अपने खूबसूरत और साफ-सुथरे समुद्र तटों (बीच) के लिए जाना जाने वाला केरल का वर्कला शहर UNEP की ‘20 ज़ीरो वेस्ट सिटी’ सूची में शामिल किया गया भारत का इकलौता शहर है।

 

स्रोत : विकी कॉमंस

सफलता की कहानियां

केरल का वर्कला बना ‘ज़ीरो वेस्ट सिटी’ अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर मिली पहचान

कूड़े में कमी और सतत शहरी विकास के मॉडल को अपना कर UNEP की प्रतिष्ठित सूची में हुआ शामिल, बेहतर अपशिष्‍ट प्रबंधन वाले विश्व के 20 अग्रणी शहरों मिला स्‍थान

Author : कौस्‍तुभ उपाध्‍याय

कूड़े को संसाधन में बदलने की एक छोटे शहर की बड़ी कहानी

अपने क्लिफ बीच और पर्यटन के लिए मशहूर केरल का तटीय शहर वर्कला (Varkala) अब वैश्विक स्तर पर एक अपनी नई पहचान बना रहा है। अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध केरलम (केरल) राज्‍य के इस छोटे व अनजाने से शहर अपने पर्यावरणीय मॉडल की बदौलत यह उपलब्धि हासिल की है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों UNEP और UN-Habitat ने इसे दुनिया के 20 ‘ज़ीरो वेस्ट सिटी’ में शामिल किया है। 

वर्कला की यह उपलब्धि न केवल केरल राज्‍य, बल्कि पूरे भारत के लिए एक मिसाल है। कूड़े को संसाधन में बदलने वाले वर्कला के अपशिष्‍ट प्रबंधन व पर्यावरणीय मॉडल को अंतरराष्‍ट्रीय मॉडल को मिली यह सराहना बताती है कि सही नीति, तकनीक और समुदाय की भागीदारी से कचरे की समस्या को अवसर में बदला जा सकता है। ऐसा करके एक छोटा सा शहर भी बड़ी कामयाबी की अपनी अलग कहानी लिख सकता है।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव के शून्य अपशिष्ट पर सलाहकार बोर्ड ने वर्कला को शून्य अपशिष्ट की ओर 20 शहर यानी 20 Cities Towards Zero Waste पहल में शामिल किया है। इसे यूएन-हैबिटेट और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) का समर्थन प्राप्त है। यह UNEP की एक नई (inaugural) पहल है, जिसे 2026 में पहली बार लॉन्च किया गया। इसका उद्देश्य चुने गए शहरों को मान्यता देना, उनके मॉडल को दुनिया के सामने लाना और अन्य शहरों को प्रेरित करना है। इस सूची में शामिल दुनिया के 20 शहरों के नाम इस प्रकार हैं- 

  • अकरा (Accra) – घाना

  • बोलोन्या (Bologna) – इटली

  • शेफचाउएन (Chefchaouen) – मोरक्को

  • दार-एस-सलाम (Dar es Salaam) – तंज़ानिया

  • देहिवाला (Dehiwala) – श्रीलंका

  • फ्लोरियानोपोलिस (Florianópolis) – ब्राज़ील

  • गाज़ियानटेप (Gaziantep) – तुर्की

  • जॉर्ज टाउन (George Town) – मलेशिया

  • हांगझोउ (Hangzhou) – चीन

  • इलोइलो (Iloilo) – फिलीपींस

  • किसुमू (Kisumu) – केन्या

  • कुआलालंपुर (Kuala Lumpur) – मलेशिया

  • लिलोंगवे (Lilongwe) – मलावी

  • सैन फर्नांडो (San Fernando) – फिलीपींस

  • सैन फ्रांसिस्को (San Francisco) – अमेरिका

  • सान्या (Sanya) – चीन

  • सूझोउ (Suzhou) – चीन

  • योकोहामा (Yokohama) – जापान

  • ज़ापोपान (Zapopan) – मेक्सिको

  • वर्कला (Varkala) – भारत

इस तरह हम देखते हैं कि इस सूची में भारत से केवल वर्कला शहर को ही शामिल किया गया है।

