दस साल पहले एक मोटरसाइकिल, हजारों किलोमीटर का सफर और एक सवाल - आखिर भारत अपने पानी को बचाने में इतना पीछे क्यों है? इसी सवाल की तलाश में शशांक सिंह ने 2016 में 13 राज्यों की करीब 8,000 किलोमीटर लंबी मोटरसाइकिल यात्रा की। यह यात्रा उनके लिए केवल भारत को करीब से देखने का माध्यम नहीं थी, बल्कि पानी और ग्रामीण समुदायों के साथ उनके लंबे जुड़ाव की शुरुआत भी बनी। आज, एक दशक बाद, शशांक ग्राउंडवॉटर, जल संरक्षण, तालाबों के पुनर्जीवन और समुदाय आधारित जल प्रबंधन के लिए काम कर रहे हैं।
एसबीआई यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप के दौरान शशांक सिंह ने राजस्थान के तिलोनिया स्थित बेयरफुट कॉलेज के साथ काम करते हुए खराब हो चुके तालाबों के पुनर्जीवन और समुदाय आधारित वर्षाजल संचयन के प्रयासों को करीब से समझा। इस अनुभव ने पानी को केवल एक प्राकृतिक संसाधन के बजाय समुदाय, आजीविका और स्थानीय पारिस्थितिकी से जुड़ा मुद्दा देखने की उनकी दृष्टि को मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने ग्राम एसोसिएशन की स्थापना की, जिसके माध्यम से वे ग्रामीण क्षेत्रों में जल और वन संरक्षण पर काम कर रहे हैं।
हाल ही में इंडिया वाटर पोर्टल के साथ साक्षात्कार में उन्होंने भारत की जल संस्कृति पर अपने अनुभव रखे। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के प्रमुख अंश-
जल यात्रा का आईडिया आपको कहां से आया?
जब यूथ फॉर इंडिया फेलोशिप कर रहे थे, तब उसी दौरान पानी के ऊपर प्रोजेक्ट किया तो अहसास हुआ कि पानी को और गहराई से समझने की जरूरत है। मैंने राजस्थान का ट्रेडिशनल विज्डम देखा वहां लोगों का पानी के साथ रिश्ता मुझे समझ में आया। तब यह उत्सुकता मेरे अंदर जगी कि भारत को भी देखा जाए। यात्रा का कुछ एजेंडा होना चाहिए। तो मैंने जल को एजेंडा बनाया।
इंजीनियरिंग छोड़ कर समाजसेवा से कैसे जुड़े?
मैंने इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद हीरो साइकिल में बतौर क्वालिटी इंजीनियर अपनी सेवाएं दीं। तभी मुझे यूथ फॉर इंडिया की फेलोशिप मिली जिसमें मुझे पता चला कि 13 महीने मुझे गॉंव में रहकर काम करना होगा। मुझे पता चला कि वहां कई इंजीनियर भी हैं। मेरे अंदर यह उत्सुकता हुई कि ये इंजीनियर बड़ी-बड़ी एमएनसी छोड़ कर गॉंव में क्यों अपनी सेवाएं दे रहे हैं। बस इसी सवाल की खोज में मैं चल पड़ा। फिर मैंने पानी पर राजस्थान में एक प्रोजेक्ट किया। तब मुझे अहसास हुआ कि मुझे इस क्षेत्र में समय देना चाहिए। उसके बाद मैंने अपनी जल यात्रा पूरी की और अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए 2019 में ग्राम संस्था की नींव डाली।
राजस्थान में पानी से जुड़ी कौन सी समस्या सबसे बड़ी है और उसका हल क्या हो सकता है?
यात्रा के दौरान मैंने पाया कि राजस्थान के पास पानी को संरक्षित करने की अपनी खुद की एक समझ थी। लेकिन धीरे-धीने कहीं न कहीं हम लोग आधुनिकता की ओर बढ़ चुके हैं। पहले जल स्रोतों को सामुदायिक प्रयासों के साथ संरक्षित किया जाता था। लेकिन अब सब कुछ सरकारी सिस्टम के हवाले हो गया है। कहीं न कहीं एक गवर्नेंस गैप मुझे राजस्थान में देखने को मिला। सच पूछिए तो गवर्नेंस गैप हर राज्य में है, लोग इस बात से अवगत हैं कि पानी की समस्या दिन पर दिन गहरा रही है। राजस्थान के कई इलाकों में पानी पीने के लायक नहीं है। गुणवत्ता की बात करें तो यहां कई जगह पानी सलाइन है। ऐसी जगहों पर पीने के पानी की उपलब्धता के बारे में सरकार को कदम उठाने चाहिए।
राजस्थान के अलावा बाकी के 9 राज्यों में सबसे ज्यादा सकारात्मक चीज कहां देखने को मिली?
