अलग-अलग साइट पर नीरज वानेखेड़े

 
जल संरक्षण

पानी की हर बूंद को सहेज रहे पांढुर्णा के वाटरमैन नीरज वानखड़े

वाटर वारियर सीरीज में पढ़ें मध्य प्रदेश के पांढुर्णा जिले के वाटर मैन नीरज वानखेड़े की कहानी, जो लोगों को वर्षा जल संचयन के कई तरीके सिखाते हैं, ताकि बारिश का पानी सीधे खेतों में जाए या भूजल रिचार्ज में मदद करे…

Author : सयाली पराते

मध्य प्रदेश के पांढुर्णा  में गर्मियों के दिनों में पानी की चिंता आम है, लेकिन इसी संकट के बीच एक शख्स ऐसे भी है जिन्होंने पानी को बचाना और हर बूंद को सहेजना अपना मिशन बना लिया है। नाम है नीरज वानखेड़े, जो तिगांव के रहने वाले सामाजिक कार्यकर्ता और किसान है। नीरज गांवों और खेतों में जल संरक्षण के छोटे-छोटे उपायों के जरिए बारिश के पानी को रोकने, भूजल रिचार्ज करने और जलस्रोतों को बचाने के लिए लोगों को प्रेरित करते है।  

आम तौर पर बारिश का पानी सूखी जमीन पर बहकर निकल जाता है। वर्षों से ऐसा ही होता आ रहा था, लेकिंग  पांढुर्णा और मध्य प्रदेश के कई जिलों में अब अधिकांश जगहों पर बारिश का पानी खेतों और जलस्रोतों तक पहुंच रहा है। यह संभव हुआ है नीरज के अथक प्रयासों से और  इसी लिए स्थानीय लोग उन्हें ‘वाटरमैन’ कहने लगे है। आखिर नीरज ने  पांढुर्णा में पानी बचाने की यह मुहिम कैसे शुरू की और उनके प्रयासों से जमीन पर क्या बदलाव आया? 

तिगांव से शुरू हुआ सफ़र 

मध्य प्रदेश के  पांढुर्णा  जिले के एक छोटे से गांव तिगांव से शुरू हुआ जल संरक्षण का प्रयास आज कई जिलों तक पहुंच चुका है। सोख्ता गड्ढों, बोर रिचार्ज सिस्टम और मैजिक पिट जैसे प्रयोगों से नीरज न केवल बारिश का पानी जमीन में उतार रहे है, बल्कि गांवों को यह समझाने की कोशिश भी कर रहे है कि जल सुरक्षा सिर्फ पानी लाने से नहीं, उसे बचाने से भी हासिल होगी।

गर्मियों में जब खेतों की मिट्टी सूखने लगती है और गांव के कुओं में पानी नीचे उतर जाता है, तब नीरज की नजर आसमान से ज्यादा जमीन पर रहती है। वे यह देखने की कोशिश करते है कि बारिश की अगली बूंद जमीन पर गिरने के बाद जाएगी कहां?

उनके लिए बारिश का पानी बहकर नदी में चले जाना हमेशा अच्छी बात नहीं है। अगर वही पानी खेत में कुछ देर रुक जाए, तालाब में जमा हो जाए या किसी गड्ढे के रास्ते जमीन के भीतर चला जाए, तो वह आने वाले महीनों में किसी कुएं, बोरवेल या खेत के लिए जीवन बन सकता है। यही सोच पिछले कुछ  समय से नीरज को पानी बचाने के काम में लगाए हुए है। नीरज बताते हैं की शुरुआत में लोग उनके काम को संदेह की नजर से देखते थे। , लेकिन अब सब उनके साथ मिलकर काम करते है ।

