झांसी के 140 साल पुराने पारीछा बांध को ICID ने वर्ल्ड हेरिटेज इरिगेशन स्ट्रक्चर्स (WHIS) के रूप में मान्यता दी है।
फोटो : विकी कॉमंस
बलिया के सुरहा ताल को देश के 100वें रामसर स्थल के रूप में देश और दुनिया के पर्यावरणीय नक्शे पर स्थान दिलाने के बाद उत्तर प्रदेश ने अपनी अंतरराष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने वाली एक और उपलब्धि हासिल की है। झांसी का 140 साल पुराना पारीछा बांध को अब वैश्विक विरासत स्थलों की सूची में शामिल कर लिया गयाहै। इंटरनेशनल कमीशन ऑन इरिगेशन एंड ड्रेनेज (International Commission on Irrigation and Drainage यानी ICID) ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज इरिगेशन स्ट्रक्चर्स (WHIS) के रूप में मान्यता दे दी है। पारीक्षा बांध को यह दर्ज़ा मिलने के बाद फ्रांस में 14 अक्टूबर को होने वाली 26वीं आईसीआईडी इंटरनेशनल कांग्रेस और 77वीं इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव काउसिंल की मीटिंग में WHIS Award - 26 दिया जाएगा।
यहां यह जान लेना भी ज़रूरी है कि पारीछा बांध को UNESCO की विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) की सूची में शामिल नहीं किया गया है। बल्कि, ICID ने World Heritage Irrigation Structure (WHIS) के रूप में मान्यता दी है और ICID खुद स्पष्ट करता है कि WHIS की अवधारणा UNESCO World Heritage Sites की तर्ज पर है, लेकिन दोनों अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं। पारीछा बांध को यह सम्मान औपचारिक रूप से 12-17 अक्टूबर के बीच आयोजित होने वाली ICID बैठक में 14 अक्टूबर को फ्रांस के मार्सेई में होने वाली ICID बैठक में दिया जाएगा। इस अंतरराष्ट्रीय मान्यता का उद्देश्य एक सदी से अधिक पुरानी और आज भी उपयोगी सिंचाई एवं जल प्रबंधन संरचनाओं को पहचान देना और उनके संरक्षण पर ध्यान आकर्षित करना है। ICID के मानदंडों में संरचना की उम्र के साथ उसकी इंजीनियरिंग, सिंचाई में योगदान, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव तथा लंबे समय तक सफल संचालन को भी महत्व दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश के सिंचाई एवं जल संसाधन विभाग को 13 अगस्त को इस बारे में ICID की ओर से एक पत्र मिला है। इसमें झांसी के 140 साल पुराने पारीछा बांध को फ्रांस के मार्सेई में 14 अक्टूबर में होने वाली 26वीं आईसीआईडी इंटरनेशनल कांग्रेस और 77वीं इंटरनेशनल एग्जीक्यूटिव काउसिंल मीटिंग के दौरान डब्ल्यूएचआईएस अवार्ड-26 दिया जाएगा। पत्र में संस्था ने इसके लिए विभाग के अधिकारियों को आमंत्रित किया है।
| तथ्य | आंकड़ा |
|---|---|
| नाम | पारीछा बांध/पारीछा वियर |
| स्थान | झांसी जिला, उत्तर प्रदेश |
| नदी | बेतवा नदी |
| निर्माण/पूरा होने का वर्ष | 1886 |
| निर्माण अवधि | 1881–1886 |
| लंबाई | 1,174.6 मीटर |
| ऊंचाई | 16.77 मीटर |
| सकल जल भंडारण क्षमता | 78.76 मिलियन घन मीटर (MCM) |
| जीवित जल भंडारण क्षमता | 78.76 मिलियन घन मीटर (MCM) |
