लखनऊ और बाराबंकी में बहने वाली गोमती की सहायक नदी रेठ प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण सिमट कर नाले जैसी हो गई है।
फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल
लखनऊ से जुड़े पानी के मुद्दों की बात होती है, तो गोमती और कुकरैल नदी का जिक्र जरूर होता है। पर लखनऊ में इन दो नदियों के अलावा भी कई छोटी नदियां बहती हैं। इनमें सई, बेहटा, नगवा, अकराडी, कड़ू और रेठ या रेथ जैसी नदियां भी शामिल हैं, जिनमें से ज़्यादातर गोमती की ही सहायक नदियां हैं। यानी यह अपने उद्गम स्थल से निकल कर कुछ किलोमीटर तक स्वतंत्र रूप से बहने के बाद गोमती में मिल जाती हैं, जो स्वयं गाज़ीपुर जिले के पास गंगा में मिलती है।
इस लेख में हम आपको रैठ या रेथ नदी के बारे में बताने जा रहे हैं, जो हालात की मार से आज लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी है। लखनऊ शहर के निकट से होकर गुजरने वाली रेठ नदी की कहानी इतिहास के पन्नों में समाने वाली है। यह कहना इसलिए गलत नहीं लगता, क्योंकि अस्तित्व के खतरे से जूझ रही इस छोटी सी नदी को बचाने की कोई ठोस कार्ययोजना सरकार के पास नहीं दिखाई देती।
रेठ नदी का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यह शहरी व औद्योगिक इलाकों से होकर गुजरती है। इस कारण इन इलाकों के लोगों के निजी स्वार्थ इसके दुश्मन बन गए हैं। जैसे-जैसे राजधानी लखनऊ की आबादी बाराबंकी की ओर बढ़ रही है वैसे-वैसे रेठ नदी की रेखा मिटती और सिमटती जा रही है।
रेठ नदी का प्राकृतिक स्वरूप सबसे अधिक शहरी विस्तार और अवैध अतिक्रमण की वजह से प्रभावित हुआ है। पिछले दो-तीन दशकों में शहर का विस्तार जिस तेजी से हुआ, उसकी सबसे बड़ी कीमत इस नदी को चुकानी पड़ी।
शहर के निकट ओबरी में एक प्रतिष्ठान का बड़ा हिस्सा नदी की भूमि पर बना हुआ है। आलापुर के पास नदी की स्थिति किसी गंदे नाले से भी बदतर दिखाई देती है। एआरटीओ कार्यालय के पीछे नदी की जमीन पर अवैध प्लॉटिंग हो चुकी है, जबकि ग्राम पंचायत बड़ेल क्षेत्र में नदी की तलहटी तक निर्माण और प्लॉटिंग कर दी गई है। इससे कई स्थानों पर नदी की चौड़ाई लगातार कम होती जा रही है और जल प्रवाह बाधित हो रहा है।
बरसात के दौरान पानी के फैलाव की प्राकृतिक जगह भी सिकुड़ गई है, जिससे जलभराव और कटाव जैसी समस्याएं बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि छेदानगर से सतरिख तक नदी का स्वरूप अभी अपेक्षाकृत चौड़ा दिखाई देता है, लेकिन यदि अतिक्रमण की यही रफ्तार जारी रही तो आने वाले वर्षों में यह हिस्सा भी अपनी पहचान खो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी की राजस्व सीमा का पुन: निर्धारण कर अतिक्रमण हटाना और फ्लडप्लेन को संरक्षित करना अब बेहद जरूरी हो गया है।