धीरे-धीरे भरोसा बढ़ा

नीरज बताते है की आज वे मध्य प्रदेश के कई जिलों में छिन्दवाड़ा, पांढुर्णा, मुलताई आदि और छत्तीसगढ़ के करीब 8-10 जिलों धमतरी, दुर्ग, जशपुर, रायगढ़, बिलासपुर, मुंगेरी, सारणगढ़, भिलाई, बालोद,  आदि में जल संरक्षण और पर्यावरण के काम से जुड़े है। उनके काम की शुरुआत जागरूकता से हुई थी, लेकिन बाद में उन्होंने जमीन पर छोटे-छोटे प्रयोग करने शुरू किए। इन प्रयोगों में सोख्ता गड्ढा, बोर रिचार्ज सिस्टम, वर्षा जल संचयन और मैजिक पिट प्रमुख है। 

वे बताते है की इसकी शुरआत तब हुई जब उन्होंने बचपन में अपने गांव में महिलाओं को दूर से पानी लाते हुए देखा,महिलाएं बड़ी दूर से थोडासा पानीला पति थी,  जिसके बाद 2011 में हमने पानी बचाने के बारे में सोचा। 2012 में श्रद्धा सबुरी संस्था की स्थापना की। गांव के लोगों से मुलाकात हुई और डैम की सफाई का काम शुरू किया। 

महाराष्ट्र में जल संरक्षण के कामों को देखने के बाद समझ आया कि सिर्फ डैम सफाई से पानी की समस्या हल नहीं होगी। इसके बाद पानी फाउंडेशन की ट्रेनिंग के बारे में पता चला और चार लोगों की टीम ने महाराष्ट्र के पिंपलगांव के नाम से प्रशिक्षण में हिस्सा लिया। जहां 2016-17 में हमने ट्रेनिंग ली।

शुरुआत में कुछ लोगों ने मिलकर संस्था बनाई और 8–10 लोगों की टीम के साथ काम शुरू किया। करीब 5-6 साल तक उन्होंने गांव-गांव जाकर जल संरक्षण को लेकर जागरूकता अभियान चलाया। पंपलेट और बातचीत के जरिए लोगों को समझाया कि पानी बचाना क्यों जरूरी है और जल संरक्षण से उन्हें क्या फायदे मिल सकते हैं। 

जब पानी बचाने की शुरुआत पोस्टर से हुई

नीरज वानखड़े के शुरुआती दिनों में जल संरक्षण का काम मुख्य रूप से जागरूकता तक सीमित था। वे गांव-गांव जाकर लोगों को पंपलेट देते और समझाते कि पानी क्यों बचाना चाहिए और जल संरक्षण से क्या फायदा हो सकता है।

लेकिन उन्हें जल्द ही महसूस हुआ कि केवल बोलकर बताने और पंपलेट से लोगों की आदत बदलना मुश्किल है। लगभग पांच-छह साल तक वे और उनकी टीम इस तरह जागरूकता का काम करते रहे। फिर उन्हें एक प्रशिक्षण का अवसर मिला। वे पानी फाउंडेशन से मिले प्रशिक्षण ने उनके काम का तरीका बदल दिया।

वे बताते है की प्रशिक्षण में उन्होंने सीखा कि पानी को सिर्फ बचाने की बात करने के बजाय उसके बहाव को समझना जरूरी है। पहाड़ी से आने वाले पानी को कैसे रोका जाए, सोख्ता गड्ढा कैसे बनाया जाए, बोल्डर पिचिंग, गेबियन, डीप सीसीटी और एलबीएस कंट्रोल जैसी संरचनाओं से पानी की गति कैसे कम की जा सकती है? इन तकनीकों को उन्होंने प्रशिक्षण में समझा।

साथ ही उन्होंने यह भी सीखा कि जल संरक्षण अकेले व्यक्ति का काम नहीं है। इसके लिए सामूहिक भागीदारी जरूरी है। प्रशिक्षण से लौटने के बाद उन्होंने अपने गांव में इन तकनीकों को आजमाना शुरू किया।

जल संरक्षण में नीरज के प्रयास 

30-35 सोख्ता गड्ढों से बदला काम का तरीका

प्रशिक्षण के बाद नीरज ने एक कंपनी और ग्रामीणों के सहयोग से गांव में करीब 30 से 35 सोख्ता गड्ढे बनवाए। इनका उद्देश्य घरों या गांव में बह जाने वाले गंदे पानी को सीधे नाले में जाने देने के बजाय उसे जमीन के भीतर पहुंचाना था। सोख्ता गड्ढे में पानी को फिल्टर करते हुए जमीन में उतारने की व्यवस्था की गई।

