भारत में बड़े पैमाने पर मछली पालन और आहार के रूप में इनका उपयोग होता है। पर इनके शल्क और कांटों को फेंक दिया जाता है। भारतीय वैज्ञानिकों की एक नई खोज से अब इस कचरे का इस्तेमाल चिकित्सा में हो सकेगा।
फोटो : विकी कॉमंस
फिश वेस्ट से तैयार किया एक लाख रुपये किलो बिकने वाले महंगे पदार्थ का सस्ता विकल्प
भारतीय वैज्ञानिकों की खोज बदबूदार कचरे की समस्या से भी दिला सकती है छुटकारा
केरल के कोच्चि स्थित CIFT के शोध दल ने विकसित की पेटेंट वाली उन्नत तकनीक
हड्डियों, खासकर रीढ की हड्डी और दातों को हुए नुकसान को पूरी तरह से ठीक कर पाना चिकित्सा जगत में लंबे समय से एक चुनौती बनी हुई है। इसकी वजह है इनका मांस पेशियों के बजाय कैल्शियम और ऐसे जटिल पदार्थों से बना होना, जिसके निर्माण में काफी लंबा वक्त लगता है। भारतीय वैज्ञानिकों ने अब इसका समाधान खोज निकाला है। वह भी किसी महंगे रसायन या यौगिक से नहीं बल्कि कचरा समझ कर फेंक दिए जाने वाले फिश वेस्ट यानी मछलियों के शल्क और कांटों से एक नया पदार्थ तैयार करके।
मछलियों के कांटों व शल्क (स्केल), त्वचा और अन्य अवशेषों को आमतौर पर एक बदबूदार कचरा माना जाता है। इसी कारण मछली बाजारों और प्रोसेसिंग यूनिटों से निकलने वाला यह कचरा एक अनुपयोगी अपशिष्ट के रूप में महौल में बदबू, सड़ांध और अन्य पर्यावरणीय समस्याएं पैदा करता है। लेकिन अब यही "फिश वेस्ट" आधुनिक चिकित्सा के लिए एक बहुमूल्य संसाधन बनने जा रहा है। भारत के वैज्ञानिकों ने ऐसा बायोमैटेरियल विकसित किया है जो भविष्य में टूटी हड्डियों की मरम्मत, दंत प्रत्यारोपण (डेंटल इम्प्लांट) और क्षतिग्रस्त ऊतकों के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
हाल ही में केरल के कोच्चि स्थित ICAR-Central Institute of Fisheries Technology (CIFT) के वैज्ञानिकों ने मछली के शल्कों से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट (Hydroxyapatite) आधारित नैनोफाइबर ग्राफ्ट विकसित किया है। यह तकनीक न केवल चिकित्सा विज्ञान में नई संभावनाएं खोलती है बल्कि "कचरे से संपदा" और सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा को भी मजबूत करती है।
मानव शरीर की हड्डियों और दांतों का एक बड़ा हिस्सा कैल्शियम फॉस्फेट से बना होता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण खनिज रूप हाइड्रॉक्सीएपेटाइट कहलाता है। इसका रासायनिक फार्मूला इस प्रकार है-
Ca10(PO4)6(OH)2Ca_{10}(PO_4)_6(OH)_2Ca10(PO4)6(OH)2
यह वही प्राकृतिक पदार्थ है, जो हमारी हड्डियों को मजबूती देता है और दांतों के इनेमल का प्रमुख घटक है। वैज्ञानिक वर्षों से कृत्रिम हाइड्रॉक्सीएपेटाइट तैयार करते रहे हैं, जिसकी लागत बहुत अधिक होती है। फार्मा बाज़ार में इसकी कीमत एक लाख रुपये प्रति किलो से ज़्यादा है। लेकिन, प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट जैव-संगतता (Biocompatibility) और हड्डी निर्माण क्षमता के मामले में अधिक प्रभावी माना जाता है। जिसे ICAR-CIFT के वैज्ञानिकों ने मछलियों के शल्क और हड्डियों से तैयार किया है, क्योंकि उन्होंने शोध में पाया कि कचरे समझ कर फेक दी जाने वाली चीजें वास्तव में इस बहुमूल्य खनिज का समृद्ध स्रोत हैं।