रेठ नदी के प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण शहर और आसपास के क्षेत्रों का अनुपचारित गंदा पानी है। जगनेहटा के पास जमुरिया नाले का दूषित जल सीधे नदी में गिरता है, जिससे पानी की गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। इसके अलावा कुर्सी क्षेत्र के निकट संचालित पशु वधशाला का अपशिष्ट भी नदी में पहुंचने की शिकायतें लंबे समय से होती रही हैं। घरेलू सीवेज, ठोस कचरा और जैविक अपशिष्ट मिलकर नदी के पानी में दुर्गंध, गाद और प्रदूषण बढ़ा रहे हैं। इसका असर केवल नदी तक सीमित नहीं है, बल्कि किनारे बसे गांवों के भूजल और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ता है।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि जहां-जहां नालों का पानी नदी में मिलता है, वहां छोटे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) या विकेंद्रीकृत अपशिष्ट जल उपचार प्रणाली स्थापित की जाए। इसके साथ ही नालों में ठोस कचरा जाने से रोकने और नियमित जल गुणवत्ता निगरानी की व्यवस्था भी जरूरी है। यदि इन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए तो रेठ नदी का पानी दोबारा सिंचाई, भूजल पुनर्भरण और अन्य स्थानीय उपयोगों के लिए काफी हद तक उपयोगी बनाया जा सकता है।
जिस तरह किसी भाषा को बोलियां समृद्ध बनाती हैं, उसी तरह बड़ी नदी को अपनी सहायक नदियों से ताकत मिलती है। गोमती भी ऐसी नदी है जिसे सई, कठिना और सरायन के साथ अपेक्षाकृत छोटी कुकरैल, बेहटा और रैथ सरीखी नदियों से संजीवनी मिलती है। ज़ाहिर सी बात है गोमती के लिए इन नदियों का अस्तित्व बना रहना भी अनिवार्य है। इसके लिए व्यापक कार्य योजना बनाकर काम किये जाने की आवश्यकता है। साथ ही अतिक्रमण और प्रदूषण की मार से बचाने उपायों पर भी ध्यान देना होगा।सुशील सीतापुरी, संयोजक, 'मैं गोमती हूं' अभियान
सरकारी तंत्र ने रेठ नदी को शायद अब पूरी तरह से एक नाला ही मान लिया है। लखनऊ-महमूदाबाद रोड पर कुर्सी के निकट औद्योगिक इलाके में रेठ नदी को करीब एक किलोमीटर की लंबाई में पक्के नाले में न सिर्फ तब्दील कर दिया गया, बल्कि ऊपर स्लैब से ढक भी दिया गया। इससे न सिर्फ रेठ नदी के जीव-जन्तु विलुप्त हो गए बल्कि पशुओं को पीने लायक पानी भी नसीब नहीं हो रहा। बैना टिकरहार, चिलहेटी, उमरा, अमरसंडा, सतरखि क्षेत्र और नगर पालिका परिषद नवाबगंज में नदी पर अतिक्रमण है।
कूड़ा-कचरा भरा होने के कारण बरसात होने पर पानी की निकासी नहीं हो पाती। ऐसे में इलाके में जलभराव की स्थिति पैदा हो जाती है और लोग उल्टे इस नदी को ही कोसते हैं, जबकि उनके ही डाले कूड़े से नदी का बहाव अवरुद्ध हुआ है।
विशेषज्ञों ने नदी के स्वरूप को नष्ट कर नाले में परिवर्तित किए जाने को गलत बताया है, इसके बावजूद इस गलती को सुधारने की कोई कार्यवाही आज तक नहीं हुई है। कई बार जिला स्तर पर हुए सर्वेक्षणों में नदी के किनारे सरकारी जमीन पर कब्जे की पुष्टि भी हो चुकी है, पर कब्जा हटवाने की कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। एकाध बार केवल औपचारिकता निभाई गई, जिससे स्थिति जस की तस बनी हुई है।
लुप्त होती रेठ नदी को पुनर्जीवित करने का मुद्दा कई बार उठने के बावजूद आज तक इस दिशा में कोई ठोस कार्यवाही नहीं हुई है।
रेठ नदी का शहर के निकट बहने वाला हिस्सा प्राकृतिक सौंदर्य और हरित क्षेत्र विकसित करने की दृष्टि से काफी संभावनाएं रखता है। यदि अतिक्रमण हटाकर दोनों किनारों का वैज्ञानिक तरीके से विकास किया जाए तो इसे एक आकर्षक रिवर फ्रंट या पिकनिक स्पॉट के रूप में विकसित किया जा सकता है। नदी किनारे पैदल पथ, साइकिल ट्रैक, बैठने की व्यवस्था, खुले हरित क्षेत्र, बच्चों के लिए पार्क, स्थानीय प्रजातियों का पौधारोपण और पक्षी अवलोकन जैसे आकर्षण विकसित किए जा सकते हैं। इससे न केवल शहरवासियों को एक नया सार्वजनिक मनोरंजन स्थल मिलेगा, बल्कि नदी संरक्षण के प्रति लोगों की भागीदारी भी बढ़ेगी।