यहीं से लोगों ने पहली बार उनके काम को केवल जागरूकता अभियान  के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देखना शुरू किया। नीरज के लिए यह प्रयोग महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे उन्हें समझ आया कि जल संरक्षण के लिए हमेशा बड़े बांध या बड़े बजट की जरूरत नहीं होती। कई बार एक छोटा-सा गड्ढा भी पानी के रास्ते को बदल सकता है।

इसके बाद उन्होंने ग्रामीणों और युवाओं के साथ मिलकर जाम नदी के लगभग 1.5 किलोमीटर हिस्से की सफाई भी की। नदी की सफाई का काम पहले समुदाय के साथ शुरू हुआ और बाद में ड्राईटेक कंपनी के सहयोग से भी आगे बढ़ा।

बोर रिचार्ज से जमीन के भीतर पहुंचाई बारिश

नीरज बताते है की मेरे सारे प्रयोगों में सबसे जरुरी प्रयोग बोर रिचार्ज सिस्टम रहा है। जब हम हजारों फीट नीचे से भूजल निकाल रहे है, तो बारिश का पानी उसी दिशा में वापस क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता? इसी सोच के साथ उन्होंने बोर रिचार्ज सिस्टम पर काम किया। इसका उद्देश्य बारिश के पानी को उचित फिल्ट्रेशन के बाद जमीन के भीतर पहुंचाना है।

नीरज बताते है कि उनके बनाए मॉडल को जल शक्ति मंत्रालय की वेबसाइट पर भी स्थान मिला और इसके बाद कई जगह लोग इस तरह के सिस्टम को अपनाने लगे। यह सिर्फ तकनीकी प्रयोग नहीं था। यह भूजल के साथ हमारे संबंध को बदलने की कोशिश थी। हम जमीन से पानी निकालते हैं। लेकिन क्या हम जमीन को पानी वापस भी देते हैं? यही सवाल उनके काम के केंद्र में है।

मैजिक पिट का प्रयोग खेत में

करीब 5-6 साल पहले, कोविड के समय, नीरज ने अपने खेत में एक और प्रयोग किया, मैजिक पिट। वे  कहते है यह ऐसा गड्ढा है जिसके जरिए खेत में जमा होने वाला बारिश का पानी जमीन के भीतर पहुंचाया जाता है। महाराष्ट्र में इसी तरह की संरचनाओं के कुछ नए रूपों को जलतारा जैसे नामों से भी अपनाया जा रहा है। नीरज इस प्रयोग को खेती की पुरानी समझ से जोड़ते है।

उनका कहना है कि उनके पूर्वज खेतों में जैविक खाद और गोबर डालते थे। इससे मिट्टी भुरभुरी रहती थी और केंचुओं की गतिविधि से मिट्टी में छोटे-छोटे छिद्र बनते थे। बारिश का पानी इन रास्तों से जमीन में चला जाता था।

उनके अनुसार आज रासायनिक उर्वरकों के लगातार इस्तेमाल से कई खेतों में मिट्टी की ऊपरी परत कठोर हो रही है। परिणाम यह है कि खेत में पानी दिखाई तो देता है, लेकिन वह जमीन में पर्याप्त मात्रा में नहीं उतर पाता और बहकर बाहर निकल जाता है।

मैजिक पिट इसी समस्या का एक स्थानीय समाधान है। नीरज का सुझाव है कि एक एकड़ खेत में दो मैजिक पिट बनाए जा सकते हैं, ताकि बारिश के पानी को जमीन में पहुंचाने में मदद मिले।

मैजिक पिट की साइंस 

क्या पानी का स्तर बढ़ा?