यदि मछली के शल्कों (Fish Scales) को सूक्ष्म स्तर पर देखा जाए, तो उनकी संरचना बेहद जटिल और उपयोगी दिखाई देती है। इनमें मुख्य रूप से कोलेजन प्रोटीन और कैल्शियम फॉस्फेट जैसे खनिज पाए जाते हैं, जो मानव हड्डियों और दांतों के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इन्हें एक प्राकृतिक बायोमैटेरियल के रूप में देखते हैं। मछली के शल्क केवल बाहरी सुरक्षा कवच नहीं होते, बल्कि इनमें मौजूद जैविक और खनिज तत्व उन्हें चिकित्सा अनुसंधान के लिए मूल्यवान बनाते हैं। विशेष रूप से हाइड्रॉक्सीएपेटाइट जैसे खनिज, जो हड्डियों और दांतों का प्रमुख घटक हैं, शल्कों से अपेक्षाकृत आसानी से प्राप्त किए जा सकते हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार शल्कों की सूक्ष्म संरचना मानव शरीर के कठोर ऊतकों (Hard Tissues) से काफी हद तक मेल खाती है। यही वजह है कि इनसे तैयार सामग्री शरीर में अपेक्षाकृत बेहतर जैव-संगतता (Biocompatibility) दिखाती है और नई हड्डी बनने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित कर सकती है। पहले जिन्हें मत्स्य उद्योग का बेकार अवशेष माना जाता था, वही शल्क आज बोन ग्राफ्ट, डेंटल रिपेयर, टिश्यू इंजीनियरिंग और पुनर्जनन चिकित्सा (Regenerative Medicine) जैसे क्षेत्रों में नई संभावनाओं का आधार बन रहे हैं। यह दर्शाता है कि प्रकृति में मौजूद साधारण दिखने वाली चीजें भी आधुनिक चिकित्सा के लिए असाधारण महत्व रख सकती हैं।
ICAR-CIFT के वैज्ञानिकों ने अन्य संस्थानों के सहयोग से एक तकनीक विकसित की है, जिसका शीर्षक "Nanofibers and a Process for Their Preparation" है। इसका पेटेंट भी प्राप्त कर लिया गया है। इस तकनीक में मछली के शल्कों से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट को नैनोफाइबर ट्यूब्यूल्स (Nanofiber tubules) में परिवर्तित किया जाता है।
इन नैनोफाइबरों का उपयोग बोन ग्राफ्ट और डेंटल ग्राफ्ट सामग्री के रूप में किया जा सकता है। जब किसी व्यक्ति की हड्डी टूट जाती है, जबड़े की हड्डी क्षतिग्रस्त हो जाती है या दांत प्रत्यारोपण के लिए अतिरिक्त हड्डी की आवश्यकता होती है, तब यह सामग्री एक "स्कैफोल्ड" की तरह काम करती है जिस पर नई कोशिकाएं विकसित हो सकती हैं।
इस तकनीक में फिश वेस्ट से हाइड्रॉक्सीएपेटाइट के नैनोफाइबर ट्यूब्यूल्स तैयार करने के लिए इलेक्ट्रोस्पिनिंग (Electrospinning) नामक प्रक्रिया का उपयोग किया गया है। इसमें अत्यंत पतले नैनोस्तरीय रेशे तैयार किए जाते हैं, जो मानव ऊतकों की प्राकृतिक संरचना की नकल होते हैं।
ये नैनोफाइबर केवल खाली जगह भरने का ही काम नहीं करते, बल्कि हड्डी बनाने वाली कोशिकाओं (Osteoblasts) को भी आकर्षित करते हैं और उन्हें बढ़ने के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं। इसके अलावा इनमें एंटीमाइक्रोबियल और एंटी-इन्फ्लेमेटरी यानी सूजन को खत्म करने जैसे गुण भी जोड़े जा सकते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा कम होता है और उपचार की प्रक्रिया तेज होती है।
आधुनिक दंत चिकित्सा में बोन ग्राफ्टिंग एक आम प्रक्रिया बन चुकी है। कई बार दांत निकल जाने, चोट लगने या मसूड़ों की बीमारी के कारण जबड़े की हड्डी कमजोर हो जाती है। ऐसे मामलों में डेंटल इम्प्लांट लगाने से पहले अतिरिक्त हड्डी की आवश्यकता पड़ती है।
मछली के शल्कों से बने हाइड्रॉक्सीएपेटाइट आधारित नैनोफाइबर ऐसी स्थितियों में उपयोगी हो सकते हैं। ये जबड़े की हड्डी के साथ घुल-मिलकर नई हड्डी के निर्माण को बढ़ावा देते हैं। इसके कारण डेंटल इम्प्लांट की सफलता दर बढ़ सकती है और रिकवरी का समय कम हो सकता है।
हर साल दुनिया भर में करोड़ों लोगों को फ्रैक्चर की समस्या का सामना करना पड़ता है। सामान्य फ्रैक्चर तो प्लास्टर और दवाओं से ठीक हो जाते हैं, लेकिन बड़े बोन डिफेक्ट, संक्रमण या कमजोर रक्त प्रवाह जैसी स्थितियों में हड्डी का जुड़ना कठिन हो जाता है।
