फ़ोटो - विकिकॉमंस
GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का अर्थ है ग्लेशियल झील के अचानक फटने या उसमें जमा पानी के प्राकृतिक बांध को तोड़कर तेजी से नीचे की ओर बह निकलने से आने वाली बाढ़ है। यह घटना हिमालय जैसे ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में एक गंभीर प्राकृतिक आपदा बन सकती है।
ग्लेशियर यानी हिमनद के पिघलने से निकलने वाला पानी जब ग्लेशियर के आसपास या उसके सामने जमा होता है, तो वहां ग्लेशियल झील बन जाती है। ऐसी झीलों को अक्सर बर्फ या ग्लेशियर से आई चट्टानों और मलबे से बनी मोरैन (Moraine) बांध रोककर रखती है। ग्लेशियरों में होने वाली भौतिक गतिविधियों के कारण इन झीलों का आकार छोटा बड़ा होता रहता है।
जब ग्लेशियल झील को रोकने वाला प्राकृतिक बांध कमजोर या क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो झील का पानी अचानक बाहर निकल आता है। इसके कई कारण हो सकते है -
ग्लेशियर या चट्टान का झील में गिरना
हिमस्खलन (Avalanche)
भारी बारिश या अचानक बड़ी मात्रा में पानी का झील में पहुंचना
बदल फटने से अचानक बारिश
भूकंप
मोरैन बांध का कटाव या उसके भीतर मौजूद बर्फ का पिघलना
झील के जलस्तर में तेजी से वृद्धि
ऐसी स्थिति में पानी के साथ बर्फ, चट्टानें और मलबा भी तेज गति से नीचे की ओर आता है।
GLOF की सबसे बड़ी समस्या यह है की ये अचानक आती है और लोगों को संभलने या सुरक्षित स्थान तक जाने का समय भी नहीं मिल पाता है। ऊंचाई वाले इलाकों से निकलने वाला पानी संकरी घाटियों में तेज गति से नीचे आता है और रास्ते में पुलों, सड़कों, बिजली परियोजनाओं, घरों तथा अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है।
भारत में हिमालयी क्षेत्र में GLOF के खतरे को देखते हुए ग्लेशियल झीलों की निगरानी और जोखिम आकलन निरंतर किया जाता है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) ग्लेशियल झीलों और हिमालय पर स्थित जल निकायों की निगरानी करता है, जबकि उपग्रह आधारित तकनीक से झीलों के आकार में होने वाले बदलावों का अध्ययन किया जाता है।
तापमान बढ़ने के कारण कई हिमालयी ग्लेशियर तेज़ी से पिघल रहे हैं। इससे आने वाले समय में नई ग्लेशियल झीलें बन सकती हैं और पहले से मौजूद झीलों का विस्तार हो सकता है। ISRO के अनुसार, 1984 से 2023 के बीच भारतीय हिमालयी नदी घाटियों में अध्ययन की गई बड़ी ग्लेशियल झीलों में कई झीलों के क्षेत्रफल में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।
हालांकि, हर ग्लेशियल झील GLOF का कारण नहीं बनती। किसी झील का जोखिम उसके आकार, जलस्तर, प्राकृतिक बांध की मजबूती, आसपास के ग्लेशियर और ढलानों तथा संभावित ट्रिगर घटनाओं जैसे कारकों पर निर्भर करता है।
4 अक्टूबर 2023 को सिक्किम की साउथ लोनक (South Lhonak) ग्लेशियल झील से जुड़ी GLOF घटना ने इस खतरे को गंभीरता से सामने रखा। इस घटना से तीस्ता नदी घाटी में व्यापक बाढ़ आई और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुँचा।
इसके बाद भारत में उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की निगरानी, जोखिम आकलन और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों पर और जोर दिया गया है। 2026 में C-DAC ने हिमाचल प्रदेश के सिस्सू में GLOF Early Warning System का एक प्रूफ-ऑफ-कॉन्सेप्ट भी संचालित किया, जिसमें झील के जलस्तर, मौसम और झील की स्थिति की रियल-टाइम निगरानी शामिल है।
GLOF का खतरा पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है, लेकिन नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। इसके लिए -
उपग्रहों और ड्रोन से ग्लेशियल झीलों की नियमित निगरानी
झील के जलस्तर और प्राकृतिक बांध की स्थिति की निगरानी
उच्च जोखिम वाली झीलों में सेंसर और Early Warning System लगाना
संभावित बाढ़ के रास्तों का मानचित्रण
निचले क्षेत्रों में चेतावनी और निकासी योजना तैयार करना
स्थानीय प्रशासन और समुदायों को आपदा-प्रतिक्रिया का प्रशिक्षण देना
संवेदनशील पुलों, सड़कों और जलविद्युत परियोजनाओं की सुरक्षा बढ़ाना
भारत में GLOF के लिए Early Warning System में जलस्तर सेंसर, मौसम संबंधी उपकरण, सैटेलाइट संचार और बाढ़ के संभावित फैलाव का मॉडलिंग जैसे उपायों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
ग्लेशियल झीलें हिमालय के जल संसाधनों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन उनकी बदलती स्थिति को समझना और संभावित खतरों की समय रहते पहचान करना मानव जीवन तथा बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
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