वर्कला के बेहतरीन कचरा प्रबंधन के चलते यहां की सड़कें भी एकदम साफ-सुथरी नज़र आती हैं। 

ज़ीरो वेस्ट : सिर्फ सफाई नहीं, सोच में भी बदलाव

‘ज़ीरो वेस्ट’ शब्द सुनते ही अक्सर यह भ्रम होता है कि शहर में बिल्कुल भी कचरा नहीं बनता। लेकिन, ऐसा नहीं है। दरअसल यह थोड़ा तकनीकी मामला है।  ‘ज़ीरो वेस्ट’ का अर्थ है कचरे के उत्पादन को न्यूनतम करना, अधिकतम पुनः उपयोग और रीसाइक्लिंग सुनिश्चित करना, और लैंडफिल पर निर्भरता को खत्म करना। 

UN-Habitat के ‘Waste Wise Cities’ फ्रेमवर्क के अनुसार, शहरों को कचरे को एक संसाधन के रूप में देखना चाहिए, जहां 5R यानी Refuse, Reduce, Reuse, Recycle, Rethink की अवधारणा को अपनाते हुए चीजों को दोबार इस्‍तेमाल यानी सर्कुलर इकॉनमी को बढ़ावा दिया जाता है। दुनिया की 20 ज़ीरो वेस्ट सिटीज़ में वर्कला का चयन भी इसी व्यापक दृष्टिकोण के आधार पर हुआ है, क्‍योंकि नीति, तकनीक, सामाजिक समावेशन के ज़रिये दीर्घकालिक स्थिरता को महत्व दिया गया है।

वर्कला का चयन सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) को प्राप्त करने में भारत की भूमिका को मजबूत करता है। यह शहरी पर्यावरणीय प्रबंधन में हुई प्रगति को दर्शाता है। यह पहल वैश्विक स्थिरता प्रयासों में योगदानकर्ता के रूप में भारत की छवि को बेहतर बनाती है।

क्या होता है ‘ज़ीरो वेस्ट’ यह कैसे संभव हुआ?

हालांकि वर्कला की उपलब्धि प्रेरणादायक है, लेकिन कुछ सवाल भी उठते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ‘ज़ीरो वेस्ट’ एक लक्ष्य है, न कि पूर्ण स्थिति। कुछ क्षेत्रों में अभी भी कचरा प्रबंधन की चुनौतियां मौजूद हैं। खासकर, पर्यटन स्थलों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में। इसके अलावा, बढ़ती आबादी और पर्यटन के दबाव के बीच इस मॉडल को बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती होगी। आज दुनिया भर के शहर कचरे के संकट से जूझ रहे हैं। खुले में कचरा फेंकना, जलाना और लैंडफिल पर निर्भरता न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है, बल्कि स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी गंभीर असर डालती है। ऐसे में वर्कला जैसे मॉडल यह दिखाते हैं कि समस्या का समाधान संभव है कि यदि नीति, तकनीक और समाज एक साथ मिलकर काम करें।

क्यों खास है वर्कला की एंट्री

वर्कला को United Nations Environment Programme (UNEP) और UN-Habitat की ओर से ‘इंटरनेशनल डे ऑफ ज़ीरो वेस्ट’ (30 मार्च) के अवसर पर मिली यह मान्यता कई कारणों से विशेष है। दुनिया भर के केवल 20 शहरों में चयन होना अपने आप में बड़ी उपलब्धि है, लेकिन वर्कला का चयन सिर्फ सतही सफाई या स्वच्छता अभियानों के आधार पर नहीं हुआ। इसकी असली ताकत इसकी सिस्टम-आधारित अपशिष्ट प्रबंधन रणनीति है, जिसमें नीति, तकनीक और जनभागीदारी तीनों का संतुलित समावेश है।

