पुन्नक्कायल के पास खाड़ी-ए-मन्नार में | TNPCB/IWAI |
| प्रमुख सहायक नदियां | पेयार, उल्लार, करैयार, सेवलार, पांबार, मणिमुथार, वराहनदी, रामनदी, जंबूनदी, गदनानदी, कल्लार, करुणैयार, पचैयार, चित्तार, गुंडार, ऐंथारुवियार, हनुमानदी, करुप्पानदी, अलुथाकन्नियार | IWAI |
| प्रमुख बांध/जलाशय | पापनासम, मणिमुथार; सहायक नदी तंत्र में गदना, रामनदी और करुप्पानदी जलाशय प्रमुख | TN Agriculture/Tirunelveli PWD/IWAI |
| पापनासम बांध | ताम्रपर्णी पर; सिंचाई और जलविद्युत के लिए महत्वपूर्ण | TN Agriculture/Census |
| मणिमुथार बांध | मणिमुथार नदी पर; ताम्रपर्णी की प्रमुख सहायक नदी | तिरुनेलवेली जिला प्रशासन |
| गदना जलाशय | गदनानदी पर; क्षमता लगभग 428.52 Mcft, बांध लंबाई 2,645 मीटर, ऊंचाई 85 फीट | तिरुनेलवेली PWD |
| रामनदी जलाशय | रामनदी पर; प्रमुख सिंचाई परियोजना | IWAI/Tirunelveli district |
| सिंचाई व्यवस्था | 8 एनीकट, 11 नहरें और 186 सिंचाई टैंक; लगभग 86,107 एकड़ सिंचाई लाभ | तिरुनेलवेली जिला प्रशासन |
| जलवैज्ञानिक विशेषता | बारहमासी नदी; दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्व दोनों मानसून से जल प्राप्त करती है | TNPCB |
| समुद्र | खाड़ी-ए-मन्नार (Gulf of Mannar) | TNPCB/IWAI |
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। अदालत ने धार्मिक स्वतंत्रता को नकारा नहीं। संविधान का अनुच्छेद 25 धार्मिक आस्था और उसके पालन की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यह स्वतंत्रता सार्वजनिक स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक सीमाओं के अधीन है।
अदालत ने कहा कि धार्मिक अनुष्ठान ऐसे तरीके से नहीं किए जा सकते जिनसे नदी प्रदूषित हो या दूसरे लोगों के अधिकार प्रभावित हों। साथ ही उसने राख विसर्जन को अनुमति दी, लेकिन शर्त रखी कि राख को बिना पकाए मिट्टी के बर्तन में ही नदी में प्रवाहित किया जाए, ताकि बर्तन पानी में घुल जाए। पकी हुई मिट्टी के बर्तन को राख के साथ नदी में डालने की अनुमति नहीं है। यह अंतर महत्वपूर्ण है, क्योंकि अदालत ने धार्मिक परंपरा को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसके पर्यावरणीय रूप को बदलने की कोशिश की है।
अदालत ने ताम्रपर्णी के कानूनी व्यक्तित्व का आधार उसकी देवी के रूप में धार्मिक मान्यता को बनाया। फैसले में कहा गया कि ताम्रपर्णी का उल्लेख वाल्मीकि रामायण, महाभारत और कालिदास के रघुवंशम् में मिलता है। अदालत ने ताम्रपर्णी माहात्म्यम का भी उल्लेख किया, जिसे परंपरा में व्यास से जोड़ा जाता है। नदी को तमिरा देवी के रूप में देखा जाता है और पापनासम का धार्मिक महत्व भी नदी से जुड़ा है।
भारतीय कानून में हिंदू देवी-देवताओं और मूर्तियों को कई मामलों में ज्यूरिस्टिक पर्सन माना गया है। अदालत ने इसी स्थापित कानूनी सिद्धांत को नदी की धार्मिक पहचान के साथ जोड़ा। लेकिन, यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी है। अदालत ने यह नहीं कहा कि हर नदी अपने आप कानूनी व्यक्ति है। कोर्ट ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया है कि ताम्रपर्णी को कानूनी व्यक्ति का दर्जा इसलिए मिला, क्योंकि उसे देवी के रूप में पूजा जाता है। और यह व्यक्तित्व भी केवल एक सीमित अधिकार, यानी प्रदूषण से मुक्त रहने के अधिकार तक सीमित है।
ताम्रपर्णी नदी को कानूनी व्यक्ति घोषित करने को एक महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है। हालांकि नदी को प्रदूषण मुक्त करने के लिए यह अपने आप में पर्याप्त नहीं है। क्योंकि, कानूनी व्यक्तित्व अपने आप सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं बनाता, न नदी में पानी का प्राकृतिक प्रवाह सुनिश्चित करता है और न ही प्रदूषणकारी गतिविधियों को अपने आप रोक देता है। इसके लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति, वैज्ञानिक निगरानी, पर्याप्त बजट और स्थानीय समुदाय की भागीदारी जरूरी है।
