आजादी के 79 साल : खाद्यान्न उत्पादन में तो भारत आत्मनिर्भर हो गया है, पर ‘जल-सुरक्षा' के मामले में स्थिति चिंताजनक होती जा रही है।
फोटो : इंडिया वाटर पोर्टल
स्वतंत्रता दिवस विशेष : 15 अगस्त पर देश में पानी की ऐतिहासिक और मौजूदा स्थिति का एक तुलनात्मक अध्ययन
15 अगस्त 1947 को भारत ने राजनीतिक आजादी हासिल की थी। उस समय देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक खाद्य सुरक्षा थी। स्वतंत्रता के शुरुआती दशकों में हरित क्रांति जैसे अभियानों के जरिए भारत ने खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल कर इस लक्ष्य को काफी हद तक प्राप्त कर लिया। आज़ादी के शुरुआती तीन-चार दशकों तक हमारा और देश के नीति नियंताओं का फोकस खाद्यान्न उत्पादन, दुग्ध उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन जैसे अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाले लक्ष्यों पर टिका रहा। इस बीच दबे पांव एक गंभीर संकट ने देश में अपने पांव जमा लिए। यह है जल संकट।
सैकड़ों नदियों, झीलों, तालाबों और पारंपरिक जल स्रोतों वाले हमारे देश में शायद कभी किसी ने गंभीरता से नहीं सोचा था कि पानी का संकट भी एक विकराल समस्या बन सकता है। पानी को लेकर इसी निश्चिंतता या लापरवाही ने देश को आज एक निरंतर गहराते जल संकट के कगार पर ला खड़ा किया है। आज भूजल संकट, नदियों का प्रदूषण, सूखती झीलें और बढ़ता जल तनाव देश की सबसे बड़ी समस्याओं और पर्यावरणीय और विकास संबंधी चुनौतियों में शामिल हैं। इसलिए आज स्वतंत्रता के 79वें वर्ष में हमें खुद से एक अहम सवाल यह भी पूछना चाहिए कि क्या हम अपने सबसे बुनियादी प्राकृतिक संसाधन पानी के मामले में भी आत्मनिर्भर हो पाए हैं?
1947 में भारत के विभाजन के साथ सिंधु नदी तंत्र भी दो देशों में बंट गया। सिंधु, झेलम और चिनाब का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में था, जबकि रावी, व्यास और सतलज भी दोनों देशों से होकर बहती थीं। पानी को लेकर शुरुआती विवादों के बाद विश्व बैंक की मध्यस्थता में करीब नौ साल की बातचीत हुई और 19 सितंबर 1960 को भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर हुए। इस ऐतिहासिक संधि ने तीन पूर्वी नदियों रावी, व्यास और सतलज का पानी भारत के लिए और तीन पश्चिमी नदियों सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया। औसत प्रवाह के आधार पर भारत को करीब 33 MAF और पाकिस्तान को करीब 135 MAF पानी मिला। हालांकि पश्चिमी नदियों पर भारत को घरेलू इस्तेमाल, सीमित सिंचाई और तय शर्तों के तहत जलविद्युत उत्पादन की अनुमति है। इसी तरह शुरुआती 10 साल के संक्रमण काल में भारत को पूर्वी नदियों का कुछ पानी पाकिस्तान को देना था।
| नदी | मुख्य जल-उपयोग का अधिकार | नदी-समूह | औसत वार्षिक प्रवाह | पानी के उपयोग से जुड़ी प्रमुख शर्त |
|---|---|---|---|---|
| रावी | भारत | पूर्वी नदियां (कुल) | 33 MAF | भारत को व्यापक उपयोग; 10 वर्ष के संक्रमण काल में पाकिस्तान को निर्धारित आपूर्ति |
| व्यास | भारत | पूर्वी नदियां (कुल) | 33 MAF | भारत को व्यापक उपयोग; 10 वर्ष के संक्रमण काल में पाकिस्तान को निर्धारित आपूर्ति |
| सतलज | भारत | पूर्वी नदियां (कुल) | 33 MAF | भारत को व्यापक उपयोग; 10 वर्ष के संक्रमण काल में पाकिस्तान को निर्धारित आपूर्ति |
| सिंधु | पाकिस्तान | पश्चिमी नदियां (कुल) | 135 MAF | पाकिस्तान के लिए मुख्य उपयोग; भारत को घरेलू उपयोग, सीमित सिंचाई और निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत की अनुमति |
| झेलम | पाकिस्तान | पश्चिमी नदियां (कुल) | 135 MAF | पाकिस्तान के लिए मुख्य उपयोग; भारत को घरेलू उपयोग, सीमित सिंचाई और निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत की अनुमति |
| चिनाब | पाकिस्तान | पश्चिमी नदियां (कुल) | 135 MAF | पाकिस्तान के लिए मुख्य उपयोग; भारत को घरेलू उपयोग, सीमित सिंचाई और निर्धारित शर्तों के तहत जलविद्युत की अनुमति |
| नोट | 33 MAF और 135 MAF नदी-समूहों का औसत प्रवाह है, किसी एक नदी का अलग-अलग प्रवाह नहीं। | |||
नोट: 33 MAF और 135 MAF नदी-समूहों का औसत प्रवाह है, किसी एक नदी का अलग-अलग प्रवाह नहीं।
भारत में पानी की उपलब्धता की सबसे बड़ी कहानी बढ़ती आबादी के साथ बदलते प्रति व्यक्ति हिस्से की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1951 में देश में प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक जल उपलब्धता 5177 घन मीटर थी। 1991 में यह घटकर 2209 घन मीटर और 2001 में 1820 घन मीटर रह गई। 2011 में यह 1545 घन मीटर थी।
केंद्रीय जल आयोग के 2019 के पुनर्मूल्यांकन के आधार पर 2021 में औसत वार्षिक प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1486 घन मीटर आंकी गई। 2031 में इसके 1367 घन मीटर तक पहुंचने का अनुमान है।
1951 के 5177 घन मीटर की तुलना में 2021 का 1486 घन मीटर आंकड़ा देखें तो प्रति व्यक्ति उपलब्धता में लगभग 71 % की गिरावट दिखाई देती है। हालांकि इन आंकड़ों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग वर्षों के जल संसाधन आकलन में पद्धतियों में अंतर भी रहे हैं। फिर भी व्यापक तस्वीर साफ है: देश में पानी की कुल उपलब्धता सीमित है और आबादी बढ़ने के साथ प्रत्येक व्यक्ति के हिस्से में आने वाला पानी लगातार घट रहा है।
भारत को नदियों और मानसून से समृद्ध देश माना जाता है। देश में औसतन करीब 4000 अरब घन मीटर वर्षा होती है। लेकिन, इसका पूरा पानी हमारे इस्तेमाल के लिए उपलब्ध नहीं होता। केंद्रीय जल आयोग के पुराने राष्ट्रीय आकलनों में औसत वार्षिक जल उपलब्धता करीब 1869 अरब घन मीटर और उपयोग योग्य जल संसाधन करीब 1123 अरब घन मीटर आंके गए थे।
केंद्रीय जल आयोग और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र के सहयोग से किए गए 2019 के पुनर्मूल्यांकन में औसत वार्षिक जल संसाधन उपलब्धता 1999.20 अरब घन मीटर और उपयोग योग्य मात्रा करीब 1126 अरब घन मीटर आंकी गई।
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है। बारिश के रूप में आसमान से गिरने वाला या नदियों में बहने वाला पूरा पानी हमारे लिए उपलब्ध नहीं हो जाता। भौगोलिक, जलवैज्ञानिक और स्थलाकृतिक से जुड़ी स्थितियों व बाधाओं के कारण इसका एक बड़ा हिस्सा उपयोग में नहीं लाया जा सकता।
यही वजह है कि भारत की जल समस्या केवल “पानी कितना है” का सवाल नहीं है। असली सवाल यह है कि पानी कहां है, कब है, कितनी मात्रा में उपलब्ध है और हम उसका इस्तेमाल कितनी दक्षता से कर रहे हैं।
भारत की पानी की कहानी में भूजल की भूमिका शायद सबसे महत्वपूर्ण है। खेतों की सिंचाई से लेकर गांवों और शहरों के पेयजल तक, देश का एक बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे मौजूद पानी पर निर्भर है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार सिंचाई में भूजल की हिस्सेदारी 2007-08 के 61% से बढ़कर 2016-17 में 64% हो गई। देश की लघु सिंचाई योजनाओं में भी भूजल आधारित योजनाओं की हिस्सेदारी 94.8% है।
ग्रामीण भारत में भूजल की अहमियत और स्पष्ट हो जाती है। केंद्रीय भूजल बोर्ड यानी CGWB के अनुसार देश की करीब 85% ग्रामीण आबादी पेयजल और घरेलू जरूरतों के लिए भूजल का इस्तेमाल करती है। इसका अर्थ है कि हरित क्रांति और कृषि उत्पादन बढ़ाने की जिस यात्रा ने भारत को खाद्य सुरक्षा दी, उसमें भूजल की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण रही। लेकिन इसी सफलता ने एक नया संकट पैदा किया है।
जब जमीन के नीचे से निकाला जाने वाला पानी बारिश और प्राकृतिक पुनर्भरण से वापस आने वाले पानी से ज्यादा हो जाता है, तो जलभृतों पर दबाव बढ़ता है। कई इलाकों में यही हो रहा है।
भूजल संकट की तस्वीर अब केवल कुछ सूखाग्रस्त जिलों या शहरों तक सीमित नहीं है। 2025 के नवीनतम गतिशील भूजल संसाधन आकलन में देश की 6762 आकलन इकाइयों (Assessment units) का अध्ययन किया गया। इस अध्ययन से देश में पानी को लेकर एक चिंताजनक स्थिति उभर कर सामने आती है -
| भूजल स्थिति | आकलन इकाइयां | हिस्सेदारी |
|---|---|---|
| अति-दोहित | 730 | 10.80% |
| गंभीर | 201 | 2.97% |
| अर्ध-गंभीर | 758 | 11.21% |
| सुरक्षित | 4946 | 73.14% |
| लवणीय | 127 | 1.88% |
इस तरह 1689 इकाइयां, यानी करीब 25 % आकलन इकाइयां अति-दोहित (Over-exploited), गंभीर (Critical) या अर्ध-गंभीर (semi-critical category) श्रेणी में हैं। अति-दोहित क्षेत्रों में भूजल का वार्षिक दोहन उपलब्ध वार्षिक निकासी योग्य संसाधन से भी अधिक है। 2025 में देश का कुल वार्षिक भूजल पुनर्भरण 448.52 अरब घन मीटर आंका गया, जबकि निकासी योग्य भूजल संसाधन 407.75 अरब घन मीटर और कुल भूजल दोहन 247.22 अरब घन मीटर था। देश का औसत भूजल दोहन स्तर 60.63 % रहा।
यह राष्ट्रीय औसत देखने में बहुत चिंताजनक नहीं लगता, लेकिन इसमें क्षेत्रीय असमानता छिप जाती है। पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और कुछ अन्य राज्यों के कई इलाके कहीं ज्यादा दबाव में हैं। यानी समस्या यह नहीं है कि पूरा भारत एक साथ सूख रहा है, बल्कि यह है कि जहां पानी की मांग और आर्थिक गतिविधियां ज्यादा हैं, वहां स्थानीय जलभृत तेजी से दबाव में आ रहे हैं।
पानी उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है। वह पीने, खेती और पारिस्थितिकी के लिए सुरक्षित भी होना चाहिए।
केंद्रीय भूजल बोर्ड के नवीनतम गुणवत्ता आकलनों में भूजल में अलग-अलग क्षेत्रों में आर्सेनिक, फ्लोराइड, नाइट्रेट, आयरन, लवणता, यूरेनियम, मैंगनीज और कुछ भारी धातुओं की समस्या सामने आती रही है। CGWB का 2025 का आकलन भी बताता है कि देश में भूजल सामान्य तौर पर पीने योग्य है, लेकिन कई इलाकों में स्थानीय स्तर पर प्रदूषक निर्धारित सीमाओं से ऊपर पाए जाते हैं।
यह समस्या कितनी व्यापक हो सकती है, इसका एक संकेत 2022-23 के सरकारी आंकड़ों से मिलता है। उस आकलन में नाइट्रेट की निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा वाले 443 जिलों, फ्लोराइड वाले 263 जिलों, आयरन वाले 356 जिलों और आर्सेनिक वाले 118 जिलों की पहचान की गई थी। यूरेनियम भी 132 जिलों में पाया गया था। ये आंकड़े प्रभावित जिलों में मौजूद हर स्थान के प्रदूषित होने का अर्थ नहीं हैं, बल्कि संबंधित जिलों में निगरानी किए गए कुछ स्थानों पर समस्या मिलने को दर्शाते हैं।
यानी पानी की आजादी का मतलब केवल यह नहीं हो सकता कि नल में पानी आ रहा है। यह भी जरूरी है कि उस नल तक पहुंचने वाला पानी सुरक्षित हो।
भारत की जल संपदा की दूसरी बड़ी धुरी उसकी नदियां हैं। लेकिन बढ़ते शहरीकरण, घरेलू सीवेज, औद्योगिक प्रदूषण और अन्य मानवीय गतिविधियों ने अनेक नदी तंत्रों पर दबाव बढ़ाया है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की 2025 की प्रदूषित नदी खंडों की रिपोर्ट में 623 नदियों का आकलन किया गया। इनमें 271 नदियों में 296 प्रदूषित नदी खंड पाए गए। हालांकि यह भी एक महत्वपूर्ण सकारात्मक संकेत है कि प्रदूषित नदी खंडों की संख्या 2018 के 351 से घटकर 2025 में 296 हुई है और पहले से चिन्हित 219 प्रदूषित खंडों में सुधार दर्ज किया गया।
इसलिए तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। कई नदियों में सुधार संभव हुआ है। लेकिन दूसरी ओर सैकड़ों प्रदूषित नदी खंड यह याद दिलाते हैं कि नदी को केवल पानी के स्रोत के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। नदी स्वयं एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र है।
देश की ज्यादातर नदियों में औद्योगिक प्रदूषण के कारण पेयजल आपूर्ति की स्थिति गंभीर होती जा रही है और मुख्य रूप से अब भूजल ही सहारा रह गया है।
भारत के सामने आने वाली सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मांग और उपलब्धता के बीच संतुलन बनाए रखना होगी। राष्ट्रीय जल आयोग के आकलन के अनुसार 2050 में देश की पानी की जरूरत उच्च मांग परिदृश्य में करीब 1180 अरब घन मीटर हो सकती है। दूसरी ओर 2019 के पुनर्मूल्यांकन में उपयोग योग्य जल संसाधन करीब 1126 अरब घन मीटर आंके गए हैं। हालांकि इस तुलना को भविष्य की निश्चित कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि दोनों आंकड़े अलग-अलग अध्ययनों और समय की पद्धतियों से आए हैं। इसके बावजूद यह तुलना एक गंभीर संकेत जरूर देती है कि यदि पानी के इस्तेमाल का तरीका नहीं बदला गया तो उपलब्ध संसाधनों पर मांग का दबाव लगातार बढ़ता जाएगा।
पुराने सरकारी अनुमानों में 2050 तक पानी की मांग 1447 अरब घन मीटर तक पहुंचने की संभावना भी जताई गई थी, जो उपयोग योग्य जल संसाधनों से करीब 30 % अधिक होती। इसी संदर्भ में जल उपयोग की दक्षता बढ़ाने और बेहतर जल शासन की जरूरत पर जोर दिया गया था। इसलिए भविष्य की जल सुरक्षा केवल नए बांध बनाने या और ज्यादा भूजल निकालने से हासिल नहीं होगी। इसके लिए पानी की मांग को नियंत्रित करना, खेती में पानी की दक्षता बढ़ाना, वर्षाजल को जमीन में पहुंचाना, शहरों में अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग करना और नदियों तथा जलभृतों को स्वस्थ रखना जरूरी होगा।
आजादी के बाद भारत ने हरित क्रांति से खाद्य सुरक्षा के मोर्चे पर एक लंबी यात्रा तय की। लेकिन, इस विकास मॉडल की अपनी पर्यावरणीय कीमत भी रही, खासकर उन इलाकों में जहां सिंचाई के लिए भूजल पर अत्यधिक निर्भरता बढ़ी। आज हमारे सामने चुनौती अलग है। हमें अधिक पानी पैदा नहीं करना है। हमें उपलब्ध पानी को बचाना, पुनर्भरण करना, प्रदूषण से बचाना और अधिक न्यायपूर्ण ढंग से इस्तेमाल करना है।
जल आत्मनिर्भरता का मतलब हर शहर या हर गांव में पानी का असीमित भंडार होना भी नहीं है। इसका मतलब है कि किसी इलाके की जल जरूरतें उसके स्थानीय जल संसाधनों की वहन क्षमता के भीतर रहें और बारिश के पानी, भूजल, नदियों, तालाबों और पुनर्चक्रित पानी के बीच संतुलन बनाया जाए। इसका स्पष्ट मतलब है कि भविष्य में हमें “जल सुरक्षा” को केवल सरकारी योजना नहीं, बल्कि विकास की बुनियादी शर्त समझना होगा। जिस प्रकार 1947 में मिली आजादी का अर्थ था विदेशी शासन से मुक्ति। उसी प्रकार आज आजादी के 79 साल बाद भारत के सामने स्वतंत्रता को कुछ नए मायनों में तलाशने की आवश्यकता दिखाई दे रही है-
सूखे से आजादी।
जल संकट से आजादी।
गिरते भूजल से आजादी।
जल प्रदूषण से आजादी।
पानी खत्म करने वाली विकास व्यवस्था से आजादी
स्वतंत्रता दिवस पर जब लाल किले पर लहराते तिरंगे तले हम देश की उपलब्धियों का उत्सव मनाएंगे, तब पानी का सवाल हमें अपनी एक दूसरी जिम्मेदारी भी याद दिलाएगा। आने वाली पीढ़ियों को एक जल संकट मुक्त देश सौंपने की जिम्मेदारी भी है। इसलिए आज हमारी लड़ाई किसी दूसरे से नहीं, बल्कि पानी के प्रति हमारी अपने लापरवाही से ही है। और इस लड़ाई को जीतते हुए हमें एक ऐसा भारत बनाना होगा, जहां वाली पीढ़ियों को विकास की कीमत नदियों के सूखने, भूजल के खत्म होने के रूप में न चुकानी पड़े।
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