| गेटों की संख्या | 318 स्टील फॉलिंग शटर |
| डिजाइन स्पिलवे क्षमता | 22,990 घन मीटर/सेकंड |
| बांध का प्रकार | कंक्रीट ग्रेविटी |
| मुख्य उद्देश्य | बहुउद्देशीय |
| अक्षांश/देशांतर | 25°30′37″N, 78°46′49″E |
पारीछा बांध की योजना 19वीं सदी में बनाई गई थी। वर्ष 1855 में कैप्टन स्ट्रेची ने बुंदेलखंड के लिए नहर प्रणाली विकसित करने का विचार रखा था। इसके बाद सर्वे किया गया। वर्ष 1881 में इसका निर्माण शुरू हुआ और वर्ष 1886 में बांध चालू हो गया। यह उस समय बुंदेलखंड के लोगों और किसानों को लिए एक बड़ी राहत थी, क्योंकि उस दौर में यहां के कुएं, बावड़ी व तालाबों जैसे पारंपरिक जलस्रोतों में पानी की उपलब्धता और खेती मुख्य रूप से मानसून पर निर्भर थी। वर्षा की अनिश्चितता का सीधा असर फसल और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ता था। ऐसे इलाके में नदी के पानी को नियंत्रित करके नहरों के माध्यम से खेतों तक पहुंचाना अपने आप में बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती थी।
पारीछा इसी सोच का हिस्सा था। यह सिर्फ पानी रोकने वाली संरचना नहीं बनी, बल्कि इससे जुड़ी नहर व्यवस्था ने बेतवा के पानी को बड़े कृषि क्षेत्र तक पहुंचाने का रास्ता तैयार किया। समय के साथ यह पूरा नेटवर्क बुंदेलखंड की सिंचाई व्यवस्था की रीढ़ बन गया।पारीछा बांध को डब्ल्यूएचआईएस अवार्ड-26 अवॉर्ड के लिए चुना जाना सिर्फ एक पुराने बांध को सम्मान मिलना नहीं है। यह बुंदेलखंड की उस सिंचाई व्यवस्था की पहचान है, जो लंबे समय से किसानों और खेती के लिए पानी उपलब्ध कराने में काम कर रही है।
पारीछा की सबसे खास बात इसकी उम्र के साथ-साथ इसका विशाल आकार और संचालन व्यवस्था है। यह संरचना करीब 1,174 मीटर लंबी और नदी तल से लगभग 16.8 मीटर ऊंची है। इसमें 318 स्टील के गेट या फॉलिंग शटर हैं, जिनके माध्यम से पानी के प्रवाह और निकासी को नियंत्रित किया जाता है।
यह व्यवस्था उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। 19वीं सदी में आज जैसी आधुनिक कंप्यूटिंग, सैटेलाइट मैपिंग या डिजिटल हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग उपलब्ध नहीं थी। इसके बावजूद नदी के प्रवाह, जल दबाव, बाढ़ और सिंचाई की जरूरतों को ध्यान में रखकर इतनी लंबी जल संरचना तैयार की गई।
पारीछा की मौजूदा जल भंडारण क्षमता भी समय के साथ बढ़ाई गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पहले इसकी क्षमता करीब 1,700 मिलियन क्यूबिक फीट थी, जिसे बढ़ाकर लगभग 2,400 मिलियन क्यूबिक फीट किया गया है। यानी करीब 240 करोड़ घनफीट या लगभग 68 मिलियन घनमीटर पानी।
इसकी उपयोगिता केवल सिंचाई तक सीमित नहीं है। पारीछा जलाशय से पारीछा ताप विद्युत परियोजना को भी पानी मिलता है, जिसकी स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता 920 मेगावाट बताई गई है। मानसून में जब इसके गेट खोले जाते हैं तो यह जगह पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बनती है।
जल संकट से जूझते बुंदेलखंड क्षेत्र के लिए विशेष महत्व रखता है करीब डेढ़ सौ साल पुराना पारीछा बांध।
बुंदेलखंड का नाम आते ही सूखा, पानी की कमी, अनियमित बारिश और खेती की मुश्किलें सामने आती हैं। उत्तर प्रदेश का यह हिस्सा मुख्य रूप से कठोर चट्टानी भूगर्भीय क्षेत्र में आता है, जहां भूजल का भंडारण और उसका दोहन गंगा के मैदानी इलाकों से अलग प्रकृति का है। CGWB के अनुसार उत्तर प्रदेश के दक्षिणी हिस्से में, जिसमें बुंदेलखंड का बड़ा क्षेत्र आता है, कुओं की सामान्य उत्पादकता कई अन्य भूभागों की तुलना में कम है।
ऐसे इलाके में सतही जल संरचनाओं का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। पारीछा इसी कारण केवल एक ऐतिहासिक बांध नहीं, बल्कि क्षेत्र की जल सुरक्षा का हिस्सा है।
पारीछा से जुड़ी बेतवा नहर प्रणाली झांसी, जालौन और हमीरपुर जैसे इलाकों तक सिंचाई का पानी पहुंचाती है। उपलब्ध परियोजना आंकड़ों के अनुसार पारीछा से जुड़ी नहर प्रणाली का कृषि योग्य कमान क्षेत्र करीब 4.27 लाख हेक्टेयर रहा है। एक सरकारी प्रस्तुति में पारीछा के लिए लगभग 2.75 लाख हेक्टेयर सिंचाई क्षमता का आंकड़ा दिया गया है, जबकि अलग-अलग परियोजना दस्तावेजों में कमान और वास्तविक सिंचाई के लिए अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। इसलिए पारीछा से "5 लाख हेक्टेयर" सिंचाई होने के दावे को सीधे इस्तेमाल करने के बजाय परियोजना-विशिष्ट आंकड़ा देना अधिक सुरक्षित है।
इसका महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि बेतवा नदी पर बाद में बनी अन्य जल परियोजनाएं भी इसी व्यापक सिंचाई तंत्र से जुड़ती गईं। पारीछा आज अकेली संरचना नहीं, बल्कि दशकों में विकसित हुए एक बड़े जल प्रबंधन नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
झांसी का पारीछा बांध बेतवा नदी पर बना है। यह करीब 140 साल से बुंदेलखंड की सिंचाई व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह बेतवा नहर प्रणाली का मुख्य हिस्सा है। इस नहर व्यवस्था से बुंदेलखंड के सूखे क्षेत्रों में खेती के लिए पानी पहुंचाया जाता है। पारीछा बांध करीब 1,174 मीटर लंबा है और इसकी ऊंचाई नदी तल से करीब 16.8 मीटर है। इसमें 318 स्टील के गेट लगाए गए हैं। इन गेटों की मदद से पानी को रोकने और जरूरत के हिसाब से छोड़ने का काम किया जाता है। वहीं पिछले कुछ वर्षों में इसकी पानी जमा करने की क्षमता बढ़ाई गई है।
पहले इसकी क्षमता करीब 1,700 मिलियन क्यूबिक फीट थी, जिसे बढ़ाकर करीब 2,400 मिलियन क्यूबिक फीट किया गया। यह बांध 140 साल पुराना होने के बाद भी काम कर रहा है। इस बांध से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई इलाकों में सिंचाई का फायदा मिलता है। बारिश के मौसम में जब बांध के गेट खोले जाते हैं तो यहां पानी का सुंदर दृश्य भी दिखाई देता है। यही वजह है कि यह जगह पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनती है। पारीछा बांध से थर्मल पावर प्रोजेक्ट को भी पानी मिलता है। इस परियोजना की बिजली उत्पादन क्षमता 920 मेगावाट है।