ऐसे मामलों में बोन ग्राफ्टिंग (Bone grafting) की तकनीक का उपयोग किया जाता है। मछली से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट आधारित सामग्री शरीर में नई हड्डी बनने की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करती है। शोधों में पाया गया है कि यह सामग्री ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं की वृद्धि और खनिजीकरण (Mineralization) को बढ़ावा देती है।
भारतीय वैज्ञानिकों की इस खोज से जहां चिकित्सा जगत की राह आसान होगी, वहीं इससे 'बेस्ट फ्रॉम वेस्ट' और 'सर्कुलर इकनॉमी' की अवधारणाओं को भी बढ़ावा मिलेगा।
आज बाजार में उपलब्ध अधिकांश हाइड्रॉक्सीएपेटाइट को कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है। हालांकि प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट के कई फायदे हैं।
ICAR-CIFT द्वारा प्रकाशित रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार मछली से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट में बेहतर जैव-संगतता, बेहतर ऑस्टियोकंडक्टिविटी (हड्डी निर्माण को दिशा देने की क्षमता) और उच्च री-एब्जॉर्प्शन क्षमता देखी गई है। पशु परीक्षणों में इसने व्यावसायिक रूप से उपलब्ध कुछ बोन ग्राफ्ट्स की तुलना में काफी अधिक और तेज कैल्सिफिकेशन प्रक्रिया को प्रदर्शित किया।
केवल शल्क ही नहीं, मछली के अन्य हिस्से भी उपयोगी हैं। त्वचा और शल्कों से कोलेजन निकाला जा सकता है, जो घाव भरने और टिश्यू इंजीनियरिंग में उपयोगी है। हड्डियों से कैल्शियम और हाइड्रॉक्सीएपेटाइट प्राप्त किया जा सकता है। शेलफिश के अवशेषों से चिटिन और चिटोसैन जैसे बायोपॉलिमर बनाए जा सकते हैं जिनका उपयोग दवा वितरण प्रणाली, घाव ड्रेसिंग और जल शोधन में होता है।
इसके अलावा मछली के आंतरिक अंगों, यकृत (लिवर) और प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले तेलयुक्त अवशेषों से ओमेगा-3 फैटी एसिड, मछली का तेल, जैव सक्रिय पेप्टाइड्स (Bioactive Peptides) और विभिन्न एंजाइम भी प्राप्त किए जा सकते हैं। इनका उपयोग पोषण संबंधी सप्लीमेंट्स, हृदय स्वास्थ्य उत्पादों, औषधियों और कॉस्मेटिक उद्योग में किया जाता है। हाल के वर्षों में वैज्ञानिकों ने मछली अपशिष्ट से प्राप्त बायोएक्टिव यौगिकों के एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रोबियल और सूजन-रोधी गुणों पर भी विशेष ध्यान दिया है। यही कारण है कि आज मछली उद्योग का अपशिष्ट केवल कचरा नहीं, बल्कि खाद्य, स्वास्थ्य, चिकित्सा, जैव प्रौद्योगिकी और पर्यावरण संरक्षण जैसे कई क्षेत्रों के लिए मूल्यवान कच्चे माल के रूप में देखा जा रहा है।
भारत अकेला देश नहीं, जो इस दिशा में काम कर रहा है। दुनिया के कई शोध संस्थान मछली के अपशिष्ट से हाइड्रॉक्सीएपेटाइट निकालने और उसे बायोमेडिकल उपयोगों के लिए विकसित करने में जुटे हैं। साइंस जर्नल स्प्रिंग नेचर में 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि मछली के शल्कों से प्राप्त हाइड्रॉक्सीएपेटाइट ने मानव ऑस्टियोब्लास्ट कोशिकाओं में उत्कृष्ट जैव-संगतता दिखाई। शोधकर्ताओं ने इसे हड्डी पुनर्जनन (Bone Regeneration) के लिए एक टिकाऊ और कम लागत वाला विकल्प बताया।
इसी तरह साइंस डायरेक्ट में प्रकाशित एक अन्य अध्ययन में मछली के शल्कों से तैयार नैनो-हाइड्रॉक्सीएपेटाइट ने उच्च ऑस्टियोजेनिक क्षमता प्रदर्शित की, अर्थात यह पदार्थ नई हड्डी बनाने की प्रक्रिया को सक्रिय रूप से बढ़ावा देता है।
मछली उद्योग से निकलने वाला जैविक कचरा कई तटीय क्षेत्रों में प्रदूषण का कारण बनता है। यदि इसी कचरे को बायोमेडिकल उत्पादों में बदल दिया जाए तो दोहरे लाभ मिलते हैं। एक ओर तो इससे पर्यावरणीय प्रदूषण कम होता है, दूसरी ओर उच्च मूल्य वाले चिकित्सा में उपयोगी उत्पाद तैयार होते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक इसे सर्कुलर बायोइकोनॉमी का उत्कृष्ट उदाहरण मानते हैं। जब यह अपशिष्ट खुले में सड़ता है तो दुर्गंध, जल प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। ऐसे में भारतीय वैज्ञानिकों की यह खोज प्रदूषण और दुर्गंध जैसी समस्याओं को भी दूर करने में मददगार है, जो पर्यावरण के लिए काफी लाभकारी है।