लेकिन इस फैसले का महत्व कम भी नहीं है। क्योंकि, यह नदी को केवल ‘जल संसाधन’ मानने के दृष्टिकोण के बजाय उसे एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखने का नज़रिया पेश करता है। ताम्रपर्णी के लिए फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है कि इसमें कानून, आस्था और पारिस्थितिकी तीनों को एक साथ जोड़ा गया है। नदी को देवी मानने वाली परंपरा को नदी को प्रदूषित करने की छूट के बजाय उसकी रक्षा की जिम्मेदारी में बदला गया है। सबसे बड़ा संभावित बदलाव प्रदूषण को केवल पर्यावरणीय उल्लंघन के बजाय नदी के अधिकार के उल्लंघन के रूप में देखने का है। अदालत ने पहले से मौजूद पर्यावरण कानूनों, संविधान के अनुच्छेद 21 और नागरिकों के पर्यावरण संरक्षण के मौलिक कर्तव्य को इस नई अवधारणा से जोड़ा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके निर्देश continuing mandamus की तरह लागू रहेंगे। यानी मामला एक बार आदेश देकर खत्म नहीं हो जाता, बल्कि अदालत जरूरत पड़ने पर आगे भी निगरानी और निर्देश दे सकती है।
भारत में नदी को कानूनी व्यक्ति मानने की सबसे चर्चित शुरुआत 2017 में उत्तराखंड हाई कोर्ट के फैसले से हुई थी। 20 मार्च 2017 को मोहम्मद सलीम बनाम उत्तराखंड राज्य मामले में हाई कोर्ट ने गंगा और यमुना तथा उनकी सहायक नदियों, धाराओं और प्राकृतिक जलप्रवाहों को living entities/juristic persons घोषित किया था।
इसके कुछ ही दिन बाद उत्तराखंड हाई कोर्ट ने दूसरे मामले में ग्लेशियरों, नदियों, झरनों, झीलों, आर्द्रभूमियों, जंगलों आदि को भी कानूनी इकाई का दर्जा देने का आदेश दिया था।
लेकिन इन फैसलों की एक बड़ी कानूनी सीमा है। सुप्रीम कोर्ट ने 7 जुलाई 2017 को गंगा-यमुना संबंधी उत्तराखंड हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी। इसलिए उन्हें भारत में आज लागू, अंतिम और निर्विवाद कानूनी मिसाल के रूप में देखना सही नहीं होगा।
इस लिहाज से ताम्रपर्णी का मामला अलग है। मद्रास हाई कोर्ट ने उत्तराखंड के फैसले का हवाला देते हुए उससे अपनी दूरी भी स्पष्ट की और कहा कि ताम्रपर्णी को नदी होने मात्र के कारण नहीं, बल्कि पूजित देवी होने के कारण कानूनी व्यक्तित्व दिया जा रहा है। साथ ही अधिकार को सिर्फ प्रदूषण से मुक्त रहने तक सीमित किया गया है।
इस फैसले की सबसे बड़ी चुनौती या असली परीक्षा नदी में सीवेज रोकने की होगी। ताम्रपर्णी के प्रदूषण को खत्म करने के लिए घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरा और नदी के जलग्रहण क्षेत्र पर मानवीय दबाव को भी नियंत्रित करना होगा। अदालत ने अपने फैसले में जल प्रदूषण निवारण अधिनियम, 1974 की धारा 24 का उल्लेख किया है, जो जलधाराओं में प्रदूषक पदार्थ डालने पर रोक लगाती है। इसलिए ‘कानूनी व्यक्ति’ का दर्जा मौजूदा पर्यावरणीय कानूनों का विकल्प नहीं है। बल्कि यह उनके प्रवर्तन को एक अतिरिक्त नैतिक और संवैधानिक आधार देता है। हालांकि, ताम्रपर्णी के लिए पहले से ही सीवेज ट्रीटमेंट की व्यवस्था मौजूद है। केंद्र सरकार के अनुसार तिरुनेलवेली में नदी प्रदूषण कम करने के लिए 24.20 एमएलडी क्षमता का एसटीपी स्थापित किया गया था। लेकिन, नदी को वास्तव में स्वस्थ बनाने के लिए केवल एक एसटीपी पर्याप्त नहीं। पूरे नदी तंत्र में सीवेज नेटवर्क, उपचार क्षमता, औद्योगिक अपशिष्ट, ठोस कचरा, घाट प्रबंधन और नदी तट के अतिक्रमण पर एक साथ काम करना होगा। हाईकोर्ट का यह फैसला इन चीजों में मददगार साबित हो सता है।
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