पारीछा की कहानी को समझने के लिए पास की धुकवां वीयर को अलग करके नहीं देखा जा सकता। ICID के अनुसार धुकवां जलाशय पारीछा वीयर के लिए सहायक भंडारण की भूमिका निभाता है और बेतवा नहर प्रणाली के लिए पानी उपलब्ध कराने में मदद करता है।
धुकवां का निर्माण भी इस बात का उदाहरण है कि सिंचाई प्रणाली केवल एक बांध से नहीं बनती। जलाशय, वीयर, नहर, स्लुइस और वितरण प्रणाली मिलकर एक पूरा जल तंत्र तैयार करते हैं। धुकवां से जुड़े आंकड़ों के अनुसार बेतवा नहर प्रणाली की सिंचाई क्षमता इसके निर्माण के बाद लगातार बढ़ी और आज यह बड़े कृषि क्षेत्र को लाभ पहुंचाती है। यही कारण है कि पारीछा को केवल "पुराना बांध" कहना इसके महत्व को छोटा कर देता है। यह करीब डेढ़ सदी से विकसित होते आ रहे एक सिंचाई नेटवर्क की केंद्रीय कड़ी है।
ICID की WHIS सूची में भारत की कई ऐतिहासिक जल संरचनाएं शामिल हैं। 2025 में भारत की चार और संरचनाओं को इस सूची में शामिल किया गया था। इनमें मुख्य रूप से यह चार नाम सबसे पहले लिए जा सकते हैं -
| संरचना | राज्य | जिला/स्थान | निर्माण वर्ष | नदी | लंबाई/क्षमता | सिंचाई क्षेत्र | WHIS में शामिल वर्ष |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चेय्यार अनिकट | तमिलनाडु | तिरुवन्नामलाई जिला, चेय्यार तालुक, अवनियूरम गांव के पास | 1852 | चेय्यार नदी (पालार नदी की सहायक नदी) | लंबाई 70.60 मीटर; चौड़ाई 3 मीटर | 7,851.58 हेक्टेयर | 2025 |
| एकरुख मीडियम प्रोजेक्ट | महाराष्ट्र | सोलापुर जिला, हिप्परगा क्षेत्र | 1866–1871; 1871 में कमीशन | हिप्परगा नदी; कृष्णा बेसिन, सीना उप-बेसिन | बांध की लंबाई 2,134 मीटर; सकल भंडारण क्षमता 62.52 मिलियन घन मीटर; जीवित भंडारण 59.06 मिलियन घन मीटर | 3,005 हेक्टेयर | 2025 |
| कोडिवेरी अनिकट एंड चैनल सिस्टम | तमिलनाडु | इरोड जिला, गोबिचेट्टिपालयम तालुक, कोडिवेरी गांव | 1125 ईस्वी | भवानी नदी | अनिकट की लंबाई 151.20 मीटर; थडापल्ली चैनल 77 किमी और अरक्कनकोट्टई चैनल 32 किमी | 24,500 एकड़ (लगभग 9,915 हेक्टेयर) | 2025 |
| नोय्यल रिवर सिस्टम टैंक | तमिलनाडु | कोयंबटूर, तिरुप्पुर, इरोड और करूर जिले | 1000–1300 ईस्वी | नोय्यल नदी (कावेरी की सहायक नदी) | नोय्यल नदी की लंबाई 158.35 किमी; प्रणाली में 20 अनिकट और 31 टैंक | 9,344 एकड़ (लगभग 3,782 हेक्टेयर) | 2025 |
इस सूची में शामिल होने का आधार केवल बांंध का पुराना होना नहीं है। ICID के अनुसार ऐसी संरचना आमतौर पर 100 वर्ष से अधिक पुरानी होनी चाहिए और उसने सिंचाई, कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था या इंजीनियरिंग के विकास में असाधारण योगदान दिया हो। अपने समय से आगे की डिजाइन, निर्माण तकनीक, लंबे समय तक सफल संचालन और इंजीनियरिंग उत्कृष्टता भी इसके महत्वपूर्ण मानदंड हैं। पारीछा का महत्व भी इसी संदर्भ में है। 