यहां घर-घर कचरा अलग करने की आदत, विकेंद्रीकृत प्रोसेसिंग यूनिट्स, हरिता कर्मा सेना जैसी जमीनी टीमों की सक्रिय भूमिका और कचरे को संसाधन में बदलने की सोच इसे अन्य शहरों से अलग बनाती है। खास बात यह भी है कि यह मॉडल पर्यटन-प्रधान शहर में लागू हुआ, जहां कचरे का दबाव अधिक रहता है। ऐसे में वर्कला का चयन यह दिखाता है कि सही दृष्टिकोण अपनाकर कोई भी शहर सतत विकास की दिशा में वैश्विक पहचान बना सकता है।

‘केरल मॉडल’ दिखाता है विकेंद्रीकरण की ताकत

वर्कला की सफलता के केंद्र में केरल का विकेंद्रीकृत अपशिष्ट प्रबंधन मॉडल है, जिसने पारंपरिक “कचरा उठाओ और फेंको” सोच को पूरी तरह बदल दिया है। इस मॉडल का मूल सिद्धांत “My Waste, My Responsibility” है, जो लोगों को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक बनाता है। यहां हर घर, दुकान और संस्थान को कचरे के स्रोत पर ही अलग करने के लिए प्रेरित किया गया है, जिससे गीले और सूखे कचरे का वैज्ञानिक प्रबंधन संभव हो सका है। इस व्यवस्था में बड़े लैंडफिल की जगह छोटे-छोटे स्थानीय समाधान अपनाए गए हैं, जैसे घरेलू कम्पोस्टिंग और माइक्रो प्रोसेसिंग यूनिट्स। इससे न केवल कचरे का बोझ कम हुआ, बल्कि परिवहन और निपटान की लागत भी घटी। तिरुवनंतपुरम जैसे शहरों में पहले इसी मॉडल के सफल प्रयोग ने वर्कला के लिए आधार तैयार किया। यह मॉडल यह साबित करता है कि जब जिम्मेदारी स्थानीय स्तर पर बांटी जाती है, तो समाधान ज्यादा टिकाऊ और प्रभावी बनते हैं।

हाल के वर्षों में वर्कला ने एक शांतिपूर्ण पर्यटन स्‍थल के रूप में बड़ी संख्‍या में पर्यटकों को आकर्षित किया है।

हरिता कर्मा सेना : कचरा प्रबंधन की रीढ़

वर्कला के ‘ज़ीरो वेस्ट’ मॉडल की असली ताकत है, हरिता कर्मा सेना, जो एक महिला-प्रधान सामुदायिक नेटवर्क है। यह समूह केवल कचरा इकट्ठा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि शहर की पर्यावरणीय जागरूकता का चेहरा बन चुका है। ये सदस्य घर-घर जाकर कचरा संग्रहण करते हैं, लोगों को सही तरीके से कचरा अलग करने के लिए प्रशिक्षित करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि सिस्टम जमीनी स्तर पर सही ढंग से काम करे।

इस पहल ने दोहरी भूमिका निभाई है। एक ओर यह कचरा प्रबंधन को मजबूत करती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय महिलाओं को रोजगार और आर्थिक आत्मनिर्भरता भी देती है। इन ‘ग्रीन वॉरियर्स’ के कारण कचरे का एक बड़ा हिस्सा सीधे रीसाइक्लिंग और रिसोर्स रिकवरी सेंटर तक पहुंचता है, जिससे लैंडफिल पर निर्भरता घटती है। यह मॉडल यह भी दिखाता है कि सामाजिक सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं।

तकनीक और नवाचार : कचरे से बिजली तक

वर्कला ने कचरा प्रबंधन को केवल सामाजिक पहल तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसमें आधुनिक तकनीक और नवाचार को भी शामिल किया है। यहां स्थापित सैनिटरी वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो रोजाना करीब 5 टन कचरे को प्रोसेस कर लगभग 60 किलोवाट बिजली उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। 

सैनिटरी वेस्ट, जैसे डायपर और सेनेटरी पैड आमतौर पर सबसे जटिल कचरे की श्रेणी में आते हैं, जिसे न तो आसानी से रीसायकल किया जा सकता है और न ही सुरक्षित तरीके से निपटाया जाता है। वर्कला ने इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए इसे ऊर्जा उत्पादन में परिवर्तित किया है। इसके अलावा, यहां एरोबिक कम्पोस्टिंग यूनिट्स, बायोगैस प्लांट और स्मार्ट कलेक्शन सिस्टम जैसे उपाय भी अपनाए गए हैं। यह तकनीकी हस्तक्षेप न केवल पर्यावरणीय प्रभाव को कम करता है, बल्कि शहर को ऊर्जा और संसाधनों के मामले में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी ले जाता है।

सामाजिक भागीदारी : सफलता की असली कुंजी

वर्कला की उपलब्धि का सबसे मजबूत आधार है जनभागीदारी। किसी भी अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की सफलता तभी संभव है, जब आम लोग उसे अपनाएं और उसमें सक्रिय भूमिका निभाएं। वर्कला में यही हुआ है। यहां लोगों को केवल नियमों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं किया गया, बल्कि उन्हें इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है।

हर घर में कचरे को अलग करने की आदत विकसित की गई है, जबकि सामुदायिक स्तर पर कम्पोस्टिंग और बायोगैस जैसे विकल्पों को बढ़ावा दिया गया है। स्कूलों, स्थानीय संगठनों और स्वयंसेवी समूहों के माध्यम से लगातार जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। इसके साथ ही होटल, रेस्टोरेंट और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है, जिससे पूरे शहर में एक समान प्रणाली विकसित हो सके। हालांकि, पर्यटन से जुड़े क्षेत्रों में अभी भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं, लेकिन सामुदायिक सहयोग के कारण इन समस्याओं को लगातार कम किया जा रहा है।

पर्यटन और पर्यावरण केके बढ़ता वर्कला

वर्कला की पहचान एक प्रमुख पर्यटन स्थल के रूप में है, जहां हर साल हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं। आमतौर पर ऐसे शहरों में कचरा प्रबंधन एक बड़ी समस्या बन जाता है, क्योंकि बढ़ती भीड़ के साथ कचरे की मात्रा भी तेजी से बढ़ती है। लेकिन वर्कला ने इस चुनौती को अपने ‘ज़ीरो वेस्ट’ मॉडल के जरिए अवसर में बदल दिया है।

यहां पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है। समुद्र तटों, होटलों और सार्वजनिक स्थानों पर कचरा अलग करने और कम करने के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। स्थानीय प्रशासन और व्यवसायिक संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित किया गया है, ताकि पर्यटन का दबाव पर्यावरण पर न पड़े। संयुक्त राष्ट्र से मिली मान्यता के बाद वर्कला अब ‘सस्टेनेबल टूरिज्म’ के एक वैश्विक उदाहरण के रूप में उभर रहा है, जिससे भविष्य में पर्यावरण के प्रति जागरूक पर्यटकों की संख्या भी बढ़ने की संभावना है।

महानगरों जैसी भारी-भरकम भीड़-भाड़ से दूर वर्कला की सड़कों का नज़ारा रात में कुछ ऐसा दिखता है। 

प्रदर्शन में लगातार सुधार से बढ़ी रैंकिंग

वर्कला की यह सफलता एक दिन में नहीं मिली, बल्कि यह लगातार सुधार और प्रयासों का परिणाम है। कुछ वर्षों पहले तक यह शहर स्वच्छता के मामले में खास प्रदर्शन नहीं कर रहा था, लेकिन योजनाबद्ध तरीके से किए गए बदलावों ने इसकी स्थिति पूरी तरह बदल दी।

स्वच्छ सर्वेक्षण जैसी राष्ट्रीय रैंकिंग में बेहतर प्रदर्शन, स्टार रेटिंग हासिल करना और एक मजबूत सैनिटरी वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम विकसित करना इस प्रगति के प्रमुख संकेत हैं। स्थानीय प्रशासन ने डेटा आधारित निर्णय, नियमित मॉनिटरिंग और फीडबैक सिस्टम को अपनाया, जिससे कमियों की पहचान कर उन्हें समय रहते सुधारा जा सका।

आज वर्कला न केवल अपने राज्य में बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर भी एक उदाहरण बन चुका है। इसकी यात्रा यह दिखाती है कि यदि निरंतर प्रयास और सही रणनीति अपनाई जाए, तो कोई भी शहर अपनी छवि और प्रदर्शन को पूरी तरह बदल सकता है।

क्या सीख सकते हैं भारत के अन्य शहर ?

वर्कला का ‘ज़ीरो वेस्ट’ मॉडल भारत के अन्य शहरों के लिए एक व्यवहारिक और अपनाने योग्य रास्ता दिखाता है। खासकर छोटे और मध्यम शहरों के लिए यह मॉडल अधिक उपयोगी है, जहां सीमित संसाधनों के बीच बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स लागू करना कठिन होता है। वर्कला ने यह साबित किया है कि यदि कचरे के स्रोत पर ही अलगाव, स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और जनभागीदारी को प्राथमिकता दी जाए, तो बिना बड़े निवेश के भी प्रभावी परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत इसकी लचीलापन है, जिसे अलग-अलग भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार ढाला जा सकता है। शहरी निकाय यदि स्थानीय समुदायों, स्वयंसेवी समूहों और निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करें, तो कचरा प्रबंधन को एक सामूहिक जिम्मेदारी बनाया जा सकता है। केरल सरकार अब इस मॉडल को राज्य के अन्य शहरों में लागू करने की दिशा में काम कर रही है, जो यह संकेत देता है कि यह पहल केवल एक शहर तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि व्यापक बदलाव का आधार बन सकती है। वर्कला की यह उपलब्धि अन्य भारतीय शहरों को भी ‘ज़ीरो वेस्ट‘ रणनीतियाँ अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है।

वर्कला से समुद्र तटों पर सूर्योदय और सूर्यास्‍त का सुनहरा नज़ारा बरबस ही लोगों का मन मोह लेता है। 

बेहतर वेस्ट मैनेजमेंट वाले देश के अन्य शहर

भारत में वर्कला के अलावा भी कई शहर हैं, जिन्होंने अपशिष्ट प्रबंधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय काम किया है। मध्‍य प्रदेश का इंदौर इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है, जो लगातार कई वर्षों से स्वच्छ सर्वेक्षण में शीर्ष स्थान पर बना हुआ है। इंदौर ने डोर-टू-डोर कलेक्शन, कचरे के सख्त वर्गीकरण और बायो-सीएनजी जैसे नवाचारों के जरिए यह सफलता हासिल की है।

इसी तरह छत्तीसगढ़ राज्य के अंबिकापुर ने ‘गार्बेज कैफे’ और महिला स्व-सहायता समूहों की मदद से कचरे को संसाधन में बदलने का अनूठा मॉडल विकसित किया है। यह यह सरगुजा ज़िले का प्रमुख शहर (टाउनशिप) है, जिसने देश में अपने बेहतर कचरा प्रबंधन मॉडल, खासकर महिला स्व-सहायता समूहों और “गार्बेज कैफे” पहल के लिए जाना जाता है।

मैसूर और पुणे जैसे शहरों ने भी विकेंद्रीकृत कचरा प्रबंधन और रीसाइक्लिंग सिस्टम को मजबूत किया है। कर्नाटक मैसूर ने वार्ड स्तर पर कचरा अलगाव और स्थानीय कम्पोस्टिंग यूनिट्स को बढ़ावा देकर विकेंद्रीकृत मॉडल को मजबूत किया है। इससे शहर में डोर-टू-डोर कलेक्शन और स्रोत पर ही कचरा छंटाई के कारण लैंडफिल पर निर्भरता काफी कम हुई है। महाराष्‍ट्र के पुणे में कचरा प्रबंधन का मॉडल कचरा बीनने वाले संगठनों और नगरपालिका की साझेदारी पर आधारित है, जिसमें सूखे कचरे की बड़े स्तर पर रीसाइक्लिंग की जाती है। यहां SWaCH जैसी पहल के जरिए लाखों घरों से कचरा संग्रहण और छंटाई का काम व्यवस्थित रूप से किया जा रहा है।

उत्तर प्रदेश में भी कुछ शहर कचरा प्रबंधन के बेहतर उदाहरण के रूप में उभर रहे हैं, हालांकि वे अभी वर्कला या इंदौर जैसे मॉडल तक पूरी तरह नहीं पहुंचे हैं, पर हाल के वर्षों में यहां हुए सुधार उल्‍लेखनीय हैं। इनमें सबसे पहला नाम राज्‍य की राजधानी लखनऊ का लिया जा सकता है, जहां डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन, स्रोत पर कचरा अलगाव और वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट जैसी पहलें लागू की गई हैं। यहां नगर निगम ने प्रोसेसिंग प्लांट और कम्पोस्टिंग के जरिए कचरे के निपटान को बेहतर करने की कोशिश की है, लेकिन अभी भी सेग्रीगेशन को लेकर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। 

गंगा और वरुणा नदी किनारे बसे मशहूर शहर वाराणसी के काशी क्षेत्र में घाटों और पर्यटन क्षेत्रों में कचरा प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया है। डोर-टू-डोर कलेक्शन और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्लांट के जरिए शहर ने स्वच्छता रैंकिंग में सुधार किया है, हालांकि बढ़ती आबादी और पर्यटन दबाव के कारण चुनौतियां बनी हुई हैं। इसी तरह राज्‍य के प्रमुख औद्योगिक शहर गौतम बुद्धनगर यानी नोएडा में अपशिष्ट प्रबंधन के लिए आधुनिक प्रोसेसिंग प्लांट, ड्राई वेस्ट मैटेरियल रिकवरी फैसिलिटी और निर्माण-ध्वंस (C&D) कचरे के रीसाइक्लिंग पर काम हो रहा है। यहां टेक्नोलॉजी आधारित मॉनिटरिंग और निजी भागीदारी के जरिए सिस्टम को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है।

इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में स्थानीय जरूरतों के अनुसार अलग-अलग मॉडल विकसित किए गए हैं, लेकिन इन सबका लक्ष्य एक ही है, कचरे को कम करना और उसे उपयोगी संसाधन में बदलना।

निष्कर्ष : कचरे से भविष्य गढ़ता वर्कला

वर्कला की कहानी सिर्फ एक शहर की सफलता नहीं, बल्कि लोगों को प्रशासन की सोच में एक ऐसे बदलाव को दर्शाती है, जहां कचरे को समस्या नहीं, बल्कि संसाधन के रूप में देखा जाता है। इसका असर 'ज़ीरो वेस्‍ट सिटी' के रूप में चयन के रूप में देखने को मिलता है। यह उपलब्धि बताती है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो छोटे शहर भी वैश्विक स्तर पर पहचान बना सकते हैं। आज जब दुनिया जलवायु संकट और प्रदूषण से जूझ रही है, तब वर्कला जैसे छोटे शहरों के उदाहरण उम्मीद की किरण बनकर उभर रहे हैं, जो यह संदेश देते हैं कि सतत विकास कोई सपना नहीं, बल्कि एक व्यवहारिक वास्तविकता है।

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