मैं जिन-जिन राज्यों में गया, वहां मुझसे लोग एक ही सवाल करते थे - आपको पिछला राज्य कैसा लगा? जब मैं बताता था कि मुझे लोगों का समयोग मिला, तो लोग कहते थे, "यहां आपको और ज्यादा सहयोग मिलेगा और हम लोग ज्यादा बेहतर हैं।" मेरी यात्रा का अधिकांश भाग दूर-दराज़ के गॉंवों और आदिवासी क्षेत्रों से गुज़री।
यात्रा को 10 साल हो गए, तब जो समस्याएं देखीं, क्या अब उनका समाधान दिखाई दे रहा है?
10 साल पहले जिस नज़रिए से चीजों को देखा था और आज अनुभव के साथ चीजों को देखता हूं। बात अगर सकारात्मक चीजों की करें तो आज तमाम लोग आगे आये हैं जो पानी पर काम कर रहे हैं। सरकार ने भी कई सारी योजनाएं लागू की हैं, लेकिन हां पॉलिसी चीजों को लागू करने की अभी भी बहुत जरूरत है।
पेय जल से जुड़ी सरकारी योजनाओं की सफलता को आप कैसे देखते हैं?
जल जीवन मिशन, अटल भूजल योजना, आदि कई योजनाएं हैं जो देश भर में अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं। लेकिन जिन गॉंवों या आदिवासी क्षेत्रों में कम्युनिटी द्वारा जल प्रबंधन का पुराना सिस्टम हुआ करता था, वो पीछे छूट रहा है। मेरी राय में समुदायों को साथ लेकर चलने की जरूरत है, ताकि इन योजनाओं की मॉनीटरिंग अच्छी तरह हो सके। इसके अलावा सरकार को समुदायों से फीडबैक लेने की जरूरत है, कि आपको पानी मिला कि नहीं मिला, कितना मिला, कैसे मिला, पानी की गुणवत्ता, आदि या फिर योजना को और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है, जैसे सवाल करने चाहिए। जहां भी कमियां पायी जाएं उन्हें तुरंत एड्रेस करने की जरूरत है।
कृषि में इस्तेमाल हो रहे भूजल पर आपका क्या दृष्टिकोण है?
हमारे देश में मीठे पानी की सबसे ज्यादा खपत सिंचाई में ही होता है। 60 से 65 प्रतिशत पानी भूजल है। मैंने कई अन्य देशों की ग्राउंडवॉटर पॉलिसी पढ़ीं तो पाया कि कई देशों में यह नीति है कि ज़मीन आपकी है तो ठीक है, लेकिन उसके नीचे मौजूद पानी पर आपका एकल अधिकार नहीं हो सकता। कई देशों में ग्राउंड वॉटर पर केवल सरकार का अधिकार होता है और उसका डिस्ट्रिब्यूशन भी वही तय करती है। हमारे देश में 2 करोड़ से अधिक निजी बोरवेल ऑपरेट हो रहे हैं। ऐसे में जिन लोगों के पास बोरवेल है उनके लिए सरकार को यह accountability तय करनी चाहिए कि जितना भूजल निकाला जा रहा है, उतना रिचार्ज हो रहा है या नहीं। यह देखने की जरूरत है कि जिनके पास बोरवेल है उसने कितने चेक डैम बनाये हैं कितने तालाब बनाए हैं, आदि क्योंकि हमें रिचार्ज के उपाय भी पहले से तय करने हैं।
सोलर पंपों के जरिए अंधाधुंध पानी निकाला जा रहा है, इसे कैसे नियंत्रित किया जाए?