1886 में जब यह काम करने लगा, तब बुंदेलखंड में इसका मकसद केवल एक जलाशय बनाना नहीं था। इसके पीछे खेती को मानसून की अनिश्चितता से कुछ हद तक बचाने और नहरों के जरिए पानी को दूर तक पहुंचाने की सोच थी। करीब 140 साल बाद भी इसकी मूल उपयोगिता बनी हुई है। इस लिहाज से पारीछा को भारत की उस लंबी परंपरा का हिस्सा माना जा सकता है जिसमें जल को नियंत्रित करने, संग्रहित करने और खेतों तक पहुंचाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग समाधान विकसित किए गए।
पुरानी भारतीय जल इंजीनियरिंग की बात हो और पुणे का खड़कवासला बांध याद न आए, ऐसा मुश्किल है। 19वीं सदी में पुणे क्षेत्र में पड़े गंभीर सूखे के बाद यहां एक बड़े जलाशय की जरूरत महसूस हुई। खड़कवासला में बांध का निर्माण 1869 में शुरू हुआ और 1879 में पूरा हुआ।
इस परियोजना को सर एम. विश्वेश्वरैया के नाम से भी जोड़ा जाता है और सरकारी प्रकाशन योजना में खड़कवासला बांध को विश्वेश्वरैया द्वारा निर्मित परियोजनाओं में शामिल करते हुए बताया गया है कि यह आज भी पुणे और आसपास के क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत है।
खड़कवासला का महत्व केवल इसकी उम्र नहीं है। यह एक ऐसे समय में बनाया गया जब भारत में बड़े पैमाने पर आधुनिक जल संसाधन इंजीनियरिंग विकसित हो रही थी। कठोर चट्टान पर आधारित इसकी चिनाई वाली संरचना और जल नियंत्रण व्यवस्था उस दौर की इंजीनियरिंग क्षमता का उदाहरण मानी जाती है।
यही परियोजना आगे चलकर पुणे की जल व्यवस्था का आधार बनी। पानशेत और वरसगांव जैसी बाद की परियोजनाओं के साथ इसका एकीकृत उपयोग किया गया, जिससे पुणे की बढ़ती आबादी के लिए जल आपूर्ति और सिंचाई व्यवस्था मजबूत हुई।
पारीछा को WHIS का दर्जा मिलना अपने आप में उपलब्धि है, लेकिन इससे एक दूसरी जिम्मेदारी भी पैदा होती है। पारीछा जैसे बांधों के मामले में चुनौती दोहरी है। एक तरफ इन्हें आधुनिक जल प्रबंधन की जरूरतों के अनुरूप काम में बनाए रखना है, दूसरी तरफ इनके ऐतिहासिक स्वरूप और इंजीनियरिंग विशेषताओं को भी सुरक्षित रखना है। जलवायु परिवर्तन के दौर में अचानक आने वाली अत्यधिक बारिश, बाढ़, लंबे सूखे और बदलते जल प्रवाह जैसी परिस्थितियां पुराने जल ढांचों के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। इसलिए पारीछा की विरासत केवल पत्थर, लोहे और गेटों में नहीं है। इसकी असली विरासत उस विचार में है कि पानी की कमी वाले इलाके में भी वैज्ञानिक योजना, इंजीनियरिंग और सामुदायिक जरूरतों को जोड़कर ऐसी व्यवस्था बनाई जा सकती है जो पीढ़ियों तक काम करे।
बुंदेलखंड आज भी जल संकट से पूरी तरह मुक्त नहीं हुआ है। ऐसे में 140 साल पुराने पारीछा की वैश्विक पहचान एक तरह से अतीत की इंजीनियरिंग को सम्मान देने के साथ भविष्य के लिए भी संदेश है: पानी का स्थायी समाधान केवल नए बांध बनाने में नहीं, बल्कि पुराने जल तंत्रों को समझने, बचाने और बदलती जरूरतों के मुताबिक बेहतर तरीके से संचालित करने में भी छिपा है।
लेटेस्ट अपडेट्स के लिए हमारे व्हाट्सऐप चैनल को फॉलो करें