नीरज बताते हैं कि पहले गर्मियों में मार्च-अप्रैल तक पानी की समस्या सामने आने लगती थी। अब कुछ क्षेत्रों में जल संरचनाओं की सफाई, स्टॉप डैम और पानी रोकने की व्यवस्थाओं के कारण अप्रैल-मई तक पानी उपलब्ध रहने लगा है।

वे तीगांव के स्टॉप डैम और मोही-मांडवी डैम से किसानों को हुए लाभ का भी उल्लेख करते है। हालांकि उनके पास हर वर्ष का वैज्ञानिक भूजल स्तर मापने वाला लंबा डेटा सेट उपलब्ध नहीं है। वे पिछले चार-पांच वर्षों में पानी की स्थिति में सुधार महसूस होने की बात कहते है।

ग्रामीणों के लिए कुएं में अप्रैल तक पानी रहना अपने आप में बड़ा बदलाव है। लेकिन जल संरक्षण की सफलता को वैज्ञानिक रूप से साबित करने के लिए वर्ष-दर-वर्ष जलस्तर, बारिश और भूजल पुनर्भरण का नियमित रिकॉर्ड भी जरूरी है। यही वह जगह है जहां नीरज जैसे स्थानीय प्रयोगों को वैज्ञानिक निगरानी से जोड़ना आगे की राह हो सकती है।

जलवायु बदल रही है, लेकिन जिम्मेदारी हमारी भी है

पिछले कुछ वर्षों में नीरज ने गर्मी में बढ़ोतरी महसूस की है। उनके अनुसार करीब 5 वर्षों में गर्मी पहले की तुलना में काफी अधिक महसूस होती है। वे इसे जलवायु परिवर्तन से जोड़ते है, लेकिन वे केवल मौसम को दोष नहीं देते।

उनका ध्यान स्थानीय स्तर पर हो रहे पेड़ों की कटाई पर भी है। उनके अनुसार क्षेत्र में पलाश के पेड़ों की कटाई एक परंपरा और मान्यता से जुड़ी हुई है। कुछ अवसरों पर पेड़ की शाखाएं काटकर घरों के दरवाजे पर रखी जाती है। उनका कहना है कि इससे बड़ी संख्या में पेड़ काटे जाते है।

इसके अलावा खेतों की मेड़ों पर लगे पेड़ों को भी काटा जा रहा है। यह समस्या संतरा उत्पादक क्षेत्र में और जटिल हो जाती है। जंगलों के कम होने के साथ वन्यजीवों का आवास भी घटता है। बंदर खेतों और संतरे के बागों की ओर आते हैं और किसान उन्हें रोकने के लिए खेत की मेड़ के पेड़ काट देते है।

नीरज इसे एक बड़े पर्यावरणीय चक्र का हिस्सा मानते हैं, जंगल हमने कम किए, इसलिए वन्यजीव हमारे खेतों में आए और अब उन्हें रोकने के लिए हम पेड़ काट रहे है।

इस साल जंगल में डाले 20 हजार सीड बॉल 

जल संरक्षण से उनका काम अब वन संरक्षण तक भी पहुंच गया है। नीरज बताते है की उनकी टीम ने इस साल जंगलों में 20 हजार सीड बॉल डालने का काम किया है। इसके पीछे भी उनका विचार केवल पेड़ लगाना नहीं है।

सीड बॉल 

वे ऐसे पौधों का चयन करना चाहते है जिन्हें पशु आसानी से न खाएं, जो स्थानीय रोजगार में मदद करें और जिनके फल पक्षियों तथा दूसरे वन्यजीवों के भोजन का हिस्सा बन सकें। इसी सोच के तहत सीताफल, जामुन और आम जैसे पौधों के बीजों का इस्तेमाल किया गया।

उनका मानना है कि अगर जंगल में जानवरों के लिए भोजन उपलब्ध होगा तो वे भोजन की तलाश में खेतों की ओर कम आएंगे। इस तरह उनके लिए जल, जंगल, खेती और वन्यजीव अलग-अलग मुद्दे नहीं है। वे इन्हें एक ही पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा मानते है।

‘हर घर जल’ के बाद अब ‘हर बूंद बचाने’ की जरूरत

नीरज सरकारी योजनाओं की भूमिका को भी स्वीकार करते है। उनके अनुसार हर घर तक नल से पानी पहुंचाने जैसी योजनाओं से ग्रामीणों को सुविधा मिली है। लेकिन उनका सवाल यह है कि पानी घर तक पहुंचने के बाद उसे बचाने की बात कितनी हो रही है?

पहले जब लोग हैंडपंप से पानी निकालते थे या दूर से पानी लाते थे, तो पानी की हर गुंडी का महत्व था। अब नल और मोटर की सुविधा ने पानी तक पहुंच आसान कर दी है। उनके अनुसार सुविधा बढ़ने के साथ पानी की बर्बादी भी बढ़ी है।  वे अपने जागरूकता कार्यक्रमों में इसी व्यवहार को बदलने की कोशिश करते हैं। उनका संदेश सीधा है -

“पानी सिर्फ घर तक पहुंचाना पर्याप्त नहीं है, पानी को बचाना भी जरूरी है।”

एक नदी के लिए 100 किलोमीटर की यात्रा

नीरज का काम केवल खेत और गांव तक सीमित नहीं रहा।पांढुर्णा में स्थानीय लोगो और एडमिनिस्ट्रेशन के साथ मिलकर जाम नदी को बचाने के लिए उन्होंने उद्गम से संगम तक यात्रा हुई। यात्रा करीब तीन दिनों में पूरी की गई, जिसमें कुछ दूरी पैदल और कुछ वाहन से तय की गई।

नदी को बचाने के लिए उन्होंने उसके पर्यावरणीय महत्व के साथ-साथ उसके सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को भी लोगों के सामने रखा। जाम नदी के किनारे मौजूद मंदिरों, आश्रमों और संत परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने लोगों को समझाया कि नदी केवल पानी की धारा नहीं है। वह स्थानीय समाज की स्मृति, संस्कृति और आस्था से भी जुड़ी है।

उन्होंने नदी के किनारे कचरा न डालने और गंदा पानी न छोड़ने की अपील भी की। यह उनके जागरूकता मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लोगों को उसी भाषा में समझाना जिसमें वे नदी को महसूस करते हैं।

सम्मान मिले, लेकिन काम नहीं बदला

नीरज के काम को समय के साथ पहचान भी मिली। उन्हें 2019 में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा ‘वॉटर हीरो’ सम्मान मिला। 2022 में जल संरक्षण के काम के लिए ‘जल प्रहरी’ सम्मान भी मिला। इसके अलावा पर्यावरण जागरूकता से जुड़े कई अन्य सम्मान भी उन्हें मिले है।

लेकिन उनके लिए पुरस्कार काम का उद्देश्य नहीं बने। वे बताते हैं कि उन्हें नई चीजें सीखना पसंद है। कभी गूगल से, कभी प्रशिक्षण से और कभी खुद प्रयोग करके वे सिखते रहते है। उनका मानना है कि सीखने के लिए कोई व्यक्ति छोटा या बड़ा नहीं होता।

भारत में जल सुरक्षा के लिए सरकार बड़े पैमाने पर नदी जोड़ परियोजनाओं पर काम कर रही है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य योजना में 30 नदी लिंक की पहचान की गई है। इसका उद्देश्य जल-अधिशेष क्षेत्रों से जल-अभाव वाले क्षेत्रों तक पानी पहुंचाना है।

केन-बेतवा जैसी परियोजनाओं के जरिए सिंचाई, पेयजल और क्षेत्रीय जल सुरक्षा को मजबूत करने की कोशिश हो रही है। अगर हम एक ओर करोड़ों-हजारों करोड़ रुपये खर्च करके पानी को एक नदी से दूसरी नदी तक पहुंचाने की योजना बना रहे हैं, तो दूसरी ओर अपने गांव की बारिश की बूंद को वहीं रोकने के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं? बड़ी नदी जोड़ परियोजनाएं अपनी जगह महत्वपूर्ण हो सकती हैं। लेकिन जल सुरक्षा का दूसरा सिरा स्थानीय स्तर पर ही है।

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