देश के कई शहरों में छोटी नदियों और जलधाराओं के पुनर्जीवन के बाद ऐसे सार्वजनिक स्थल विकसित किए गए हैं, जिससे स्थानीय पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिला है। यदि रेठ नदी के साथ भी इसी दृष्टिकोण से कार्य किया जाए तो यह बाराबंकी की पहचान बनने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण का एक सफल उदाहरण भी बन सकती है।
रेठ नदी के संरक्षण और इसके मूल स्वरूप को बहाल करने की मांग कोई नई नहीं है। सामाजिक संगठनों, पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय नागरिकों द्वारा समय-समय पर प्रशासन का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाता रहा है। पूर्व में तैनात रहे जिलाधिकारी विकास गोठलवाल, मिनिस्ती एस, योगेश्वर राम मिश्र, अजय यादव और डॉ. रोशन जैकब के कार्यकाल में भी नदी को पक्का नाला बनाए जाने, अतिक्रमण हटाने और इसके पुनर्जीवन का मुद्दा कई बार उठा। अधिकारियों ने निरीक्षण करने, राजस्व अभिलेखों का परीक्षण कराने और नदी का स्वरूप बहाल करने जैसी बातें भी कहीं, लेकिन धरातल पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो सकी। न तो व्यापक स्तर पर अतिक्रमण हटाया गया और न ही प्रदूषण रोकने के लिए कोई स्थायी व्यवस्था बन सकी।
करीब दो साल पहले जनवरी 2024 में रेठ नदी को पहले चरण में 50 मीटर के दायरे में अतिक्रमण को ध्वस्त करके नदी को अतिक्रमणमुक्त करवाने को लेकर बैठक हुई थी। इसमें पहले चरण में 14 निर्माण ध्वस्त करने की बात कही गई थी। सारी कवायदों के बावजूद आजतक अतिक्रमण नहीं हट सका है। नतीजा यह है कि वर्षों बाद भी रेठ नदी उन्हीं समस्याओं से जूझ रही है।
स्थानीय लोगों का मानना है कि केवल बैठकों और घोषणाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि समयबद्ध कार्ययोजना, विभिन्न विभागों के समन्वय और लगातार निगरानी के साथ ठोस कार्रवाई करनी होगी, तभी इस नदी का अस्तित्व बचाया जा सकेगा।
रेथ नदी और इसके तट पर 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों से युद्ध करने वाले चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह के इतिहास को बहराइच के किसान स्नातकोत्तर महाविद्यालय के एमए के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इससे मध्यकालीन इतिहास विषय का अध्ययन करने वाले एमए के छात्र-छात्राएं अब इस नदी की ऐतिहासिकता और महत्व के बारे में जान सकेंगे।
इतिहासकारों क मुताबिक रेठ नदी के किनारे हुए युद्ध में चहलारी नरेश के शौर्य और बलिदान को 168 वर्ष बाद भी याद किया जाता है। ओबरी गांव के पास 13 जून 1858 को अंग्रेजों के विरुद्ध अवध की सेना का नेतृत्व करते हुए बलभद्र सिंह ने अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए थे। सीमित संसाधनों और छोटी सी सेना के कारण चहलारी नरेश ने रेठ नदी के तट पर नवाबगंज (बाराबंकी) में ओबरी के युद्ध में वीर गति को प्राप्त हुए थे।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें