नदी और तालाब

नदियां सिर्फ पानी की धारा नहीं, जीवन की पूरी व्यवस्था हैं

नदियां जंगल, मिट्टी, भूजल, खेत, जैव विविधता और स्थानीय आजीविका को जोड़ने वाला पूरा पारिस्थितिकी तंत्र हैं, इसलिए उनका सूखना या प्रदूषित होना सिर्फ पानी की कमी नहीं, हमारी खाद्य सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और जीवन व्यवस्था पर सीधा खतरा है।

Author : सयाली पराते

नदी को देखते हुए अक्सर हमारे मन में बहते हुए पानी की एक तस्वीर बनती है। लेकिन नदी सिर्फ पानी की एक धारा नहीं है। उसके साथ जंगल, मिट्टी, भूजल, तालाब, आर्द्रभूमि, खेत, मछलियां, पक्षी और नदी पर निर्भर लोगों की आजीविका सभी मिलकर एक नदी तंत्र बनाते है।

यही वजह है कि किसी नदी का सूखना या प्रदूषित होना केवल पानी की कमी या जल गुणवत्ता की समस्या नहीं है, बल्कि इसका असर खेती, जैव विविधता, भूजल, भोजन और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक पहुंचता है।

इसी महत्व को समझने और नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए हर साल सितंबर के चौथे रविवार को विश्व नदी दिवस (World Rivers Day) मनाया जाता है। वर्ष 2026 में विश्व नदी दिवस 27 सितंबर यानी आज मनाया जाएगा। 

एक रिपोर्ट के अनुसार 100 से अधिक देशों में लोग इस दिवस से जुड़े कार्यक्रमों में भाग लेते हैं। इसका उद्देश्य नदियों के अनेक मूल्यों को सामने लाना, उनके प्रति जन-जागरूकता बढ़ाना और उनके बेहतर संरक्षण को प्रोत्साहित करना है। लेकिन सवाल यह है कि आज नदियों को इस तरह याद करने की जरूरत क्यों पड़ रही है?

नदी सिर्फ पानी नहीं, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र है

किसी नदी को समझने के लिए सिर्फ उसके मुख्य प्रवाह को देखना पर्याप्त नहीं है। नदी जहां से निकलती है, वहां के जंगल और पहाड़, रास्ते में मिलने वाली छोटी धाराएं और सहायक नदियां, नदी के किनारे की मिट्टी, आर्द्रभूमियां और अंत में समुद्र में वह मिलती है, ये सभी उसके तंत्र का हिस्सा है।

संयुक्त राष्ट्र भी नदियों, झीलों, आर्द्रभूमियों और भूजल जैसे जल-संबंधी पारिस्थितिकी तंत्र को जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और आजीविका के लिए महत्वपूर्ण मानता है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य-6 के तहत जल से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्रों, जिनमें नदियां, आर्द्रभूमि, झीलें, जलभृत और पर्वतीय क्षेत्र के संरक्षण और पुनर्स्थापन को महत्व दिया गया है। 

इसका अर्थ है कि नदी को बचाने का मतलब केवल नदी के पानी को साफ करना नहीं है। बल्कि नदी के आसपास के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को स्वस्थ रखना भी उतना ही जरूरी है।

नदियां खेती और भोजन से जुड़ी हैं

भारत में नदियों का रिश्ता खेती से बहुत पुराना है। नदी घाटियों में विकसित हुई कृषि व्यवस्था ने हजारों वर्षों से मानव बस्तियों को पानी और उपजाऊ मिट्टी उपलब्ध कराई है। नदी का पानी सीधे सिंचाई में इस्तेमाल होता है, लेकिन उसका महत्व यहीं समाप्त नहीं होता। 

नदी और उसके आसपास के जल निकाय भूजल तंत्र से भी जुड़े होते है। जब बारिश होती है तो पानी का कुछ हिस्सा जमीन में जाता है और भूजल को रिचार्ज करता है। नदी, जलग्रहण क्षेत्र, मिट्टी और भूजल के बीच यह संबंध किसी क्षेत्र की जल सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

किसी नदी में पानी कम होने या उसके आसपास के जलग्रहण क्षेत्र के खराब होने का असर किसानों पर भी पड़ सकता है। लंबे समय में यह सिंचाई की उपलब्धता, फसल उत्पादन और ग्रामीण आजीविका को प्रभावित कर सकता है।

जब नदी में प्रदूषण दिखाई नहीं देता

नदी प्रदूषण की तस्वीर अक्सर प्लास्टिक, बोतलों और नदी किनारे जमा कचरे से बनाई जाती है। लेकिन नदी में जाने वाला प्रदूषण हमेशा दिखाई नहीं देता। शहरी सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाले प्रदूषक और अन्य मानव गतिविधियां नदी की जल गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि नदी की वास्तविक स्थिति जानने के लिए केवल आंखों से देखना पर्याप्त नहीं है। इसके लिए नियमित जल गुणवत्ता निगरानी और वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी है।

भारत में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) नदियों की जल गुणवत्ता की निगरानी करता है। CPCB की 2025 में प्रकाशित रिपोर्ट में 271 नदियों में 296 प्रदूषित नदी खंड चिन्हित किए गए। रिपोर्ट में जैव रासायनिक ऑक्सीजन मांग (BOD) के आधार पर प्रदूषित नदी खंडों को अलग-अलग प्राथमिकता श्रेणियों में रखा गया है।  यह आंकड़ा केवल प्रदूषण की समस्या को दिखाने के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है कि नदी संरक्षण में वैज्ञानिक निगरानी की भूमिका कितनी जरूरी है।

रिपोर्ट में 2018 में चिन्हित नदी खंडों की तुलना में सुधार और कुछ नए प्रदूषित खंडों की जानकारी भी दी गई है। यानी किसी नदी की स्थिति स्थिर नहीं होती। उसमें सुधार भी हो सकता है और कुछ स्थानों पर स्थिति खराब भी हो सकती है। इसलिए नदी संरक्षण एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। 

क्या सीवेज का सवाल नदी से बाहर है ?

किसी शहर में नदी साफ करने की योजना बनाई जाती है तो सबसे महत्वपूर्ण सवाल सीवेज का है, सीवेज आखिर जा कहां रहा है? यदि नदी में गिरने वाले नालों में पर्याप्त रूप से सीवेज पहुंचता रहेगा, तो नदी के किनारे से कचरा हटाने मात्र से उसकी जल गुणवत्ता में स्थायी सुधार नहीं हो सकता।

इसलिए नदी संरक्षण में सीवेज ट्रीटमेंट, औद्योगिक अपशिष्ट नियंत्रण, नालों की निगरानी और प्रदूषण के स्रोत पर नियंत्रण महत्वपूर्ण हैं। संयुक्त राष्ट्र लंबे समय से जल संसाधनों के एकीकृत प्रबंधन पर जोर देता रहा है। उसके अनुसार मीठे पानी के संसाधनों को जलग्रहण क्षेत्र, भूमि उपयोग, जैव विविधता और मानव जरूरतों के साथ जोड़कर देखना जरूरी है। यानी नदी की सफाई नदी के भीतर से शुरू होकर शहर, गांव और पूरे जलग्रहण क्षेत्र तक जाती है।

नदी और जैव विविधता का गहरा संबंध

नदी अपने भीतर और अपने किनारों पर अनेक जीवों को जीवन देती है। मछलियां, कछुए, उभयचर, जलीय पौधे, पक्षी और नदी किनारे पाए जाने वाले दूसरे जीव नदी तंत्र पर निर्भर होते हैं। कई पक्षियों के लिए नदी और उसके आसपास की आर्द्रभूमियां भोजन और प्रजनन स्थल होती हैं। मछलियों के लिए नदी का प्रवाह, पानी का तापमान, ऑक्सीजन और नदी तल की स्थिति महत्वपूर्ण होती है।

जब नदी का प्रवाह बदलता है, नदी किनारे के आवास नष्ट होते हैं या पानी प्रदूषित होता है तो इसका असर केवल पानी पर नहीं पड़ता। इससे नदी पर निर्भर जीवों की पूरी श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।

संयुक्त राष्ट्र की 2025 की SDG रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक स्तर पर मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्रों पर लगातार दबाव है। रिपोर्ट बताती है कि 1970 के बाद से मीठे पानी की प्रजातियों की आबादी में बड़ी गिरावट दर्ज की गई है और लगभग एक-चौथाई मीठे पानी की मछली प्रजातियां विलुप्ति के जोखिम में हैं। इसलिए नदी बचाने का अर्थ नदी में रहने वाले जीवों को बचाना भी है।

नदी और जलवायु परिवर्तन

जलवायु परिवर्तन ने नदियों के सामने एक और चुनौती खड़ी की है। बारिश के पैटर्न में बदलाव, अत्यधिक बारिश, लंबे सूखे और तापमान में वृद्धि नदी के प्रवाह और जल उपलब्धता को प्रभावित कर सकते हैं। कहीं बहुत कम बारिश होने पर नदी का प्रवाह घट सकता है, तो कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश होने से बाढ़ की स्थिति पैदा हो सकती है। दोनों ही परिस्थितियां नदी और उस पर निर्भर समुदायों के लिए चुनौती पैदा करती है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जल, जलवायु, जैव विविधता, भूमि और आपदा जोखिम एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। हालिया संयुक्त राष्ट्र चर्चा में भी स्रोत से समुद्र तक जल के प्रवाह और मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्रों के संरक्षण को जलवायु और आपदा-लचीलापन से जोड़कर देखने पर जोर दिया गया है। यानी नदी संरक्षण को जलवायु परिवर्तन से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

नदी का पानी और भूजल अलग-अलग नहीं

कई बार नदी और भूजल को दो अलग-अलग संसाधनों की तरह देखा जाता है। लेकिन वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। कई नदी प्रणालियों में सतही जल और भूजल के बीच लगातार आदान-प्रदान होता रहता है।

किसी क्षेत्र में अत्यधिक भूजल दोहन, कम बारिश, नदी के प्रवाह में बदलाव और भूमि उपयोग में परिवर्तन एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। इसीलिए नदी संरक्षण के लिए सतही जल और भूजल दोनों को एक साथ समझना जरूरी है।

यदि किसी क्षेत्र में नदी का प्रवाह घट रहा है लेकिन दूसरी ओर भूजल का लगातार दोहन बढ़ रहा है, तो केवल नदी में पानी बढ़ाने की कोशिश पर्याप्त नहीं होगी। जलग्रहण क्षेत्र, वर्षाजल संचयन, भूजल पुनर्भरण और पानी की मांग को भी योजना का हिस्सा बनाना होगा।

नदी के किनारे का क्षेत्र भी उतना ही महत्वपूर्ण

नदी के किनारे की जमीन को अक्सर खाली या विकास के लिए उपलब्ध भूमि के रूप में देखा जाता है। लेकिन नदी का किनारा अपने आप में एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी क्षेत्र हो सकता है।

बाढ़ के समय नदी को फैलने के लिए जगह चाहिए। आर्द्रभूमियां और बाढ़ मैदान पानी को रोकने और धीरे-धीरे छोड़ने में भूमिका निभा सकते है। नदी किनारे की वनस्पति मिट्टी के कटाव को कम करने और कई जीवों को आवास देने में मदद करती है।

इसलिए नदी संरक्षण में नदी के किनारे के क्षेत्र, बाढ़ मैदान और आर्द्रभूमियों को भी शामिल करना जरूरी है। संयुक्त राष्ट्र ने भी जल से जुड़े पारिस्थितिकी तंत्रों को बाढ़ और सूखे जैसे जोखिमों को कम करने तथा जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण बताया है। 

नदी बचाने का मतलब सिर्फ सफाई अभियान नहीं

नदी दिवस पर कई जगह सफाई अभियान आयोजित किए जाते हैं। ऐसे अभियान जागरूकता पैदा करने के लिए उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन नदी संरक्षण को केवल सफाई अभियान तक सीमित करना पर्याप्त नहीं है। एक नदी को स्वस्थ रखने के लिए कई स्तरों पर काम करना पड़ता है -

  • नदी में जाने वाले सीवेज को रोकना

  • औद्योगिक अपशिष्ट की निगरानी करना

  • नदी के प्राकृतिक प्रवाह को समझना

  • बाढ़ मैदान और आर्द्रभूमियों की रक्षा करना

  • जलग्रहण क्षेत्र में मिट्टी और पानी का संरक्षण करना

  • भूजल के अत्यधिक दोहन को नियंत्रित करना

  • नदी किनारे की जैव विविधता को बचाना

  • स्थानीय समुदायों को नदी प्रबंधन में शामिल करना

  • नियमित जल गुणवत्ता निगरानी करना

  • जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को नदी प्रबंधन में शामिल करना

नदी को बचाने का सबसे महत्वपूर्ण तरीका शायद यही है कि नदी को एक अलग संसाधन के रूप में नहीं, बल्कि पूरे जल चक्र के हिस्से के रूप में देखा जाए।

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