मछली के शल्कों और कांटों से दांतों तथा हड्डियों की मरम्मत करने वाली सामग्री का विकास केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का भी एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे साधारण जैविक कचरे को एक अत्याधुनिक चिकित्सा समाधान में बदला जा सकता है। ICAR-CIFT के वैज्ञानिकों की यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत की मत्स्य संपदा केवल भोजन का स्रोत नहीं, बल्कि भविष्य की चिकित्सा तकनीकों का आधार भी बन सकती है। यदि यह तकनीक सफलतापूर्वक क्लीनिकल उपयोग तक पहुंचती है तो आने वाले वर्षों में अस्पतालों और दंत चिकित्सा केंद्रों में ऐसे बोन और डेंटल ग्राफ्ट देखने को मिल सकते हैं जिनकी शुरुआत किसी मछली बाजार के फेंके गए शल्कों और कांटों से हुई होगी। इस तरह इस वैज्ञानिक खोज की सबसे बड़ी खूबसूरती है कि यह कचरे को भी जीवन बचाने वाला संसाधन बना रहा है।
ICAR-CIFT कई वर्षों से मछली अपशिष्ट आधारित तकनीकों पर काम कर रहा है। संस्थान ने पहले भी मछली की हड्डियों और शल्कों से हाइड्रॉक्सीएपेटाइट निकालने की तकनीक विकसित की थी और उसका प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी किया जा चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मछली प्रसंस्करण उद्योग, बायोटेक कंपनियां और चिकित्सा उपकरण निर्माता मिलकर काम करें तो भारत इस क्षेत्र में वैश्विक आपूर्ति केंद्र बन सकता है। इससे तटीय राज्यों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
हालांकि, यह तकनीक बेहद आशाजनक है, लेकिन इसके व्यापक उपयोग में अभी कई प्रकार की व्यावहारिक चुनौतियां बाकी हैं। सबसे पहले इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने के लिए कम खर्च वाली कई चरणों वाली प्रक्रिया विकसित करने की आवश्यकता होगी। इनमें बड़े पैमाने पर उत्पादन, गुणवत्ता मानकीकरण, विस्तृत जैव-सुरक्षा परीक्षण, क्लीनिकल ट्रायल और नियामकीय मंजूरियों (Regulatory approval) प्राप्त करने जैसी चुनौतियां शामिल हैं।
इसके अलावा विभिन्न मछली प्रजातियों के शल्कों और हड्डियों की संरचना अलग-अलग हो सकती है। ऐसे में कच्चे माल की गुणवत्ता में एकरूपता बनाए रखना भी एक चुनौती है। वैज्ञानिक समीक्षा लेखों में भी इन मुद्दों को व्यावसायीकरण की प्रमुख बाधाओं में गिना गया है।
मछली के कांटों, शल्कों और अन्य अवशेषों से हड्डी तथा दांतों की मरम्मत के लिए बायोमैटेरियल विकसित करने की यह पहल दिखाती है कि वैज्ञानिक नवाचार किस तरह पर्यावरणीय चुनौतियों को अवसर में बदल सकता है। इससे एक ओर इससे मछली प्रसंस्करण उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट का बेहतर प्रबंधन संभव होगा। दूसरी ओर, कम लागत वाले और जैव-संगत चिकित्सा उत्पाद विकसित करने का रास्ता भी खुलेगा। यदि भविष्य में यह तकनीक बड़े पैमाने पर क्लीनिकल उपयोग के स्तर तक पहुंच पाती है, तो यह न केवल बोन ग्राफ्ट और डेंटल इम्प्लांट के क्षेत्र में बदलाव ला सकती है, बल्कि भारत की ब्लू बायोइकोनॉमी को भी नई गति दे सकती है। यह उपलब्धि इस बात का उदाहरण है कि सतत विकास, चिकित्सा विज्ञान और अपशिष्ट प्रबंधन को साथ लेकर चलने वाली तकनीकें आने वाले समय में मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण दोनों के लिए लाभकारी साबित हो सकती हैं।
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