आज टेक्नोलॉजी हमारे पास है जिससे हम पता कर सकते हैं कि एक बिघा खेत में किस फसल कि लिए कितना पानी चाहिए। और हम यह भी जानते हैं कि एक सोलर पंप कितनी देर में कितना पानी ज़मीन से निकाल सकता है। इसके लिए फसल के हिसाब से सोलर पंप को चलाने की टाइमिंग सेट करने की जरूरत है। किसानों को भी इसके लिए जागरूक होना पड़ेगा। जिन किसानों के घर में सोलर पंप लगे हैं, उसके खेत के हिसाब से उसे कितने पानी की जरूरत है उस हिसाब से उसने कितनी देर मोटर चलाई, इस पर निगरानी की जरूरत है। यही चीज शहरों में भी लागू करने की जरूरत है। लेकिन शहरों में मोटर से इतनी बर्बादी नहीं होती क्योंकि अलार्म आदि लगे रहते हैं।
ग्राम एसोसिएशन के पीछे मूल उद्देश्य क्या था?
अपनी जल यात्रा के दौरान जब मैं केरल पार करते हुए कन्याकुमारी पहुंचा तो सामने एक समुद्री तट था। तब मैंने खुद से सवाल किया - इसके आगे क्या है? तब मैं अगेला समुद्र को निहार रहा था, पीछे पलट कर देखा तो अहसास हुआ कि भारत का बड़ा हिस्सा कवर करके आये हैं। तो इस यात्रा को यूं ही समाप्त नहीं कर देना चाहिए। तभी निर्णय लिया की मैं आगे की यात्रा गाँव से शुरू करूंगा। मेरा विश्वास है, आत्मनिर्भर भारत तभी बनेगा जब आत्मनिर्भर गाँव बनेंगे।
जलधाराओं को खत्म होने से रोकने के लिए क्या उपाय करने चाहिए? या फिर इस दिशा में किस प्रकार के सामूहिक प्रयास किए जा सकते हैं?
मैंने अपने साथियों के साथ एक जल धारा पर काम किया था, उस अनुभव के आधार पर मैं कहना चाहूंगा कि जल धारा को बचाने का मतलब केवल पानी के स्रोत को बचाना नहीं है, इसके लिए हमें पेड़ पौधों को बचाने की जरूरत है। उदाहरण के तौर पर रांची को ले लीजिए। यह शहर एक पहाड़ी क्षेत्र में बसा हुआ है। यहां जलभृत पहाड़ियों के अंदर क्रैक में होते हैं, पॉकेट के रूप में। आम तौर पर एक्विफर आस-पास से कनेक्ट होते हैं। अक्सर जलभृत में आने वाला पानी पेड़ से रिस कर आता है। हमने देखा कि जिन जल धाराओं के आस-पास के पेड़-पौधे कटने शुरू हो गए, वो जल धाराएं सूख गईं। हमें यह समझना होगा कि पेड़ और पानी का रिश्ता बहुत गहरा होता है। अगर हमें धाराओं को बचाना है तो पेड़ भी बचाने होंगे। समुदाय यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि धाराओं के आस-पास के जो वनस्पति हैं, उन्हें हम लोग न काटें। जलधाराओं को आगे की जैव विविधता भी निर्भर करती है, इसलिए अगर हम पेड़ काट रहे हैं तो धाराओं के साथ-साथ पहाड़ के निचले हिस्से की जैव विविधता भी प्रभावित होती है।
शहर में रहने वाले युवाओं में पानी के प्रति जिम्मेदारी का भाव कैसे लाया जा सकता है?
पानी के प्रति जिम्मेदारी का भाव तभी आयेगा जब आप छोटी-छोटी बचत करेंगे। अगर मुझे घर से निकलना है तो मैं पानी पी कर निकलता हूं और साथ लेकर निकलता हूं, ताकि ये नहीं कि प्यास लगने पर पानी खरीदना पड़े। अगर आपके घर के पास जल निकाय जैसे तालाब, झील आदि हैं, तो वॉलेंटियर करके उसकी साफ-सफाई में हाथ बटाइये, कुछ नहीं तो लोगों को जागरूक करने का ही काम करें। आपके छोटे प्रयास आपके साथ-साथ आने वाली जैनरेशन को मदद करेंगे।
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