भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अब मानसून का पूर्वानुमान ब्लॉक स्तर पर उपलब्ध कराएगा। इससे किसानों के लिए मौसम के मुताबिक खेती करना आसान हो जाएगा।

 

फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल

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मौसम विभाग अब जारी करेगा ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान, किसानों के लिए खेती की राह होगी आसान

शुरुआती दौर में 15 राज्यों के 3,196 ब्लॉकों को कवर करेगी AI आधारित नई वर्षा पूर्वानुमान प्रणाली, डेटा के गहन विश्‍लेषण से मिलेगी ज्‍़यादा सटीक जानकारी

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने अपनी मानसून पूर्वानुमान प्रणाली में एक बड़ा बदलाव किया है। इसके तहत अब पहली बार मानसून का पूर्वानुमान ब्लॉक स्तर तक उपलब्ध कराया जाएगा। शुरुआती चरण में नई प्रणाली 15 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के 3,196 ब्लॉकों को कवर करेगी। यह भारत के लगभग आधे ब्लॉकों के बराबर है। इसका सबसे ज्‍यादा फायदा देश के किसानों को मिलने की उम्‍मीद है, क्‍योंकि इन पूर्व सूचनाओं से उनकी खेती की राह आसान होगी।

ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान प्रणाली की दो मुख्‍य विशेषताएं 

  1. अबतक मौसम विभाग द्वारा मानसून के आने की जानकारी केवल राज्य या जिला स्तर तक ही दी जाती थी। लेकिन, भारत जैसे विशाल क्षेत्रफल वाले और मौसम में विविधता वाले देश में केवल जिला स्तर का पूर्वानुमान ज़मीनी स्‍तर पर कई बार पर्याप्त नहीं होता था। कई बार एक ही जिले में कुछ इलाकों में बारिश शुरू हो जाती थी, जबकि दूसरे हिस्से सूखे रह जाते थे। ऐसे में किसानों को बुवाई का सही समय तय करने में कठिनाई होती थी। 

  2. नई ब्लॉक-स्तरीय प्रणाली इसी समस्या को दूर करने के लिए शुरू की गई है। इसका उद्देश्य किसानों को उनके क्षेत्र के अनुसार अधिक सटीक जानकारी देना है, ताकि वे समय पर खेती से जुड़े निर्णय ले सकें।

क्यों जरूरी है ब्लॉक-स्तरीय पूर्वानुमान ?

भारत की भौगोलिक विविधताओं की वजह से मानसून के व्यवहार में अकसर बहुत अनियमितता देखने को मिलती है। जिला स्‍तरीय पूर्वानुमानों से आमतौर पर लोगों को केवल यह जानकारी मिल पाती है कि किसी शहर या जिले में मानसून कब पहुंचेगा, जैसे मुंबई में लगभग 10 जून और दिल्ली में 29 जून के आसपास। लेकिन, किसी जिले में मानसून पहुंचने का मतलब यह नहीं होता कि उस जिले के हर गांव और ब्लॉक में एक ही समय पर और बराबर वर्षा होगी। कई बार कुछ इलाकों में बारिश हो जाती है, जबकि आसपास के इलाके सूखे रहते हैं। इसके अलावा बारिश की मात्रा में भी अकसर काफी असमानता देखने को मिलती है। किसानों के लिए यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि भारत में आज भी ज्‍यादातर खेती बारिश पर ही निर्भर है और बुवाई का समय सीधे तौर पर बारिश पर निर्भर करता है। यदि किसान समय से पहले बुवाई कर दें और बारिश न हो, तो बीजों के सूख जाने से फसल को नुकसान हो सकता है। इसलिए स्थानीय स्तर का पूर्वानुमान खेती के लिए अधिक उपयोगी माना जा रहा है।  

नई प्रणाली कैसे काम करती है ?

नई ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान प्रणाली पारंपरिक मौसम भविष्यवाणी से कहीं अधिक उन्नत मानी जा रही है। अभी तक मौसम विभाग बड़े क्षेत्रों या जिलों के आधार पर अनुमान जारी करता था, लेकिन अब यह तकनीक छोटे-छोटे ब्लॉकों तक मौसम की स्थिति का विश्लेषण कर सकेगी। इससे स्थानीय स्तर पर बारिश की संभावना, मानसून की गति और उसके असर को समझना आसान होगा। खासतौर पर खेती पर निर्भर ग्रामीण इलाकों के लिए यह बदलाव बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

यह प्रणाली मुख्य रूप से दो आधुनिक मौसम पूर्वानुमान मॉडलों के संयोजन पर आधारित है। पहला मॉडल वैश्विक मौसम परिस्थितियों का अध्ययन करता है, जबकि दूसरा भारत के स्थानीय भौगोलिक और मौसमी पैटर्न का विश्लेषण करता है। इन दोनों मॉडलों से प्राप्त आंकड़ों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की मदद से एक साथ प्रोसेस किया जाता है, ताकि अधिक सटीक और क्षेत्र विशेष के अनुरूप पूर्वानुमान तैयार किया जा सके। सरल शब्दों में कहें तो यह तकनीक पुराने मौसम रिकॉर्ड और वर्तमान परिस्थितियों की तुलना करके मानसून की अगली चाल का अनुमान लगाती है।

100 साल के डेटा और एआई से तैयार होता है पूर्वानुमान

इस प्रणाली की एक बड़ी खासियत यह है कि इसमें लगभग 100 वर्षों के मौसम संबंधी आंकड़ों का उपयोग किया गया है। आईएमडी के ऐतिहासिक डेटा के आधार पर यह समझने की कोशिश की जाती है कि पहले किन परिस्थितियों में मानसून किस दिशा में बढ़ा था, कितनी बारिश हुई थी और किन इलाकों में देरी या कमी देखने को मिली थी। एआई इन्हीं पुराने पैटर्न्स को वर्तमान डेटा के साथ मिलाकर संभावित स्थिति का आकलन करती है।

मानसून केरल तट पर पहुंचने के बाद यह प्रणाली उसकी आगे की यात्रा पर लगातार नजर रखती है। इसके तहत हवा की गति, दिशा, समुद्री नमी, तापमान, वायुदाब और विभिन्न क्षेत्रों की भौगोलिक स्थितियों का विश्लेषण किया जाता है। हाई-रिजॉल्यूशन सिम्युलेशन मॉडल के जरिये अगले चार सप्ताह तक का संभावित पूर्वानुमान जारी किया जाता है। यानी किसानों और प्रशासन को पहले से यह संकेत मिल सकेगा कि किस क्षेत्र में बारिश सामान्य रहने वाली है, कहां भारी वर्षा हो सकती है और किन इलाकों में कम बारिश की आशंका है।

इस तकनीक को पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान Indian Institute of Tropical Meteorology ने विकसित किया है। वैज्ञानिकों का मानना है कि स्थानीय स्तर तक पहुंचने वाले ऐसे पूर्वानुमान खेती, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकते हैं।


बिहार में तालाबों में की जाने वाले मखाने की खेती में भी बारिश के पानी की महत्‍वपूर्ण भूमिका होती है, क्‍योंकि बारिश होने से तालाबों के जलस्‍तर में बढ़ोतरी होती है।

किसानों की जरूरत को ध्यान में रख तैयार की गई है नई प्रणाली

नई ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान प्रणाली को कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है। दरअसल, देश में बड़ी संख्या में किसान अब भी मानसून आधारित खेती पर निर्भर हैं। बारिश के समय, मात्रा और वितरण में थोड़ा सा बदलाव भी बुवाई, सिंचाई और फसल उत्पादन पर सीधा असर डालता है। इसी वजह से कृषि मंत्रालय लंबे समय से ऐसी प्रणाली की मांग कर रहा था, जो किसानों को स्थानीय स्तर पर अधिक सटीक मौसम जानकारी उपलब्ध करा सके।

कृषि मंत्रालय पहले से किसानों को साप्ताहिक मौसम आधारित सलाह जारी करता है, जिसमें बुवाई, सिंचाई, उर्वरक उपयोग और फसल सुरक्षा से जुड़े सुझाव दिए जाते हैं। नई प्रणाली को उसी मौजूदा ढांचे के अनुरूप तैयार किया गया है, ताकि किसानों तक जानकारी पहुंचाने में अतिरिक्त बदलाव या नई व्यवस्था की जरूरत न पड़े। मौसम विभाग ने कोशिश की है कि ब्लॉक-स्तरीय पूर्वानुमान सीधे कृषि सलाह सेवाओं से जुड़ जाएं। इससे किसानों को यह समझने में आसानी होगी कि आने वाले दिनों में बारिश की स्थिति कैसी रह सकती है और उन्हें खेती से जुड़े कौन-कौन से फैसले लेने चाहिए।

उत्तर प्रदेश में शुरू हुआ सूक्ष्म स्तर का मौसम मॉडल
नई पूर्वानुमान प्रणाली के तहत मौसम विभाग ने उत्‍तर प्रदेश के लिए अलग से एक 10-दिवसीय उच्च-रिजॉल्यूशन मानसून पूर्वानुमान मॉडल भी शुरू किया है। यह मॉडल लगभग 1 किलोमीटर के स्तर तक मौसम की जानकारी देने में सक्षम बताया जा रहा है। यानी अब एक ही जिले के अलग-अलग इलाकों में बारिश और मौसम की स्थिति का अलग-अलग अनुमान लगाया जा सकेगा। इतनी सूक्ष्म स्तर की भविष्यवाणी भारत में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली के लिए बड़ा तकनीकी बदलाव मानी जा रही है। यह संभव हो पाया है राज्यभर में स्थापित बड़ी संख्या में स्वचालित मौसम स्टेशनों की वजह से। ये स्टेशन लगातार तापमान, आर्द्रता, हवा की दिशा, वर्षा और वायुदाब जैसी जानकारियां रिकॉर्ड करते हैं। इन आंकड़ों की मदद से ‘मिथुन’ नामक मौसम मॉडल को अधिक सटीक बनाया गया है। मौसम विभाग का मानना है कि यदि अन्य राज्य भी अपने स्थानीय मौसम स्टेशनों का डेटा साझा करें, तो इसी तरह की उच्च-रिजॉल्यूशन पूर्वानुमान प्रणाली देश के अन्य हिस्सों में भी विकसित की जा सकती है।

बारिश का सटीक अनुमान जारी होने से किसान बारिश से पहले बोवाई करके बेहतर फसल प्राप्‍त कर सकेंगे। 

अब केवल बारिश की सूचना तक सीमित नहीं रहेगा मौसम का पूर्वानुमान

भारत में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली अब केवल यह बताने तक सीमित नहीं रह गई है कि बारिश होगी या नहीं। अब इसका उद्देश्य किसानों, प्रशासन और आम लोगों को ऐसी जानकारी उपलब्ध कराना है, जिसकी मदद से वे समय रहते बेहतर फैसले ले सकें। उदाहरण के तौर पर किसान पहले से तय कर सकेंगे कि बुवाई कब करनी है, सिंचाई रोकनी है या फसल को भारी बारिश से बचाने के लिए कौन से कदम उठाने हैं। इसी तरह प्रशासन भी संभावित बाढ़, जलभराव या सूखे जैसी स्थितियों के लिए पहले से तैयारी कर सकेगा।

India Meteorological Department अब पारंपरिक मौसम मॉडलों के साथ कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हाई-रिजॉल्यूशन डेटा और आधुनिक कंप्यूटिंग तकनीकों को जोड़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले वर्षों में इससे और अधिक स्थानीय तथा सटीक मौसम पूर्वानुमान संभव हो सकेंगे। ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यदि यह प्रणाली सफल रहती है, तो यह भारत की कृषि व्यवस्था को अधिक वैज्ञानिक, सुरक्षित और जलवायु जोखिमों के प्रति बेहतर तरीके से तैयार बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। 

आपदा और जल प्रबंधन में भी मिलेगी मदद

ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान का उपयोग केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे बाढ़ प्रबंधन, जल संरक्षण और आपदा तैयारी में भी काफी मदद मिल सकती है। यदि किसी क्षेत्र में पहले से भारी बारिश की आशंका का अनुमान मिल जाता है, तो प्रशासन जल निकासी, राहत सामग्री और संवेदनशील इलाकों की निगरानी जैसी तैयारियां समय रहते शुरू कर सकता है। वहीं कम बारिश की संभावना वाले क्षेत्रों में जलाशयों और सिंचाई परियोजनाओं के प्रबंधन को बेहतर बनाया जा सकेगा।

भारत में पिछले कुछ वर्षों में अत्यधिक वर्षा, फ्लैश फ्लड और लंबे सूखे जैसी घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे में स्थानीय स्तर पर सटीक मौसम जानकारी प्रशासनिक फैसलों को अधिक प्रभावी बना सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि भविष्य में यदि इस प्रणाली को नदी जल प्रबंधन, भूजल निगरानी और फसल बीमा योजनाओं से जोड़ा गया, तो इसका लाभ और व्यापक हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में सटीक पूर्वानुमान महत्‍वपूर्ण

जलवायु परिवर्तन के कारण भारत में मानसून का व्यवहार लगातार अधिक अनिश्चित होता जा रहा है। कई बार कम समय में अत्यधिक बारिश हो जाती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है। पारंपरिक मौसम पूर्वानुमान प्रणाली अक्सर इतने सूक्ष्म स्तर के बदलावों को पकड़ नहीं पाती थी। यही वजह है कि अब मौसम विभाग स्थानीय स्तर पर अधिक सटीक और तेज पूर्वानुमान प्रणाली विकसित करने पर जोर दे रहा है।

वैज्ञानिकों के अनुसार भविष्य में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सुपरकंप्यूटिंग और रियल टाइम डेटा तकनीकों की मदद से मौसम पूर्वानुमान और अधिक भरोसेमंद बनाया जा सकेगा। भारत जैसे विशाल और विविध भौगोलिक परिस्थितियों वाले देश में ब्लॉक-स्तरीय पूर्वानुमान को जलवायु अनुकूलन रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। इससे किसानों के साथ-साथ शहरों, जल संसाधन विभागों और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को भी बदलते मौसम के अनुसार बेहतर तैयारी करने में मदद मिलेगी।

भारत में मौसम पूर्वानुमान प्रणाली की विकास यात्रा : संक्षिप्त टाइमलाइन

  • 1875 – भारत में India Meteorological Department (आईएमडी) की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य मौसम संबंधी आंकड़े जुटाना और चक्रवात जैसी आपदाओं की निगरानी करना था।

  • 1886 – देश में नियमित मौसम मानचित्र (Weather Maps) तैयार करने की शुरुआत हुई। इससे विभिन्न क्षेत्रों के मौसम का तुलनात्मक अध्ययन संभव हुआ।

  • 1940-50 का दशक – स्वतंत्रता के बाद मौसम पूर्वानुमान नेटवर्क का विस्तार किया गया। अधिक वर्षामापी केंद्र और वेधशालाएं स्थापित की गईं।

  • 1960 का दशक – कृषि मौसम सेवाओं (Agrometeorological Services) की शुरुआत हुई, ताकि किसानों को मौसम आधारित सलाह दी जा सके।

  • 1970 – भारत में उपग्रह आधारित मौसम निगरानी की दिशा में काम तेज हुआ। इसी दौर में चक्रवात चेतावनी प्रणाली को भी मजबूत किया गया।

  • 1982 – भारत का पहला समर्पित मौसम उपग्रह INSAT-1A लॉन्च किया गया। इससे बादलों, मानसून और चक्रवातों की निगरानी क्षमता बढ़ी।

  • 1990 का दशक – कंप्यूटर आधारित Numerical Weather Prediction (NWP) मॉडल का इस्तेमाल शुरू हुआ। इससे मौसम पूर्वानुमान की वैज्ञानिक सटीकता बढ़ी।

  • 2000-2010 – डॉप्लर मौसम रडार नेटवर्क का विस्तार हुआ। भारी बारिश, आंधी और चक्रवात की निगरानी अधिक प्रभावी बनी।

  • 2013 – आईएमडी ने उच्च-रिजॉल्यूशन मौसम मॉडल अपनाने शुरू किए, जिससे स्थानीय स्तर पर पूर्वानुमान बेहतर हुए।

  • 2016 – ‘मौसम’ और ‘मेघदूत’ जैसे मोबाइल ऐप लॉन्च किए गए, ताकि किसानों और आम लोगों तक मौसम जानकारी सीधे पहुंच सके।

  • 2020 के बाद – आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सुपरकंप्यूटिंग और हाई-रिजॉल्यूशन डेटा आधारित मौसम मॉडल पर तेजी से काम शुरू हुआ।

  • 2024-25 – ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान प्रणाली की शुरुआत की गई, जिसके तहत हजारों ब्लॉकों तक स्थानीय मौसम पूर्वानुमान पहुंचाने की दिशा में काम शुरू हुआ।

निष्‍कर्ष : एक बड़े बदलाव की शुरुआत कर सकती है नई प्रणाली

ब्लॉक-स्तरीय मानसून पूर्वानुमान प्रणाली भारत की मौसम सेवाओं में एक बड़े बदलाव के रूप में देखी जा रही है। यह केवल तकनीकी सुधार नहीं, बल्कि खेती, जल प्रबंधन और आपदा तैयारी को अधिक वैज्ञानिक बनाने की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। स्थानीय स्तर पर सटीक मौसम जानकारी मिलने से किसानों को फसल संबंधी फैसले लेने में मदद मिलेगी, वहीं प्रशासन भी बाढ़, सूखा और अत्यधिक वर्षा जैसी परिस्थितियों के लिए पहले से तैयार हो सकेगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, आधुनिक मौसम मॉडल और ऐतिहासिक डेटा के मेल से विकसित यह प्रणाली भविष्य में भारत की जलवायु चुनौतियों से निपटने की क्षमता को भी मजबूत कर सकती है।

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